
मानस सत्पथी
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की विकास यात्रा में यदि किसी क्षेत्र ने राष्ट्र-निर्माण की सबसे सशक्त कहानी लिखी है, तो वह सिंचाई अवसंरचना का निर्माण है। विशाल बांधों, लंबी नहरों और बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं ने न केवल कृषि उत्पादन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया, बल्कि भारत को खाद्यान्न आयातक देश से विश्व के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों में शामिल कर दिया। हरित क्रांति की सफलता, किसानों की बढ़ती उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विस्तार में इन परियोजनाओं की निर्णायक भूमिका रही। यही कारण था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बड़े बांधों को आधुनिक भारत के "नए मंदिर" कहा था।
लेकिन इस सफलता के पीछे एक ऐसा विरोधाभास भी छिपा है, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। सात दशकों की योजनाबद्ध सिंचाई व्यवस्था के बावजूद आज भी भारत के लगभग आधे कृषि क्षेत्र की निर्भरता मानसून पर बनी हुई है। सरकारी आकलन बताते हैं कि यदि देश अपनी पूरी सिंचाई क्षमता का उपयोग भी कर ले, तब भी लगभग 40 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा आधारित ही रहेगी। यही वे क्षेत्र हैं जो देश के अधिकांश मोटे अनाज, दालें और तिलहन पैदा करते हैं तथा जहाँ अनुसूचित जनजातियों और आर्थिक रूप से सबसे कमजोर समुदायों की बड़ी आबादी निवास करती है।
इन क्षेत्रों की समस्या को अक्सर केवल "जल संकट" के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश हिस्सों में प्रतिवर्ष 700 से 1400 मिलीमीटर तक वर्षा होती है, जो विश्व के अनेक विकसित सिंचित क्षेत्रों के बराबर है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि यहाँ पानी कम गिरता है, बल्कि यह है कि जो पानी बरसता है, उसे धरती पर रोककर रखने, भूजल में पहुँचाने और पुनः उपयोग के योग्य बनाने की हमारी क्षमता कितनी है।

यहीं से भारत की सिंचाई नीति पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। आज चुनौती केवल नए बांध बनाने या अधिक नहरें खोदने की नहीं है। असली आवश्यकता यह समझने की है कि जल सुरक्षा केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं से नहीं, बल्कि स्वस्थ प्राकृतिक परिदृश्यों, मजबूत स्थानीय संस्थाओं और टिकाऊ जल-प्रबंधन प्रणाली से सुनिश्चित होती है। जलवायु परिवर्तन, गिरते भूजल स्तर और अनियमित मानसून के इस दौर में भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है—क्या हम पिछली शताब्दी की परियोजना-आधारित सिंचाई व्यवस्था को ही आगे बढ़ाएँगे या फिर ऐसी नीति अपनाएँगे जो पूरे भू-दृश्य (Landscape) को जल संरक्षण का आधार बनाए?
