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लोकसभा चुनाव 2024 : केजरीवाल,अखिलेश, लालू ले गए शेर का हिस्सा

Saw more mature: Neither from home nor from ghat

राहुल गांधी ने राजनीति में जितने थपेड़े और चोटें खायी इतनें में तो कोई नौसिखिया राजनीति की बारीकियां सीख गया होता। राहुल को विरासत में राजनीति मिली है साथ-साथ एक प्रसिद्धि नाम लेकर पैदा हुवे है। उन्हें 10 साल शुद्ध रूप से देश को चलाने के लिये मिले थे जब 2004 से 2014 तक कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री अवश्य थे पर सब कुछ 10 जनपथ से सोनिया और राहुल के कहने पर चलता था। मनमोहन सिंह के दूसरे टर्म में तो राहुल ही सब कुछ हो गये थे। उनके इशारे पर मंत्री बनते बिगड़ते रहेे। उस समय उन्होंने राजनीति सीखनें के बजाय चाटूकारों के साथ अपना वक्त गंवाया। दिग्विजय सिंह, मोतीलाल बोरा, पी. चिदम्बरम और मणि शंकर जैसे नेताओं के चक्रव्यूह में फंसे रहे। उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था पर वे हिम्मत नहीं जुटा पाये। चैकड़ी को भी राहुल से अधिक मनमोहन रास आ रहे थे क्योंकि मनमोहन सिंह न राजनीति जानते थे न ही पार्टी में उनके समर्थक थे। एैसे में वे किसी को खतरा नहीं बन सकते थे। उनसे न हाईकमान और न चैकड़ी को कोई डर था। राहुल की चैकड़ी ने 10 जनपथ की चैखट पर सिर रख कर  अपना स्वार्थ सिद्ध किया और आज राहुल को लाकर चैराहे पर खड़ा कर दिया। राहुल न तब समझ पाये और न अब समझ पा रहे हैं। 2014 में पार्टी के सत्ता से बाहर होने के बाद भी चैकड़ी अपनी करतूतों से बाज नहीं आयी। यदि पूरे देश में कार्यक्रम और आंदोलन होते और राहुल को जगह-जगह कार्य कर्ताओं और जनता के बीच ले जाते तो आज तस्वीर कुछ और होती। लेकिन हुआ उलट, राहुल गांधी की सारी शक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कमी निकालनें और उनकी व्यक्तिगत बुराईयों में बर्बाद करवा दी। जितने कार्य भाजपा सरकार अच्छे कर रही थी जिससे आम जन को लाभ मिल रहा था जो राष्ट्रहित में थे, उनकी भी बुराई राहुल करते रहे। लोगों की समस्याओं के खिलाफ कोई ठोस कार्यक्रम न किया न कार्यकर्ताओं को दे पाये। चैकड़ी और कोटरी नेता राहुल के यहां अपना नम्बर बढ़ाने में लगे रहे। 

एक उदाहरण है, मोतीलाल वोरा पार्टी के तत्कालीन कोषाध्यक्ष ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी को खुश करने के लिये एक ग्रुप बना कर जिसमें ये सभी सदस्य बन गये और उस कंपनी को कांग्रेस पार्टी से रकम दिलवा कर नेशनल हेराल्ड को ओने पोने-दामों में खरीदवा दिया। जिसका खामियाजा आज नेहरू के ये वारिसान आज भी भुगत रहे। उन्हें आरोपों के चलते कोर्ट से जमानत लेना पड़ी। वोरा जी अब नहीं रहे पर उनकी सलाह क्रियाकलाप आज भी राहुल का पीछा नहीं छोड़ रहे।

समझ पाना कठिन है कि ये चैकड़ी सोनिया और राहुल का भला कर रही थी या सोची समझी चाल से उन्हें डाउन कर रही थी। विशेष तौर से दिग्विजय सिंह के कई दाव ऐसे थे जो उल्टे पड़े। मध्य प्रदेश में पहले अर्जुन सिंह जी को 10 जनपथ से विशेषकर राहुल से दूर किया। बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी उनके कारण पार्टी छोड़नी पड़ी थी। बात यहीं नहीं 2023 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश मंे, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व सांसद जय प्रकाश अग्रवाल (जेपी) को चुनाव पूर्व पार्टी प्रत्याशी चयन के लिये पर्ववेक्षक बनाया गया। कुछ समय बाद ही तेज तर्रार 10 जनपथ वफादार जे पी को बदलवाया गया। मध्य प्रदेश की कोटरी ने रणदीप सिंह सुरजेवाला को बनवा कर मन मर्जी के टिकिट अपने लोगों को दिलवा दिये। जहां कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, उसी मध्य प्रदेश में मुंह की खा गयी फिर भी राहुल ने सबक नहीं लिया। राहुल अभी भी नरेन्द्र मोदी की बुराई करके चुनाव जीतना चाहते हैं, केजरीवाल, अखिलेश यादव और लालू यादव के सहारे सत्ता में वापिसी करना चाहते हैं। यह समझौता उन्हें बहुत भारी पड़ेगा। डूबती कांग्रेस को सहारा देने के बजाय ये लोग कांग्रेस की नैया डुबोने में लगे हैं। कांगेस ने दिल्ली और उत्तर-प्रदेश में केवल एक दो सीट पाने के लिये पार्टी को तखते पर चढ़ा दिया। ये क्षेत्रीय घटक पार्टियां मौका पाते ही रस्सी खींचंेगी।



