बिहार में SIR यानी सघन पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision) पर बहुत बवाल छिड़ा हुआ है। मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियां लगातार हमलावर हो रही हैं और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यहां तक कि SIR जैसे संवैधानिक कार्य को मजहबी चश्मे से देखा जा रहा है। लेकिन बात यह है कि ऐसी नौबत क्यों आई? आखिर चुनाव आयोग को इतने बड़े पैमाने पर गहन पुनरीक्षण अभियान की जरुरत क्यों पड़ी?
सीमांचल ने बढ़ाई थी चिंता... जब से बिहार में चुनाव की तैयारी शुरु हुई, तब से चुनाव आयोग की चिंता के केन्द्र में बिहार के सीमांचल का इलाका था। जहां पर पहले से जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड और निवास प्रमाणपत्र जारी होने जैसी गड़बड़ियों की शिकायतें आ रही थीं। किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 47% तक पहुंचने की रिपोर्ट आई थी। चुनाव आयोग को आशंका थी कि हर विधानसभा क्षेत्र में औसतन 10 हजार फर्जी वोटर घुसपैठ कर गए हैं। इन्हीं सब कारणों से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू करने की जरुरत पड़ी। सीमांचल के इलाके में बीते दो दशक से बांग्लादेश से घुसपैठ चल रही है। जिसकी वजह से इस इलाके की जनसांख्यिकी में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। 1951 से 2011 तक इस क्षेत्र में मुस्लिमों की आबादी में 16 फीसदी की तीव्र बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालिया जातिगत जनगणना में सामने आया कि किशनगंज में मुस्लिम आबादी 68%, अररिया में 50%, कटिहार में 45% और पूर्णिया में 39% तक पहुंच गई है। यानी एक औसत के अनुसार इन चारों जिलों में मुस्लिम आबादी 47% तक पहुंच गई है। सीमांचल में इतनी तेजी से हो रहे जनसांख्यिकी बदलाव ने केंद्रीय एंजेंसियों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और रिपोर्ट केन्द्र सरकार तक पहुंच गई। जो कि चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का आधार बनी।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया मामला
चुनाव आयोग के सघन पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो दर्जन याचिकाएं दाखिल की गई हैं। जिनमें मुख्य रुप से एक जैसे ही आरोप हैं कि 'SIR की प्रक्रिया से चुनाव आयोग अनियंत्रित अधिकार मिलता है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार छीने जा सकते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर चुनाव आयोग का काम क्या है। उसे यही तो तय करना है कि कौन भारत का मतदाता है और कौन नहीं। देश में वैधानिक रुप से चुनावी प्रक्रिया का पालन हो, यह चुनाव आयोग की ही तो जिम्मेदारी है। फिर उसे SIR यानी सघन पुनरीक्षण अभियान(Special Intensive Revision) से कैसे रोका जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि "वोट देने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16 और 19 और अधिनियम 1951 की धारा 62 के तहत कुछ पात्रताओं पर आधारित है, जैसे कि नागरिकता, उम्र और सामान्य निवास एक वोटर बनने के लिए अहम हैं। अपात्र लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं है और इसलिए वे अनुच्छेद 19 और 21 के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकते।"
जिसके बाद 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में अदालत ने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह जरूर कहा कि वह मतदाता सूची को अपडेट करते समय लोगों से लिए जाने वाले डाक्युमेंट में आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों को वैध माने।
SIR से क्यों चिंतित राजद-कांग्रेस जैसे दल