भारत की भूली-बिसरी जल सभ्यता
सिंचाई विभागों और आधुनिक इंजीनियरिंग के अस्तित्व में आने से बहुत पहले भारत ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन की अत्यंत विकसित परंपरा विकसित कर ली थी। भारतीय समाज ने प्रकृति को बदलने के बजाय उसके अनुरूप स्वयं को ढालने की नीति अपनाई।
दक्षिण भारत के चोल शासकों ने परस्पर जुड़े हुए तालाबों (Cascading Tank Systems) का निर्माण किया, जिनमें एक तालाब का अतिरिक्त जल दूसरे तालाब में पहुँचता था। वर्तमान तेलंगाना के काकतीय शासकों ने प्राकृतिक जलधाराओं के साथ हजारों जलाशय बनाए, जिनमें से अनेक आज भी कार्यरत हैं। राजस्थान ने शुष्क परिस्थितियों के अनुरूप जोहड़ और कुंड विकसित किए, जबकि बिहार में आहर-पइन जैसी प्रणालियाँ मौसमी बाढ़ को नियंत्रित करने का प्रभावी माध्यम बनीं। हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने से प्राप्त जल को खेतों तक पहुँचाने के लिए कुहल प्रणाली विकसित हुई, वहीं दक्कन के पठारी क्षेत्रों में छोटे-छोटे तालाब, मेड़बंदी और जल अवरोधक संरचनाएँ वर्षा जल को रोकने का आधार बनीं।
इन सभी प्रणालियों में विविधता अवश्य थी, लेकिन उनका मूल दर्शन एक ही था—प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग।
इनका उद्देश्य केवल खेतों तक पानी पहुँचाना नहीं था। ये पूरे पारिस्थितिक तंत्र को सशक्त बनाती थीं। तालाब भूजल को पुनर्भरित करते थे, मिट्टी में नमी बनाए रखते थे, बाढ़ की तीव्रता कम करते थे, पशुपालन और मत्स्य पालन को बढ़ावा देते थे तथा स्थानीय जैव विविधता की रक्षा करते थे। प्रत्येक जल संरचना अपने आप में अलग परियोजना नहीं थी, बल्कि पूरे भू-दृश्य का एक अभिन्न हिस्सा थी।
इतना ही महत्वपूर्ण था उनका सामाजिक ढाँचा। इन प्रणालियों का संचालन स्थानीय समुदाय करते थे। गाँवों की संस्थाएँ जल वितरण तय करती थीं, रखरखाव करती थीं और विवादों का समाधान करती थीं। शासक बड़े मरम्मत कार्यों और विस्तार के लिए संसाधन उपलब्ध कराते थे। अर्थात जल प्रबंधन केवल तकनीकी विषय नहीं था, बल्कि स्थानीय शासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी हिस्सा था।
यही भारत की वास्तविक जल सभ्यता थी—जहाँ सिंचाई का अर्थ केवल पानी उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे प्राकृतिक परिदृश्य विकसित करना था जो वर्षा जल को अधिक समय तक अपने भीतर संजोकर रख सकें।
औपनिवेशिक शासन और जल प्रबंधन की बदलती सोच
ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ भारत की यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। औपनिवेशिक प्रशासन जल को स्थानीय संसाधन नहीं, बल्कि राजस्व और प्रशासनिक नियंत्रण के साधन के रूप में देखता था।
बड़ी नहरें और केंद्रीकृत सिंचाई परियोजनाएँ उनके लिए अधिक सुविधाजनक थीं क्योंकि उनका सर्वेक्षण करना, वित्तपोषण करना, रखरखाव करना और उन पर कर लगाना अपेक्षाकृत आसान था। इसके विपरीत हजारों स्थानीय तालाबों और सामुदायिक जल प्रणालियों का प्रबंधन औपनिवेशिक शासन की केंद्रीकृत प्रशासनिक सोच से मेल नहीं खाता था।
धीरे-धीरे जल प्रबंधन समाज और प्रकृति के संयुक्त प्रयास से निकलकर इंजीनियरिंग विभागों के नियंत्रण में चला गया। स्थानीय ज्ञान की जगह पेशेवर इंजीनियरों ने ले ली। ग्राम संस्थाओं की भूमिका नौकरशाही ने संभाल ली। जल संरक्षण की अवधारणा पीछे छूटती गई और उसकी जगह नहरों द्वारा पानी पहुँचाने की सोच हावी हो गई।
