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नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर राजनीतिक हंगामा

Political uproar regarding Citizenship Amendment Act

भारत की संसद ने 1947 में हुए भारत विभाजन के कष्टकारी नतीजों को ध्यान में रखते हुए 2019 में अपने नागरिकता अधिनियम को संशोधित करते हुए उसमें प्रावधान किया था कि भारत के उस हिस्से से जिसे । इंग्लैंड ने 1947 में अपनी संसद में एक अधिनियम पारित करके मजहब के आधार पर भारत के कुछ हिस्सों को पाकिस्तान के नाम से अलग देश घोषित कर दिया था। लेकिन इंग्लैंड की संसद द्वारा यह अधिनियम पारित करने से पहले कांग्रेस ने दिल्ली में भारत को विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया। उसी प्रस्ताव के आधार पर इंग्लैंड की संसद ने पाकिस्तान बनाने का अधिनियम पारित किया था। जाहिर था कांग्रेस के प्रस्ताव और इंग्लैंड की संसद के अधिनियम का संयुक्त परिणाम यह हुआ कि करोड़ों भारतीय नागरिकों की भारतीय नागरिकता अपने आप समाप्त हो गई और वे रातों रात पाकिस्तान के नागरिक घोषित कर दिए गए। उनमें बहुत से नागरिक तो ऐसे थे जो नए देश पाकिस्तान के नागरिक बन कर ख़ुश थे। लेकिन करोड़ों लोग ऐसे भी थे जो  उनकी भारतीय नागरिकता को उनकी इच्छा के बिना छीन लिए जाने से दुखी थे। इसी तरह शेष बचे भारत में भी बहुत से भारतीय नागरिक ऐसे थे जो अपनी भारतीय नागरिकता छोड़कर नए देश पाकिस्तान की नागरिकता लेना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस ने भारत के विभाजन को लेकर तो प्रस्ताव पारित कर दिया लेकिन उस प्रस्ताव में नागरिकता को लेकर पैदा होने वाले इस संकट पर या तो ध्यान नहीं दिया या फिर वह ज़मीनी हालात से इतना कट चुकी थी कि उसे इसका अन्दाजा ही नहीं हुआ। यहाँ तक इंग्लैंड का प्रश्न था उसे इस स्थिति पर विचार करने की जरुरत ही नहीं थी। लेकिन डाॅ. भीमराव रामजी आम्बेडकर, जो बाद में भारतीय संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष भी बने, नागरिकता को लेकर उत्पन्न इस गंभीर संकट को पहचान गए थे। उन्होंने कहा था कि देश के बहुत से मुसलमान अपने लिए पाकिस्तान के नाम से एक अलग देश की माँग कर रहे थे। इसका अर्थ था कि वे भारतीय नागरिकता त्यागना चाहते थे। अब जब पाकिस्तान बन गया है तो ऐसे मुसलमानों को पाकिस्तान में ही चले जाना चाहिए। इसी प्रकार देश के जिस हिस्से को पाकिस्तान बनाया जा रहा था, उस हिस्से में रह रहे लाखों हिन्दु-सिख पाकिस्तान बनाने का विरोध कर रहे थे और वे भारतीय नागरिकता ही रखना चाहते थे। आम्बेडकर का प्रस्ताव था कि पाकिस्तान बनने पर इस प्रकार की आबादी की अगला बदली की व्यवस्था भी करनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक का भी मोटे तौर पर यही मत था। सरदार पटेल ने तो असम में जाकर अपने सार्वजनिक भाषण में भी यह बात कही थी कि अब पाकिस्तान बन गया है इसलिए जो मुसलमान भारतीय नागरिकता रहने से दुखी हैं वे पाकिस्तान जा सकते हैं। लेकिन नेहरु ने तुरन्त इसका विरोध किया। उधर पाकिस्तान में जो हिन्दु-सिख भारत की नागरिकता रखना चाहते थे, पाकिस्तान की नई सरकार उनको बलपूर्वक भारत नहीं आने दे रही थी। आम्बेडकर ने इस पर नेहरु को एक पत्र भी लिखा कि वे पाकिस्तान की सरकार पर दबाव डालें कि वह ऐसे हिन्दु-सिखों को भारत में आने से न रोकें। लेकिन भारत सरकार की इस क्रूर नीति के बावजूद लाखों हिन्दु-सिख अपनी भारतीय नागरिकता बचाने के लिए पाकिस्तान से चल पड़े। लाखों इस चाहत में ही मारे गए और लाखों सब कुछ लुटाकर ही भारत पहुँचने में कामयाब हो सके। लेकिन बहुत से लोग पाकिस्तान के दूर दराज़ के इलाक़ों में रहते थे वे भारत नहीं आ सके। कांग्रेस के नेता उन दिनों पाकिस्तान में रह रहे हिन्दु-सिख-बौद्धों से अपील कर रहे थे कि वे वहीं बने रहें। कुछ हिन्दु-सिख-बौद्धों ने कांग्रेस नेताओं की उस अपील को यथार्थ मान कर उस पर विश्वास कर लिया और पाकिस्तान में बने रहे। पाकिस्तान का निर्माण करवाने में इंग्लैंड की सहायता करने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने पहले ही भाषण में कहा कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दु-सिख-बौद्ध को डरने की जरुरत नहीं है। उनको अपने मजहब को मानने की पूरी आजादी होगी। कुछ हिन्दु-सिख-बौद्ध जिन्ना के इस धोखे में भी आ गए।

