चार जून को चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी के एक बड़े नेता से पूछा गया कि अपनी पार्टी के मौजूदा प्रदर्शन को आप किस तरीके से देखते हैं तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि कार्यकर्ता कब तक उपेक्षित रहता। पार्टी उसे कुछ दे या नहीं दे, वह जाएगा भला कहां? उन्हीं का जवाब था कि बाहरी लोगों को लगातार तवज्जो दिया गया तो प्रतिबद्ध कार्यकर्ता घर बैठ गया..वह मतदाताओं को मनाने और बूथ तक पहुंचाने के लिए घर से निकला ही नहीं। इस बीच आई खटाखट की अर्थनीति ने विशेषकर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों को अपने मोहपाश में बांध लिया। लगा कि राहुल बाबा पीएम बनते ही उसे एक लाख रूपए देने लगेंगे, ठीक वैसे ही, जैसे छह हजार मोदी जी देते हैं। ऐसे में पार्टी का ऐसा प्रदर्शन होना ही था। उस नेता का कहना था।
लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं है, जिसकी वजह से बीजेपी की स्थिति खराब हुई। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर सांसदों का यही मानना था कि वे कुछ करें या न करें, मोदी जी की लोकप्रियता से जीत ही जाएंगे। लेकिन इस बार जनता ने तय कर लिया था कि मोदी जी की लोकप्रियता तो बरकरार रहेगी,लेकिन उसके सांसद जी को इस बार मुंह की खानी ही होगी। ठीक दो दशक पहले के चुनाव की ही तरह वोटर का नजरिया रहा, तब देश का ज्यादातर मतदाता अटल जी की फिर से सरकार देखना चाहता था, लेकिन स्थानीय सांसद को अपने क्षेत्र से बाहर करना चाहता था। पता नहीं इस तथ्य को बीजेपी नेतृत्व समझ पाया या नहीं, लेकिन पार्टी के लिए यह बड़ा झटका है। नरेंद्र मोदी कार्यकाल के लिहाज से नेहरू की बराबरी करते हुए तीसरी बार प्रधानमंत्री तो बन चुके हैं, लेकिन वे नेहरू का एक रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए हैं, वह रिकॉर्ड है, तीसरी बार अपनी पार्टी को बहुमत दिलाना। मोदी ने जब से गुजरात की कमान संभाली है, राज्य के हर चुनाव में बहुमत की गारंटी रहे, केंद्र में भी दो बार बहुमत दिलाने में कामयाब रहे, लेकिन तीसरी बार चूक गए।
अठारहवीं लोकसभा चुनावों में बीजेपी भले ही सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी हो, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो यह नतीजा उसके लिए सबसे बड़ा झटका ही माना जाएगा। 2014 में जब पार्टी 283 सीटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल करके सत्ता में आई थी, तब कहा गया था कि देश का मतदाता प्रबुद्ध हो गया है। उसे अस्थिर सरकारें मंजूर नहीं हैं। 2019 के आम चुनावों ने इसी धारणा को आगे बढ़ाया और ब्रांड मोदी का नाम स्थापित हो गया। लेकिन 2024 में स्थितियां बदली हुई हैं। हालत ये रही कि भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर 240 पर ही अटक गई। ऐसे में सवाल उठेंगे कि भारतीय जनता पार्टी कहां चूकी?