इस परिवर्तन का प्रभाव केवल तकनीक तक सीमित नहीं था। सदियों से जिन सामाजिक संस्थाओं ने तालाबों, बांधों और जलाशयों की देखभाल की थी, वे कमजोर पड़ती चली गईं। कई स्थानों पर जल संरचनाएँ तो बचीं, लेकिन उन्हें संचालित करने वाली सामाजिक व्यवस्था समाप्त हो गई। परिणामस्वरूप समय के साथ हजारों पारंपरिक जलाशय उपेक्षा का शिकार हो गए।
यहीं से भारत की सिंचाई व्यवस्था का चरित्र बदल गया। जल अब प्राकृतिक परिदृश्य का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि सरकारी परियोजनाओं का उत्पाद बन गया। इसी सोच की विरासत स्वतंत्र भारत को भी मिली, जिसने विकास के नए लक्ष्य तो निर्धारित किए, लेकिन जल प्रबंधन के संस्थागत ढाँचे में अपेक्षित परिवर्तन नहीं कर पाया।

स्वतंत्रता के बाद भी नहीं बदला संस्थागत ढाँचा
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और आर्थिक विकास की थी। ऐसे समय में भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा और इंदिरा गांधी नहर जैसी विशाल परियोजनाओं ने देश के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया। यदि ये परियोजनाएँ नहीं होतीं, तो हरित क्रांति की सफलता और कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता की कल्पना करना कठिन होता।
किन्तु एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्वतंत्र भारत ने औपनिवेशिक शासन से प्राप्त सिंचाई के संस्थागत ढाँचे में बहुत कम परिवर्तन किया। उद्देश्य अवश्य बदल गया—राजस्व संग्रह के स्थान पर कृषि उत्पादन और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता मिली—लेकिन योजना निर्माण की सोच वही रही। सिंचाई का अर्थ बड़े बांध, लंबी नहरें और विशाल कमांड एरिया (Command Area) ही माना जाता रहा।
सरकारी योजनाओं में सिंचाई परियोजनाओं को "बड़ी", "मध्यम" और "लघु" श्रेणियों में बाँटा गया। यह वर्गीकरण देखने में केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रतीत होता है, लेकिन उसने नीति-निर्माण को गहराई से प्रभावित किया। बड़े बांधों और नहरों को अधिक बजट, तकनीकी विशेषज्ञता और राजनीतिक प्राथमिकता मिली, जबकि लाखों किसानों के जीवन से जुड़े छोटे तालाब, पारंपरिक जलाशय और सामुदायिक जल संरचनाएँ "लघु सिंचाई" के नाम पर हाशिए पर चली गईं।
समय के साथ सिंचाई की सफलता मापने के मानदंड भी बदल गए। यह देखा जाने लगा कि कितने करोड़ घनमीटर जल संग्रहित हुआ, कितनी किलोमीटर नहर बनी और कितने लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिली। ये मानक इंजीनियरिंग परियोजनाओं के मूल्यांकन के लिए उपयुक्त थे, लेकिन वे यह नहीं बता सकते थे कि किसी क्षेत्र का भूजल कितना बढ़ा, मिट्टी की नमी में कितना सुधार हुआ, जलग्रहण क्षेत्र कितना स्वस्थ हुआ या स्थानीय पारिस्थितिकी कितनी मजबूत हुई।
धीरे-धीरे पानी एक प्राकृतिक चक्र के बजाय केवल इंजीनियरिंग का उत्पाद बन गया।
यह मॉडल उत्तर भारत के विशाल जलोढ़ मैदानों में काफी सफल रहा, जहाँ चौड़ी नदियाँ, समतल भूभाग और गहरे भूजल भंडार बड़ी नहर प्रणालियों के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल थे। लेकिन जब यही मॉडल दक्कन के पठार, बुंदेलखंड, छोटानागपुर और मध्य भारत के कठोर चट्टानी क्षेत्रों में लागू किया गया, तब उसकी सीमाएँ सामने आने लगीं। इन क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं, फिर भी उनके लिए वही नीति अपनाई गई जो गंगा के मैदानों के लिए बनाई गई थी।
यहीं से भारत की सिंचाई नीति और प्राकृतिक भूगोल के बीच असंतुलन पैदा हुआ, जिसका प्रभाव आज भी स्पष्ट दिखाई देता है।
पठारी भारत अब भी क्यों पिछड़ा है?
