logo

पुरुष सूक्तः ब्राह्मण-शूद्र सृजन की ऋचाओं का सत्य

Purusha Sukta: The Truth Behind the Verses on the Creation of Brahmins and Shudras


प्रो. राकेश उपाध्याय 


पूज्य आचार्य स्व. युगलकिशोर मिश्र जी से मैंने अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त और ऋग्वेद के पुरुषसूक्त का अध्ययन किया था। पृथ्वी सूक्त की बात बाद में करेंगे, पहले चर्चा पुरुष सूक्त की।

इसी पुरुष सूक्त के एक मंत्र की एकाध पंक्ति अक्सर अकादमिक वार्तालोक में समाजशास्त्र, राजनीति आदि को लेकर चर्चा में आती है। वर्ण व्यवस्था को लेकर यही संदर्भ ऋग्वेद के दसवें मंडल से लिया जाता है।

ब्राह्मणो अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कृतः।
उरू तदस्य यद् वैश्यः पदभ्यां शुद्रो अजायत्।।

इस पंक्ति का जो मूल अर्थ है, उसके अनुसार, ''इस (पुरुष) का मुख ब्राह्मण था। उसके बाहु क्षत्रिय रूप हुए। उस (पुरुष) के मध्य से वैश्य और पद से शूद्र उत्पन्न हुए।''

वस्तुतः मूल प्रश्न है कि यह जो परम आदि पुरुष हैं, जिनके निज शरीर के अविच्छिन्न रूप में चारों वर्ण का उल्लेख आया है, उसका वास्तविक रूप क्या है? तो पुरुष सूक्त ने पहले ही मंत्र में स्पष्ट किया है कि यह जो कुछ भी चर-अचर, दृश्य और अदृश्य है, वह सब कुछ वही पुरुष है जो वैविध्य रूप में चार वर्णों में भी है।

इस मंत्र का प्रारंभ होता है कि-

उस परमपुरुष के हजारों यानी अनंत सिर हैं, हजारों यानी अनंत आंखें, हजारों यानी अनंत पैरों की गति है। और जब वह अपने मूल स्वरूप से चैतन्य अवस्था में आया तो संपूर्ण भूमि और समस्त ब्रह्मांड में चारों ओर छा गया, और तो और दृश्यमान ब्रह्मांड से भी परे जाकर वह दस अंगुल के परिमाण में बाहर भी स्थित हो गया।

सहस्रशीर्षा पुरुष सहस्राक्षः सहस्रपात्....। सभूमिं विश्वतो वृत्वा.....।

पुरुष सूक्त का यही प्रारंभ है, यही प्रथम मंत्र है। वह इस भूमि, विश्व और ब्रह्मांड में  चारों ओर छा गया। बहुत पहले एक गीत में एक पंक्ति मुखरित हुई थी कि कौन है कौन है वो कहां से वो आया, चारों दिशाओं में तेज से वो छाया। कुछ वैसी ही जिज्ञासा यहां दर्शन रूप आती है।

क्या ही अद्भुत चित्र दृश्यमान हो जाता है इस मंत्र में? नारायण ऋषि ने गहन ध्यान अवस्था में किंचित प्रयोग के बाद सृष्टि सृजन की उस मूल प्रसर धारा का चित्र वैदिक मंत्रों में खींच दिया था, जिसकी कल्पना करना बड़े बड़े कवियों के वश में नहीं।

पुरुष सूक्त का दर्शन करने वाले ऋषि नारायण हैं। वेद के मंत्र किसी की रचना नहीं हैं। यह तो दर्शन है, जिसे देखा गया, जिसकी अनुभूति मानसपटल ने प्रत्यक्ष की थी। अगले मंत्र में उस आदि पुरुष का एक और भव्य चित्र नारायण ऋषि ने रेखांकित किया।

यह जो सबकुछ दिख रहा है, दृश्यमान जगत है, वह यह पुरुष ही है। जो कुछ घटना घट चुकी है, जो घटने जा रही है, वह भी यही पुरुष है। वही अमर अर्थात अमृत तत्व है, वही अन्न (वनस्पति, फल-फूल आदि) रूप में नित्य बढ़ता जाता है।

पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम...।
उत अमृतत्वस्य इशानो यत् अन्नेन अतिरोहति।

