logo

पीएम मोदी का ऐतिहासिक इजराइली दौरा और आगे की राह

PM Modi's historic visit to Israel and the way forward

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल की दूसरी आधिकारिक यात्रा 25 फरवरी 2026 को शुरू हुई, जो कि भारत के नजरीये से बेहद अहम रही। उनकी पहली इज़राइल यात्रा जुलाई 2017 में हुई थी। 2017 में प्रधानमंत्री की इज़राइल यात्रा के बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 14 जनवरी 2018 से पाँच दिनों की भारत यात्रा की थी। यह दो दिवसीय यात्रा पश्चिम एशिया की भू-राजनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हो रही है और इससे कई रणनीतिक तथा रक्षा संबंधी निर्णय निकलने की उम्मीद है, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में से एक की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

दशकों में निर्मित संबंध
भारत और इज़राइल ने 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए थे और तब से व्यापार, प्रौद्योगिकी, कृषि, जल प्रबंधन तथा रक्षा के क्षेत्रों में साझेदारी लगातार मजबूत होती गई है। जुलाई 2017 में मोदी की पहली इज़राइल यात्रा अपने आप में ऐतिहासिक थी — वह इज़राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। जनवरी 2018 में इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा ने इस संबंध को और मजबूत किया, जो अब रणनीतिक गहराई वाली साझेदारी का रूप ले चुका है।
द्विपक्षीय व्यापार भी इस बढ़ती निकटता को दर्शाता रहा है, हालांकि हाल की क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का असर पड़ा है। वित्त वर्ष 2024–2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार घटकर 3.75 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया, जो पहले के उच्च स्तरों से कम है। भारत का इज़राइल को निर्यात 2.1 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 1.6 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इस यात्रा के दौरान दोनों पक्ष आर्थिक सहयोग को फिर से गति देने के रास्तों पर चर्चा कर सकते हैं।

दो वैश्विक नेताओं के बीच शक्तिशाली गठबंधन
मोदी के आगमन से पहले नेतन्याहू ने गर्मजोशी भरा और महत्वाकांक्षी संदेश दिया। कैबिनेट बैठक में बोलते हुए उन्होंने मोदी को “प्रिय मित्र” बताया और इस यात्रा को “ऐतिहासिक” कहा। सोशल मीडिया मंच एक्स पर नेतन्याहू ने इसे “दो वैश्विक नेताओं के बीच शक्तिशाली गठबंधन” बताया और कहा कि भारत और इज़राइल नवाचार, सुरक्षा और साझा रणनीतिक दृष्टि पर मिलकर काम कर रहे हैं। यह भाषा महत्वपूर्ण संकेत देती है। जो संबंध पहले रक्षा खरीद और कृषि तकनीक पर आधारित व्यावहारिक साझेदारी था, वह अब व्यापक रणनीतिक समन्वय के रूप में विकसित हो चुका है।

