धरती की सतह पर फैली मृदा की पतली-सी परत मानव जीवन की आधारशिला है, क्योंकि यही वह माध्यम है जिसके सहारे खाद्य उत्पादन, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन कायम रहता है। किंतु आधुनिक विकास की तेज़ रफ्तार, रासायनिक कृषि, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के सम्मिलित प्रभाव ने इस अमूल्य संसाधन को गंभीर संकट में डाल दिया है। मृदा का निर्माण जहाँ हजारों वर्षों में होता है, वहीं उसका क्षरण कुछ ही वर्षों में संभव हो जाता है, जिससे उसकी उर्वरता और संरचना पर प्रतिकूल असर पड़ता है। आज विश्व के सामने यह प्रश्न गम्भीरता से उभर रहा है कि क्या हम अपनी ही जीवनदायिनी मिट्टी को खोते जा रहे हैं। मृदा संकट केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और मानव अस्तित्व से जुड़ा एक व्यापक वैज्ञानिक विषय बन चुका है।
मृदा का निर्माण एक अत्यंत धीमी प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे पेडोजेनेसिस कहा जाता है। चट्टानों के अपक्षय, जैविक अवशेषों के विघटन, जलवायु और स्थलाकृति के दीर्घकालिक प्रभावों से मिलकर यह प्रक्रिया हजारों वर्षों में कुछ सेंटीमीटर उपजाऊ मिट्टी तैयार करती है। इसके विपरीत, आधुनिक मानवीय गतिविधियाँ; विशेषकर गहन कृषि, वनों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण, मृदा के क्षरण को इतनी तीव्र गति से बढ़ा रही हैं कि यह संतुलन बिगड़ता जा रहा है। एक ओर प्रकृति मृदा को बनाने में सहस्राब्दियाँ लगाती है, वहीं दूसरी ओर मनुष्य कुछ ही वर्षों में उसकी ऊपरी उपजाऊ परत को नष्ट कर देता है। यही असंतुलन मृदा संकट की जड़ में है।

यदि हम मृदा को केवल एक निष्क्रिय माध्यम के रूप में देखें, तो शायद उसकी हानि का महत्व समझ में न आए, किंतु वैज्ञानिक दृष्टि से मृदा एक जीवित प्रणाली है। इसमें अरबों सूक्ष्मजीव जैसे- बैक्टीरिया, कवक, शैवाल, प्रोटोजोआ आदि सक्रिय रहते हैं, जो पोषक तत्वों के चक्रण, कार्बनिक पदार्थों के विघटन और पौधों के लिए आवश्यक तत्वों की उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृदा की यही जैविक सक्रियता उसकी उर्वरता का मूल है। जब रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है, तो यह सूक्ष्मजीव समुदाय प्रभावित होता है, जिससे मृदा की प्राकृतिक उर्वरता घटने लगती है। धीरे-धीरे मिट्टी केवल एक माध्यम बनकर रह जाती है, जिसे कृत्रिम रूप से पोषक तत्व देकर फसल उगाई जाती है, किंतु उसकी स्वाभाविक उत्पादकता समाप्त होने लगती है।
मृदा अपरदन इस संकट का एक और गंभीर पहलू है। वर्षा की तीव्रता, बाढ़, तेज हवाएँ और मानव-जनित कारण जैसे वनों की कटाई और अनुचित कृषि पद्धतियाँ मिलकर मृदा की ऊपरी परत को बहा ले जाती हैं। यही ऊपरी परत सबसे अधिक उपजाऊ होती है, जिसमें कार्बनिक पदार्थ और पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है। जब यह परत नष्ट होती है, तो भूमि की उत्पादकता में तेजी से गिरावट आती है। भारत जैसे देश में, जहाँ मानसून पर कृषि अत्यधिक निर्भर है, वहाँ मृदा अपरदन की समस्या और भी गंभीर हो जाती है। हर वर्ष लाखों टन उपजाऊ मिट्टी नदियों में बह जाती है, जो अंततः समुद्र में जमा हो जाती है, और पीछे छूट जाती है बंजर होती भूमि।
हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इसके साथ ही मृदा पर दबाव भी बढ़ा। उच्च उत्पादक किस्मों के बीज, रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई के व्यापक उपयोग ने प्रारंभिक वर्षों में उत्पादन को बढ़ाया, किंतु दीर्घकाल में इससे मृदा की संरचना और जैविक संतुलन प्रभावित हुआ। एक ही प्रकार की फसल को बार-बार उगाने की प्रवृत्ति, जिसे एकल फसल प्रणाली कहा जाता है, मृदा के पोषक तत्वों को असंतुलित कर देती है। उदाहरण के लिए, यदि लगातार गेहूँ या धान की खेती की जाए, तो नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे तत्वों का अनुपात बिगड़ जाता है, जिससे उत्पादन धीरे-धीरे घटने लगता है।