लेकिन इस सभी से यह तो स्पष्ट हो गया था कि भारत सरकार को अपने नागरिकता अधिनियम को विभाजन के उपरान्त उत्पन्न हालात के अनुसार संशोधित करना जरुरी था क्योंकि इस कृत्रिम विभाजन के परिणाम दशकों तक ही नहीं बल्कि शताब्दियों तक आते रहेंगे। परिणाम तो विभाजन के तुरन्त बाद ही आने शुरु हो गए। पूर्वी बंगाल (पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश) से जल्दी ही हिन्दु-सिख-बौद्ध वहाँ से भाग कर भारत आने लगे। वहाँ उनका रहना मुश्किल हो गया। इस्लाम में मतान्तरित होने के लिए वे तैयार नहीं थे। पाकिस्तान के विधि मंत्री जोगेन्द्र नाथ मंडल को भी पाकिस्तान से भाग कर भारत आना पड़ा। हालत यहाँ तक गड़बड़ा गए कि पश्चिमी पाकिस्तान से हिन्दु-सिख भाग कर अफ़ग़ानिस्तान में चले गए। लेकिन इस प्रकार के हालात में भारत सरकार को अपने नागरिकता अधिनियम में संशोधन करना चाहिए था ताकि जो लोग अपने पर बलपूर्वक थोपी गई पाकिस्तान नागरिकता को लेने को तैयार नहीं थे बल्कि अपनी भारतीय नागरिकता को ही प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील थे। लेकिन भारत सरकार अपने इस राष्ट्रीय दायित्व का पालन करने से बचती रही और लाखों हिन्दु-सिख-बौद्ध कष्टकारी जीवन व्यतीत करने के लिए अभिशप्त होते रहे।

