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G20 समिट की अपार सफलता से सन्निपात में विपक्ष

Opposition upset over G20 summit's massive success

  • पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और शशि थरूर ने की सराहना
  • मोदी जी आँख मिलाते है किसी के मुंह नहीं लगते


भारत को G20 की अध्यक्षता मिलने पर विपक्षी नेताओं के मुरझाये चेहरे सभी ने देखे और कुछ चेहरे मोदी विरोधी पत्रकारों के भी थे। मोदी ने उसकी तैयारियां की जगह-जगह देश भर में कोन्क्लेव या रिहर्सल कर सूचना-समस्यायें और समाधान आदि समझने ंके प्रयास किये। जब समिट के लिये दिल्ली सज कर तैयार हुयी तो बजाय उसकी प्रशंसा करने के उस पर भी घटिया और विरोधी टिप्पणियां शुरू हो गयी। पर मोदी अपनी आदत के अनुसार न किसी की सुनते हैं न जबाब देते हैं न ही विपक्षी नेताओं के मुंह लगते हैं। चुपचाप अपने काम करते रहते हैं और अपने मिशन को अंजाम देकर ही चैन लेते है।

कोई भी बड़ा कार्य नरेन्द्र मोदी की सरकार में हो, विपक्ष को तो उसका विरोध करने की आदत हो गयी है। राजनैतिक कार्य हो या राष्ट्रीय कार्य या जनहित का हो, या अन्तर्राष्ट्रीय विषय का हो पर कांग्रेस पार्टी ने बिना जाने, बिना समझे उसका विरोध करना ही है। सबसे पहले राहुल गांधी शुरू होते हैं फिर उनके सिपह सालार उसे फैलाते हैं फिर पार्टी के छुट भैया नेता उसकी रट लगाना शुरू कर देते हैं। नोट बन्दी, कोरोना वेक्सीन और अडानी प्रकरण इसके उदाहरण हैं। नोटबन्दी, अडानी और राफेल खरीद पर बोलते-बोलते राहुल गांधी का मुंह थक गया होगा पर बोलना बन्द नहीं हुआ। इस पर सुप्रीम कोर्ट भी गये पर वहां से भी खाली हाथ लौटे। तब भी राहुल गांधी ने उसकी रट नहीं छोड़ी।

एैसी बातों पर भी राजनैतिक लाभ लेने के लिये बोलते हैं जिनका जनहित से कोई लेना देना नहीं न ही जनता का उनसे कोई सरोकार है। इसका उदाहरण है उनका संसद भवन, सेन्ट्रल विस्टा का निर्माण और फिर उसका उद्घाटन। नये संसद भवन का निर्माण खुद कांग्रेस पार्टी का प्रस्ताव था। उसकी जांच पड़ताल करके उस पर योेजना तैयार हो गयी थी। बाद में नरसिम्हा राव की सरकार के समय ये कहा गया कि अभी बजट नहीं है और उसके लिये इन्तजार किया जा सकता है। अतः इसे एक दशक या इससे अधिक समय के लिये टाल दिया गया। नरेन्द्र मोदी किसी कार्य को टालते नही है, न ही इन्तजार करना उनकी आदत नहीं है। वे एैसे कार्य पूरे कर रहे है जिनके सपने कभी कांग्रेस ने देखे थे। संसद भवन के निर्माण से जनता का कोई अहित नहीं होता। भ्रष्टाचार की भंेट चढ़ने वाला पैसा अब मोदी सरकार में बच रहा है। वही विकास और निर्माण में लग रहा है। बाद में उसके उदघाटन पर विरोध किया। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति कोई भी उद्घाटन करे उससे जनता को कोई लाभ या हानि नहीं है पर इसका भी जम कर विरोध किया गया।

जब दिल्ली में विश्व के तमाम देशों के मुखिया, प्रेसीडेंट, प्रधान मंत्री आदि आ रहे हों, उस समय राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है। एक-एक भारतवासी की नाक का सवाल होता है, एैसे समय पर विपक्ष को देश की बुराई करने से बचना चाहिये। घर की लड़ाई सदा घर में रहना चाहिये यदि कोई कमी या गलती हो तो उसे भी ढकने का काम करना चाहिये।