पश्चिम बंगाल में उसे बड़ी जीत की उम्मीद थी, तकरीबन सारे एक्जिट पोल ऐसी ही उम्मीद जता रहे थे। लेकिन वैसा नहीं हुआ। उलटे उसकी सीटें भी घट गई। राजस्थान में भी पार्टी बेहतर प्रदर्शन नही कर पा रही है। राज्य की आधी सीटों पर ही जीत हासिल होती नजर आ रही है। पार्टी को हरियाणा में भी झटका लगा है। लेकिन प्रज्ज्वल रेवन्ना कांड के बाद जिस कर्नाटक से उसे सबसे ज्यादा झटके की उम्मीद थी, वहां से उसे उतना नुकसान नहीं हुआ है। बीजेपी भले ही तमिलनाडु से बहुत उम्मीद कर रही थी, लेकिन वहां उसे एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी को महाराष्ट्र में भी बड़ा नुकसान हुआ है। पिछली बार पार्टी के यहां से 22 सांसद जीते थे। लेकिन इस बार उसकी सीटें आधी रह गई हैं। एनसीपी से अलग होकर बीजेपी का साथ देने वाले अजित पवार को महज एक ही सीटें मिलती नजर आ रही हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार और हरियाणा से बड़ा झटका लगा है। हालांकि पार्टी को सबसे ज्यादा समर्थन मध्य प्रदेश से मिला है। गुजरात में भी उसका गढ़ बचा हुआ है। असम, अरूणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल में भी उसका जादू चल रहा है।
सवाल यह है कि आखिर बीजेपी उत्तर प्रदेश में क्यों कमजोर हो गई? फौरी तौर पर देखें तो सबसे बड़ा कारण यहां के युवाओं के गुस्से को बड़ा कारण माना जा रहा है। राज्य में बार-बार परीक्षाओं के पेपर आउट होते रहे। इससे युवाओं में गुस्सा रहा। इसकी वजह से उनकी नौकरियां लगातार दूर जाती रहीं। अग्निवीर योजना को लेकर विपक्षी दलों विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा नेता अखिलेश यादव ने जिस तरह मुद्दा बनाया, उसने युवाओं में बीजेपी के खिलाफ गुस्सा भर दिया। राममंदिर के निर्माण के बाद समूचा देश जिस तरह राममय हुआ था, उससे बीजेपी को उम्मीद थी कि पार्टी को रामभक्तों का बहुत साथ मिलेगा। लेकिन उत्तर प्रदेश में ही राम लहर नहीं चल पाई। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मौजूदा हालात के चलते 1999 का आम चुनाव याद आ रहा है। तब उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 85 सीटें थीं। 1998 के आम चुनावों में बीजेपी को राज्य से 52 सीटें मिली थीं। लेकिन बाद में कल्याण सिंह ने बागी रूख अपना लिया तो अगले ही साल हुए आम चुनावों में बीजेपी की 23 सीटें घट गईं। कुछ ऐसी ही स्थिति इस बार बीजेपी की उत्तर प्रदेश में होती दिख रही है। पार्टी अपना आकलन तो करेगी, लेकिन मोटे तौर पर माना जा रहा है कि बीजेपी को राज्य में सबसे ज्यादा नुकसान युवाओं के गुस्से, राज्य सरकार के स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार ना रोक पाने और गलत उम्मीदवार देने की वजह से हुआ। उदाहरण के लिए बलिया से नीरज शेखर की उम्मीदवारी पर पार्टी के ही लोगों को सबसे ज्यादा एतराज रहा। खुद प्रधानमंत्री मोदी भी डाक मतमत्रों में छह हजार से ज्यादा वोटों से पीछे चलते रहे, इसका मतलब साफ है कि बीजेपी को लेकर राज्य में एक तरह से गुस्सा था, जिसे भांपने में पार्टी नाकाम रही।
बिहार के बारे में माना जा रहा था कि नीतीश को नुकसान होगा, लेकिन इसके ठीक उलट नीतीश अपनी ताकत बचाए रखने में कामयाब हुए हैं। राज्य में अब जनता दल सबसे बड़ा संसदीय दल है। तो क्या यह मान लिया जाए कि 2020 के विधानसभा चुनावों में कमजोर किए जाने की कथित कोशिश को पलट दिया है?
महाराष्ट्र में शायद अजीत पवार को साथ लाना भाजपा के वोटरों को पसंद नहीं आया। बीजेपी ही उन्हें राज्य की सिंचाई घोटाले का आरोपी मानती रही और उन्हें ही उपमुख्यमंत्री बनाकर ले आई। जब कोई विपक्षी व्यक्ति पार्टी या गठबंधन में लाया जाता है तो सबसे ज्यादा जमीनी कार्यकर्ता को परेशानी होती है। वह पसोपेश में पड़ जाता है कि कल तक वह अपनी पार्टी लाइन के लिहाज से जिसका विरोध करता रहा, उसका अब कैसे समर्थन करेगा। महाराष्ट्र का कार्यकर्ता इसीलिए निराश रहा। जिसका असर चुनावी नतीजों पर दिख रहा है। हरियाणा के प्रभुत्वशाली जाट मतदाताओं को सबसे ज्यादा गुस्सा अग्निवीर और शासन में उसकी घटती भागीदारी को लेकर रहा। इसकी वजह से यहां का अधिसंख्य मतदाता पार्टी से रूष्ट हुआ और नतीजा सामने है। राजस्थान में बीजेपी का कार्यकर्ता ही मुख्यमंत्री भजनलाल को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
