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वर्तमान भारत में परिवारों के विघटन की स्थिति : कारण, प्रभाव और समाधान

Present-day situation of family disintegration in India: causes, effects and solutions

भारतीय संस्कृति में परिवार केवल कुछ व्यक्तियों का समूह नहीं रहा, बल्कि यह संस्कार, सुरक्षा, प्रेम, सहयोग और जीवन मूल्यों का सबसे बड़ा केंद्र माना गया है। भारत की पहचान सदैव संयुक्त परिवार व्यवस्था, पारस्परिक प्रेम, बड़ों के सम्मान और त्याग की भावना से रही है। यहां परिवार व्यक्ति को केवल पालन-पोषण ही नहीं देता, बल्कि उसे सामाजिक जीवन जीने की शिक्षा भी देता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसी महान भावना इसी भारतीय पारिवारिक दृष्टि का परिणाम है। किन्तु वर्तमान समय में भारतीय परिवार व्यवस्था एक गहरे परिवर्तन और संकट के दौर से गुजर रही है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, एकल परिवार बढ़ रहे हैं, पति-पत्नी के संबंधों में तनाव बढ़ रहा है, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हो रहा है तथा परिवारों में भावनात्मक दूरी निरंतर बढ़ती जा रही है। यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय जीवन मूल्यों के क्षरण का संकेत भी है। आज परिवारों के विघटन के पीछे अनेक कारण कार्य कर रहे हैं—पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, संवादहीनता, लोक व्यवहार एवं संस्कार शिक्षा का अभाव, नैतिक दायित्वों से पलायन, उपभोक्तावादी जीवनशैली तथा अत्यधिक व्यक्तिवाद। इन सभी कारणों ने मिलकर भारतीय परिवार व्यवस्था को कमजोर किया है।

पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता प्रभाव

वर्तमान समय में भारतीय समाज पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव अत्यधिक बढ़ा है। आधुनिकता और प्रगति के नाम पर ऐसी जीवनशैली को अपनाया जा रहा है जिसमें व्यक्ति स्वयं को परिवार से अधिक महत्वपूर्ण मानने लगा है। “मेरी जिंदगी, मेरी पसंद” जैसी सोच ने सामूहिकता की भावना को कमजोर किया है। भारतीय संस्कृति में परिवार के लिए त्याग, समर्पण और समन्वय को महत्व दिया जाता था, जबकि पाश्चात्य विचारधारा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज लोग छोटी-छोटी बातों पर संबंध तोड़ने लगे हैं। सहनशीलता कम होती जा रही है और समझौते की भावना समाप्त होती दिखाई दे रही है। विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी अब केवल एक सामाजिक अनुबंध की तरह देखा जाने लगा है। पहले जहां विवाह जीवनभर साथ निभाने का संकल्प माना जाता था, वहीं आज छोटी समस्याओं पर तलाक और अलगाव की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह स्थिति भारतीय परिवार व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

संवादहीनता : रिश्तों में बढ़ती दूरी

परिवारों के विघटन का एक प्रमुख कारण संवादहीनता भी है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, इंटरनेट और टीवी ने लोगों को एक घर में रहते हुए भी मानसिक रूप से अलग कर दिया है। पहले परिवार के लोग साथ बैठकर भोजन करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे, समस्याओं पर चर्चा करते थे और भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब रहते थे। आज स्थिति यह है कि एक ही घर में रहने वाले लोग घंटों मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, लेकिन आपस में कुछ मिनट भी संवाद नहीं करते। संवाद की कमी के कारण गलतफहमियां बढ़ती हैं, मन की बातें दब जाती हैं और धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी आने लगती है। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होता जा रहा है। यही दूरी आगे चलकर पारिवारिक विवाद और विघटन का कारण बनती है।

लोक व्यवहार एवं संस्कार शिक्षा का अभाव

भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति संस्कार थे। परिवार बच्चों को विनम्रता, बड़ों का सम्मान, सेवा, संयम, सहनशीलता और कर्तव्यपरायणता की शिक्षा देता था। लेकिन आज यह परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा और लोक व्यवहार की शिक्षा का महत्व लगातार कम हुआ है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना रह गया है। बच्चों को आधुनिक तकनीक तो सिखाई जा रही है, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखाई जा रही। घर के वातावरण में भी परिवर्तन आया है। माता-पिता के पास बच्चों के साथ समय बिताने का अभाव है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी संस्कारों से दूर होती जा रही है। उनमें धैर्य, सहनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारियों की भावना कम होती दिखाई देती है। जब परिवारों में संस्कारों का आधार कमजोर होता है, तब रिश्ते केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। ऐसे संबंध लंबे समय तक मजबूत नहीं रह पाते।

