हर साल दिवाली का त्योहार न सिर्फ रोशनी और खुशियों का पर्व होता है, बल्कि भारतीयों के लिए यह धन-संवर्धन का प्रतीक भी है। हर घर में दीये जलते हैं, मिठाइयों की खुशबू फैलती है, और उसी के बीच सोने-चाँदी के सिक्कों की खनक गूंजती है। परंपरा कहती है — दिवाली पर सोना या चाँदी खरीदना शुभ होता है। लेकिन इस साल स्थिति थोड़ी अलग है। सोना और चाँदी दोनों ही अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच चुके हैं। सोने की कीमत में लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि और चाँदी में 52 प्रतिशत की छलांग के साथ, हर निवेशक के मन में सवाल है — क्या वाकई यह सही समय है निवेश करने का, या अब थोड़ा ठहरना ही समझदारी होगी?
सवाल का जवाब समझने के लिए हमें त्योहार की रौनक से थोड़ा ऊपर उठकर अर्थशास्त्र की रोशनी में देखना होगा। सोने-चाँदी की बढ़ती कीमतें सिर्फ दिवाली की मांग से नहीं बढ़ीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता, मुद्रास्फीति, डॉलर की कमजोरी और केंद्रीय बैंकों की भारी खरीदारी जैसे कारकों से प्रेरित हैं। जब दुनिया भर में राजनीतिक और आर्थिक संकट होता है, तब सोना एक “सेफ हेवन” यानी सुरक्षित निवेश बन जाता है — ऐसा संपत्ति वर्ग जो बाकी बाजारों की अस्थिरता में भी स्थिर रहता है। वहीं, चाँदी अब केवल आभूषण या धार्मिक धातु नहीं रही; इसका औद्योगिक उपयोग — खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों में — लगातार बढ़ रहा है। इस वजह से इसकी मांग में दीर्घकालिक बढ़ोतरी संभावित है।
लेकिन जब दाम इतने ऊँचे हों, तो भावनाओं से ज़्यादा समझदारी जरूरी होती है। दिवाली पर सोना-चाँदी खरीदने की परंपरा जितनी पवित्र है, उतनी ही सावधानी की भी मांग करती है। सोने के गहनों या सिक्कों में मेकिंग चार्ज, जीएसटी और ज्वेलर प्रीमियम जोड़ने पर लागत काफी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में सोना लंबी अवधि के निवेश के लिए तो ठीक है, लेकिन अल्पावधि में ज्यादा लाभ की संभावना सीमित है, क्योंकि कीमतें पहले ही ऊँचाई पर हैं। बाज़ार कभी भी “करेक्शन” देख सकता है, यानी अचानक कीमतों में गिरावट आ सकती है।
फिर भी, समझदार निवेशकों के लिए अवसर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सोना और चाँदी अभी भी डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो में स्थिरता देने वाले विश्वसनीय निवेश साधन हैं। जब शेयर या बॉन्ड मार्केट डगमगाते हैं, तब ये धातुएँ सुरक्षा प्रदान करती हैं। यदि आप 3–5 साल की अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं, तो आज की ऊँची कीमतें बहुत बड़ी चिंता नहीं हैं। भारत की संस्कृति में सोने के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ — चाहे मंदी हो या महंगाई। माँ लक्ष्मी की प्रतीक इस धातु की मांग हमेशा बनी रहती है, भले ही गति कभी तेज़ हो, कभी धीमी।
वहीं, चाँदी अब “डार्क हॉर्स” के रूप में उभर रही है। वर्ल्ड सिल्वर सर्वे 2025 के अनुसार, चाँदी की वैश्विक आपूर्ति में गिरावट आई है जबकि औद्योगिक खपत लगातार बढ़ रही है। इस “डिमांड-सप्लाई गैप” से संकेत मिलता है कि चाँदी की यह तेजी सिर्फ दिवाली की नहीं, बल्कि एक गहरी आर्थिक प्रवृत्ति का हिस्सा है। जो निवेशक थोड़ी अस्थिरता झेल सकते हैं, उनके लिए चाँदी आने वाले वर्षों में सोने से भी बेहतर रिटर्न दे सकती है।
