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विपक्ष की बेहुदा हरकतें आत्मघाती कदम : उपराष्ट्रपति धनखड़ जी से असभ्यता महंगी पड़ेगी

Ridiculous actions of the opposition are suicidal steps: Rudeness from Vice President Dhankhar ji will be costly.

लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्षी सांसदों ने जमकर हल्ला किया। वैसे तो किसी न किसी बहाने से सदन की कार्यवाही रोकना विपक्ष की आदत रही है पर जिसे एक सीमा तक हर सरकार बर्दाश्त करती रहती है। विरोध करने की सीमा कहीं तक हो अध्यक्ष के साथ दुर्व्यहार, अनाचरण या अभद्र भाषा प्रपत्रों को फाड़ना आदि बन्द होना चाहिए।

 संसद में सुरक्षा की चूक को लेकर दोनों सदनों से निलंबित किये गये 146 सांसदों के मामले को लेकर विपक्ष ने दिल्ली में पैदल मार्च निकाल कर खुद अपनी हरकतों से जनता को वाकिफ करा दिया, शायद ही किसी व्यक्ति की सहानुभूति उनके साथ हो। हंगामा करने वालों को, बदतमीजी करने वालों को जब भी सजा मिलती है चाहे वो किसी फिल्म ही में क्यों न हो जनता तालियां बजाती है। यही हाल निलंबित सांसदों और विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ हो रहा। माननीयों के निष्कासन से लोग खुश हैं।

पहले भी फालतू बातों जैसे नये संसद का भवन निर्माण फिर उसका उदघाटन, फिर प्रधानमंत्री द्वारा जबाब देने की जिद आदि पर हंगामा करके अपनी किरकिरी करायी। उसका नतीजा हाल ही के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल गया जब उत्तर भारत के तीनों प्रदेश मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा बम्पर वोटों से जीती। सांसदों के निलंबन पर मार्च निकाल कर विपक्ष ने खुद की पोल खोल दी। अपने आचरण, फिर उपराष्ट्रपति की नकल और राहुल गांधी का वीडियो बनाना सारी करतूतें जन-जन तक पहुंचा कर आत्मघाती कदम उठा लिया।

सांसद जनता की समस्याओं को उठाने और प्रदेश, देश को विकास की ओर ले जाने के कार्यों  पर सुझाव प्रस्ताव बहस आदि के लिये चुने जाते हैं। उन पर अरबो रूपये खर्च होते हैं। ये माननीय हर तरह का सुख भोगते हैं। बंगला, रेलगाड़ी, हवाई सफर सब कुछ मुफ्त। वेतन और अन्य शक्तियों से प्रदत्त होते हैं। उनके लिये संसदीय कार्यों में हिस्सा लेने के बजाय उसमें व्यवधान डालना रोजमर्रा का काम हो गया है। विपक्ष कोई एक मांग प्रत्येक सत्र में उठा लेता है, फिर उस पर जिद पकड़ लेता है, फिर हंगामा शुरू करता है। चिल्ला चिल्ला कर सदन नहीं चलने देता है। जब सारे हथियार फेल हो जाते हैं तो बदतमीजी पर उतर आते हैं ताकि सदन न चल पाये। संसद से वाकआउट करना अखबार की, टीवी  की सुर्खियों में आये और घर बैठकर ऐशो आराम करें। एेसे एेसे बेमतलब के मुद्दों पर हंगामा करते हैं जो नियम प्रतिकूल भी है और जिनका जनता से कोई लेना देना नहीं है। कई बार इस बात पर अड़ जाते हैं कि इसका जवाब प्रधानमंत्री ही दें या गृहमंत्री ही दें। नियमों में एेसा कोई प्रावधान नहीं है। प्रधानमंत्री जवाब दंे या कोई अन्य मंत्री इससे सांसद को या लोगों को क्या फर्क पड़ता है या क्या लाभ हानि हो पायेगी। नये संसद के निर्माण में कांग्रेस पार्टी ने खूब बाधा डालने की कोशिश की जबकि यह प्रस्ताव कांग्रेस का ही था। सुप्रीम कोर्ट तक गये, अपना समय, जनता का पैसा और सुप्रीम कोर्ट का समय बर्बाद किया, हार कर आ गये, फिर उसके उद्घाटन पर हंगामा किया। उद्घाटन राष्ट्रपति करें या प्रधानमंत्री, इससे जनता या विपक्ष को क्या लाभ था। लेकिन विपक्ष अपनी जिद पर डटा रहा और लोगों की नजरों में हास्य का पात्र बना।