बिहार चुनाव से पहले चुनाव आयोग के सघन पुनरीक्षण अभियान(Special Intensive Revision) का सबसे गहन विरोध राजद और कांग्रेस जैसे दल कर रहे हैं। जिन्हें बिहार के मुस्लिम मतदाताओं से बहुत उम्मीद है। क्योंकि पुनरीक्षण अभियान का सर्वाधिक विरोध राज्य के मुस्लिम इलाकों में हो रहा है। मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा लंबे समय से विपक्षी महागठबंधन का समर्थन करता रहा है। यही वजह है कि महागठबंधन SIR के विरोध के बहाने इस बिरादरी को गोलबंद करना चाहता है।

लेकिन विपक्ष वोटबैंक की राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ में जुटा है। क्योंकि सीमांचल में घुसपैठ का मामला बेहद गंभीर है। क्योंकि यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर के चिकेन नेक के करीब है। यहां घुसपैठ कितनी ज्यादा हो गई है, वह इसी आंकड़े से समझिए कि अब तक जहां पूरी सरकारी कवायद के बावजूद पूरे देश की करीब 90 फीसदी आबादी का ही आधार कार्ड बन पाया है। वहीं, बिहार के सीमांचल में यह आंकड़ा आबादी से भी ज्यादा पहुंचा हुआ है। किशनगंज में कुल आबादी से 105.16 फीसदी ज्यादा आधार कार्ड बने हुए हैं। वहीं अररिया में कुल आबादी से 102.23 फीसदी ज्यादा आधार कार्ड हैं। कटिहार में आबादी से 101.92 फीसदी और पूर्णिया में 101 फीसदी ज्यादा आधार कार्ड बना हुआ है। इसी से समझ लीजिए कि इन इलाकों में क्या खेल चल रहा है। चुनाव आयोग को पास जो शिकायत पहुंची है कि सीमांचल सहित कुछ चुनिंदा जिलों से जुड़े विधान सभा क्षेत्रों में औसतन दस हजार फर्जी मतदाता हैं। आबादी से अधिक आधार कार्ड प्रथमदृष्टया इस आरोप को बिल्कुल सही साबित कर रहा है।
कैसे चल रहा है वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण?
चुनाव आयोग द्वारा बिहार की मतदाता सूची में संशोधन की यह पूरी प्रक्रिया प्रदेश में मतदाता सूची को त्रुटिविहीन करने के लिए की जा रही है। इसका एक उद्देश्य चुनाव को पारदर्शी बनाने के साथ ही अवैध या फर्जी वोटर की पहचान करना भी है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत चुनाव कर्मी मसलन बीएलओ आदि घर-घर जाकर जानकारी जुटाते हैं। यह जानकारी बिल्कुल नए सिरे से जुटाई जाती है। इसमें घर में मौजूद वैध वोटरों की नई लिस्ट बनाई जाती है। इस प्रक्रिया में पुरानी सूची को नहीं देखा जाता है।

यह तब किया जाता है जब चुनाव आयोग को लगता है कि मतदाता सूची पुरानी और त्रुटिपूर्ण है या यूं कहें कि पूरी तरह से दुरुस्त नहीं है।
ऐसे में इसे फिर से बनाने की जरूरत होती है। ऐसा विशेष तौर पर चुनावों से पहले या फिर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद किया जाता है।
बिहार में इस कार्यवाही को विशेष गहन पुनरीक्षण इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि चुनाव आयोग ने इसके लिए साल 1950 के कानून के सेक्शन 21(3) के तहत मिले विवेकाधिकार का इस्तेमाल किया है। इसमें आयोग 'जिस तरीके से वो (आयोग) ठीक समझे' प्रक्रिया आगे बढ़ाने को लेकर अनुमति प्रदान कर सकता है। बिहार में चल रही प्रक्रिया में आयोग ने घर-घर जाने के साथ पुरानी सूची से मिलान और गणना प्रपत्र वितरित करने की प्रक्रिया को जोड़ा है। इसमें गणना के दौरान ही सबूत के तौर पर दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। यह इस प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव है।
देश में कहीं ना कहीं लगाता चुनाव चलते रहे हैं। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए मतदाता सूची में संशोधन की लगातार जरुरत पड़ती है। इसके माध्यम से चुनाव आयोग बिना धांधली के साफ-सुथरे चुनाव करा पाता है। किसी भी चुनाव को कराने के लिए सबसे पहले वोटर लिस्ट की जांच सबसे अहम होती है। इसके बाद ही अन्य प्रक्रियाओं से गुजरा जाता है। ऐसे में बड़े लोकतांत्रिक देश में यह बहुत जरूरी और बड़ी जिम्मेदारी का काम हो जाता है।
