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ताकि गरिमापूर्ण बना रहे लोकतंत्र

so that democracy remains dignified

1999 के आम चुनाव में मधेपुरा सीट से शरद यादव के हाथों हारने के ठीक तीन साल बाद लालू यादव राज्यसभा पहुंचे। संसद के दोनों सदनों की एक परिपाटी रही है। जब भी कोई नया सदस्य बोलता है, पूरे सदन से उम्मीद की जाती है कि उससे टोका-टाकी ना हो। लेकिन नए सदस्य से भी उम्मीद की जाती है कि वह भी अपने भाषण में ऐसे मुद्दों को ना शामिल करे, जो विवादित हों। लेकिन लालू यादव कहां मानने वाले थे। भाषण के शुरूआत के कुछ ही देर बाद वे उन सारे मुद्दों पर आ गए, जिन पर सदन में शोरशराबा होना लाजमी था। शोर बढ़ता देख राज्यसभा की तत्कालीन उपसभापति नजमा हेपतुल्ला आसन पर पहुंची, क्योंकि तब आसन कोई और संभाल रहा था। उन्होंने लालू यादव के भाषण पर तत्काल रोक लगा दी। उन्हें समझाया कि एक राज्य के मुख्यमंत्री रहे और एक पार्टी के अध्यक्ष से ऐसे असंसदीय परंपरा की उम्मीद नहीं की जा सकती। लालू यादव ने आसन की बात मानी और फिर उन्होंने अपना भाषण पूरा किया।

इसके बरक्स आज की संसद को हमें देखना चाहिए। हमने जिस संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार किया है। वह एक तरह से ब्रिटेन की कॉपी है। ब्रिटेन की संसद में कई अच्छी परंपराएं हैं। जैसे संसद का कोई सदस्य किसी पर बिना किसी प्रमाण के आरोप नहीं लगा सकता। सांसद चाहे जिस भी पृष्ठभूमि या दल का हो, वह हवा-हवाई किसी पर आरोप नहीं लगाता। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में संसदो को सबसे पवित्र दर्जा हासिल है। इसी पवित्रता बोध पर ही संसदीय परंपराएं निर्मित हुई हैं और उन्हें पल्लवित-पुष्पित किया गया है। देश चाहे जो भी हों, अगर वहां लोकतंत्र मजबूत बना हुआ है तो इसकी बड़ी वजह वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संसद के प्रति पावन भाव की बड़ी भूमिका है। संविधान सभा की बहसों से जब हम गुजरेंगे तो हमें पता चलेगा कि संविधान निर्माताओं ने अपनी संसद के प्रति भी ऐसा ही भाव रखा था। जिसका कमोबेश हर दल पालन करता रहा है।

लेकिन हाल के कुछ वर्षों में संसद को पवित्र जगह मानने का भाव कमजोर हुआ है। कुछ राज्यों की विधानसभाएं कभी-कभी अखाड़े में जरूर परिवर्तित होती रही हैं। तमिलनाडु की विधानसभा में जयललिता से हुई बदसलूकी और उत्तर प्रदेश की विधानसभा में हुई खुली मारपीट इसका उदाहरण हैं। लेकिन कुल मिलाकर हर विधानसभा से यही उम्मीद की जाती रही है कि उनके यहां भी पवित्रताबोध से भरी संसद जैसा ही बर्ताव होगा। शायद यही वजह है कि संसदीय कार्यवाही को लेकर खास तरह के आदरभाव की उम्मीद की जाती रही है। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में यह आदरभाव कम हुआ है। इसकी बड़ी वजह यह है कि आज की राजनीतिक पीढ़ी संसद को अपनी भड़ास निकालने और इस पूरी प्रक्रिया में अनर्गल प्रलाप करने का माध्यम तक मान चुकी है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने इस सोच को एक कदम और आगे बढ़ा दिया। विधानसभा और राज्य का विषय भले ही न हो, लेकिन उस पर विचार के लिए विधानसभा बुला ली और संसदीय विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए वहां अनाप-शनाप बोलना और आरोप लगा दिया। दिल्ली की विधानसभा की तमाम कार्यवाहियों को देखेंगे तो हर बार कुछ ना कुछ दिन ऐसे जरूर रहेंगे, जब सत्ता पक्ष, मुख्यमंत्री या मंत्री केंद्र सरकार, विपक्षी नेता आदि पर आधारहीन आरोप लगाएगा।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा के दौरान राहुल गांधी का भाषण भी अरविंद केजरीवाल मार्का राजनीति का विस्तार लगता है।

दरअसल संसद या विधानमंडलों के सदस्यों को एक विशेषाधिकार हासिल है। संसद या विधानमंडल में बोलने या वहां किसी पर आरोप लगाने को लेकर किसी भी अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। केजरीवाल सरकार इसी विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके बार-बार विधानसभा सत्रों में आरोप लगाती रही है। केजरीवाल बाहर रहते हुए भी खूब आरोप लगाते रहे। आधारहीन आरोपों को लेकर जब अरूण जेटली और नितिन गडकरी ने अदालती कार्यवाही की तो बिना शर्त माफी भी मांग ली। कई ऐसे और भी मामले रहे। इसी तरह राहुल गांधी भी जनसभाओं में आरोप लगाते रहे। ऐसे आरोपों को लेकर उन पर मामले भी चल रहे हैं। जिसमें एक रांची में भी चल रहा मामला है। ठाणे में भी उन पर मामला चल रहा है।

