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विदेशी अंशदान को नियमित करना आज के समय की आवश्यकता

Regulating foreign contributions is a necessity of the times.


प्रहलाद सबनानी


वैश्विक स्तर पर आज विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक सीमाएं जैसे समाप्त सी होती दिखाई दे रही हैं। एक तरह से आज हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं। इन परिस्थितियों के बीच एक देश से दूसरे देश में सहायता के रूप में धनराशि को हस्तांतरित करना भी बहुत आसान बन गया है। धनराशि का हस्तांतरण करने का उद्देश्य सचमुच में यदि छोटे, अविकसित अथवा विकासशील देशों की मदद करना हो तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। परंतु, आज कुछ देश अन्य देशों में राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृति उथल पुथल करने के उद्देश्य से धनराशि का हस्तांतरण करने का प्रयास करने लगे हैं। विशेष रूप से विकसित देश अपनी औपनिवेशिक, विस्तारवादी एवं भूमंडलकारी नीतियों के अंतर्गत इन देशों में गैर सरकारी संस्थाओं (NGO), न्यास एवं सामाजिक संगठनों एवं संस्थानों के माध्यम से अथवा अन्य माध्यमों से भारी मात्रा में धनराशि का हस्तांतरण करते हैं ताकि इन देशों के गरीब नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई अथवा मुसलमान बनाया जा सके। हालांकि, धनराशि का हस्तांतरण कुछ अन्य घोषित उद्देश्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक, अनुसंधान, मानवीय सेवाओं और आपदा राहत आदि क्षेत्रों में इन देशों की सहायता करने का रहता है। हाल ही में, श्रीलंका, नेपाल, बंगलादेश आदि छोटे विकासशील देशों में सत्ता परिवर्तन करने में भी विदेशी अंशदान की विशेष भूमिका रही है।

विदेशी अंशदान को नियमित करने हेतु विभिन्न देशों में बनाए जाने लगे कानून

वैश्विक स्तर पर कुछ देशों में जब अन्य देशों द्वारा भेजी जाने वाली राशि का उपयोग इन देशों के नागरिकों का धर्म परिवर्तन करने में अथवा निर्धारित उद्देश्यों के अतिरिक्त होता हुआ दिखाई देने लगा तो कई देशों ने विदेशी अंशदान को नियमित करने के उद्देश्य से कानून बनाए जाने के बारे में विचार करना शुरू किया और कालांतर में इन देशों यथा संयुक्त राज्य अमेरिका (1938), आस्ट्रेलिया (2018), कनाडा (2024), यूनाइटेड किंगडम (2025), आदि देशों में इस संदर्भ में कुछ सख्त कानून बनाए भी गए। यूरोपीय संघ भी वर्तमान में ऐसी ही व्यवस्था को विधिक रूप देने की प्रक्रिया में है। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सका एवं भारत में पात्र संस्थानों द्वारा विदेशी योगदान प्राप्त करने और उसके उपयोग को नियमित करने के उद्देश्य से वर्ष 1976 में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) बनाया गया। इस अधिनियम को भारत में लागू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में विदेशी अंशदान में पारदर्शिता, जवाबदेही, कानूनी अनुपालन, वैध कार्यों को सक्षम बनाना, जनविश्वास, सुनिश्चित करना है। साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और व्यापक राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। अमेरिका में वर्ष 1938 में बनाए गए कानून में परिस्थिति अनुसार वर्ष 1960 में एवं समय समय पर संशोधन भी किए गए है।  

भारत की तुलना में अन्य देशों में कानून सख्त 

भारत में एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और धार्मिक एवं राजनैतिक संगठन, जो विदेशी अंशदान प्राप्त करते हैं, पर लागू होता है। जबकि कुछ अन्य देशों में तुलनीय वैश्विक कानून का कार्यक्षेत्र विस्तृत हैं एवं यह लॉबिस्ट, जनसंपर्क (पीआर) फर्म, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय तथा कंपनियों सहित उन सभी संस्थाओं या व्यक्तियों पर लागू होते हैं, जो किसी विदेशी प्रधान के निर्देश पर कार्य करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों।