शहरीकरण और औद्योगिकीकरण भी मृदा संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जैसे-जैसे शहर फैलते जा रहे हैं, कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल घटता जा रहा है। सड़कों, भवनों, कारखानों और अन्य बुनियादी ढाँचों के निर्माण के लिए उपजाऊ भूमि का उपयोग किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषक तत्व मृदा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, जिससे वह कृषि के लिए अनुपयुक्त होती जाती है। कई स्थानों पर भारी धातुओं का संचय मृदा को विषैला बना रहा है, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाल सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव, सूखा और बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति, ये सभी मृदा की संरचना और उसकी जल धारण क्षमता को प्रभावित करते हैं। जब लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो मिट्टी की नमी कम हो जाती है और वह कठोर होकर दरारें विकसित कर लेती है। दूसरी ओर, अत्यधिक वर्षा मिट्टी के कणों को ढीला कर देती है, जिससे अपरदन की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन मृदा संकट को एक बहुआयामी समस्या बना देता है।

मृदा संकट के वैज्ञानिक आकलन के लिए आज विभिन्न उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिनमें रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस ) और मृदा स्वास्थ्य सूचकांक प्रमुख हैं। उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भूमि उपयोग में परिवर्तन, वनस्पति आवरण की स्थिति और मृदा नमी का विश्लेषण किया जाता है, जिससे क्षरण के संभावित क्षेत्रों की पहचान संभव हो पाती है। इसके साथ ही, मृदा में उपस्थित कार्बनिक कार्बन की मात्रा, सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलन और पी एच स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर उसकी गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जाता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण न केवल वर्तमान स्थिति को समझने में सहायक है, बल्कि भविष्य की योजनाओं और नीतियों के निर्माण के लिए भी आधार प्रदान करता है, जिससे मृदा संरक्षण के प्रयास अधिक लक्षित और प्रभावी बन सकते हैं।
मृदा संकट का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर भी असर डालता है। जब मृदा की उर्वरता घटती है, तो फसलों की उत्पादकता कम होती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न होता है। इसके साथ ही, फसलों में पोषक तत्वों की मात्रा भी कम हो जाती है, जिससे पोषण संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। मृदा की जल धारण क्षमता घटने से जल संकट भी गहरा सकता है, क्योंकि वर्षा का जल जमीन में समाहित होने के बजाय बह जाता है। इसके अतिरिक्त, मृदा में कार्बन का भंडारण कम होने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ सकती है, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज कर सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मृदा केवल खाद्य उत्पादन का माध्यम ही नहीं, बल्कि वैश्विक कार्बन चक्र का भी एक प्रमुख घटक है। मृदा में विशाल मात्रा में कार्बन संचित रहता है, जो पौधों और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के माध्यम से नियंत्रित होता है। जब मृदा का क्षरण होता है या उसकी जैविक संरचना नष्ट होती है, तो यह संचित कार्बन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में उत्सर्जित होने लगता है, जिससे जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस दृष्टि से मृदा संरक्षण केवल कृषि या पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के शमन की एक प्रभावी रणनीति भी है। यदि मृदा में कार्बन का संरक्षण और संवर्धन किया जाए, तो यह न केवल उसकी उर्वरता बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक तापवृद्धि को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
भारत के संदर्भ में मृदा संकट विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि यहाँ की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। देश के विभिन्न हिस्सों में मृदा क्षरण के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानों में बाढ़ से मृदा का ह्रास होता है, जबकि पश्चिमी भारत में मरुस्थलीकरण की समस्या बढ़ रही है। मध्य भारत और दक्कन के पठार में मृदा की उर्वरता घटने की समस्या सामने आ रही है। इसके अतिरिक्त, अंधाधुंध भूजल दोहन और असंतुलित सिंचाई के कारण कई क्षेत्रों में लवणता और क्षारीयता बढ़ रही है, जिससे भूमि अनुपजाऊ होती जा रही है।