केजरी ने कांग्रेस को बनाया वेवकूफ

राजनीति के शातिर खिलाड़ी केजरीवाल ने कांग्रेस के सर्वेसर्वा नेता राहुल गांधी को वेवकूफ बना कर कांग्रेस से सब कुछ ले लिया। पंजाब में समझौता न करके कांग्रेस को जिन्दा नहीं होने दिया। यदि समझौता होता तो कांग्रेस कम से कम पांच सीटों पर सीधे भाजपा के मुकाबले में होती। पंजाब में मरणासन्न कांग्रेस को पूरी तरह मार डाला। सदा के लिये भाजपा का विकल्प आप पार्टी खुद बन गयी। दिल्ली प्रदेश में कांग्रेस को तीन सीटें देकर खुद चार सीटें ले ली। इस तरह केजरी ने दिल्ली में कांग्रेस को आप से छोटी पार्टी होने की घोषणा कांग्रेस से ही करवा दी। लोकसभा में 2019 के चुनाव में कांग्रेस को आप पार्टी से कहीं अधिक वोट मिले थे। कांग्रेस को लगभग 23प्रतिशत  और आप को 18 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में 2014 में लगभग 15 प्रतिशत और आप को 33 प्रतिशत  वोट मिले थे। इस तरह 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट बढ़ कर 23 प्रतिशत   हो गये जब कि आप 33 प्रतिशत  से घट कर  18 प्रतिशत   पर आ गयी।

इस तरह कांग्रेस पार्टी को आप से अधिक सीटें लेना चाहिये थी। पांच सीट लेकर, दो आप को देती या कम से कम गिरी हालत में कांग्रेस का हक सात में से चार सीटों पर बनता ही था। आधे से अधिक क्षेत्र में दिल्ली प्रदेश में कांग्रेस का झंडा उठाने वाले अब आप का झंडा उठा रहे होंगे। प्रदेश में आप का राज होने से उसी में चले जायेंगे। कांग्रेस टापती रह जायेगी।

जो कांग्रेस पार्टी कल तक केजरीवाल के भ्रष्ट आचरण के आरोपों की जांच की मांग कर रही थी। उसी कांग्रेस पार्टी से केजरी ने अपने निर्दोष होने की वकालत करवा ली। कल तक कांग्रेस के पूर्व मंत्री सांसद जो शराब घोटाले में केजरी के विरूद्ध जांच की मांग कर रहे थे। कांग्रेस के राष्ट्रीय खजान्ची अजय माकन और दिल्ली के पूर्व सांसद सन्दीप दीक्षित लम्बे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित के पुत्र आदि सभी नेताओं के मुंह बन्द करवा दिये गये। यदि केजरीवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के संगीन आरोप रहते या वे सजा पा जाते दोनों स्थितियों में कांग्रेस ही भाजपा का विकल्प बनी रहती। पार्टी के अपरिपक्व नेताओं ने ये मौका भी गंवा दिया। 



अखिलेश यादव और लालू यादव के चंगुल में फंसी कांग्रेस

उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कांग्रेस के निर्णय विवेकपूर्ण नहीं रहे। कांग्रेस पार्टी के सांसदों या विधायक की संख्या भले कम हो। पर वो उत्तर-प्रदेश में जिन्दा है मरी नहीं। 80 में से केवल 17 सीटें लेकर कांग्रेस अपने को छोटी पार्टी बनाती जा रही है। कांग्रेसी कार्यकर्ता टूट-टूट कर सपा के साथ हो जायेगा या चला जायेगा। देश के सबसे बड़े प्रदेश में अपने को सपा के मुकाबले में चौथाई पहले ही कर लिया। इस बार कांग्रेस को मुस्लिम वोट सपा से अधिक मिलने की उम्मींद जताई जा रही थी।

कांग्रेस ने बिहार में लालू यादव के साथ समझौता करके प्रमाणित कर दिया कि वो भ्रष्ट से भ्रष्ट नेताओं से थोड़े-थोड़े लालच के लिये भी समझौता कर सकती है। आरजेडी के मालिक लालू यादव सुप्रीम कोर्ट से भ्रष्ट आचरण में सजा आफ्ता हैं, जेल काट रहे हैं। मतलब साफ है कि ऊपर से ईमानदार बनने वाले कांग्रेस पार्टी चलाने वाले 10 जनपथ के नेताओं को महा भ्रष्ट सरकारी माल की चोरी में जेल काटने वालों के साथ सरकार बनानें में कोई गुरेज नहीं।  बिहार में भी कुल 9 सीटों पर समझौता कर कांग्रेस चौथेे नम्बर की पार्टी बनी रहेगी।

उसमें भी लालू एक-एक करके कांग्रेस के लिये बेहतर समझी जाने वाली सीटों पर प्रत्याशी घोषित करते जा रहे। हाल ही में पूर्णियां सीट आदि पर एैसा करके राहुल पर दबाव बना दिया है। एक दूसरे बड़े प्रदेश बंगाल में भी चैथे नम्बर पर हो गयी जब कांग्रेस के नेता खुद पार्टी को कुयें में डाल रहे हैं तो इंडी गठबंधन की क्षेत्रीय पार्टियां धक्का देने बैठी हुयी हैं ताकि वे भाजपा का विकल्प बन सके। आप पार्टी ने पंजाब में, सपा ने उत्तर प्रदेश में ओर राजद ने बिहार में कांग्रेस पार्टी को चैथे नम्बर की पार्टी बना दिया और चुनाव से पहले ही कांग्रेस द्वारा उससे सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी करवा लिया।






डॉ. विजय खैरा

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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