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पंजाब संकट के कगार पर: AAP का शासन बन रही विफलता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा

Punjab on the brink of crisis: AAP failing governance poses a threat to national security.


दीपक कुमार रथ


पंजाब कोई सामान्य राज्य नहीं है। यह पाकिस्तान के खिलाफ भारत की अग्रिम सुरक्षा पंक्ति है और वह धरती है जिसने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद की भारी कीमत चुकाई है। लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार के तहत पंजाब तेजी से वित्तीय दबाव, अपराध, नशे और फिर से उभरती चरमपंथी गतिविधियों के खतरनाक गठजोड़ में फंसता दिखाई दे रहा है। यह अब केवल प्रशासनिक अक्षमता का सवाल नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बनता जा रहा है। यहां तक कि कांग्रेस के नेताओं ने भी अब सार्वजनिक रूप से पंजाब के हालात को “गंभीर सुरक्षा चिंता” बताया है।

सबसे पहला चेतावनी संकेत राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति है। पंजाब अब भी गैंगस्टर-आतंकवाद के गठजोड़ से जूझ रहा है, जबकि पुलिस व्यवस्था को लेकर सवाल अदालतों तक पहुंच चुके हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को हिरासत में रहते हुए टेलीविजन साक्षात्कार देने की अनुमति दिए जाने के बाद कथित पुलिस मिलीभगत की जांच के आदेश दिए थे। हाल ही में कांग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने आरोप लगाया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गैंगस्टरों के संपर्क में थे और उनके कॉल रिकॉर्ड की जांच की मांग की। ये आरोप हैं, सिद्ध तथ्य नहीं। लेकिन राजनीतिक और न्यायिक स्तर से ऐसे आरोपों का सामने आना इस बात को दर्शाता है कि पुलिस व्यवस्था में जनता का विश्वास किस हद तक प्रभावित हुआ है।

नशे का संकट इससे भी अधिक गंभीर तस्वीर पेश करता है। मान सरकार गिरफ्तारी और नशीले पदार्थों की बरामदगी के आंकड़े सामने रख सकती है। वास्तव में पंजाब पुलिस के अनुसार, मार्च 2025 से जुलाई 2026 के बीच एनडीपीएस अधिनियम के तहत 67,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही चिंताजनक है। सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में भर्ती होने वालों की संख्या 2024 में 9,577 से बढ़कर 2025 में 25,290 हो गई—यानी 164 प्रतिशत की चौंकाने वाली वृद्धि। जब पुनर्वास केंद्रों में इलाज की मांग इतनी तेजी से बढ़ रही हो, तब सरकार केवल गिरफ्तारी के आंकड़ों के आधार पर नशे के खिलाफ अपनी सफलता का दावा नहीं कर सकती।

सबसे चिंताजनक पहलू नशे, संगठित अपराध और चरमपंथी नेटवर्क के बीच बढ़ता गठजोड़ है। जून 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी-गैंगस्टर शाहजाद भट्टी से जुड़े मामलों में पंजाब और हरियाणा में 18 स्थानों पर तलाशी ली। इससे पहले भी एजेंसी ने पंजाब में पाकिस्तान स्थित हैंडलरों, स्थानीय मददगारों, हथियारों की तस्करी और लक्षित हमलों से जुड़े एक व्यापक षड्यंत्र का पर्दाफाश किया था। खालिस्तानी नेटवर्क समाप्त नहीं हुआ है; उसने अपना स्वरूप बदल लिया है। अब यह विदेशी हैंडलरों, आपराधिक नेटवर्क, एन्क्रिप्टेड संचार और कट्टरपंथी प्रचार के माध्यम से सक्रिय रहने की कोशिश कर रहा है।

यहीं “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों को केवल राजनीतिक नारेबाजी के बजाय गंभीरता से देखने की जरूरत है। वैचारिक कट्टरपंथ, अलगाववादी प्रचार और सामाजिक असंतोष का फायदा उठाने की कोशिशें वास्तविक खतरे हैं। ऐसे नेटवर्क को महज राजनीतिक असहमति बताकर खारिज कर देना या, इससे भी बदतर, उन्हें अपना प्रभाव बढ़ाने की जगह देना ठीक वही स्थिति पैदा कर सकता है, जिसमें सुरक्षा संबंधी समस्या धीरे-धीरे रणनीतिक संकट का रूप ले लेती है।

इसके बाद वित्तीय स्थिति का सवाल आता है। पंजाब के 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार राज्य की बकाया देनदारियां जीएसडीपी के 45.1 प्रतिशत तक पहुंच गई हैं। राज्य अब भी राजस्व घाटे से जूझ रहा है और काफी हद तक कर्ज पर निर्भर है। राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 4.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कोई भी सरकार अनिश्चितकाल तक लोकलुभावन योजनाओं को वित्तपोषित नहीं कर सकती और साथ ही रोजगार सृजन, उद्योग के विस्तार तथा उत्पादक क्षमता के पुनर्निर्माण जैसे कठिन लेकिन जरूरी कार्यों को टाल नहीं सकती।

इसलिए पंजाब को केवल नारों, सब्सिडी और राजनीतिक संकटों से निपटने की तात्कालिक कोशिशों से अधिक की जरूरत है। उसे अनुशासित वित्तीय प्रबंधन, ड्रग सिंडिकेट के खिलाफ कठोर कार्रवाई, मजबूत पुलिस व्यवस्था, बेहतर खुफिया समन्वय और अलगाववादी आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता की आवश्यकता है। पंजाब पुलिस के बहादुर अधिकारी और जवान इसे अंजाम देने में सक्षम हैं। उन्हें केवल स्पष्ट राजनीतिक दिशा और मजबूत प्रशासनिक समर्थन चाहिए।

पंजाब की भौगोलिक स्थिति उसकी सुरक्षा को सीधे भारत की सुरक्षा से जोड़ती है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन इस वास्तविकता को अच्छी तरह समझते हैं। सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी की सरकार भी इसे उतनी ही गंभीरता से समझती है। राष्ट्रीय सीमा पर स्थित कोई राज्य ऐसी सरकार का जोखिम नहीं उठा सकता जो शासन को केवल चुनावी प्रबंधन के रूप में देखे। पंजाब को ऐसी सरकार चाहिए जो वास्तव में शासन करे—सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए संघर्ष न करती रहे।

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