बंगाल की राजधानी कोलकाता की व्यस्त दिनचर्या से 73 किलोमीटर दूर एक शांत इलाका है संदेशखाली। लेकिन 5 जनवरी से यह लगातार चर्चा में हैं। वहां एक के बाद एक ऐसी भयावह घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। मामला तब चर्चा में आया जब बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता शेख शाहजहां के खिलाफ कथित तौर पर राशन वितरण में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम छापेमारी करने पहुंची, जिस पर सैकड़ों की संख्या में हिंसक और अराजक तत्वों की भीड़ ने हमला कर दिया और उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया। इसके बाद 8 फरवरी की घटनाओं ने तनाव को और बढ़ा दिया जब शाहजहां शेख की कथित ज्यादतियों से नाराज स्थानीय महिलाओं ने बंगाल पुलिस पर शाहजहां शेख से मिलीभगत का आरोप लगाया और सड़कों पर प्रदर्शन करने लगीं। उनका आरोप था कि पुलिस की मिलीभगत से शाहजहां और उसके गुंडे कई सालों से जमीनें हड़प रहे हैं और महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। इस पूरी कहानी में सबसे चिंताजनक बात यह है कि शाहजहां शेख और उसके लोग सामाजिक रुप से पिछड़े तबके की हिंदू महिलाओं को विशेष तौर पर निशाने पर रखते थे। ऐसे कई वीडियो सामने आए, जिसमें महिलाओं ने कैमरे के सामने आकर आरोप लगाया कि शाहजहां और उसके गुर्गों के निशाने पर युवा और सुंदर महिलाएं होती थीं। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू यह है कि शाहजहाँ ने हिंसा और शोषण के अपने जघन्य कृत्यों के लिए केवल हिंदू महिलाओं को निशाना बनाया, जबकि मुस्लिम महिलाओं को ऐसे अत्याचारों से बख्शा। धार्मिक पहचान पर आधारित यह जुल्मो-सितम संदेशखाली की विस्फोटक परिस्थिति में एक सांप्रदायिक बारुद भी बिखेर देता है। संदेशखाली कांड भ्रष्टाचार और अपराध को जड़ से खत्म करने की जरुरत पर जोर देता है। क्योंकि यह अब भी देश के कुछ हिस्सों में कोढ़ की तरह फैला हुआ है, जहां राजनीतिक रसूख रखने वाले दबंग लोग आम नागरिकों पर अपना जोर आजमाते हैं और उनका जीना दूभर कर देते हैं। महिलाओं का शोषण और दुर्व्यवहार, साथ ही न्याय दिलाने में कानूनी संस्थानों की विफलता, प्रणालीगत सुधारों और जवाबदेही के उपायों की तत्काल जरुरत महसूस कराता है।
इतना सब होने पर भी आरोपी शाहजहां की गिरफ्तारी में देरी और उसके बाद उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप की नौबत आना, पश्चिम बंगाल में सत्ता के दुरुपयोग की चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है। आलोचकों का मानना है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य उन आदर्शों पर खरा उतरने में विफल रहा है, जिन्होंने 2011 में ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया था। ' मां, माटी और मानुष' के युग की शुरुआत करने का उनका वादा भ्रष्टाचार के कारण विफल होता जा रहा है। आपराधिक तत्वों से ममता बनर्जी की पार्टी की सांठगांठ अक्सर सामने आती रहती है। ममता बनर्जी की पिछली छवि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा की रही है। लेकिन उनसे लोगों को जबरदस्त निराशा हुई है। वह केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों का मुखर विरोध करने में पीछे नहीं हटतीं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के अंदर आपराधिक तत्वों की घुसपैंठ और उनकी अराजक प्रवृत्ति पर चुप्पी साध लेती हैं। 55 दिनों बाद गिरफ्तार किए गए शाहजहां को उन्होंने पार्टी से निकाल तो दिया है, लेकिन उनका यह कदम मजबूरी में उठाया लगता है, जो कि सुधार के प्रति पार्टी की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को लेकर संदेह पैदा करता है। देश संदेशखाली की भयावह घटनाओं से अचंभित है। हर तरफ इसकी चर्चा हो रही है। इसलिए यह जरूरी है कि न्याय दिलाने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और इसे व्यापक रूप दिया जाए। अपराधियों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, और भविष्य में ऐसे अत्याचारों को रोकने के लिए उपाय किए जाने चाहिए। इसके अलावा राज्य एजेंसियों में गहरी पैंठ बना चुकी उन संस्थागत बुराइयों को दूर करना भी उतना ही जरुरी है, जो संदेशखाली जैसी भयावह घटनाओं का कारण बनती हैं, जिसमें राजनीतिक संरक्षण और कानूनी संस्थाओं का क्षरण शामिल है। उन महिलाओं की दुर्दशा को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने शाहजहाँ और उसके साथियों के हाथों अकल्पनीय पीड़ा सही है। उन पीड़िताओं की आवाज़ सुनी जानी चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। केवल सामूहिक कार्रवाई और न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के माध्यम से ही हम ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोकने और एक ऐसे समाज का निर्माण करने की उम्मीद कर सकते हैं, जहां हर व्यक्ति के साथ उनके लिंग, धर्म या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना सम्मानजनक व्यवहार किया जाता हो।

दीपक कुमार रथ
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