अक्सर कहा जाता है कि भारत के पठारी और आदिवासी क्षेत्रों में सिंचाई का विकास इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि वहाँ नदियाँ कम हैं, भूमि ऊबड़-खाबड़ है और चट्टानी संरचना के कारण भूजल सीमित है। इन कारणों में कुछ सच्चाई अवश्य है, लेकिन पूरी कहानी यही नहीं है।
असल समस्या प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें समझने की हमारी नीति की कमी है।
उत्तर भारत के मैदान और दक्कन का पठार दो बिल्कुल अलग जल-भौगोलिक संसार हैं। गंगा के मैदानों में गहरे जलभृत (Aquifers), विस्तृत नदी तंत्र और समतल भूमि है। इसलिए वहाँ नहरें और बड़े जलाशय प्रभावी सिद्ध होते हैं। इसके विपरीत पठारी क्षेत्रों में वर्षा मुख्यतः मानसून के कुछ सप्ताहों में होती है। कठोर चट्टानों के कारण भूजल सीमित मात्रा में संग्रहित होता है और छोटी-छोटी नदियाँ वर्षा समाप्त होते ही सूखने लगती हैं।
अर्थात इन क्षेत्रों में पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी के धरती पर टिके रहने की अवधि बहुत कम है।
भारत की पारंपरिक जल प्रणालियाँ इसी वास्तविकता को समझती थीं। दक्कन, बुंदेलखंड और मध्य भारत में हजारों तालाब, छोटी पालें, मेड़बंदियाँ और जल अवरोधक संरचनाएँ वर्षा जल की गति को धीमा करती थीं। इससे पानी धीरे-धीरे जमीन में समाता था, भूजल का स्तर बढ़ता था और कुछ सप्ताह की वर्षा पूरे वर्ष की जल उपलब्धता में बदल जाती थी। इससे केवल खेती ही नहीं, बल्कि पशुपालन, मत्स्य पालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संपूर्ण आधार मजबूत होता था।
आधुनिक सिंचाई नीति ने इसके विपरीत वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोकने के बजाय बाहर से पानी लाने अथवा भूजल के अत्यधिक दोहन पर अधिक भरोसा किया। कुछ समय तक इससे सिंचाई क्षेत्र बढ़ा, लेकिन भूजल का लगातार दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में कहीं अधिक तेज़ हो गया।
इस नीति का आर्थिक पक्ष भी विचारणीय है। एक बड़ा बांध लाखों हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा दे सकता है और उसका उद्घाटन भी राजनीतिक रूप से आकर्षक होता है। इसके विपरीत किसी पठारी जिले में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हजारों खेत तालाब, चेक डैम, कंटूर बंडिंग, परकोलेशन टैंक और पुनर्भरण संरचनाएँ बनानी पड़ती हैं। ये परियोजनाएँ सुर्खियाँ भले न बनाएँ, लेकिन दीर्घकाल में इनका पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ कहीं अधिक होता है।
दुर्भाग्य से हमारी नीतियाँ लंबे समय तक दृश्यमान अवसंरचना को प्राथमिकता देती रहीं, जबकि अदृश्य पारिस्थितिक मजबूती की उपेक्षा होती रही।

जब परिदृश्य की अनदेखी महँगी पड़ने लगी
पिछले पाँच दशकों में भारत की जल अर्थव्यवस्था में एक बड़ा परिवर्तन आया है। आज सिंचाई का सबसे बड़ा स्रोत नहरें नहीं, बल्कि भूजल है। लाखों किसानों ने मानसून की अनिश्चितता और नहरों की सीमित पहुँच के कारण ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भरता बढ़ा दी।
कुछ समय तक यह व्यवस्था कृषि उत्पादन के लिए लाभकारी सिद्ध हुई, लेकिन धीरे-धीरे इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे। अनेक राज्यों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, कुएँ सूख रहे हैं, बोरवेल की गहराई बढ़ती जा रही है और सूखे की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होती जा रही है।
दरअसल हमने भूजल निकालने की व्यवस्था तो विकसित कर ली, लेकिन उसे पुनर्भरित करने की व्यवस्था उतनी मज़बूत नहीं बनाई।
