बीते सितंबर में भुज-अहमदाबाद नमो रेल के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था, ‘‘जब हर भारतीय देश को आगे ले जाने का प्रयास कर रहा है, तब नकारात्मकता से भरे कुछ लोग देश की एकता और अखंडता को नष्ट करना चाहते हैं। वे देश को बांटना चाहते हैं।’ प्रधानमंत्री का एक तरह से लोकसभा में विपक्ष उन्होंने आरोप लगाया, ''नकारात्मकता से भरे कुछ लोग भारत की एकता और अखंडता को निशाना बना रहे हैं और देश को बांटना चाहते हैं। नफरत से भरे लोग भारत और गुजरात को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।'
प्रधानमंत्री के इस बयान को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उस बयान का जवाब माना गया, जिसे उन्होंने अमेरिका के प्रतिष्ठित जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में कुछ ही महीनों पहले दिया था। एक व्याख्यान में राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि लोकसभा चुनाव एक ही स्तर पर नहीं लड़ा गया, बल्कि चुनाव आयोग के स्तर पर भी सरकार ने अपनी जीत के लिए काम किया। राहुल गांधी के शब्द थे, "चुनाव आयोग वही कर रहा था जो सरकार चाहती थी। पूरा अभियान इस तरह तैयार किया गया था कि मोदी पूरे देश में अपना एजेंडा लागू कर सकें, जिसमें विभिन्न राज्यों के लिए अलग-अलग योजनाएं थीं। "
राहुल गांधी की नहीं, भारतीय राजनीति, आर्थिकी और वैचारिकी की कुछ ताकतें ऐसी हैं, जो जब भी भारत से बाहर जाती हैं, भारत विरोधी बयान जरूर देतीं हैं। इसमें कभी हंगरी के कथित वामपंथी और व्यवस्थाविरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस का नाम आता है तो कभी अमेरिका में सक्रिय भारत विरोधी वैचारिक थिंक टैंक का तो कभी किसी और का।
2021 के दिल्ली में चले किसान आंदोलन के दौरान तो बाकायदा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक टूलकिट भी सामने आया था। स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने बाकायदा एक एक्शन प्वाइंट भी जारी किया था। जिसे टूलकिट कहा जाता है। चीन को लेकर जिस तरह भारतीय विपक्षी दलों के नेता बयान देते हैं, वह एक तरह से उकसाऊ बयान होता है। जिसमें भारत सरकार को उकसाने की कोशिश की जाती है। अक्सर यह बताया जाता है कि भारत ने चीन के सामने सरेंडर कर दिया है। दिलचस्प यह है कि ये सारी बातें विदेशों में कहीं ज्यादा जोरशोर से उठाई जाती हैं। एक दौर में भारत विरोधी रूख के चलते विदेशी, विशेषकर पश्चिमी मीडिया बेहद मुखर रहता था। भारत के खिलाफ खबरें एक तरह से प्लांट की जाती थीं। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। अब इसमें विपक्षी दलों के नेता भी शामिल हो गए हैं। चूंकि विदेश में बोलने को लेकर देश में मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकता, लिहाजा विदेशी भूमि का इस्तेमाल भारत विरोधी नैरेटिव खड़ा करने में खूब हो रहा है, विशेषकर विपक्षी खेमे की ओर से ज्यादा हो रहा है।
हाल की कुछ घटनाओं को देखें तो इसमें एक और चीज जुड़ गई है। ऐसे आरोप उछालना, जिनका भले ही जमीनी स्तर पर ठोस वजूद ना हो। दिलचस्प यह है कि इसे उछालने के लिए संसद के सत्र की शुरूआत से ठीक पहले का वक्त चुना जाता है। राहुल गांधी पिछले आम चुनाव से पहले भारत के दो अरबपतियों गौतम अदाणी और मुकेश अंबानी के खिलाफ आग उगलते रहते थे। मोदी सरकार पर इन्हें संरक्षण देने का आरोप भी लगाते रहे। यह बात और है कि लोकसभा चुनाव के बाद से उनके निशाने पर से अंबानी हट गए हैं। इस बदलाव के लिए राहुल गांधी की सोच जिम्मेदार है या अंबानी के साथ हुआ कोई समझौता। इसकी ठीक-ठीक जानकारी किसी को नहीं हैं। लेकिन अंदाणी अब भी उनके निशाने पर हैं। यह बात और है कि अदाणी के खिलाफ बोलने को लेकर उनके सहयोगी दल त़णमूल कांग्रेस ने किनारा कर लिया है।
