आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के क्षरण और पारिस्थितिक संकटों से जूझ रही है, तब भारत के विभिन्न हिस्सों से उभरती प्रकृति संरक्षण की कहानियाँ आशा का नया क्षितिज प्रस्तुत करती हैं। ये केवल वन्यजीवों या जंगलों की रक्षा की घटनाएँ नहीं, बल्कि उस बदलती सामाजिक चेतना के प्रमाण हैं जिसमें मनुष्य और प्रकृति के संबंध को नए सिरे से समझा और परिभाषित किया जा रहा है। देश के दूरस्थ गाँवों, रेगिस्तानी विस्तारों, तराई के वनों और घास के मैदानों में स्थानीय समुदाय, वैज्ञानिक संस्थान और प्रशासन मिलकर ऐसे संरक्षण प्रतिरूप विकसित कर रहे हैं, जो न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से उपयोगी हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अनुकरणीय हैं।
वैश्विक स्तर पर जैव-विविधता संरक्षण की चुनौती अभूतपूर्व है। जैव-विविधता और पारिस्थितिकी सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच की 2019 की व्यापक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 10 लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने 2023 में स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान पारिस्थितिक क्षरण की गति जारी रही, तो मानव सभ्यता के लिए आवश्यक प्राकृतिक सेवाओं; जल, स्वच्छ वायु, खाद्य सुरक्षा और जलवायु संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। ऐसे समय में भारत, जो विश्व की लगभग 8 प्रतिशत ज्ञात जैव-विविधता का घर है, संरक्षण के ऐसे मॉडल प्रस्तुत कर रहा है जिनमें विज्ञान, समाज और संस्कृति का समन्वय दिखाई देता है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन-सहचर के रूप में देखा गया है। नदियाँ यहाँ माँ हैं, वृक्ष पूजनीय हैं, पर्वत देवतुल्य हैं, और पशु-पक्षी लोककथाओं, त्योहारों और आस्थाओं का हिस्सा हैं। यही सांस्कृतिक आधार आज आधुनिक संरक्षण प्रयासों को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान कर रहा है। जब संरक्षण किसी समाज की भावनात्मक संरचना में समाहित हो जाता है, तब वह केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहता, वह जनांदोलन बन जाता है।
कच्छ के रण में हर वर्ष आने वाले ग्रेटर फ्लेमिंगो इसका जीवंत उदाहरण हैं। बरसात के बाद जब विशाल सफेद रण गुलाबी पक्षियों से भर उठता है, तो वह दृश्य केवल प्राकृतिक सौंदर्य का नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक बन जाता है। स्थानीय लोग इन्हें “लाखा जी के बाराती” कहकर पुकारते हैं। यह संबोधन दर्शाता है कि संरक्षण केवल कानूनों से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से मजबूत होता है। यही कारण है कि कच्छ क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए वैश्विक स्तर पर महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि माना जाता है।
इस क्षेत्र की पारिस्थितिक महत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्य है। अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण व्यवस्था के अंतर्गत भारत की अनेक आर्द्रभूमियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। कच्छ क्षेत्र में प्रतिवर्ष हजारों ग्रेटर फ्लेमिंगो प्रजनन हेतु आते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि इस क्षेत्र की खारी भूमि, उथले जल निकाय और सूक्ष्म जीवों की प्रचुरता इन पक्षियों के लिए आदर्श आवास तैयार करती है। यह उदाहरण बताता है कि प्राकृतिक तंत्र की रक्षा केवल पक्षियों की सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक चक्र की रक्षा है।
प्रकृति संरक्षण की दूसरी बड़ी धुरी है—सह-अस्तित्व, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ मनुष्य और वन्यजीवों का प्रत्यक्ष संपर्क होता है। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र इसका सशक्त उदाहरण हैं। यहाँ फसल कटाई के मौसम में एशियाई हाथियों के झुंड गाँवों की ओर बढ़ आते हैं, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। पारंपरिक दृष्टि में इसे केवल समस्या माना जाता था, किंतु अब ‘गज मित्र’ जैसी सामुदायिक पहल ने इस सोच को बदला है। गाँव के स्वयंसेवक हाथियों की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं, समय रहते चेतावनी देते हैं और सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करते हैं। इससे टकराव कम हुआ है और विश्वास बढ़ा है।
भारत में लगभग 30,000 से अधिक एशियाई हाथी पाए जाते हैं, जो विश्व की कुल एशियाई हाथी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हैं। 2014 से 2023 के बीच हाथियों से जुड़े संघर्षों में प्रतिवर्ष औसतन 500 से अधिक मानव मृत्यु दर्ज की गईं। ऐसे में सामुदायिक मॉडल केवल सामाजिक पहल नहीं, बल्कि वैज्ञानिक संरक्षण रणनीति का विस्तार हैं। यह सिद्ध करता है कि स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता संरक्षण का सबसे प्रभावी साधन बन सकते हैं।
वन्यजीव संरक्षण में पुनर्वास और पुनर्स्थापन की कहानियाँ भी अत्यंत प्रेरक हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य भारत में काला हिरण की वापसी ऐसी ही सफलता का प्रमाण है। कभी शिकार, आवास विनाश और कृषि विस्तार के कारण इनकी संख्या तेजी से घटी थी। किंतु संरक्षण कार्यक्रमों, सुरक्षित घासभूमियों और कानूनी सुरक्षा ने इन्हें फिर खुले मैदानों में लौटाया। यह केवल एक प्रजाति की वापसी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र के पुनर्जीवन का संकेत है।