बांग्लादेश बनने के बाद इसके विपरीत एक अजीब दौर प्रारम्भ हो गया। बांग्लादेश से लाखों की संख्या में मुसलमान अवैध तरीक़े से भारत में घुसने लगे। ये वे लोग हैं जिन्होंने ब्रिटिश काल में मुस्लिम लीग व ब्रिटिश सरकार के सहयोग से चलाए जा रहे ‘भारत तोड़ो अभियान’  में भाग लिया था जिसके परिणाम स्वरूप 1947 में भारत का विभाजन हो गया और इन्हें इनकी माँगी हुई पाकिस्तानी नागरिकता मिल गई। इनके भारत में आने का कारण क्या है ? क्या वहाँ की सरकार (पाकिस्तानी या बांग्लादेशी) इन्हें इस्लाम मजहब के कारण तंग कर रही है? ऐसा तो सम्भव ही नहीं है क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों ही संवैधानिक लिहाज़ से भी इस्लामी देश है। तब ये भारत में क्यों आ रहे हैं? क्या भारत में काम-काज की तलाश में आते हैं? यदि ऐसा है दो इन्हें बाक़ायदा विधि के अनुसार भारत का वीज़ा व वर्क परमिट लेकर आना चािहए। लेकिन ये बिना वीज़ा के आते हैं। यदि इनको आज 75 साल बाद लगता है कि भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान की नागरिकता की जरुरत नहीं थी। वह एक ऐतिहासिक ग़लती थी तो इन्हें पाकिस्तान और बंगला देश में उसी प्रकार अभियान चलाना चाहिए जैसा इन्होंने 1947 से पहले भारत को तोड़ कर के ‘पाकिस्तानी नागरिकता’ के लिए किया था। लेकिन अब अभियान की दिशा यह होगी कि पाकिस्तानी बांग्लादेशी नागरिकता समाप्त कर, इन्हें भी भारत की पुरानी नागरिकता मिल जानी चाहिए। लेकिन  ऐसा कोई आन्दोलन पाकिस्तान या बंगला देश में फिलहाल चलता दिखाई नहीं दे रहा।

पाकिस्तान और बंगला देश से हिन्दु-सिख-बौद्ध को भारतीय नागरिकता देने को ‘सामान्य शरणार्थी’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे यदि भारत की नागरिकता की माँग कर रहे हैं तो शरणार्थी के नाते नहीं बल्कि यह उनका अधिकार है क्योंकि उनकी भारतीय नागरिकता बिना उनकी इच्छा के छीनी गई थी।  यह अलग बात है कि आधुनिक शब्दावली में उनके लिए शरणार्थी शब्द का ही प्रयोग किया जा रहा है। दरअसल भारत सरकार ने विभाजन से उत्पन्न इस दशकों से लम्बित समस्या का समाधान निकालने के लिए ही नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पारित किया है। इस संशोधन के अनुसार कोई भी हिन्दु-सिख-बौद्ध-जैन-ईसाई जिसे मजहब के आधार पर पाकिस्तान, बंगला देश और अफ़ग़ानिस्तान में उत्पीड़ित किया गया हो और वह 2014 से पहले भारत आ गया तो उसे आवेदन करने पर भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। यह एक प्रकार से विभाजन का प्रायश्चित है। वैसे भी यह अधिनियम पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों को शरण देने या नागरिकता देने का प्रावधान नहीं करता। इसका सम्बंध केवल उन हिन्दु सिखों बौद्धों से है जो 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत में आ चुके हैं। अर्थात कम से कम इन्हें छह साल तो भारत में रहते हुए हो ही गए हैं। इस संशोधन में PAB से छह साल पहले भारत में आ चुके अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता वापिस करने का वैधानिक रास्ता निकाला गया है। यह संशोधन PAB में रह रहे अल्पसंख्यकों पर लागू नहीं होता। यह संशोधन PAB से अल्पसंख्यकों को भारत में भाग आने के लिए प्रोत्साहित भी नहीं करता क्योंकि यह संशोधन केवल उन अल्पसंख्यकों पर लागू होता है जिन्हें भारत मे रहते हुए छह साल हो गए हैं। दरअसल यह अधिनियम भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के मूल प्रावधानों को नहीं बदलता बल्कि यह उन अल्पसंख्यक शरणार्थियों के लिए नागरिकता प्राप्त  करने की वैकल्पिक व तीव्रगामी व्यवस्था स्थापित करता है जो कम से कम छह साल से भारत मे रह रहे हैं। इसे फ़ास्ट ट्रैक व्यवस्था भी कहा जा सकता है।