अब सवाल यह है — निवेश कैसे किया जाए? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि एकमुश्त निवेश की बजाय चरणबद्ध तरीके से खरीदें। यानी हर कुछ हफ्तों में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सोना या चाँदी लें। इससे औसत लागत घटती है और बाजार में अचानक उतार-चढ़ाव का असर कम होता है। कुल निवेश का केवल 5-10% हिस्सा ही इन धातुओं में लगाना समझदारी है। और सिर्फ भौतिक खरीदारी ही विकल्प नहीं है — गोल्ड ईटीएफ, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड या सिल्वर ईटीएफ जैसे आधुनिक माध्यम भी मौजूद हैं। ये न केवल सुरक्षित हैं बल्कि आसानी से खरीदे-बेचे जा सकते हैं और भंडारण की परेशानी से भी बचाते हैं।
फिर भी, एक अंतर समझना जरूरी है — भावनात्मक खरीद और निवेश खरीद में फर्क। दिवाली पर छोटा सिक्का या चाँदी का दीपक खरीदना परंपरा है, और वह शुभ भी है। लेकिन सिर्फ इसलिए बड़ी रकम लगाना कि “कीमत बढ़ रही है”, यह अक्सर उलटा साबित होता है। इतिहास गवाह है — जब हर कोई खरीद रहा होता है, बाजार अक्सर ज़्यादा गर्म हो जाता है। और फिर मुनाफा वसूली के बाद अचानक ठंडा पड़ जाता है। 2011 में जब सोना रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा था, तब कई निवेशकों ने उसके बाद के वर्षों में गिरावट का दर्द झेला था।
इसके बावजूद, यह भी सच है कि दिवाली 2025 ने देशभर में फिर से “स्वर्ण युग” की रौनक लौटा दी है। सूरत, जयपुर, चेन्नई और लखनऊ जैसे शहरों में ज्वेलर्स के पास बुकिंग का रेला है। लोग ऊँचे दामों के बावजूद खरीद रहे हैं, क्योंकि सोना-चाँदी भारतीय मन में सिर्फ संपत्ति नहीं, सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक है। आर्थिक अनिश्चितता और शेयर बाजार की अस्थिरता के बीच, लोग अभी भी उसी चीज़ में भरोसा रखते हैं जिसे वे छू सकते हैं, महसूस कर सकते हैं और अपनी अगली पीढ़ी को दे सकते हैं।
सोना और चाँदी की यही दोहरी पहचान — संस्कार और संपत्ति — उन्हें अमर बनाती है। चाहे युद्ध हो, महामारी या मंदी — इन धातुओं ने हर युग में भरोसे की दीवार बनी रखी है। लेकिन भरोसा तभी फायदेमंद होता है जब उसमें विवेक का साथ हो। आज का निवेशक यदि परंपरा और तर्क दोनों को साथ लेकर चले, तो इस दिवाली उसके लिए सचमुच “धनवर्षा” हो सकती है।
इस दिवाली का सबसे समझदार निवेश वही होगा जो संतुलित हो — श्रद्धा से भरा, लेकिन विवेक से नियंत्रित। अगर आप खरीद रहे हैं, तो सोच-समझकर, धीरे-धीरे और लंबी अवधि के दृष्टिकोण से खरीदें। सोना-चाँदी एक दिन में अमीर नहीं बनाते, लेकिन सालों में स्थिरता और सुरक्षा ज़रूर देते हैं।
आखिरकार, सोने-चाँदी में निवेश सिर्फ चमक या परंपरा का विषय नहीं, बल्कि विश्वास और बुद्धिमत्ता का संतुलन है। दिवाली का दीपक हमें सिखाता है कि रोशनी तभी टिकती है जब उसमें संयम का तेल और विवेक की बाती हो। वैसे ही निवेश में भी स्थायी उजाला तभी रहेगा जब निर्णय भावनाओं नहीं, बल्कि समझ पर आधारित हो।
तो इस बार जब आप लक्ष्मी पूजन के बाद ज्वेलर की दुकान की ओर बढ़ें, एक पल ठहरिए — खुद से पूछिए, “मैं सोना खरीद रहा हूँ परंपरा के लिए, सुरक्षा के लिए या सिर्फ लालच में?” पहले दो कारण आपको समृद्ध बनाएँगे, तीसरा आपको पछतावा देगा।
हाँ, यह दिवाली सोना-चाँदी में निवेश की शुरुआत के लिए शुभ समय हो सकता है — परंतु संयम, योजना और दूरदर्शिता के साथ।
दीपों की तरह आपकी संपत्ति भी चमके — पर स्थिर, सधी हुई और टिकाऊ रोशनी के साथ।
डी-डॉलराइजेशन और चमकता सोना-चांदी: भरोसे की नई मुद्रा की वापसी
