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सनातन कोई धर्म नहीं जीवन का आधार है

Sanatan is not a religion but the basis of life

सनातन धर्म को लेकर इन दिनों बहुत विवाद छिड़ा हुआ है। कुछ राजनेताओं द्वारा सनातन धर्म क नीचा दिखाने की पूरी कोशिश की जा रही है। लेकिन क्या  सनातन धर्म किसी पंथ, जाति, या व्यक्ति विशेष तक ही सीमित है। ऐसा नहीं है बल्कि सनातन धर्म मानव मात्र के कल्याण के लिए है। इसीलिए उसका नाम सनातन है जो कि चिरंतन यानी की शाश्वत अर्थात् अनश्वर है।  सनातन धर्म किसी का बनाया नहीं हुआ है यह चिरंतन सत्य पर आधारित है। बल्कि कहा जाए तो यह एक अच्छे मनुष्य की जीवनशैली है। वेदों में कहा गया है मनुर्भव, यानी कि एक अच्छा मनुष्य बनो, अच्छे कर्म करो। जब कभी भी कोई व्यक्ति एक सभ्य समाज का निर्माण करना चाहता है तो उसके लिए उसे सनातन धर्म से जुड़े हर पहलुओं के बारे में जानना होगा और उसे आत्मसात करना होगा। सनातन के साथ धर्म शब्द जुड़ा हुआ है। धर्म के बारे में भारतीय शास्त्रों में कहा गया है धार्यते इति धर्म:। यानी हम जिसको धारण करते हैं वही धर्म है। यह हमारे जीने का शैली है। जिसे पौराणिक काल से हमारे देश में स्वीकार किया गया है।

आज अचानक देश में सनातन धर्म को लेकर एक विवाद छिड़ गया है। सनातन धर्म को राजनीतिक वैमनस्य का माध्यम बनाया जा रहा है। जबकि सनातन धर्म का जबकी कोई लेना-देना राजनीति से है नहीं। फिर भी विपक्ष का I.N.D.I.A गठबंधन सनातन धर्म को नष्ट करने की कसमें खा रहा है।

हालांकि पीएम मोदी समेत पूरे सत्ता पक्ष ने सनातन विरोध पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह सनातन है क्या जिसपर इतना विवाद छिड़ा हुआ है। सनातन का शाब्दिक अर्थ है सतत (Constant)  यानी जो शाश्वत रहता है, सदैव चलता रहता है, जिसमें किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं होता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या है, जिसमें कभी कोई बदलाव नहीं हो सकता। इस प्रश्न का उत्तर एक ऐसे श्लोक में छिपा है जिसका अपने आप में एक अलग ही अर्थ है। जो कि कुछ इस प्रकार है- यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधयो अष्टावंगानि (यानी यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यही अष्टांगिक मार्ग सनातन धर्म का मूल आधार है)। यह आठ नियम सनातन धर्म के प्राण तत्व हैं। जो कि कभी बदल नहीं सकते, जिसकी वजह से इन्हें सनातन कहा गया है।

नियम पांच हैं - पहला खुद को साफ रखना, दूसरा संतोषी जीवन बिताना, तीसरा अनुशासन में रहना, चौथा अध्ययन करना और आखरी यानी की पांचवां आस्थावान होना। इसी प्रकार यम भी पांच हैं - दूसरों को नुकसान ना पहुंचाना, सत्य बोलना, चोरी ना करना, बेहिसाब भोग भी ना करना और जरुरत से ज्यादा संग्रह ना करना, अनुशासन में रहना है।

यह यम-नियम देश काल परिस्थिति से परे हैं। इनमें कोई बदलाव नहीं हो सकता है। इसीलिए इन्हें सनातन कहा गया।  खुद को साफ रखना, चोरी ना करना, झूठ ना बोलना, हिंसा नहीं करना, आनृशंसता आदि जैसे नियम आज से हजार दो हजार साल पहले भी सही थे और अब से पांच हजार साल बाद भी सही रहेंगे। दुनिया का बुरे से बुरा आदमी भी गंदगी में रहने, चोरी करने, झूठ बोलने, अनावश्यक हिंसा करने, अराजक व्यवहार करने जैसी बातों को सही नहीं ठहरा

