मध्य काल, विशेषकर मुगलकाल में हिंदुओं की रोटी, बेटी और चोटी पर सबसे ज्यादा हमले हुए। इसके पहले विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने भी हिंदू समाज, उनकी संपत्ति और मंदिरों को लूटपाट का निशाना बनाया। जनश्रुतियों, ऐतिहासिक तथ्यों और स्थानीय कहानियों में हिंदुओं पर अत्याचार की कहानियां भरी-पड़ी हैं। भारतीय राजनीति की एक धारा इन तथ्यों को जानते हुए जहां इन मुद्दों और उनसे जुड़े तथ्यों पर लगातार मिट्टी डालने की कोशिश करती रहती है तो दूसरी धारा इन मुद्दों के तार्किक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। लेकिन अत्याचारों की सूची इतनी बड़ी है कि आए दिन कोई न कोई नया तथ्य सामने आ जाता है और फिर हिंदू-मुस्लिम को लेकर नया विवाद खड़ा हो जाता है। हालिया मामला महाराष्ट्र के पुणे के अंबेगांव तालुका के मंचर में सामने आया है। यहां चावड़ी चौक में एक स्थानीय दरगाह की मरम्मत का काम चल रहा था। इसी बीच पंद्रह सितंबर, शुक्रवार को दोपहर करीब ढाई बजे दरगाह की एक दीवार ढह गई।
इस दीवार के ढहते ही दरगाह से जुड़ा एक ऐसा तथ्य सामने आया, जिससे विवाद उठना स्वाभाविक है। दरअसल दीवार के अंदर एक सुरंग जैसा ढांचा मिला। इसे देखकर ऐसा लग रहा है कि दरगाह के पहले इस जगह पर मंदिर था। जैसे ही यह तथ्य सामने आया, इलाके में अफरा-तफरी स्वाभाविक तौर पर मच गई। हिंदू समुदाय जहां अपने धर्मस्थल पर दावा जताने लगा तो मुस्लिम पक्ष इसे झुठलाने लगा। हिंदू पक्ष का कहना है कि दरगाह के नीचे मंदिर था, जबकि मुस्लिम पक्ष इस दावे के विरोध में उठ खड़ा हुआ है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस जगह पर सिर्फ दरगाह और कब्रें ही हैं।
गौरतलब है कि इस दरगाह की मरम्मत के लिए मंचर नगरपालिका ने करीब 60 लाख रुपये की मंजूरी दी है। उसी पैसे से यहां मरम्मत का काम चल रहा था। इसी निर्माण के दौरान दीवार गिरी और इतिहास की एक अंधेरी परत दुनिया के सामने उजागर हो गई। बहरहाल प्रशासनिक प्रयासों से दोनों पक्ष अदालती निर्णय को मानने के लिए राजी हुए हैं और मंचर के दरगाह की जांच का जिम्मा भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को दिए जाने की चर्चा बढ़ गई है। विवाद के बाद दरगाह में निर्माण और मरम्मत का काम रोक दिया गया है।
मंचर की घटना ने मध्य काल और मुगल शासन के दौरान तोड़े गए मंदिरों और उनकी जगह बनाई गई मस्जिदों के मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है। अयोध्या के राममंदिर पर बना मस्जिद का ढांचा टूटे तीन दशक से ज्यादा हो गए। अयोध्या में रामलला का मंदिर बन भी चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद माना जा रहा है कि यह विवाद टल गया। लेकिन अब भी रह-रहकर कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों को यहां की कथित मस्जिद की हूल उठती रहती है। हालांकि लंबी चली अदालती प्रक्रिया के दौरान जिस तरह के पुरातात्विक साक्ष्य सामने आए, उससे साफ हुआ कि यहां राममंदिर था और उसे ही मध्यकाल में तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।
मंचर की घटना ने एक बार फिर इतिहास की ऐसी घटनाओं की याद दिला दी है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थित केशव देव मंदिर और शाही मस्जिद विवाद को लेकर अदालत में सुनवाई जारी है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित इस मंदिर को केशव राय मंदिर भी कहा जाता है और करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं इससे जुड़ी हैं। ऐसी मान्यता है कि करीब 5000 साल पहले श्रीकृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने ही यहां मंदिर बनवाया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भी यहां बड़ा मंदिर बना था। बाद में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय यहां दूसरा मंदिर बनाया गया। इसी मंदिर को 1017 ई.में महमूद गजनी ने तहस-नहस कर दिया। इसके बाद सन 1150 में विजय पाल देव के शासन के दौरान जज्जा ने यहां तीसरी बार मंदिर बनाया। कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने इसी मंदिर में भगवान कृष्ण का साक्षात् दर्शन किया था। चौथी बार ओरछा के राजा बीर सिंह देव बुंदेला ने मुगल बादशाह जहांगीर के समय यहां 33 लाख रुपये की लागत से नया मंदिर बनवाया। सन 1670 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस मंदिर पर हमला किया और इसे क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बाद मंदिर के भग्नावेशों के ऊपर मस्जिद का निर्माण कराया गया, जिसे आज शाही मस्जिद के नाम से जाना जाता है। कृष्ण की जन्मभूमि पर आज भी यह मस्जिद खड़ी है। बाद में यहां मंदिर बनाने की कई कोशिशें हुईं। आज जो मंदिर यहां मौजूद है, उसे साल 1965 में बनाया गया।
वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी ऐसा ही ऐतिहासिक तथ्य है। यहां के विश्वेश्वर मंदिर का भी इतिहास कुछ ऐसा ही है। वाराणसी के नजदीक जौनपुर की अटाला मस्जिद के बारे में भी तथ्य है कि उसे अटाला देवी के मंदिर के भग्नावशेष पर बनाया गया। इसका निर्माण, शर्की वंश के नवाब इब्राहिम नायब बारबक ने कराया था। इब्राहिम सुल्तान फिरोज शाह तुगलक तृतीय का भाई था। इब्राहिम ने अटाला देवी के प्राचीन मंदिर को साल 1364 में तोड़ा और सन 1377 में यहां मस्जिद का निर्माण शुरू कराया, जो 1408 में बनकर तैयार हुई।
गुजरात के पाटन जिला स्थित सिद्धपुर के रुद्र महालय मंदिर की भी ऐसी ही कहानी है। इसे रुद्रमल मंदिर के नाम से भी जानते हैं, जिसके भग्नावशेष पर मस्जिद बनवा दी गई। इस मंदिर का निर्माण चालुक्य राजवंश के मुलाराजा ने इस मंदिर का निर्माण साल 943 में शुरू करवाया था और 1140 में जयसिम्हा सिद्दराजा के कार्यकाल में यह निर्माण पूरा हुआ। इसी मंदिर को पहले अलाउद्दीन खिलजी और बाद में अहमद शाह प्रथम ने 1410-44 के बीच तोड़ा और इसके ही एक हिस्से में जामा मस्जिद बनवा दी। इस मस्जिद में आज भी मंदिर से जुड़े तमाम अवशेष दिखते हैं।
अहमदाबाद के जामा मस्जिद को लेकर भी बहुत विवाद है, जिसका निर्माण 1424 में अहमद शाह ने कराया था। यह मस्जिद जिस स्थान पर है, वहां पहले भद्रकाली देवी का मंदिर था। इतिहास में अहमदाबाद का नाम इसी देवी के नाम पर भद्रा भी रहा है। कभी इसका नाम कर्णावती तो कभी राजनगर तो कभी असावल भी रहा है। लेकिन मुस्लिम शासकों ने अपने शासन काल में इसे बदलकर अहमदाबाद कर दिया । भद्रकाली का मंदिर राजस्थान के मालवा के परमार राजाओं ने कराया था। परमार राजाओं का शासनकाल 9वीं से 14वीं सदी तक रहा।
पश्चिम बंगाल के मालदा जिला स्थित अदीना मस्जिद अब जीर्ण-शीर्ण हालत में है। बांग्लादेश सीमा के नजदीक स्थित यह मस्जिद एक समय भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती थी। 14वीं सदी में बनाई गई इस मस्जिद की बंगाल सल्तनत में रूतबा हासिल रहा है। क्योंकि इस सल्तनत के इलियास शाही राजवंश के दूसरे सुल्तान सिकंदर शाह के काल में इसका निर्माण हुआ । माना जाता है कि यह मस्जिद हिंदू मंदिर और बौद्ध मंदिर के भग्नावशेषों पर तैयार कराया गया है। इसकी बाहरी दीवारों पर अब भी मंदिर और बौद्ध मंदिर की कलाकृतियां दिखती हैं।
विदिशा की वीजा मंडल मस्जिद बहुत मशहूर है। इसे स्थानीय लोग विजय मंदिर के नाम से भी जानते हैं। इसकी गणना देश के विशालतम मंदिर परिसरों में होती है। माना जाता है कि चालुक्य वंश के राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति ने विदिशा विजय की स्मृतियों को स्थायी बनाने के लिए सूर्य का मंदिर बनवाया था। इसे भेल्लि स्वामिन नाम से भी जाना जाता था। बाद में परमार शासकों ने अपने शासनकाल के दौरान 10वीं से 11वीं सदी के बीच इसका पुनर्निर्माण कराया। लेकिन 1233-34 में इस पर मुगल और आक्रांताओं की निगाह पड़ी और उन्होंने इसे लूटपाट का निशाना बनाया। इस मंदिर पर गुलाम अल्तमश से लेकर अलाउद्दीन खिलजी, महमूद खिलजी, बहादुर शाह और औरंगजेब तक की नापाक निगाह रही और उन्होंने यहां लूटपाट भी की। 17वीं शताब्दी में औरंगजेब ने तो इसे तोपों से उड़ा दिया और इससे बचे पत्थरों से मीनार का निर्माण कराया। इसके जरिए उसे मस्जिद बना दिया।
इतिहास के ये कुछ तथ्य हैं, जिनसे जाहिर है कि किस तरह विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं और मुगल शासकों ने हिंदू श्रद्धा के केंद्रों और आराध्यों के मंदिरों को निशाना बनाया और उन्हें तोड़कर वहां मस्जिदें बनवा दीं। मंचर उसी प्रवृत्ति का प्रतीक है।
अप्सरा की प्रतिमा

पुणे के यवत में भुलेश्वर मंदिर में अप्सरा की प्रतिमा। इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में किया गया था। लेकिन इस मंदिर पर 17वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हमला किया और यहां स्थित प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया। भूलेश्वर मंदिर की खासियत यह है कि इसे किलानुमा आकार में बनाया गया है।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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