अमृत को समझना साधारण भारतीय मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। इसे ईसा-मूसा के लोगों ने अजूबा बना दिया, खुद भी भ्रम में रहे, लोगों को भी भरमा दिया।  लेकिन वैदिक ऋषि के लिए यह बहुत सरल है। जो मृत या मिट्टी नहीं बनता, मिट्टी में नहीं मिलता, वह ही  तत्व अमृत है, वह प्रकाश है, धूप है, रोशनी है।

अर्थात वह पुरुष प्रकाश रूप है। प्रकाश मिट्टी से मिलकर रूप ले लेगा लेकिन उसका अस्तित्व सदैव विशेष बना रहेगा। और जब वह मिट्टी से मिलता है तो अन्न रूप में, वनस्पति आदि रूपों में फलने-फूलने लगता है।

यही इसकी महिमा है कि यह पुरुष प्रकाश रूप है, मिट्टी से मिलकर कला रूप है, मिट्टी में सनकर फल-फूल, अन्न आदि रूपों में वही प्रकट होता है, लेकिन मंत्र देखने वाले नारायण ऋषि आगे लिखते हैं कि वह पुरुष इतने तक ही सीमित नहीं है। वह तो इससे भी बड़ा है, इससे भी आगे है। विश्वाभूतानि अस्य पादस्य।

यह जो पंचमहाभूत से निर्मित विश्व है, यह तो इसका एक हिस्सा है, ....त्रिपादस्याअमृतं दिवि।

इसका तीन चौथाई तो द्युलोक में फैला है। वह उसका अमर रूप है। अमर यानी प्रकाश रूप।

तीन पगों में त्रैलोक्य नाप लेने की सांकेतिक कथा भी इसी मंत्र में आती है। तीन चरणों में उसने सारा ब्रह्मंड, सारे लोक नाप लिए। अर्थात तीन चौथाई हिस्से के साथ वह द्युलोक या आसमानों के भी पार गया, किंतु अपने एक हिस्से या एक चौथाई अंश के साथ वह पूरे तौर पर यहीं का होकर रह गया। मनुष्य रूप पाने की उसी की इच्छाशक्ति!

अस्येहाभवत पुनः...।
ततो विष्वंड. व्याक्रमत साशनानशने अभि।।

यहीं का होकर रह गया वह आदि पुरुष। इसी भूमि को उसने अपना निवास बना लिया। साशनानशने अर्थात साशन और अनशन। 

दोनों शब्द आ गए हैं कि वह यहीं रहकर सब खाता अर्थात भोग करता है और नहीं भी खाता है अर्थात भोगमुक्त है। भोगमुक्त भी वही और भोगयुक्त भी वही। चेतन भी वही और अचेतन, जड़ भी उसी का रूप।

ध्यान रहे कि अनशन करने में महारत प्राप्त हमारी राजनीतिक परंपरा को यह अनशन शब्द भी इसी पुरुष सूक्त से पहली बार मिला है। उसी आदिपुरुष ने पहला अनशन किया था। अर्थात उपवास, व्रत उसने ले लिया। किसके लिए? सिर्फ सृजन और निर्माण के लिए। सत्याग्रह आदि व्रत, उपवास भारतीय भूभाग से ही संसार को परिपाटी रूप मिले हैं तो यह उसी आदि पुरुष सूक्त की महिमा है।

भूमि से उस प्रथम प्रकाश रूप पुरुष का मिलन होते ही विराट उत्पन्न हुआ। विराट व्यक्त जगत का प्रथम तत्व माना गया है। वह पुरुष ही विराट है, वही पुरुष ही अति सूक्ष्म है। विराट से सूक्ष्म हो जाने की उसकी कला अद्भुत है। एक बिंदु से परिपूर्ण सिंधु होने की उसकी चाहत है। कौन है जो उसे रोक सके।

तस्माद् विराट अजायत, विराजो अधि पुरुषः।। 
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः।।

और उसी विराट से अधिपुरुषः यानी जीव का सूक्ष्म रूप आया। वह आदि पुरुष ही विराट होकर फिर से सूक्ष्म जीव रूप में आ गया। जीव रूप में आते ही उसने समूची पृथ्वी को चारों ओर से घेर लिया।

देवों ने इसे ही अवसर के रूप में देखा। 

देव अर्थात आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि। पंचमहाभूत ही देव स्वरूप है, देव हैं क्योंकि यह सदा देते ही रहते हैं। देते हैं इसलिए देव हैं। इस प्रकार पंचदेवों ने सृष्टि का महायज्ञ उसी पुरुष को केंद्र में रखकर रचा।