सकता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इसका विरोध क्यों किया जा रहा है। शायद सनातन धर्म का विरोध करने वाले लोगों को सनातन धर्म के इस मूल सिद्धांतों के बारे में पता ही नहीं है। या फिर इसके बारे में सब कुछ जानते हुए भी झूठ फैला रहे हैं।

इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि जिस तरह पिछले दस सालों में सनातन धर्म लोकप्रिय होता जा रहा है। वह सनातन विरोधियों को पसंद नहीं आ रहा है। यही वजह है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और उनकी सरकार में मंत्री उदयनिधि ने  सनातन धर्म के विरुद्ध बेहद भड़काने वाला बयान दिया।  उदयनिधि ने सनातन धर्म को धार्मिक कुरीतियों से जोड़ा और इसे पूरी तरह खत्म करने की अपील की। यही नही उदयनिधि ने बेहद आपत्तिजनक तरीके से सनातन धर्म की तुलना बीमारियों से भी की।

लेकिन क्या सनातन को खत्म किया जा सकता है। उसे खत्म करने का तो एक ही तरीका है- आप झूठ बोलने लगें, चोरी करें, व्याभिचार करें, अभद्र व्यवहार करें, नफरत फैलाएं, जो भी सामने दिखे उसे मार डालें, गंदगी के ढेर में रहें। यानी सनातन धर्म द्वारा सिखाई बातों के बिल्कुल उल्टा काम करें।

क्या उदयनिधि और डीएमके के दूसरे नेता ऐसा करने के लिए तैयार हैं। या फिर सनातन धर्म को खत्म करने की अपील एक राजनीतिक स्टंट मात्र है। क्योंकि अगर डीएमके के राजनेता अपने समर्थकों से इस तरह की उम्मीद करते हैं तो पहले उन्हें स्वयं ही इसपर अमल करके दिखाना होगा- गंदगी में रहना होगा, चोरी डाका डालना होगा, परिवार और घर से दूरी बनानी होगी,  अराजक और हिंसक बनना होगा।  क्या उदयनिधि और उनके पिता ऐसा कर पाएंगे? 

उदयनिधि जैसे डीएमके नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे के बेटे प्रियांक खड्गे जैसे लोग जिस जाति प्रथा और असमानता की आड़ लेकर सनातन धर्म पर हमला कर रहे हैं। वह सनातन परंपराओं का हिस्सा है ही नहीं। सनातन तो संसार के समस्त प्राणियों में एक ही परमब्रह्म परमात्मा का निवास मानता है।  सार्वभौमिक ईश्वरत्व में विश्वास करता है और वसुधैव कुटुंबकम का नारा देता है। जो कि इस बार जी-20 का स्लोगन भी बना औऱ देश के आत्मनिर्भर होने का प्रतीक बना। गैर बराबरी और वर्ग भेद जैसी कुरीतियां देश काल स्थान के हिसाब से बदलती गईं और सनातन धर्म में इस तरह की कुरीतियों को खत्म करने का सेल्फ करेक्शन सिस्टम मौजूद है। यही वजह है कि आज छुआछूत की परंपरा लगभग नष्ट हो गई है। लेकिन विपक्ष को तो राजनीति करनी है और सनातन धर्म हमला करने के बहाने देश को उत्तर दक्षिण, हिंदी तमिल, आर्य द्रविड़ जैसे विभाजनकारी खानों में बांटकर सत्ता हासिल करनी है। वास्तव में देखा जाए तो जिस प्रकार महाभारत में कौरवों का समूल नाश शकुनि के कारण हुआ, ठीक वही भूमिका डीएमके और कांग्रेस के कुछ नेता निभा रहे हैं। उनका यह सनातन विरोध भारत की जनता स्वीकार नहीं करेगी। इसका असर चुनाव में दिखाई देगा।

 

 


दीपक कुमार रथ

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