पार्टी की दिग्गज नेता वसुंधरा को किनारे लगाया जाना भी बीजेपी की अंदरूनी राजनीति पर असर डाला। इसका असर है कि पार्टी राज्य में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई। पश्चिम बंगाल में ममता अपने किले को बचाने में कामयाब रहीं। हालांकि उड़ीसा में पार्टी का जबरदस्त प्रदर्शन रहा। जहां राज्य सरकार के साथ ही संसद की ज्यादातर सीटों पर वह काबिज हो चुकी है।
इस चुनाव ने यह भी संदेश दिया है कि गठबंधन की राजनीति खत्म नहीं हुई। दो कार्यकाल में अपने दम पर बहुमत हासिल करने के चलते मोदी-शाह की जोड़ी लगातार अपने एजेंडे को लागू करती रही। लेकिन अब गठबंधन की सरकार होगी, इसलिए अब इस जोड़ी को पहले के दो कार्यकाल की तरह काम करना आसान नहीं होगा। एक धारणा यह भी बन गई थी कि जिस संगठन के चलते बीजेपी की पहचान थी, वह धीरे-धीरे किनारे होता चला गया। लेकिन बहुमत ना हासिल होने की स्थिति में अब संगठन की अहमियत बढ़ेगी। इस चुनाव का संदेश यह भी है कि संगठन को जमीनी लोगों पर भरोसा करना होगा। बीजेपी के लिए राहत की बात यह है कि तीसरी बार वह सत्ता पर काबिज होगी। उसने उन राज्यों में भी अपनी उपस्थिति बनाने में कामयाबी हासिल की है, जहां वह नहीं थी।
अठारहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजों ने एक आशंका को भी जन्म दिया है। वह है केंद्र राज्य टकराव के तेज होने की आशंका। दस साल पहले केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी सरकार के उभार के बाद यह माना गया था कि गठबंधन की राजनीति के दिन बीत गए। लेकिन दस साल बाद एक बार फिर गठबंधन सरकार के दिन वापस आ गए हैं। गठबंधन की राजनीति का बुनियादी आधार स्थानीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का बढ़ता प्रभाव होता है। अपने असर वाले इलाकों में अपनी बढ़ती ताकत के जरिए वे राष्ट्रीय पार्टियों के विस्तार को रोक देते हैं। क्षेत्रीय राजनीति और अस्मिता के लिहाज से क्षत्रपों का उभार किंचित फायदेमंद भले होता हो, राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से क्षत्रपों की बढ़ती ताकत और केंद्रीय स्तर पर सत्ता के कमजोरी राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करने के लिए मजबूर कर देती है। अठारहवीं लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद पांच बड़े क्षेत्रीय दल ताकतवर बनकर उभरे हैं। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल यू का नए सिरे से उभार हुआ है, तो डीएमके ने भी अपनी ताकतवर स्थिति बरकरार रखी है। इन पांच में से तीन जहां केंद्र के विरोधी हैं, वहीं दो सहयोगी हैं। हालांकि इनके सहयोग की भी गारंटी नहीं मानी जा सकती है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इन क्षत्रपों का उभार क्या फिर से एक बार देश को अस्थिरता के दौर में ले जाएगा?
प्रखर समाजवादी राममनोहर लोहिया ने भारत की करीब एक हजार साल की गुलामी के लिए केंद्रीय स्तर पर भारत में कमजोर होने को सबसे बड़ी वजह माना था। स्वाधीन भारत के इतिहास में 1989 में गठबंधन की पहली सरकार बनी थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की यह सरकार महज 11 महीने ही चल पाई। उसके बाद चंद्रशेखर की अगुआई में बनी सरकार महज चार महीने ही चली। इसके बाद 1996 में तीसरी बार देवगौड़ा में तीसरी और इंद्रकुमार गुजराल की अगुआई में बनी तीसरी और चौथी बार गठबंधन सरकार बनी। लेकिन दोनों ही सरकारें महज दस और ग्यारह महीने ही चलीं। एक तरह से कह सकते हैं कि ये स्थिर सरकारें रहीं। इसके बाद आई अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली गठबंधन की सरकार भी तेरह महीने मे ही गिर गई। यह बात और है कि वाजपेयी की ही अगुआई वाली अगली गठबंधन सरकार की जरूर लंबे समय तक चली।