वह पुरुष ही इसका हविष्य बन गया और सृष्टि के सृजन यज्ञ का इस पृथ्वी पर विस्तार हुआ। इन्हीं पुरुष रूपी सूर्य के प्रभाव से पृथ्वी पर ऋतुएं प्रकट हुईं, वसंत ऋतु ने घृत का प्रबंध किया और ग्रीष्म ने ईंधन। शरद ऋतु ने यज्ञ सामग्री जुटाई। वह आदि पुरुष ही यज्ञकर्ता और यज्ञाग्नि और यज्ञ की आहुति बना।

तब देवों ने कुशा घास उत्पन्न कर उसी से उस यज्ञ पुरुष को शुद्ध किया, उसे जल छिड़ककर उसका प्रौक्षण अर्थात पवित्र किया।...

फिर प्रजापति आदि सृष्टिकर्ता देवों उस पुरुष रूपी पशु को अनुशासन में बांध दिया। इस संसार की सृजन यात्रा के लिए उस आदि पुरुष ने इस शरीर रूपी बंधन को स्वीकार किया।

देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन पुरुषं पशुम्।। 

देवों ने यज्ञ के द्वारा इस पृथ्वी पर पशु (जीव) रूप में उसी पुरुष को बांध लिया, यह करते समय उस यज्ञ पुरुष के चारों ओर सात परिधियां बनीं, उसमें इक्कीस समिधाएं थीं।

और इसी वर्णन के पूर्व नारायण ऋषि ने यह भी बताया कि इस यज्ञ में उस आदि पुरुष परमात्मा ने अपना सब कुछ सृजन यज्ञ में स्वाहा कर दिया। अब उसके पास कुछ भी शेष नहीं था, यज्ञ के बाद एकमात्र वह था और यज्ञ के फलस्वरूप या प्रसाद स्वरूप उसी की सृष्टि थी।

तस्मात यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्...।

यहां सर्वहुतः का गहरा अर्थ है। अर्थात उसने सब कुछ आहुत कर दिया। वह आहुति में बदल गया। उसी ने आहुति बनकर देखा और दिखाया कि सपनों के संसार का सृजन करने के लिए खुद का बलिदान करना होता है। स्वयं को समाप्त करोगे तभी सृजन कर सकोगे। तुम हो तो फिर क्या तुम हो, हम हैं तो फिर क्या हम हैं।

उसने देवों का सृजन किया, फिर देवों सहित स्वयं को भी अनुशासन की डोर में बांधकर जीव-जगत का बहुरूप धारण कर गया। वह एक ही था, अनंत रूपों में चला गया।

पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान ग्राम्याश्च ये।।

जीव-जगत आया, पशु-पक्षी आए। मनुष्य रूप पाकर उसे संतोष मिला कि मुक्तिपथ से मिलाने वाली काया मिल गई। फिर आरण्यान, ग्राम्याश्च। 

अरण्य भी आए और ग्राम भी आए। समस्त जीवों के साथ।

भारतीय राजनीति और शासन को यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि यह ग्राम और अरण्य साथ ही आए हैं। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त ने तो यही बताया है। यह इस ज्ञात संसार का सबसे पहला टेक्स्ट है। इसकी अनदेखी भारत को महंगी पड़ेगी।

भारतीय परंपरा के अरण्यों और ग्रामों, उसमें रहने वाली जातियों, जनजातियों और उनके स्वराज्य की रक्षा नहीं हुई, ग्राम स्वराज किंवा हिंद स्वराज और उसकी स्वायत्ता का ख्याल संपूर्णता के साथ यदि नहीं रखा गया तो सभी नीतिकारों को समझ लेना चाहिए वह भारत की सनातन आत्मा के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं।

बिना अरण्य और ग्राम स्वराज के फिर वह परमात्मा फिर शायद ही ज्यादा समय तक इस पृथ्वी पर रहे? सृष्टि का खेल तब समाप्त हुआ ही समझो, राजनीति भी नष्टप्राय ही मानो और गहन गुलामी के नए रूपों के लिए तैयार रहो।

इससे बचने का रास्ता यही है कि जिन्होंने ज्यादा एकत्रित कर लिया है, वह स्वयं ही देने के लिए आगे आएं। ग्रामों को उसके स्वराज को सुंदर बसाएं। जैसे उस आदिपुरुष ने अपने पास कुछ भी नहीं रखा, अपना सब कुछ लुटाकर ही उसने यह संसार बसाया।