तेलंगाना की 'मिशन काकतीय' इस संदर्भ में महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है। वर्ष 2014 में आरम्भ हुई इस योजना का उद्देश्य राज्य के 46 हजार से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन था। हजारों जलाशयों के पुनरुद्धार से सिंचाई क्षमता बढ़ी, भूजल स्तर में सुधार हुआ, मत्स्य पालन को बढ़ावा मिला और किसानों की फसल तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
लेकिन इस योजना ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट किया—सिर्फ तालाबों का निर्माण या मरम्मत पर्याप्त नहीं है। यदि उनके रखरखाव के लिए स्थानीय जल उपयोगकर्ता समितियाँ, पंचायतें और सामुदायिक संस्थाएँ सक्रिय नहीं होंगी, तो कुछ वर्षों बाद वही संरचनाएँ पुनः जर्जर हो जाएँगी।
यही भारत की ऐतिहासिक जल परंपरा का सबसे बड़ा सबक है। हमारी प्राचीन जल प्रणालियाँ केवल इसलिए सदियों तक जीवित नहीं रहीं कि उनका निर्माण उत्कृष्ट था, बल्कि इसलिए कि उनके पीछे समाज खड़ा था। जल संरक्षण इंजीनियरों का नहीं, पूरे समुदाय का दायित्व था।
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नई जल संरचनाएँ बनाना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक और संस्थागत क्षमता का पुनर्निर्माण करना है जो उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रख सके।
भारत के सिंचाई विकास की यात्रा को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह चार अलग-अलग चरणों में विकसित होती दिखाई देती है। पहला चरण वह था जब जल प्रबंधन स्थानीय समाज, प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से संचालित होता था। प्रत्येक क्षेत्र अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण की तकनीक विकसित करता था और उसका संचालन स्थानीय संस्थाएँ करती थीं। यह वास्तव में "परिदृश्य आधारित जल शासन" (Landscape-based Water Governance) का उत्कृष्ट उदाहरण था।
दूसरा चरण औपनिवेशिक शासन के साथ प्रारंभ हुआ, जब जल प्रबंधन का केंद्रीकरण हुआ और इंजीनियरिंग को सर्वोच्च स्थान मिला। सिंचाई का उद्देश्य स्थानीय जल चक्र को सुदृढ़ करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियंत्रण और राजस्व संग्रह को आसान बनाना था। नहरें और विशाल परियोजनाएँ विकास के प्रमुख प्रतीक बन गईं।
स्वतंत्रता के बाद तीसरा चरण आरम्भ हुआ। भारत ने इसी संस्थागत ढाँचे को अपनाकर उसे राष्ट्रीय विकास और खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य से जोड़ दिया। बड़े बांधों, बहुउद्देशीय परियोजनाओं और नहरों ने कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की और देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया। यह उपलब्धि निर्विवाद है। किंतु समय के साथ यह भी स्पष्ट हो गया कि यही मॉडल भारत के प्रत्येक भू-भाग के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हो सकता।
आज जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून, भूजल के तीव्र दोहन और वर्षा आधारित कृषि की बढ़ती असुरक्षा हमें चौथे चरण की ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही है। यह चरण है—"लैंडस्केप रेज़िलिएंस स्टेट" अर्थात् परिदृश्य-आधारित जल प्रत्यास्थता वाला भारत।
इस अवधारणा का अर्थ बड़े बांधों या नहरों का विरोध करना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि जल नीति का केंद्र किसी एक परियोजना या नदी घाटी के बजाय संपूर्ण सूक्ष्म जलग्रहण क्षेत्र (Micro-Watershed) बने। पहाड़, जंगल, खेत, जलधाराएँ, भूजल और स्थानीय समुदाय—इन सभी को एक समग्र पारिस्थितिक इकाई के रूप में देखा जाए। जब तक वर्षा का जल पूरे भू-दृश्य में अधिक समय तक नहीं रुकेगा, तब तक केवल बाहरी जल आपूर्ति से स्थायी जल सुरक्षा संभव नहीं होगी।
नई जल सुरक्षा का आधार क्या हो?