वैसे किसी उचित केस में शरण देने या न देने की परम्परा हमारे देश में रही है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 से इन सामान्य विधि विधानों में कोई  रुकावट नहीं पड़ती है। इटली की नागरिक रही सोनिया गान्धी ने इन्हीं विधि विधानों के सहारे भारत की नागरिकता हासिल की थी। पूर्व सोवियत यूनियन के प्रधानमंत्री ख्रुश्चेव की बेटी स्वेतलाना ने भी एक भारतीय से शादी की थी और भारत में शरण माँगी थी लेकिन उस समय की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उसे शरण देने से इन्कार करदिया था।


अमेरिका का दोहरा चरित्र/औरों को नसीहत ख़ुद मियाँ फ़ज़ीहत

अमेरिका का मीडिया और कुछ सीमा तक अमेरिका की विधायिका इस बात को लेकर बहुत चिन्ता ज़ाहिर कर रही है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने से भारत का पंथ निरपेक्ष चरित्र ख़तरे में पड़ गया है। भारत में किसी को शरण देने के लिए सरकार मज़हब को आधार कैसे बना सकती है? इसको लेकर अमेरिका हलकान हो रहा है। वह कुछ सीमा तक चिन्ता और कुछ सीमा तक घुड़की का प्रयोग कर रहा है। भारत पंथ निरपेक्ष बना रहे, इसका दायित्व अमेरिका ने अपने उपर ले लिया लगता है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 में उन हिन्दु, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन पंथ के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से 31 दिसम्बर 2014 तक येन केन प्रकारेण भारत में आ गए थे। अमेरिका की विधायिका में इस बात को लेकर बहस चल रही है कि इस सूची में मुसलमानों को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रावधान है कि सभी से समानता का व्यवहार किया जाएगा। इसलिए मुसलमानों को इस सूची में शामिल न किए जाने से भारत का संविधान ख़तरे में पड़ गया है और पंथ निरपेक्ष चरित्र पर दाग लग गया है। अमेरिका को इस बात की चिन्ता सबसे ज़्यादा रहती है कि किसी भी देश में मज़हब के आधार पर मतभेद नहीं होना चाहिए। इसलिए उसने अपने यहाँ 1968 में  international religious freedom act नाम से एक क़ानून बनाया जिसमें विदेशों में अमेरिकी दूतावासों को यह अधिकार दिया कि वे प्रत्येक देश की राजनीति पर नज़र रखें। यद्यपि यह अमेरिका की अनाधिकार चेष्टा ही कही जाएगी। इन्तहा तो यह है कि अमेरिका ने इस अधिनियम के अन्तर्गत  International Religious Freedom के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय राजदूत भी नियुक्त कर रखा है।

लेकिन अमेरिका के क़ानूनों में नागरिकता और शरणार्थीं को लेकर वैधानिक स्थिति क्या है, इसको भी परखना जरुरी है। अमेरिका के सभी अधिनियम या क़ानून यूएस कोड में संग्रहीत हैं। इस कोड में अधिनियमों का वर्गीकरण करने के बाद प्रत्येक वर्ग को क्रमांक दिया जाता है। इस प्रकार राष्ट्रीयता, अप्रवासी, नागरिकता और शरणार्थी सम्बंधी क़ानून क्रमांक 8 के अन्तर्गत संग्रहीत हैं। अमेरिका का The Immigration and Nationality Act 1965 इसी के अन्तर्गत आता है। 21 नवम्बर 1989 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। इस संशोधन का प्रस्ताव न्यू जर्सी के एक सीनेटर लौटनवर्ग ने रखा था, इसलिए यह संशोधन लौटनवर्ग संशोधन के नाम से जाना जाता है। यह 101वीं कांग्रेस में पारित होने के कारण यह पब्लिक लाॅ 101-167 कहलाता है। इस संशोधन में प्रावधान किया गया है कि पूर्व सोवियत यूनियन, एस्टोनिया और लिथुवानिया के यहूदी, एवेंजिलिकल क्रिश्चियन, यूक्रेन कैथोलिक मज़हब को मानने वाले नागरिकों को संयुक्त राज्य अमेरिका में शरण दी जाएगी। यह प्रावधान शुरु में केवल एक साल के लिए था लेकिन इसकी उम्र बढ़ा कर इसे अभी तक प्रभावी बनाया हुआ है।  2004 में इस का विस्तार करते हुए प्रावधान किया गया कि ईरान से आने वाले यहूदी, क्रिश्चियन और बहाई मज़हब को मानने वाले ईरानियों को भी अमेरिका में शरण दी जाएगी। इतना ही नहीं मज़हबी आधार पर शरण पाने वाले इन वर्गों को अमेरिका की सरकार वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है।