हाल में संसद में अभद्र व्यवहार के लिये लोकसभा से और राज्यसभा से बड़ी संख्या में सांसदों को निलंबित किया गया। दोनों सदनों की ये संख्या बड़ कर 143 तक पहुंच गयी। निकाले गये सांसद अपनी याचिका लेकर जनता के सम्मुख जायें, कोई इन्हें घास तक नहीं डालेगा। लोग इनसे सभ्य आचरण की आशा करते हैं। विषय भी एेसा नहीं है कि कहीं पर लोगों के साथ अन्याय हो गया हो या राष्ट्र या संविधान से खिलवाड़ हो गया है। उनका विवाद है कि सदन में सुरक्षा की चूक पर प्रधानमंत्री बयान दें। पहली बात तो प्रधानमंत्री ही बयान दें एेसा कोई नियम नहीं है। दूसरी बात सदन के अध्यक्ष की बात नहीं मानना, उनकी प्रार्थना अस्वीकार करना, उनके आदेश नहीं मानना, ऊपर से अभद्रता करना संसदीय प्रणाली के विरूद्ध है जिसे लोग कभी पसंद नहीं करेंगे। विषय क्या है - खुद की सुरक्षा की चिंता, जबकि उन्हें पूरी सुरक्षा मिली हुई है। सिपाही, गनर, पुलिस सब कुछ मिला हुआ है। इन माननीयों ने अपनी सुरक्षा को लेकर सदन नहीं चलनें दिया। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में जब पंजाब में चूक हुयी थी तब सदन में बाधा नहीं डाली थी। उत्तराखंड में खदानों में फंसे मौत से जूझते हुये लोगों को बचाया गया तो बजाय बधाई देने के उसमें खामियां निकालनें में लग गये। इन सांसदों को चाहिये था कि सुरक्षा में चूक पर बहस करते, सुझाव देते, कोई नये नियम कानून बनाये जाने पर बात करते पर अपने कर्तव्य से ये माननीय कोसों दूर हो चुके हैं।

सुरक्षा में चूक तो अमेरिका जैसे देश में भी हुयी। इन चार अमेरिकन राष्ट्रपतियों की हत्याएंं हुई हैं। अब्राहिम लिंकन, जेम्स ए.गेरफील्ड, विलियम मेकनले और जान एफ केनेडी। भारत में भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भारी सुरक्षा के बीच हत्या हुई। अगर बहस होती तो ये बात सभी सामनें आती और सुरक्षा के नये उपायों का रास्ता खुलता। सुरक्षा की कमियांे और उसे अधिक सशक्त बनानें पर बात होना चाहिये थी, सरकार की खामियों पर बात उठाते तो बेहतर होता। यदि अध्यक्ष महोदय चर्चा करने से मना करते तब सवाल उठता है विरोध जतानें का, चिल्लाने का, सदन छोड़ने का। हालांकि तब भी अध्यक्ष के बार-बार बोलने पर आदेश न मानने पर यदि कार्यवाही होती भी तो हल्की फुुल्की होती। यदि अध्यक्ष के साथ बदतमीजी करोगेे, मजाक बनाओगे तो सदन से निकाले जाने को सभी लोग सही ठहरायेंगे।

राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ जो कि उपराष्ट्रपति भी हैं जाट समाज से आते हैं। सदन में उनके साथ अभद्रता की गयी। उन्होंने आचरण अनुचित होने के कारण कुछ सांसदों को सदन से निलंबित किया। तृणमूल कांग्रेस के सदस्य कल्याण बनर्जी ने उनकी भौंडे ढंग से नकल उतार कर अशिष्टता की। राहुल गांधी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने वीडियो बनाया जो वायरल भी किया गया। उससे कल्याण बनर्जी पर लोगों ने प्रश्न उठाया, पार्टी की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सफाई भी तुरन्त दी। राहुल गांधी को वीडियो बनाने की क्या जरूरत थी फिर उसे सार्वजनिक किया। ये राहुल गांधी का लड़कपन दिखाता है। सदन में कभी आंख मारना, कभी पेपर फाड़ना, कभी आस्तीन चढ़ाना, कभी प्रधानमंत्री के पास जाकर झप्पी डालने का प्रयास करना ये सब अशोभनीय है।

अब बात जाट समाज तक पहुंच गयी। जाट तो वैसे भी जल्दी एकजुट हो जाते हैं। उन्होंने भी विपक्ष के खिलाफ धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया तो कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जी का बयान आया कि इसे जाति का मुद्दा नहीं बनाना चाहिये। वे भूल गये कि आपकी पार्टी ने, विपक्ष के साथ  इकट्ठा होकर जाति गणना की वकालत की। विपक्ष के नेता ममता बनर्जी और केजरीवाल ने आपको इंडी गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाने की बात खड़गे जी को दलित कह कर कही। विपक्ष द्वारा जातिवाद को बढ़ावा देने या समाज को घटकों में विभक्त करनें, बांटने का काम राष्ट्रहित में नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष की जाति गणना का जमकर और सटीक उत्तर दे दिया। मोदी ने कहा कि जातियां तो केवल चार है। महिला, युवा, गरीब और किसान कह कर एक नयी जाति की परिभाषा देकर मोदी जी ने जाति गणना को पीछे छोड़ दिया। जहां मोदी, राष्ट्रभक्ति, अखंडता, एकता की बात करके देश के विकास से जोड़ देते हैं। वही अंतर्राष्ट्रीय जगत में पर्यावरण, विश्व कुटुम्ब और विश्व एकता की बात करते हैं। विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मोदी,अडानी अम्बानी को भला बुरा कह कर समय बर्बाद करते हैं, सदन में बैठकर वीडियो बनाते हैं फिर वीडियो को वायरल करके खुश होते हैं ये विपक्ष का आत्मघाती कदम है।

ममता बनर्जी वाराणसी से मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ा कर निबटाना चाहती है। राहुल अपनी कार्यकलापों से पहले ही उत्तर प्रदेष में अमेठी से निबट गये है। भ्रष्ट को श्रेष्ठ कहने वाले अरविन्द केजरीवाल ने आप पार्टी को नीचे गिरा लिया। सपा के नेता अरबों की सम्पत्ति अर्जित करने में जेल में हैं। यही हाल राष्ट्रवादी कांग्रेस का है। स्टालिन के बेटे ने हिन्दु धर्म, सनातन धर्म का घोर अपमान किया है। सुप्रीम कोेर्ट से सजायाफ्ता लालू यादव को इंडी संघ में शामिल करना लोगों के गले नहीं उतर रहा। कुल मिला कर विपक्ष द्वारा की करतूतें, सरकार पर खुद को बचानें के लिये हमले करना उन्हीं पर आत्मघाती लग रहा हैं। इंडी एलायंस के समस्त विपक्षी दल के नेता और सांसद आदि ने 143 सांसदो के निलंबन के विरोध में पैदल मार्च निकाला। विषय था कि सुरक्षा चूक पर प्रधानमंत्री ब्यान दें। उनकी बेतुकी मांग की बात जनता तक विपक्ष ने खुद पहुंचा दी। यही हाल रहा तो आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 1984 के लोकसभा चुनाव में आया सबसे बड़ा आंकड़ा जो कांग्रेस को इंदिरा गंाधी की हत्या होने के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में प्राप्त हुआ था, उस 414 के आंकड़े को पार कर भाजपा नया रिकार्ड बना दे तो आश्यर्च की बात नहीं होगी। विपक्ष फिर अपने अन्दर झांकने के बजाय मोदी मशीन और मनी पावर पर दोष मढ़ने में लग जायेगा।






डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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