घटिया पत्रकारिता का भी हल्का सा नमूना  G20 समिट में देखनें को मिला। जब चीन के प्रेसीडेंट शी जिनपिंग के न आने की खबर आयी तो इस तरह प्रचारित किया गया जैसे उनके बिना समिट फेल हो जायेगा। जैसे भारत की प्रतिष्ठा को धक्का लग गया हो और जैसे मोदी ने देश को बर्बाद कर दिया हो। चीन नहीं आया तो क्या हुआ, समिट भी हुआ और जोरदारी से हुआ। वैसे भी चीन की गिनती भारत के दुश्मन देशों में शुमार है। चीन से हमारे सम्बंध कभी अच्छे नहीं रहे। एक बार पंडित नेहरू के जमानें में जब चीन ने हमारी जमींन पर कब्जा किया था तबसे आज तक उससे रिश्तों में विशेष सुधार नहीं हो सका।

जब यह खबर शुरू में आयी कि रूस के राष्ट्र अध्यक्ष पुतिन समिट में नहीं आयेंगे। दुश्मन देशों से सांठ-गांठ रखने वाले कुछ पत्रकारों ने इसे रूस की नाराजगी और रूस से रिश्ता खराब होने की बातें बोलना शुरू कर दिया। विष्व में एक मात्र इकलौते नेता नरेन्द्र मोदी हैं जिन्होनंे दोनों महाशक्तियों के बीच भारत का स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखा। यहां तक कि अमेरिका द्वारा सेंसर के बाबजूद भी रूस से तेल लेना जारी रखा। रूस से मनचाही मात्रा में सस्ती कीमत पर तेल खरीदा। यहां तक कि भारत ने पेट्रोल, डीजल अन्य देशों को भी बेचा। इसके बाबजूद भी अमेरिका से रिश्ते बनाये रखनें में हम सफल रहे। जहां सारे यूरोपीय देश रूस के खिलाफ खड़े थे वहां भारत ने तटस्थ होकर अपनी भूमिका निभायी और दुनिया में भारत की कूटनीति का झंडा गाढ़ दिया जो देश की आजादी के बाद आज तक कभी नहीं हो सका। रूस पिछले समिट में अफ्रीका नहीं गया क्योंकि यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ था। पुतिन का देश छोड़ना संभव नहीं था। उनका नहीं आना भारत की कूटनीति का हिस्सा हो सकता है। पुतिन ने समिट में न आकर अपने मित्र मोदी या कहें कि भारत को G20 सम्मेलन में असहज होने से बचा लिया।

भारत ने एक ओर बड़ी सफलता अर्जित की जब अफ्रीकी देशों के समूह को G20 की सदस्यता दिलाने में कामयाब हो गया। भारत पिछले कई वर्षों से इस कार्य में लगा था। आज इस सफलता से अफ्रीकी देशों का साथ भारत को सदा के लिये मिल गया। अफ्रीका यूनियन के अध्यक्ष अज़ाली अस्सुमानी ने नरेन्द्र मोदी का उपकार जताया।

बड़ी बात ये हुयी कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मुखिया एंटोनियो गुटेरेस ने भारत की दिल खोलकर प्रशंसा की तब भी विपक्ष ने मोदी को बधाई नहीं दी। यदि विपक्ष उस समय मोदी को बधाई देता और बिके हुये पत्रकार कुछ देर के लिये अपना स्वार्थ त्याग कर भारत की सफलताओं का जिक्र करते तो उनका सम्मान बढ़ता। पर इस बात को कुछ पत्रकार छुपा गये और कांग्रेस बराबर समिट के खिलाफ कुछ न कुछ बोलती रही। अमेरिकन राश्ट्रपति जो बाइडेन ने मई 2023 में क्वेट समिट में बोला था “ मोदी आप अत्यधिक लोकप्रिय हैं, हमें आपका आॅटोग्राफ लेना चाहिये ” भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदस्यता की बात पर फिर जो बाइडेन ने अपनी मुहर लगायी।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सुनक ने बोला मोदी जैसे नेता डिजिटल पहल टेक्नोलाॅजी और साइंटिफिक रिसर्च में बहुत आगे निकल रहे है। वे पूरी तरह भारतीयता में रचे रहे। जापान के प्रधानमंत्री फुमिओ किषिदा ने घोषणा की कि वो भारत को अगले 5 साल में 4 मिलियन डाॅलर की सहायता जापान पहुंचायेगा।