अमेरिका की विधानपालिका, अमेरिका में शरण माँगने वालों का मज़हब के आधार पर भेदभाव क्यों करती है ? वहाँ का संविधान तो इस प्रकार के साम्प्रदायिक या मज़हबी भेदभाव की अनुमति नहीं देता। 1868 में अमेरिकी संविधान में चौदहवाँ संशोधन हुआ था जिससे संविधान में Equal Protection Clause जोड़ी गई थी लेकिन इसके वाबजूद शरण दिए जाने वाले वर्गों में ईरान के मुसलमानों और पूर्व सोवियत यूनियन के मुसलमान नागरिकों को इस सूची में शामिल क्यों नहीं किया गया ? ये अनेक प्रश्न हैं जो अमेरिका की सरकार से पूछे जा सकते हैं। अमेरिका की मज़हबी आधार पर भेदभाव करने वाली यह नीति उसकी विदेश नीति का हिस्सा है। ईरान की न तो सीमा अमेरिका से लगती है और न ही दोनों देशों का इतिहास साँझा है। यही स्थिति सोवियत यूनियन की है। इसलिए शरणार्थी से मज़हबी आधार पर भेदभाव अमेरिकी की बड़ी राजनीति का हिस्सा है। भारत और पाकिस्तान का तो इतिहास भी साँझा है और 1947 में उसका विभाजन ही मज़हबी आधार पर हुआ था। लेकिन ताज्जुब है जिनसे प्रश्न पूछे जाने चाहिए वे भारत से प्रश्न पूछ रहें हैं कि आपने शरण दिए जाने वाले वर्गों की सूची में मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया? यह प्रश्न तो संयुक्त राज्य अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि आप पूर्व सोवियत यूनियन के नागरिकों को शरण व नागरिकता देने के लिए मज़हब के आधार पर मतभेद क्यों कर रहे हो ? अमेरिका शरणार्थीं जैसे शुद्ध मानवीय प्रश्न को भी अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन यह उसका अपना आन्तरिक मामला है इसलिए किसी को दख़लन्दाज़ी करने का अधिकार नहीं है। लेकिन अमेरिका इसी प्रश्न पर भारत को प्रश्नित कर रहा है। इसका न तो उसे नैतिक अधिकार है और न ही सांविधानिक। अब जब पिछले दिनों भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019  को लागू करने के लिए नियमों-उपनियमों की अधिसूचना जारी कर दी है तो अमेरिका की भड़ास और बढ़ गई है। उसका कहना है कि वह बाक़ायदा नज़र रखे हुए है कि सरकार इस अधिनियम को किस प्रकार क्रियान्वित करती है। दरअसल भारत सरकार को भी बाक़ायदा नज़र रखनी चाहिए कि अमेरिका अपने यहाँ के मूल निवासी ‘इंडियनस’ के अधिकारों को समाप्त करके निरन्तर उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक दो नहीं बना रहा ? और सरकार को अपनी इस नजरसानी का बाक़ायदा घोषणा भी करनी चाहिए।




 


डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय धर्मंशाला के पूर्व कुलपति हैं
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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