पिछले दो वर्षों में सोना और चांदी की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया है — इतना कि उन्होंने कई बार शेयर बाजार, बॉन्ड और यहां तक कि कच्चे तेल जैसे पारंपरिक निवेश साधनों को भी पीछे छोड़ दिया। सोने ने ऐतिहासिक ऊँचाइयों को छुआ है और चांदी ने भी उसी राह पर चलते हुए चमक बिखेरी है। सतही तौर पर यह महज़ महंगाई और ”सेफ हेवन” निवेश की कहानी लग सकती है, लेकिन असल में यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में चल रहे एक गहरे भूचाल का संकेत है — जिसे कहा जा रहा है “डीडॉलराइजेशन” (De-dollarisation)।

सीधे शब्दों में कहें तो डी-डॉलराइजेशन का मतलब है कि दुनिया के देश अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं — चाहे वह व्यापार के लिए हो, विदेशी मुद्रा भंडार के लिए, या अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए। दशकों तक डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना रहा। लेकिन अब उस भरोसे की नींव में दरारें पड़ रही हैं।
इस बदलाव की शुरुआत अचानक नहीं हुई। साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस की डॉलर संपत्तियाँ फ्रीज़ कर दीं। इस कदम ने कई देशों को यह एहसास दिलाया कि डॉलर में रखे विदेशी भंडार केवल वित्तीय संपत्ति नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार भी हैं। सवाल उठने लगा — “अगर कल हमारे साथ ऐसा हुआ तो?”
यहीं से एक मौन लेकिन बड़ा परिवर्तन शुरू हुआ। चीन, रूस, ब्राज़ील, सऊदी अरब जैसे देश अब स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं, आपसी मुद्रा-स्वैप समझौते कर रहे हैं, और सबसे महत्वपूर्ण — सोने का भंडारण बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर सोना खरीदा है — सालाना 1,000 टन से भी अधिक। यह केवल निवेश नहीं, बल्कि डॉलर की पकड़ से मुक्त होने की तैयारी है।
सोना एक बार फिर “न्यूट्रल रिजर्व एसेट” के रूप में उभरा है — ऐसा धन जिसका कोई राजनीतिक झुकाव नहीं, जिसे कोई देश फ्रीज़ नहीं कर सकता, और जिसकी कीमत किसी एक देश की नीतियों पर निर्भर नहीं करती। यही वजह है कि जैसे-जैसे देश डॉलर से दूरी बना रहे हैं, सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं। यह सिर्फ बाज़ार का बुलबुला नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय संरचना में हो रहे बदलाव का प्रतिबिंब है।
चांदी की कहानी भी कम रोचक नहीं है। भले ही वह सोने जैसी “मुद्रा” नहीं मानी जाती, पर इस बार उसकी चमक दोहरी वजहों से बढ़ी है — एक तो वह भी “सेफ हेवन” एसेट है, दूसरा यह ग्रीन एनर्जी रिवॉल्यूशन की धड़कन बन चुकी है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में चांदी की मांग लगातार बढ़ रही है। यानी जहाँ सोना “मुद्रा” के रूप में चमक रहा है, वहीं चांदी “उद्योग” की ऊर्जा से दमक रही है।
डीडॉलराइजेशन और सोना-चांदी की बढ़ती कीमतों का रिश्ता एक और स्तर पर भी स्पष्ट है — डॉलर इंडेक्स (DXY) की कमजोरी। जब दुनिया के बैंक डॉलर से बाहर निकलते हैं, तो उसकी मांग घटती है और डॉलर कमजोर होता है। कमजोर डॉलर का सीधा असर यह होता है कि डॉलर में कीमत तय होने वाले कमोडिटीज — जैसे सोना और चांदी — अन्य मुद्राओं के लिए सस्ते लगते हैं। इससे वैश्विक मांग बढ़ती है, और कीमतें और ऊपर चली जाती हैं।