पिछले दो दशक में पहली बार बिहार में इतने बड़े स्तर पर चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को पूरा कर रहा है। क्योंकि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि पिछली बार हुई विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के बाद से मतदाताओं में काफी अहम बदलाव आया है। इसके पीछे शहरीकरण का बढ़ना, शिक्षा व रोजगार के लिए पलायन, मतदाताओं के पते बदल जाना और पुराने पते से अपना नाम नहीं हटवाना, फर्जी मतदाताओं का होना जैसे बड़े कारण मौजूद हैं।
SIR के विरोध से चुनाव आयोग ख़फा
बिहार के विपक्षी दल चुनाव आयोग पर सत्ता पक्ष के साथ मिलकर साजिश का आरोप लगा रहे हैं। उन्हें लगता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के कोर वोट बैंक के लोगों का नाम मतदाता सूची से काटने की साजिश रच रहा है। लेकिन चुनाव आयोग ने सभी आरोपों का स्पष्टीकरण दिया है कि कुछ लोग बिहार की मतदाता सूची संशोधन के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान (SIR) के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं। लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने साफ-साफ कहा कि हाल ही में जो लिस्ट आई है, वह सिर्फ एक ड्राफ्ट लिस्ट है। यह बात सबको बताई गई थी। लेकिन कुछ लोग ऐसा दिखा रहे हैं कि यह लिस्ट फाइनल है।
चुनाव आयोग ने कहा है कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के आदेश सहित उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना बिहार की मसौदा मतदाता सूची से कोई भी नाम नहीं हटाया जा सकता। ईआरओ के किसी भी निर्णय से असंतुष्ट कोई भी मतदाता जिला मजिस्ट्रेट और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।

- चुनाव आयोग ने कहा कि हम यह समझने में असमर्थ है कि जब 1 अगस्त से 1 सितंबर तक का पूरा एक महीना लोगों को किसी भी तरह की आपत्ति दर्ज कराने के लिए उपलब्ध कराया गया है तो वे अब इतना बड़ा बखेड़ा क्यों खड़ा कर रहे हैं? चुनाव आयोग ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि वे अपने 1.6 लाख BLA से 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे और आपत्तियां मंगवा सकते हैं। हमने आप लोगों को हर तरह का मौका दिया है।
चुनाव आयोग ने कहा कि कुछ लोग यह दिखाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं कि ड्राफ्ट लिस्ट फाइनल लिस्ट है, जबकि SIR के आदेशों के अनुसार ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग का यह बयान बिहार में SIR के पहले चरण के खत्म होने पर आया है।
7.24 करोड़ मतदाताओं से फॉर्म मिले हैं। चुनाव आयोग ने बताया कि 36 लाख लोग या तो कहीं और चले गए हैं या वे मिले ही नहीं। आयोग ने यह भी बताया कि बिहार के सात लाख मतदाता ऐसे पाए गए हैं जिनके नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज हैं। इसका मतलब है कि कुछ लोगों ने एक से ज्यादा बार वोटर आईडी कार्ड बनवा लिया है।
चुनाव आयोग चाहता है कि लोग गलत जानकारी न फैलाएं। उनका कहना है कि मतदाता सूची को ठीक करने के लिए अभी भी समय है। अगर किसी को कोई गलती दिखती है, तो उसे तुरंत बताना चाहिए। इससे चुनाव में गड़बड़ी होने से बचेगी। चुनाव आयोग का मकसद है कि हर सही मतदाता का नाम लिस्ट में हो और किसी भी गलत आदमी का नाम लिस्ट में न रहे। इसलिए, अगर आपको लगता है कि आपके वोटर लिस्ट में कोई गड़बड़ है, तो आप 1 सितंबर तक अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। चुनाव आयोग आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार है।
चुनाव आयोग का कहना है कि 24 जून को दिया गया SIR का आदेश पूरी पारदर्शिता से लागू किया जा रहा है। इसका मकसद वोटर लिस्ट में करेक्शन करना और अपात्र लोगों को हटाना है। आयोग के मुताबिक, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया और 1.5 लाख से ज्यादा बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) को नियुक्त किया गया, जो पात्र वोटर्स से संपर्क कर रहे हैं लेकिन अब यही दल कोर्ट में इसका विरोध कर रहे हैं।

अंशुमान आनंद
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