इस संकट का समाधान केवल तकनीकी उपायों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मृदा संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए जैविक खेती, फसल चक्र, संरक्षण कृषि, वनीकरण और जल प्रबंधन जैसे उपाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जैविक खेती में प्राकृतिक खादों का उपयोग मृदा की संरचना और जैविक सक्रियता को बढ़ाता है। फसल चक्र अपनाने से मृदा के पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है और कीटों का प्रकोप भी कम होता है। संरक्षण कृषि के अंतर्गत कम जुताई और फसल अवशेषों को मिट्टी में बनाए रखने से मृदा अपरदन कम होता है और उसकी नमी बनी रहती है।
वनीकरण और वृक्षारोपण मृदा संरक्षण के प्रभावी उपाय हैं, क्योंकि पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं और अपरदन को रोकती हैं। इसके साथ ही, पेड़ कार्बनिक पदार्थों की आपूर्ति भी करते हैं, जिससे मृदा की उर्वरता बढ़ती है। जल प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों, जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, से जल का कुशल उपयोग संभव है और मृदा की संरचना पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय स्तर पर पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ मृदा संरक्षण के सिद्धांतों पर आधारित थीं।
नीतिगत स्तर पर भी मृदा संरक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। सरकारों को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जो टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहित करें और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को नियंत्रित करें। किसानों को मृदा स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूक करना और उन्हें उचित प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाएँ इस दिशा में एक सकारात्मक पहल हैं, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
मृदा संकट केवल वैज्ञानिक या पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और नैतिक प्रश्न भी है। यह इस बात का संकेत है कि हम प्रकृति के साथ अपने संबंधों को किस प्रकार देखते हैं। यदि हम मृदा को केवल एक संसाधन के रूप में देखते रहेंगे, तो उसका दोहन जारी रहेगा और संकट गहराता जाएगा। इसके विपरीत, यदि हम इसे एक जीवित तंत्र के रूप में समझेंगे और उसके साथ संतुलित संबंध स्थापित करेंगे, तो हम इस संकट से उबर सकते हैं। मृदा का संरक्षण केवल किसानों या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, क्योंकि अंततः हमारी थाली में आने वाला हर कण उसी मिट्टी से जुड़ा हुआ है, जिसे हम आज अनदेखा कर रहे हैं।
मृदा संकट की गंभीरता को समझना आज केवल वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के सरोकार से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। जिस गति से हम मृदा संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, वह भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों पर प्रत्यक्ष आघात है। यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ जारी रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब उपजाऊ भूमि का अभाव वैश्विक असमानताओं, खाद्य संघर्षों और सामाजिक अस्थिरता को जन्म देगा। इसलिए आवश्यक है कि हम मृदा को एक निष्क्रिय संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवंत धरोहर के रूप में देखें, जिसकी रक्षा और संवर्धन हमारे अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। सतत विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए मृदा संरक्षण को केंद्र में रखना ही वह वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण है, जो मानव सभ्यता को एक सुरक्षित और संतुलित भविष्य की ओर ले जा सकता है।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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