अमेरिका की घरेलू स्थिति ने भी इस प्रवृत्ति को मजबूत किया है। ऊँचे कर्ज, बढ़ते राजकोषीय घाटे और लगातार मुद्रास्फीति ने वास्तविक ब्याज दरों को नकारात्मक बना दिया है। जब ब्याज दरें महंगाई से कम होती हैं, तो निवेशक “नॉन-यील्डिंग” एसेट्स जैसे सोना और चांदी की ओर रुख करते हैं। केंद्रीय बैंक भी यही कर रहे हैं — भविष्य की अस्थिरता से बचने के लिए ठोस धातुओं में भरोसा जता रहे हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में चीन की भूमिका केंद्रीय है। चीन न केवल दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक और उपभोक्ता है, बल्कि BRICS देशों के ज़रिए डीडॉलराइजेशन का नेतृत्व भी कर रहा है। “पेट्रो-युआन” व्यवस्था के तहत चीन अब तेल व्यापार का एक हिस्सा युआन में कर रहा है, जिसे कई बार सोने से समर्थित किया जाता है। यह सीधे तौर पर 1970 के दशक से चल रहे “पेट्रो-डॉलर” तंत्र को चुनौती देता है। और जब तेल जैसी रणनीतिक वस्तुएं डॉलर से हटकर सोने या युआन से जुड़ती हैं, तो सोने की वैश्विक अहमियत कई गुना बढ़ जाती है।
BRICS देशों ने हाल में यह भी प्रस्ताव रखा कि भविष्य में व्यापार निपटान के लिए कोई गोल्ड-बैक्ड या कमोडिटी-बेस्ड करेंसी सिस्टम बनाया जाए। भले ही यह विचार अभी शुरुआती चरण में है, पर इसने एक मानसिक बदलाव जरूर ला दिया है — डॉलर पर निर्भरता को “जोखिम” की तरह देखा जाने लगा है। इस बदलते माहौल में, सोना वह एकमात्र संपत्ति है जिस पर सभी देश सहमत हैं।

खुदरा निवेशक भी इस वैश्विक प्रवाह को महसूस कर रहे हैं। डीडॉलराइजेशन की खबरें अब अखबारों और टीवी पर नियमित रूप से आने लगी हैं। और जैसे-जैसे लोग डॉलर की घटती ताकत के बारे में सुनते हैं, वैसे-वैसे सोने और चांदी की ओर उनका विश्वास बढ़ता है। भारत, तुर्की और खाड़ी देशों में तो यह प्रवृत्ति और मजबूत है, जहाँ सदियों से सोना “विश्वास की मुद्रा” माना जाता है।
हालाँकि, यह कहना भी गलत होगा कि केवल डीडॉलराइजेशन ही कीमतें बढ़ा रहा है। इसमें अन्य कारक भी काम कर रहे हैं — जैसे मुद्रास्फीति, ब्याज दरों का चक्र, औद्योगिक मांग, और भू-राजनीतिक तनाव। लेकिन जो चीज़ इस बार के उछाल को ऐतिहासिक बनाती है, वह है — केंद्रीय बैंकों का सामूहिक और रणनीतिक खरीदारी अभियान। पहले सोना खरीदना एक “निवेश निर्णय” होता था, अब यह राष्ट्रीय नीति बन चुका है।
दरअसल, यह सिर्फ एक “बुलियन रैली” नहीं है — यह एक वैश्विक मौद्रिक क्रांति है। दुनिया का भरोसा फिर से कागज से हटकर धातु की ओर लौट रहा है। सोना और चांदी वही भूमिका निभा रहे हैं जो कभी ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) समझौते के दौर में निभाते थे — स्थिरता और भरोसे का प्रतीक बनकर।
आने वाले वर्षों में जब अमेरिका का ऋण और घाटा और बढ़ेगा, और जब एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व अपनी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ मजबूत करेंगे, तब डॉलर की एकाधिकार स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होगी। इसका मतलब डॉलर का अंत नहीं, बल्कि एक मल्टीपोलर वित्तीय युग का आगमन है — जहाँ सोना फिर से मूल्य का निष्पक्ष पैमाना बनेगा।
अंततः, सोना और चांदी की बढ़ती कीमतें केवल बाजार की कहानी नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था के पुनर्निर्माण की कहानी हैं। यह उस युग की निशानी हैं जहाँ देश “कागजी भरोसे” से निकलकर “ठोस भरोसे” की ओर लौट रहे हैं।
डीडॉलराइजेशन के इस दौर में, सोना और चांदी अब सिर्फ सुरक्षित निवेश नहीं — बल्कि सार्वभौमिक स्वतंत्रता और आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रतीक बन गए हैं।
उनकी चमक आज लालच की नहीं, बल्कि भरोसे और स्वतंत्रता की चमक है।
सोने और चांदी का यह उभार दरअसल दुनिया के उस मनोभाव का प्रतीक है जो कह रहा है —
“अब समय है कि मुद्रा नहीं, भरोसा शासन करे।”
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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