भारत में एफसीआरए में पूर्व में भी संशोधन किए जाते रहे हैं

भारत में समय समय पर भारत सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन भी किए जाते रहे हैं। यह परिवर्तन विदेशी अंशदान को निरुत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि पारदर्शिता को सुदृढ़ करने, अधिक प्रकटीकरण करने, मजबूत जवाबदेही सुनिश्चित करने और बेहतर प्रशासन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से किए गए हैं। भारत ने विदेशी अंशदान की प्राप्ति और उसके उपयोग के विनियमन के लिए 1976 में पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया था। जैसे जैसे अंतरराष्ट्रीय सहभागिता बढ़ी और सीमापार वित्तीय प्रवाह अधिक जटिल होता गया, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। वर्ष 1984 में संशोधन के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया, न्यायाधीशों को अधिनियम के दायरे में लाया गया, “विदेशी अंशदान” और “राजनीतिक दल” की परिभाषाओं का विस्तार किया गया तथा लेखापरीक्षण संबंधी शक्तियां जोड़ी गईं। एफसीआरए, 2010 ने 1976 के अधिनियम का स्थान लेते हुए उसे समेकित किया और अधिक सुदृढ़ अनुपालन ढांचा स्थापित किया। इसे 26 सितंबर 2010 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके माध्यम से किए गए प्रमुख संशोधनों में शामिल है, प्रत्येक पांच वर्ष में पंजीकरण का अनिवार्य नवीनीकरण, पंजीकरण के लिए विस्तृत एवं कठोर शर्तें, पंजीकरण का निलंबन, निरस्तीकरण, परिसंपत्तियों का निहित होना तथा अपराधों का शमन (कम्पाउंडिंग)। वर्ष 2011 में विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम अधिसूचित किए गए, जिनके माध्यम से पंजीकरण, नामित बैंक खातों और प्रतिवेदन प्रारूपों को क्रियान्वित किया गया। वर्ष 2020 में प्रमुख संशोधन अधिनियम लाया गया। इसके अंतर्गत संस्थानों के पदाधिकारियों के लिए आधार/पासपोर्ट पहचान अनिवार्य की गई; विदेशी अंशदान केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एकल नामित खाते में प्राप्त करने का प्रावधान किया गया; अन्य संघों को उप-अनुदान (सब-ग्रांटिंग) देने पर प्रतिबंध लगाया गया; प्रशासनिक व्यय की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई तथा पंजीकरण का नवीनीकरण सरकारी जांच के अधीन कर दिया गया। वर्ष 2022 में एफसीआरए नियमों में पुनः संशोधन किया गया, इसके अंतर्गत विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त अंशदान की सीमा ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख प्रति वर्ष कर दी गई, जिससे सामान्य परिवारों के लिए अनुपालन आसान हुआ साथ ही कुछ अपराधों के शमन (कम्पाउंडिंग) से संबंधित प्रावधान भी जोड़े गए। वर्ष 2024 में नियमों में पुनः संशोधन किया गया एवं प्रशासनिक व्यय के लिए आवंटित अप्रयुक्त राशि को आगे ले जाने की अनुमति दी गई; टीडीएस रिफंड के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया; तथा आवेदनों के शीघ्र निस्तारण के लिए आवेदन के चरण में आवश्यक दस्तावेज संबंधी प्रावधानों को सुदृढ़ किया गया। अब वर्ष 2026 में प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या उसके निरस्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाए। अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पंजीकरण को निर्दिष्ट उद्देश्यों तथा अनुमोदित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा गया है तथा अनुमत धार्मिक गतिविधियों के दायरे से धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार (प्रोसिलिटाइजेशन) को बाहर रखा गया है। इस संदर्भ में एक बिल लोक सभा में दिनांक 25 मार्च 2026 को पेश किया गया है, जिसे बाद में 12 अगस्त 2026 को संयुक्त संसदीय समिति को आगे विचार के लिए सौंप दिया गया है। वैसे भी, किसी भी देश में लोकतंत्र बाहरी शक्तियों से प्रभावित नहीं हो, इस हेतु स्थानीय सरकार के लिए यह जरूरी है कि उस देश में आने वाला विदेशी अंशदान जिन उद्देश्यों के लिए देश में आ रहा है, उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, इसकी निगरानी करना उस सरकार का धर्म है। एफसीआरए भी इसी निगरानी का कानूनी माध्यम है। यह कानून उन गतिविधियों पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रुभता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था अथवा अन्य देशों के साथ संबंधो को प्रभावित कर सकती है।   

कानून की कुछ धाराओं के विरुद्ध असत्य विमर्श खड़े किए जाने का हो रहा है प्रयास

उक्त संशोधन बिल के लोक सभा में पेश किए जाने के उपरांत भारत में कुछ बिंदुओं पर विपरीत विमर्श खड़ा करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। इस संदर्भ में भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेब्सायट पर पर्याप्त जानकारी प्रदान की गई है। इसी उपलब्ध जानकारी के आधार पर असत्य विमर्श को ध्वस्त करने का प्रयास इस लेख में किया गया है। जैसे एक विमर्श यह खड़ा किया जा रहा है कि भारत सरकार अब विदेशी फंडिंग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना चाहती है, अतः उक्त अधिनियम में संशोधन किया जा रहा है। जबकि, वस्तुस्थिति यह है कि केंद्र सरकार विदेशी फंडिंग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना चाहती है। इससे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध विदेशी प्रभाव को रोका जा सकेगा। वर्ष 2024–25 में लगभग 16,200 संस्थाएं भारत में सक्रिय रूप से पंजीकृत थीं और उन्होंने लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त किया, जो किसी प्रतिबंधात्मक व्यवस्था का संकेत नहीं है। हाल ही के समय में ईसाई मिशिनरीयों द्वारा भारत के आदिवासी इलाकों में हिंदू आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाए जाने के मामले ध्यान में आए हैं। इस संदर्भ में भारत सरकार के पूर्व विदेश सचिव और राजदूत श्री कंवल सिब्बल का मत है कि FCRA भारत का घरेलू कानून है। भारत में मिशनरी कामों के लिए विदेशी फंडिंग की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। विदेशी पैसे से मुख्य रूप से हिंदुओं का ही धर्म परिवर्तन कराया जाता है। हमें अपने आंतरिक मामलों में किसी भी तरह के दखल को नकार देना चाहिए। भारत में ईसाई लॉबी को बढ़ावा देने की कोशिश करके अमेरिका धर्मनिरपेक्षता का पालन नहीं कर रहा है।

अतः यह कानून व्यापक नागरिक समाज को नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने वाले एक विशिष्ट माध्यम को विनियमित करता है। पंजीकरण बनाए रखने के लिए न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता का कोई वास्तविक उद्देश्य नहीं है। 10 लाख रुपये के न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता यह सुनिश्चित करती है कि सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण केवल वास्तव में कार्यरत संगठनों के पास ही बने रहें। इससे निष्क्रिय संस्थाओं को पंजीकरण बनाए रखते हुए बिना किसी घोषित गतिविधि के विदेशी अंशदान प्राप्त करने की वैधानिक पात्रता बनाए रखने से रोका जा सकेगा।


(उक्त आलेख भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेब्सायट पर उपलब्ध जानकारी का उपयोग करते हुए बनाया गया है।)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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