हमारा एक सपना था और है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता मिले पहली बार दुनिया के तमाम देश हमारे पक्ष में हैं यहां तक कि वीटों पावर रखनें वाली 5 महाशक्ति देशों में से चार ने इस पर फिर से सहमति व्यक्त की है। एक अकेला चीन विरोध करता है और हमारी सदस्यता रूक जाती है। अब मोदी के नेतृत्व में हम काफी आगे बड़ चुके हैं और धीरे धीरे सदस्यता मिलने का रास्ता खुलता जा रहा है। G20 समूह में अफ्रीकी देशों को सम्मलित करके मोदी ने अपनी कूटनीति का सिक्का पूरे विश्व में कायम कर दिया और अफ्रीका महाद्वीप के 55 देशों के समूह को स्थायी रूप से अपना मित्र बनाने में नरेन्द्र मोदी सफल रहे।


अमेरिका और पश्चिमी देशों से सम्बन्ध भी नहीं बिगड़े

भारत ने रूस से दोस्ती का हक अदा कर दिया

समिट के अंत में सारे देशों की बहस, विचार, सुझाव आने के बाद जो प्रस्ताव बना, उस पर सभी देशों की सहमति बनायी गयी। उस प्रस्ताव में कहीं भी यूक्रेन और रूस का विषय नहीं आया न कहीं रूस का नाम भारत ने आने दिया। केवल यूक्रेन जंग का जिक्र आया। इस तरह इस प्रस्ताव पर 100 प्रतिशत सहमति बनानें में भारत सफल रहा। भारत की अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति में मिली ये सफलता रूस की दोस्ती के लिये मील का पत्थर साबित होगी। रूस द्वारा दोस्ती और भारत का साथ निभानें का कर्ज भी भारत ने उतार दिया। सदा के लिये अपने मित्र का दिल जीत लिया। अमेरिका और रूस के बीच बड़ते तनाव में रूस का चीन की ओर झुकाव भारत की चिंता का विषय हो सकता था। लेकिन अब जो हमनें किया है यह दोस्ती का सबसे पक्का सबूत है।

चीन को एक और झटका पश्चिमी एशिया काॅरीडोर जो कि भारत से अरब की खाड़ी से होकर यूरोप तक जायेेगा के निर्माण हेतु सभी सम्बंधित देशों की सहमति हो गयी। जिसमें अफ्रीकी महाद्वीप के देशों अहम भूमिका होगी। इस मार्ग के निर्माण से, चीन द्वारा पाकिस्तान होकर बनाये जाने वाले काॅरीडोर का महत्व नहीं रहेगा। इस तरह चीनी अध्यक्ष शी जिनपिंग का सपना चकनाचूर होगा।


मोदी का परम वाक्य: ये युग युद्ध का नहीं

यूक्रेन, रूस के समय जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बोला था कि ये युग युद्ध का नहीं। उसकी गूंज G20 समारोह में भी फैली और तमाम देशों ने उसे पुनः दोहराया। आज यदि छोटे देशों में भी युद्ध होता है तो बड़ी शक्तियां इसमंे कूदेंगी और तब समूचा विश्व युद्ध में उलझ जायेेगा। बात परमाणु बम्ब तक पहुंच सकती है जो पूरे विश्व को नष्ट कर सकती है। इसलिये मोदी का ये वाक्य कि ये युग युद्ध का युग नहीं। विश्व भर में ब्रह्म वाक्य बन गया।

जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता और आतंकवाद समेत आर्थिक चुनौतियों की बात पर समस्त देशों को एक करने में भारत सफल रहा। पहले इस पर अमेरिका सहित कुछ देशों को एतराज था। G20 समिट में 100 नम्बर में भारत को 100 नम्बर मिले हैं।



 

डॉ. विजय खैरा

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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