पुरुष सूक्त ने तो यही बताया है कि संपदा दबाकर मत बैठे रहो, उसका सदुपयोग करो, उसे उन्हें बांट दो जिनके पास नहीं है, जैसे उस आदिपुरुष ने सबकुछ आहुत कर दिया।

तस्मात यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।।
छदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत..।।

उस विश्वात्मा पुरुष ने अपना जो कुछ भी था इसी सृष्टि सृजन के कार्य में लगा दिया। उसने अपने पास कुछ भी नहीं रखा। यह करते समय जब उस पुरुष का होम हो रहा था, यह वेद प्रकट हुए, इसकी ऋचाएं प्रकट हुईं।

देवों ने उसका दर्शन किया और वह चुपचाप अपना सबकुछ गंवाकर या कहिए लुटाकर मिट्टी के देहरूपी बंधन में बंध गया। जो विदेह था, वह जीव रूप में देही हो गया। प्रकाश और मिट्टी के साथ आने का यह महान संकल्प उसने पूर्ण किया।

और जब वह देह रूप में प्रकट हुआ तो नारायण ऋषि के सम्मुख प्रश्न आया कि वह कैसा दिखता है? उसका रूप कैसा है, उसके कितने हिस्से हैं? उसका कौन कौन सा अंग कैसा सुंदर बना है, थोड़ा उसका रूप बता दीजिए। उसका मुख क्या  है, उसकी भुजाएं कैसी दिखती हैं, उस आदि पुरुष के उरू और पैरों के बारे में भी तो बता दीजिए।

यत्पुरुषः व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य कौ बाहू का उरू पादा उच्येते।

नारायण ऋषि भावना में थे। उसका साक्षात रूप उनके सामने था। जिन परमात्मा ने अपने मौलिक स्वरूप को इस संसार यात्रा में कुछ लोगों को अनजाने में ही दिखा दिया था, जब माता कौसल्या ने उनका विराट रूप देखा था, जब यशोदा ने उनके मुख में ब्रह्मांड के दर्शन किए थे, कुरुक्षेत्र के रण में जो नारायण विश्वरूप में अर्जुन के सामने थे, दंडकारण्य में श्री हनुमानजी ने जिन्हें तपस्वी रूप में वन में दर-दर घूमते देखा था वह यही आदिपुरुष ही तो थे। ऐसा नहीं है कि फिर किसी को उनके दर्शन नहीं होंगे। होते हैं, होते रहेंगे, यही तो भारत होने का मर्म है, यही हमारा सनातन धर्म है।

भारत की चिर सनातन भाव-भावना का बीज रूप तो यही पुरुष सूक्त है कि उस विराट के दर्शन हो सकते हैं, जिसकी ऋचाओं के उद्गाता नारायण ऋषि ने पहली बार उसी परमात्मा को विराट रूप में चारों वर्णों का मूल अधिष्ठान बताया था।

दरिद्र नारायण की सेवा और सेवा में नारायण का दर्शन तो इसी सूक्त से आया है। अपना सब कुछ लुटाकर जो संसार की सेवा करते हैं वही तो दरिद्र नारायण कहलाते हैं। जब परहित में हम जुटते हैं, लोकसेवा को लोकधर्म निभाते हैं तो उसी #आदिपुरुष का रूप हम स्वयं हो जाते हैं। फिर जब कुछ बदले में अतिरिक्त पाना शेष नहीं बचता, तब ही वह हमें सच्चे रूप में दर्शन देता है, जीव सेवा-शिव सेवा का मंत्र साकार हो उठता है।

पुरुष सूक्त ने संसारी जीव के किसी हिस्से को परमात्मा आदि पुरुष से अलग नहीं बताया। परमेश्वर रूपी शरीर में ही यह समूचा ब्रह्मांड समाया है, यही समझाया। उससे कुछ भी अलग नहीं।

प्रकृति अर्थात मिट्टी के त्रैगुण्य सत, रज और तम से सनी ये सृष्टि है। वह पुरुष इसी प्रकृति के आसरे इस धरा-धाम पर रहते हैं। जो उन्हें जानते हैं या जानने का प्रयास करते हैं, अपनी मूल प्रकृति को समझकर अपना कर्तव्य कर्म पूरा करते हुए जीवन यात्रा पूरी करते हैं, कदाचित् लक्ष्य प्राप्त कर जाते हैं, और जो नहीं जानते हैं, वह प्रकृति के वश में आकर सुख-दुःख आदि उठाते हैं। वह भी जीवन पूरा ही करते हैं।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

Leave Your Comment

 

 

Top