अदाणी के खिलाफ राहुल गांधी का गुस्सा वैचारिक और भारतीय आम लोगों के संदर्भ में है या कांग्रेस की कोई निजी खुन्नस या कुछ और, जब भी संसद सत्र आना होता है, अंबानी के खिलाफ देश में राहुल गांधी की बयानबाजी तेज होती है और विदेशी धरती पर उन पर कोई आरोप लगता है। संसद के शीत सत्र शुरू होने के करीब हफ्ताभर पहले अदाणी पर आरोप लगा कि अमेरिका में उनकी कंपनी के खिलाफ रिश्वतखोरी को लेकर मुकदमा चल रहा है। जैसे ही यह खबर भारतीय मीडिया संस्थानों को मिली, देश में अदाणी विरोधी खबरें सुर्खियों में आ गईं। फिर विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस सदा की तरह हमलावर हो गई। ऐसा माहौल बना कि अदाणी अब जेल गए तो तब जेल गए। खबरों के रूख से ऐसा लगा कि अब अदाणी के बहाने भारत के अमेरिका से रिश्ते खराब होंगे। प्रकारांतर से ऐसा साबित किया जाने लगा कि अब तो अमेरिका भारत को सिखाएगा। ध्यान रहे, इसे ऐसे साबित किया जा रहा था कि मोदी के दौर में भारत की विदेशनीति के प्रभाव होने की अवधारणा गलत है और भारत अब फेल है।
करीब हफ्तेभर तक माहौल ऐसा ही रहा। हालांकि बाद में जयपुर में आयोजित 51वें रत्न एवं आभूषण पुरस्कार समारोह को संबोधित करते हुए गौतम अदाणी ने अमेरिका में लगाए गए आरोपों पर अपनी चुप्पी तोड़ दी। तब उन्होंने कहा, 'यह पहली बार नहीं है, जब हमने ऐसी चुनौतियों का सामना किया है, अडानी ग्रुप से किसी का भी नाम न तो एफसीपीए में नहीं आया है और न ही उनका समूह न्याय में बाधा डालने के किसी भी आरोप का सामना कर रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट का असर यह हुआ कि केन्या की सरकार ने अदाणी के साथ हुए 70 करोड़ डॉलर के समझौते को रद्द कर दिया।
याद कीजिए जनवरी 2023 को। संसद के बजट सत्र के ठीक पहले अदाणी के ही खिलाफ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आई। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि अदानी समूह के मालिक गौतम अदाणी ने 2020 से ही अपनी सात लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में हेरफेर के ज़रिये 100 अरब डॉलर कमा लिए हैं। इस रिपोर्ट आने के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और ऐसे ही दूसरे सार्वजनिक उपक्रमों की सांस फूलने लगी। इसकी वजह यह है कि इन उपक्रमों में अदाणी समूह ने भारी निवेश किया है और उनके बड़े शेयर खरीद रखे हैं। भारतीय प्रतिभूति नियामक सेबी ने इसकी जांच शुरू की और वह ऐसे किसी भ्रष्टाचार का खोज नहीं कर पाई। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आधार पर अदाणी की जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया।
रूस का एक मीडिया संस्थान है स्पुतनिक। इसकी भारतीय इकाई स्पुतनिक इंडिया ऐसे आरोपों को 'डीप स्टेट' की साजिश मान रही है। ऐसा माना जा रहा है कि 'डीप स्टेट' मोदी सरकार को जहां अस्थिर करना चाहता है, वहीं वह भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ते हुए नहीं देख पा रहा। स्पुतनिक इंडिया का मानना है कि भारत के खिलाफ जारी विरोधी गतिविधियों का उद्देश्य भारतीय संस्थानों का भरोसा घटाना है। स्पुतनिक इंडिया के मुताबिक, पश्चिमी ताकतों द्वारा भारत को अस्थिर करने की बुनियादी वजहें हैं,
= भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जो आने वाले दशकों में अमेरिका को टक्कर दे सकती है।
= डॉलर का घटता इस्तेमाल और भारतीय रूपए की वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता।
= भारतीय विदेश नीति की रणनीतिक स्वायत्तता का लगातार बढ़ते जाना।
भारत विरोधी खबरों और बयानों का एक और मकसद है, भारतीय बाजारों उथल-पुथल बढ़ाना। ताकि भारतीय व्यवस्था लड़खड़ा जाए, भारतीय लोग शेयर बाजार से बाहर निकल आएं और इससे आर्थिक अराजकता और उथल-पुथल बढ़े। जब ऐसा होगा तो मोदी सरकार बदनाम होगी और इसके चलते लोगों में गुस्सा बढ़ेगा। स्पुतनिक की रिपोर्ट में एक और बात का जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक, भारतीय उद्योग जगत के एक बड़े हिस्से का मानना है कि डीप स्टेट' को कुछ भारतीयों का भी साथ मिल रहा है। जिनमें विपक्षी नेता, प्रतिद्वंद्वी व्यवसायी और सरकारी तंत्र के वे लोग भी हैं, जिनकी नई व्यवस्था में बहुत ज्यादा दाल नहीं गल रही है। स्पुतनिक इंडिया के अनुसार, कई वामपंथी सोच वाली भारतीय संस्थाएं 'अल्पकालिक राजनीतिक या आर्थिक लाभ’ हासिल करने के लिए भारतीय लिहाज वाले व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भों को नजरअंदाज कर रही हैं।

उमेश चतुर्वेदी
कंसल्टेंट, प्रसार भारती, भारत सरकार
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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