अतीत की जिन गठबंधन सरकारों को अस्थिर किया गया, उन्हें अस्थिर करने के पीछे सबसे ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियों और उनके नेताओं के अपने स्वार्थों और राजनीति की भूमिका बड़ी रही। चूंकि इस बार बीजेपी को खुद का बहुमत नहीं मिला है। इसके साथ ही उसके गठबंधन के साथी नीतीश कुमार और एन. चंद्रबाबू नायडू बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं, इसलिए यह आशंका जताई जाने लगी है कि क्या डबल इंजन की सरकार की बात पुरानी हो जाएगी। क्या ये क्षत्रप भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आराम से चलने देंगे। अतीत के इन नेताओं के कदमों को देखें तो यह आशंका भी बेमानी नहीं है। नीतीश कुमार, राजनीति के शीर्ष पर भले ही बीजेपी के साथ पहुंचे, लेकिन अपने सियासी नफा-नुकसान के चक्कर में उन्होंने अतीत में उसी बीजेपी का दो-दो बार साथ छोड़ने में भी हिचक नहीं दिखाई। एनडीए की बैठक में हिस्सा लेने के लिए पटना से दिल्ली आते वक्त आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ हवाई जहाज में बैठे उनके फोटो खूब प्रचारित हुआ है। नीतीश राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। बेशक वे कांग्रेस के साथ ना जाएं, लेकिन इस तस्वीर के जरिए उन्होंने बीजेपी की धड़कनें जरूर बढ़ा दी हैं। इसी तरह चंद्रबाबू नायडू एनडीए गठबंधन में आंध्र में चुनाव लड़े और बीजेपी के सहयोग से जीत हासिल करने में कामयाब हुए हैं। लेकिन जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे लग रहा है कि सरकार समर्थन की सौदेबाजी की अपनी पुरानी कला पर हाथ आजमा रहे हैं। वाजपेयी सरकार को बाहर समर्थन देने के एवज में वे अनुपात के लिहाज से ज्यादा फंड और राशन तत्कालीन आंध्र के लिए ले जाते रहे। चाहे नीतीश हों या नायडू, दोनों की एक मांग समान है। दोनों अपने-अपने राज्यों को विशेष दर्जा और विशेष आर्थिक पैकेज देने की मांग करते रहे हैं। ये दोनों मांगें ऐसी हैं, जिनके लिए दोनों को अपने-अपने राज्यों से जनसमर्थन मिलता रहेगा। इसलिए यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि वे एनडीए सरकार को हिलाने की कोशिश करते रहेंगे।
लोकसभा में 37 सीटों के साथ तीसरा बड़ा दल बनने में कामयाब रही समाजवादी पार्टी का बीजेपी से छत्तीस का सियासी रिश्ता है, वह संसद में बीजेपी की राह में बाधा बनने की कोशिश करती रहेगी। 1999 और 2004 के चुनाव के दिनों ताकतवर बनी समाजवादी पार्टी ऐसा करके दिखा चुकी है। 29 सीटों के साथ तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में चौथा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है तो 22 सीटों के साथ डीएमके पांचवें नंबर पर है। इन दोनों दलों का रिश्ता भी बीजेपी से बेहतर नहीं है। तीनों ही बीजेपी के अपने-अपने राज्यों में विरोधी हैं। इसलिए यह तय है कि ये तीनों भी संसद में केंद्र सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी करते रहेंगे।
क्षत्रपों के उभार के बाद सबसे बड़ी समस्या केंद्र और राज्यों के बीच रिश्तों को लेकर उठ खड़ी होती है। भारतीय संविधान भी वैसे भारत को राज्यों का संघ बताता है। इस नाते राज्य अक्सर अपने सवाल उठाते रहते हैं। अपनी मांगों को लेकर केंद्र को अल्टीमेटम तक देते रहे हैं। लेकिन जब क्षेत्रीय स्तर पर ताकतवर दल होते हैं तो केंद्र और राज्य के रिश्तों की तल्खी कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल और केंद्र के रिश्ते कुछ ऐसे ही नजर आए हैं। तमिलनाडु की डीएमके की सरकार से भी केंद्र के रिश्ते बेहतर नहीं रहे। यह बात और है कि ममता जहां ज्यादा आक्रामक हैं, वहीं स्टालिन वैसे आक्रामक नहीं है। ऐसे में यह आशंका निर्मूल नहीं है कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के बीच टकराव बढ़ेगा, इसकी वजह से राजनीति अशांत होगी, जिसका असर देश की आर्थिक सेहत पर पड़ेगा। इस तथ्य को सभी राजनीतिक दल जानते-बूझते हैं। ऐसे में उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए वे अपने स्थानीय हितों को दरकिनार रखें। वैसे जिस तरह की आज की राजनीति है, ऐसी उम्मीद भी अक्सर बेमानी लगती है।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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