राहुल गांधी से उम्मीद थी कि वे संसद में जो भी आरोप लगाएंगे, कम से कम उनके पास उनका ठोस आधार होगा। अगर वे ऐसा करते तो उनके कई आरोपों को संसदीय कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया नहीं जा सकता था। यह बात और है कि संसदीय कार्यवाही से उनके बयानों के कई अंशों को हटाने को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर आरोप लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे रीढ़हीन स्पीकर हैं और सरकार के दबाव में ऐसा कर रहे हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता राहुल गांधी के बयान को न भूतो न भविष्यति के तौर पर सोशल मीडिया से लेकर अपने तमाम मंचों पर उठा रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति है कि जनता यह मान ले कि राहुल गांधी ने जो किया है, वही सही है। जनता का एक वर्ग इसे मान भी लेगा। सोशल मीडिया के दौर में ऐसा संभव भी है। आज पृष्ठभूमि की तरह जाने या उसे खोजने के लिए लोगों के पास वक्त नहीं है। सोशल मीडिया ने हमें तात्कालिक सूचनाओं को ही समूचा ज्ञान मानने की प्रक्रिया का सफल अंग बना दिया है। इसलिए यही माना जाएगा कि राहुल गांधी ने जो किया, वही सही है। असंसदीय माने जाने वाले उनके भाषण के अंशों को हटाना सरकार की तानाशाही है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब पारंपरिक तौर पर प्रधानमंत्री देता है। प्रधानमंत्री के जवाब के वक्त जिस तरह लगातार टोकाटाकी हुई, वह भी संसदीय परंपरा का खुला उल्लंघन है।

संसदीय परंपरा है कि जब प्रधानमंत्री बोल रहा हो तो दूसरा सदस्य तब बोलेगा, जब प्रधानमंत्री उसे मौका देते हुए अपनी सीट पर बैठ जाए। अगर प्रधानमंत्री खड़ा है तो मतलब है कि सदन को उसे सुनना है। अगर सदन को किसी बात पर आपत्ति है तो सदस्य बाद में प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। इस संदर्भ में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते वक्त लोकसभा का एक किस्सा याद आ रहा है। गुजरात से जुड़े एक मसले पर चर्चा के दौरान जब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने हस्तक्षेप किया तो गुजरात के एक कांग्रेसी सांसद ने टोकाटाकी शुरू कर दी। उनकी टोकाटाकी से परेशान वाजपेयी यह कहते हुए बैठ गए कि अब आप ही बोलिए, प्रधानमंत्री नहीं बोलेगा। अटल के बैठते हुए पूरी सदन में जैसे सन्नाटा छा गया। इसके बाद प्रियरंजन दास मुंशी अपनी सीट पर खड़े होकर बताने लगे कि अटल जी भाषण क्यों नहीं देंगे। उन्होंने वह किस्सा भी बताया कि पहली बार उन्हें सुनने के लिए वे साइकिल से बोलपुर गए थे। इसके बाद रामबिलास पासवान उठ खड़े हुए। उन्होंने भी वाजपेयी के भाषण सुनने के लिए बोरा लेकर जाने का अपना अनुभव बताया। इसके बाद तो जैसे सदन में तांता लग गया। ऐसे में जिस कांग्रेसी सांसद ने वाजपेयी को टोक-टोक कर परेशान किया था, शर्मिंदा हो गए और वाजपेयी से माफी मांगी। उसके बाद प्रधानमंत्री अपनी सीट पर खड़े हुए और तत्कालीन चर्चा पर विपक्ष की बखिया उखेड़ दी। अपने मंत्रियों का जोरदार बचाव किया।

ये संसदीय परंपरा बहुत पुरानी बात नहीं है। सवाल यह है कि क्या आज के सांसद और विशेषकर नेता प्रतिपक्ष जैसे अहम सांसद भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे? सदन में जो बोला जा रहा है, चाहे जितना भी ताकतवर सांसद हो, वैसा सदन के बाहर बोले तो उसके खिलाफ मुकदमों की बौछार हो सकती है। वैसे कांग्रेसी ऐसा करने के उस्ताद रहे हैं। संबित पात्रा को इसका अनुभव है। जब कांग्रेस शासित छतीसगढ़ से उनके खिलाफ सैकड़ों मुकदमे दर्ज करा दिया गए थे।

संसदीय परंपराओं की महानता को हम बचाकर नहीं रखेंगे, सांसद अपने शब्दों की ताकत नहीं समझेंगे, संसद को लेकर पावन बोध विकसित नहीं करेंगे तो इसके संदेश बेहद खराब होंगे। लोग और वोटर फिर संसद को क्यों गंभीर मानेंगे। इससे संसद की गरिमा का पतन होगा और अंतत: इससे लोकतंत्र कमजोर होगा।






उमेश  चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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