भारत की भविष्य की सिंचाई नीति कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
सबसे पहला सिद्धांत यह होना चाहिए कि प्रत्येक क्षेत्र अपने यहाँ होने वाली वर्षा का अधिकतम उपयोग करे। किसी अन्य नदी से पानी लाने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि स्थानीय वर्षा का एक-एक बूंद यथासंभव धरती में समाए। वर्षा जल संचयन कोई पूरक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जल सुरक्षा की पहली शर्त बनना चाहिए।
दूसरा सिद्धांत यह है कि भूजल को असीमित संसाधन नहीं बल्कि नवीकरणीय प्राकृतिक पूँजी माना जाए। दशकों तक हमारी नीतियाँ भूजल निकालने पर केंद्रित रहीं, अब प्राथमिकता उसके पुनर्भरण की होनी चाहिए। जलभृतों का पुनर्जीवन, झरनों का संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्रों का उपचार और वर्षा जल का भूजल में समावेशन राष्ट्रीय जल नीति का अभिन्न हिस्सा बनना चाहिए।
तीसरा सिद्धांत यह है कि विकेंद्रीकृत जल संरचनाओं को बड़े जलाशयों का विकल्प नहीं बल्कि उनका पूरक माना जाए। खेत तालाब, चेक डैम, कंटूर बंडिंग, परकोलेशन टैंक, रिचार्ज ट्रेंच और पारंपरिक तालाब—ये सभी मिलकर एक ऐसा जल तंत्र बनाते हैं जो पूरे क्षेत्र की जल धारण क्षमता को बढ़ाता है। यदि इन संरचनाओं को वैज्ञानिक ढंग से जोड़ा जाए, तो वे किसी भी बड़े बांध के प्रभाव को कई गुना अधिक स्थायी बना सकती हैं।
लेकिन इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है संस्थागत समन्वय। आज जल संसाधन विभाग, कृषि विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय, वन विभाग, भूजल एजेंसियाँ और पंचायती राज संस्थाएँ अलग-अलग काम करती हैं। जबकि पानी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानता। इसलिए जल प्रबंधन की व्यवस्था भी विभागीय खाँचों से बाहर निकलकर समेकित होनी चाहिए। स्थानीय समुदायों, जल उपयोगकर्ता समितियों और पंचायतों को फिर से निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना होगा।
भारत के पास आधार पहले से मौजूद है
सौभाग्य की बात यह है कि भारत को इस दिशा में शून्य से शुरुआत नहीं करनी है। पिछले कुछ वर्षों में कई सरकारी कार्यक्रम इस नई सोच की झलक प्रस्तुत करते हैं।
जल शक्ति अभियान के अंतर्गत कैच द रेन अभियान ने वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन और स्थानीय पुनर्भरण संरचनाओं को प्रोत्साहित किया है। अटल भूजल योजना ने यह सिद्ध किया है कि यदि स्थानीय समुदायों को भूजल प्रबंधन में सहभागी बनाया जाए, तो जलभृतों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है। इसी प्रकार मिशन काकतीय ने यह दिखाया कि पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन केवल सिंचाई ही नहीं बढ़ाता, बल्कि भूजल, मत्स्य पालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा देता है।
समस्या इन योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके बीच समन्वय के अभाव की है। आज भी अधिकांश कार्यक्रम अलग-अलग विभागों के अंतर्गत संचालित होते हैं, उनके मूल्यांकन के मानदंड अलग हैं और उनके लिए वित्तीय व्यवस्था भी अलग-अलग है। परिणामस्वरूप किसी एक जलग्रहण क्षेत्र में अनेक योजनाएँ चलने के बावजूद उनका संयुक्त प्रभाव मापा ही नहीं जाता। यदि किसी गाँव में एक तालाब पुनर्जीवित होता है, दूसरी ओर चेक डैम बनता है, तीसरी ओर वृक्षारोपण होता है और चौथी ओर भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था की जाती है, तो इन्हें चार अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं बल्कि एक ही जल परिदृश्य के परस्पर जुड़े हुए घटक माना जाना चाहिए। भारत के पास इसके लिए पर्याप्त वैज्ञानिक क्षमता भी उपलब्ध है। इंडिया-डब्ल्यूआरआईएस (India-WRIS), केंद्रीय जल आयोग, लघु सिंचाई गणना, कृषि गणना तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसी संस्थाओं के पास विशाल आँकड़ा भंडार है। रिमोट सेंसिंग, उपग्रह चित्रण, जीआईएस आधारित मानचित्रण और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीकें अब हमें यह समझने की क्षमता देती हैं कि किसी क्षेत्र में वर्षा का पानी किस प्रकार प्रवाहित होता है, कितना भूजल में समाता है और कहाँ सबसे अधिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। चुनौती तकनीक की नहीं, बल्कि इन सभी प्रयासों को एक साझा राष्ट्रीय दृष्टि से जोड़ने की है।
सफलता मापने के पैमाने भी बदलने होंगे
आज तक सिंचाई की सफलता इस आधार पर मापी जाती रही है कि कितने हेक्टेयर क्षेत्र को पानी मिला या कितनी जल संग्रहण क्षमता निर्मित हुई। लेकिन जलवायु परिवर्तन के इस युग में यह पर्याप्त नहीं है।
अब यह भी देखना होगा कि किसी निवेश से भूजल कितना बढ़ा, मिट्टी में नमी कितनी देर तक बनी रही, वर्षा का बहाव कितना कम हुआ, स्थानीय जैव विविधता कितनी सुदृढ़ हुई और ग्रामीण समाज जल संकट के प्रति कितना अधिक सक्षम बना।
दूसरे शब्दों में, अब केवल "प्रति बूंद अधिक फसल" (More Crop per Drop) का लक्ष्य पर्याप्त नहीं है; इसके साथ "प्रति हेक्टेयर अधिक प्रत्यास्थता" (More Resilience per Hectare) को भी नीति का मानक बनाना होगा।
निष्कर्ष : भारत को अपनी जल-बुद्धि फिर से खोजनी होगी
भारत की सिंचाई व्यवस्था का भविष्य अतीत और आधुनिकता के बीच चुनाव करने में नहीं, बल्कि दोनों का समन्वय करने में है। बड़े बांध, नहरें और बहुउद्देशीय परियोजनाएँ आगे भी आवश्यक रहेंगी, क्योंकि अनेक क्षेत्रों में उनका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन इनके साथ-साथ हजारों चेक डैम, पुनर्जीवित तालाब, वैज्ञानिक जलग्रहण प्रबंधन, खेत तालाब और सामुदायिक भूजल संरक्षण की व्यवस्था भी उतनी ही अनिवार्य होगी।
बीसवीं शताब्दी ने भारत को एक सशक्त हाइड्रोलिक स्टेट दिया, जिसने खाद्य सुरक्षा की नींव रखी। इक्कीसवीं शताब्दी की चुनौती इससे आगे बढ़ने की है। अब भारत को ऐसा "लैंडस्केप रेज़िलिएंस स्टेट" बनाना होगा, जहाँ विकास की सफलता केवल बांधों की ऊँचाई, नहरों की लंबाई या जलाशयों की क्षमता से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाए कि हमारे प्राकृतिक परिदृश्य कितने अधिक जल-सक्षम बने, भूजल कितना टिकाऊ हुआ और करोड़ों किसानों का भविष्य कितना अधिक सुरक्षित हुआ।
भारत का इतिहास बताता है कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धियाँ तब मिलीं, जब इंजीनियरिंग ने प्रकृति का स्थान नहीं लिया, बल्कि उसके साथ मिलकर काम किया। यही भारत की प्राचीन जल सभ्यता का सार था और यही भविष्य की जल नीति का भी आधार होना चाहिए। यदि हम अपनी पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता को आधुनिक विज्ञान और संस्थागत सुधारों के साथ जोड़ सकें, तो भारत न केवल जल संकट का समाधान खोज सकता है, बल्कि विश्व के लिए टिकाऊ जल प्रबंधन का एक नया मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है। यही समय की माँग है और यही भारत की अगली सिंचाई क्रांति की दिशा भी।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
Leave Your Comment