गठबंधनों का षट्कोण: नेतन्याहू का प्रस्ताव
शिखर बैठक से पहले उभरता सबसे महत्वपूर्ण विचार नेतन्याहू का “गठबंधनों का षट्कोण” प्रस्ताव है — एक ऐसा ढांचा जिसमें पश्चिम एशिया के भीतर या आसपास के छह देश आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा क्षेत्रों में सहयोग करेंगे। नेतन्याहू के अनुसार, इस समूह में भारत, ग्रीस और साइप्रस प्रमुख भागीदार होंगे, जबकि अन्य अरब, अफ्रीकी और एशियाई देशों को भी शामिल किया जा सकता है। उन्होंने इसे पश्चिम एशिया में या उसके आसपास गठबंधनों के एक व्यापक तंत्र के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य तथाकथित “कट्टरपंथी धुरी” का संतुलन बनाना है। इज़राइल ईरान को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है, जबकि ईरान भी इज़राइल के खिलाफ कई बार कठोर बयान दे चुका है। उल्लेखनीय है कि ईरान के शाह के शासनकाल में दोनों देशों के बीच अच्छे आर्थिक और सामाजिक संबंध थे, लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति और आयतुल्ला खोमैनी के सत्ता में आने के बाद यह समीकरण पूरी तरह बदल गया। ईरान एक शक्तिशाली शिया राष्ट्र के रूप में उभरा और उसने परमाणु तकनीक विकसित करनी शुरू की। आज दोनों देश अस्तित्वगत संघर्ष की स्थिति में हैं।
अमेरिका में यहूदी लॉबी के प्रभाव के कारण पिछले कई दशकों से अमेरिकी राष्ट्रपति आम तौर पर इज़राइल समर्थक नीतियों का पालन करते रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक, रक्षा और विदेश नीतियों की अनिश्चितता को देखते हुए इज़राइल भारत की मदद से एक स्वतंत्र क्षेत्रीय समूह बनाने को उत्सुक दिखाई देता है।
इस पृष्ठभूिम में यहां यह कहना उचित होगा कि नेतन्याहू के अनुसार प्रस्तावित ढांचा तीन स्तंभों पर आधारित होगा — व्यापार और प्रौद्योगिकी सहयोग सहित आर्थिक साझेदारी; क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर कूटनीतिक समन्वय; तथा खुफिया साझाकरण, रक्षा सहयोग और साझा सुरक्षा प्रतिक्रिया। विश्लेषकों ने इसकी तुलना भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) से की है, जो भारत, खाड़ी क्षेत्र और यूरोप को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना है। नेतन्याहू ने भी IMEC को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि यह प्रस्ताव समान विचार वाले देशों के बीच संस्थागत सहयोग को मजबूत कर सकता है।

मोदी की यात्रा का संकेत
भारत के लिए यह यात्रा संतुलित लेकिन उद्देश्यपूर्ण कूटनीति का उदाहरण है। नई दिल्ली ने हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है और इज़राइल, खाड़ी देशों तथा ईरान — सभी के साथ संबंध बनाए रखे हैं। इसलिए षट्कोण प्रस्ताव पर भारत की प्रतिक्रिया पर क्षेत्र और विश्व की नजर रहेगी।
यह यात्रा यह भी दिखाती है कि भारत-इज़राइल संबंध अब पर्दे के पीछे होने वाले सहयोग से आगे बढ़ चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच रक्षा खरीद, साइबर सुरक्षा, तकनीकी साझेदारी और संघर्षोत्तर पश्चिम एशिया में स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की उम्मीद है।
यरुशलम में जब दोनों नेता आमने-सामने बैठेंगे, तो चर्चा केवल समझौतों तक सीमित नहीं होगी बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था पर भी होगी जिसे वे आकार देना चाहते हैं। नेतन्याहू के लिए मोदी की मौजूदगी स्वयं एक कूटनीतिक संदेश है, जबकि भारत के लिए यह उभरती वैश्विक शक्ति के अनुरूप विदेश नीति की दिशा में एक और कदम है। द्विपक्षीय वार्ता के परिणाम 26 फरवरी को संयुक्त प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने की संभावना है।
इज़राइल में अक्टूबर 2026 में चुनाव होने हैं। यह चुनाव ऐसे समय में होगा जब देश आंतरिक विभाजन और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है, जिससे परिणाम देश की राजनीतिक दिशा, गाज़ा और वेस्ट बैंक नीति तथा वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं। शिया ईरान, सुन्नी पड़ोस, हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों तथा बदलते वैश्विक समीकरणों से निपटने के लिए क्षेत्रीय मंच बनाना नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत के इज़राइल और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। हाल के वर्षों में भारत ने अरब देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग भी बढ़ाया है। साथ ही भारत फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करता रहा है और बातचीत के जरिए समाधान का पक्षधर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। एक ओर इज़राइल के साथ रक्षा और आर्थिक साझेदारी जारी रखनी है, दूसरी ओर ईरान में चाबहार परियोजना जैसे ढांचागत प्रयासों को आगे बढ़ाना है, अरब देशों के साथ संबंध मजबूत रखने हैं और पश्चिम एशिया में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। भारत को शिया-सुन्नी प्रतिद्वंद्विता से दूर रहना होगा। इसलिए इस समय प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण है और चुनौतियों के बावजूद भारत इनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा।


 

Leave Your Comment

 

 

Top