भारत में 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम ने काले हिरण सहित अनेक प्रजातियों को कानूनी सुरक्षा दी। कई राज्यों में संरक्षण के बाद इनकी संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो नीति, विज्ञान और स्थानीय सहयोग के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है। काला हिरण घासभूमि के स्वास्थ्य का संकेतक माना जाता है। उसकी उपस्थिति यह बताती है कि वह भू-भाग फिर से जैविक रूप से सक्रिय हो रहा है।
भारत के संरक्षण प्रयासों का सबसे चुनौतीपूर्ण पक्ष संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाना है। महान भारतीय तिलोर, जिसे गोडावण कहा जाता है, इसका प्रमुख उदाहरण है। कभी राजस्थान, गुजरात और दक्कन के विस्तृत घास क्षेत्रों में दिखने वाला यह पक्षी आज अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में है। 2024 तक उपलब्ध अनुमानों के अनुसार इसकी संख्या 150 से भी कम रह गई है।इसके संरक्षण हेतु वैज्ञानिक प्रजनन केंद्र, कृत्रिम ऊष्मायन तकनीक, सुरक्षित आवास क्षेत्र और बिजली लाइनों के भूमिगतकरण जैसे उपाय अपनाए गए हैं। यह संरक्षण केवल संवेदना नहीं, बल्कि उच्च वैज्ञानिक हस्तक्षेप का परिणाम है। ऐसे प्रयास सिद्ध करते हैं कि यदि समय रहते नीति, तकनीक और जनसहयोग एक साथ आएँ, तो विलुप्ति के कगार से भी प्रजातियों को बचाया जा सकता है।
आज संरक्षण विज्ञान का एक नया सिद्धांत उभर रहा है—समुदाय-नेतृत्व वाला संरक्षण। यह प्रतिरूप मानता है कि स्थानीय लोग समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का केंद्र हैं। भारत में यह सोच तेजी से मजबूत हो रही है। चाहे हिमालयी गाँवों में जलस्रोत पुनर्जीवन हो, पश्चिमी भारत में पक्षी संरक्षण, या पूर्वोत्तर में सामुदायिक वन प्रबंधन—हर जगह यह सिद्ध हो रहा है कि जब समुदाय को स्वामित्व और सम्मान दिया जाता है, तो संरक्षण अधिक टिकाऊ बनता है।
इस संदर्भ में शिक्षा और जनजागरूकता की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि नई पीढ़ी को जैव-विविधता, जलवायु संकट और पारिस्थितिक जिम्मेदारी के प्रति संवेदनशील बनाया जाए, तो संरक्षण केवल परियोजना नहीं, बल्कि जीवनशैली बन सकता है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, मीडिया और सामाजिक अभियानों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। प्रकृति से जुड़ाव तभी गहरा होगा जब लोग उसे केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में समझेंगे।
साथ ही, प्रकृति संरक्षण के आर्थिक आयामों को समझना भी आवश्यक है। लंबे समय तक यह धारणा रही कि पर्यावरण संरक्षण विकास की गति को धीमा करता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र कृषि, मत्स्य पालन, जलस्रोत, पर्यटन और स्थानीय आजीविका का आधार होते हैं। आर्द्रभूमियों का संरक्षण न केवल प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराता है, बल्कि भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण और स्थानीय जलवायु संतुलन में भी सहायक होता है।
वैश्विक आर्थिक आकलनों के अनुसार विश्व की आधे से अधिक आर्थिक गतिविधियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकृति और उसकी सेवाओं पर निर्भर हैं। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ जैसे परागण, जल शुद्धिकरण, मिट्टी संरक्षण और जलवायु संतुलन, आर्थिक स्थिरता की बुनियाद हैं। अतः संरक्षण केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है।
भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियाँ; जल संकट, चरम मौसम, भूमि क्षरण और जैव-विविधता का ह्रास, केवल सरकारी योजनाओं से हल नहीं होंगी। इनके समाधान के लिए समाज के प्रत्येक स्तर पर भागीदारी आवश्यक है। शहरी नागरिकों के लिए यह जिम्मेदारी जल और ऊर्जा की बचत, कचरा प्रबंधन, हरित उपभोग और स्थानीय पारिस्थितिक पहलों में सहयोग के रूप में सामने आती है। वहीं ग्रामीण समुदायों के लिए पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग और सामुदायिक प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण है।
यदि भारत को वास्तव में पर्यावरणीय नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ना है, तो संरक्षण को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाना होगा। यही वह मार्ग है जो विकास, समृद्धि और पारिस्थितिक संतुलन, तीनों को एक साथ साध सकता है। भारत में उभरती संरक्षण की ये कहानियाँ केवल स्थानीय उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा हैं, जहाँ विकास और पर्यावरण विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हों; जहाँ विज्ञान, संस्कृति और समाज मिलकर पृथ्वी के साथ संतुलित संबंध स्थापित करें; और जहाँ आने वाली पीढ़ियाँ यह कह सकें कि हमने केवल प्रगति नहीं की, बल्कि अपने प्राकृतिक उत्तराधिकार को भी सुरक्षित रखा।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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