नैतिक दायित्वों से पलायन

परिवार व्यवस्था त्याग और जिम्मेदारी के आधार पर चलती है। प्रत्येक सदस्य का परिवार के प्रति कुछ नैतिक दायित्व होता है। लेकिन आज के समय में लोग अधिकारों की बात अधिक करते हैं और कर्तव्यों से बचने का प्रयास करते हैं। पति-पत्नी के बीच सहयोग और समझ की भावना कम हो रही है। माता-पिता की सेवा को बोझ समझा जाने लगा है। बुजुर्गों को अकेला छोड़ देना या वृद्धाश्रम भेज देना जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। यह स्थिति भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप के विपरीत है। आज कई लोग व्यक्तिगत सुख-सुविधा और करियर को परिवार से ऊपर रखने लगे हैं। स्वार्थ और सुविधा की मानसिकता ने पारिवारिक संबंधों को कमजोर किया है। त्याग और समर्पण के बिना कोई भी परिवार लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।

आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन

परिवारों के विघटन के पीछे आर्थिक और सामाजिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। शहरीकरण, रोजगार के लिए पलायन और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक संरचना को प्रभावित किया है। आज नौकरी और व्यवसाय के कारण लोग अपने गांव और परिवार से दूर शहरों में रहने को मजबूर हैं। एकल परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आर्थिक तनाव, महंगाई और जीवन की तेज गति ने लोगों के मानसिक संतुलन को भी प्रभावित किया है। उपभोक्तावाद ने भी परिवारों में तुलना और असंतोष को बढ़ाया है। लोग संबंधों से अधिक भौतिक वस्तुओं को महत्व देने लगे हैं। इससे परिवारों में संतोष और अपनापन कम होता जा रहा है।

परिवार विघटन के दुष्प्रभाव

 

  • परिवारों के विघटन का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। टूटते परिवारों में बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है। उनमें असुरक्षा, अकेलापन और तनाव बढ़ता है। 
    बुजुर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं। परिवारों में प्रेम और सहयोग की भावना कमजोर होने से समाज में भी असंवेदनशीलता बढ़ती है।
  • पारिवारिक विघटन का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। जब परिवार कमजोर होते हैं तो समाज में अपराध, नशाखोरी, अवसाद और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। परिवार समाज की मूल इकाई है; यदि परिवार कमजोर होगा तो समाज भी कमजोर होगा।
  • परिवारों को पुनः मजबूत बनाने की आवश्यकता
  • इस समस्या का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज और परिवार दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा।
  • सबसे पहले परिवारों में संवाद बढ़ाना आवश्यक है। परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के लिए समय निकालना चाहिए। साथ बैठकर भोजन करना, चर्चा करना और समस्याओं को समझना रिश्तों को मजबूत बनाता है।
  • बच्चों को नैतिक शिक्षा और संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है। घर और विद्यालय दोनों को इस दिशा में कार्य करना चाहिए। बड़ों के सम्मान, त्याग, सहनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को पुनः स्थापित करना होगा।
  • डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग पर नियंत्रण भी जरूरी है। परिवार के साथ समय बिताने की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।
  • साथ ही आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करना भी आवश्यक है। आधुनिक जीवनशैली को अपनाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को छोड़ देना उचित नहीं हो सकता।
  • भारतीय परिवार व्यवस्था सदियों से हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति रही है। वर्तमान समय में परिवारों के विघटन की बढ़ती घटनाएं केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट का संकेत हैं।
  • यदि समाज को मजबूत और संस्कारित बनाना है तो परिवार संस्था को पुनः सशक्त करना होगा। संवाद, संस्कार, नैतिकता और पारस्परिक सम्मान जैसे मूल्यों को जीवन में पुनः स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
  • परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, विश्वास और सहयोग की वह व्यवस्था है जो व्यक्ति और समाज दोनों को स्थिरता प्रदान करती है। इसलिए परिवारों को बचाना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दायित्व भी है।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

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