logo

विपक्ष को मिला जनसमर्थन नैतिक नहीं रणनीतिक

Opposition got public support not moral but strategic

लोकसभा चुनाव 2024 में इंडी गठबंधन को 234 सीटें मिलीं, जिसमें कांग्रेस की 99 सीटें शामिल हैं। जाहिर सी बात है कि इससे विपक्ष का हौसला बुलंद हुआ है। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच यानी NEW के जो आंकड़े सामने आए हैं, वह बताते हैं कि कांग्रेस और उसके साथियों के पास उतना जनसमर्थन मौजूद नहीं है, जितना वह शोर मचा रहे हैं।

ADR और NEW द्वारा हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव 2024 के आंकड़ों के विश्लेषण  ने विपक्ष के जीत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। इन आंकड़ों को गौर से देखा जाए तो पता चलेगा कि विपक्ष की सीटें भले ही बढ़ गई हैं। लेकिन उन्हें जनता का उतना समर्थन हासिल नहीं है। 

 

ज्यादातर विपक्षी सांसदों के पास 50 फीसदी से कम जन समर्थन

इन आंकड़ों से पता चलता है कि कांग्रेस के 99 सांसदों में से 57 यानी लगभग 58 फीसदी सांसद 50 फीसदी से कम वोट लेकर जीते हैं। वहीं यूपी में कांग्रेस की सबसे बड़ी सहयोगी समाजवादी पार्टी के कुल 37 सांसदों में से 32 यानी लगभग 86 फीसदी सांसद 50 फीसदी से कम वोट पाकर जीते हैं। उधर पश्चिम बंगाल में विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस से 29 जीते हुए सांसदों में से 21 सांसद यानी 72 फीसदी सांसद 50 फीसदी से कम वोट पाकर जीते हैं। वहीं तमिलनाडु में इंडी गठबंधन के सहयोगी डीएमके के 22 में से 14 यानी 63 फीसदी सांसद 50 फीसदी के कम वोट हासिल करके जीते हैं। इस आंकड़े का मतलब यह है कि कांग्रेस, सपा, टीएमसी और डीएमके जैसे दल महज कुछ ही वोटों के मार्जिन से जीते हैं। यदि भारतीय जनता पार्टी इन विपक्षी पार्टियों के खिलाफ थोड़ा भी और जोर लगाती तो इंडी गठबंधन की हवा खराब हो सकती थी।


सबसे कम कमजोर सांसद भाजपा में

 इसके उलट देखें तो भाजपा ने लोकसभा की 240 सीटें जीती थीं। इसमें से 75 यानी 31 फीसदी सांसदों को 50 फीसदी के कम वोट हासिल हुआ। यानी भाजपा में कमजोर सांसदों की संख्या बेहद कम है।

70 फीसदी से ज्यादा वोट पाने वालों में एक भी विपक्षी सांसद नहीं

बल्कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच यानी NEW  ने 70 फीसदी से ज्यादा वोट पाकर जीतने वाले सांसदों की लिस्ट भी जारी की है। इस बार की लोकसभा में सात ऐसे सांसद हैं, जो कि सत्तर फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करके भारी जनसमर्थन हासिल करके जीते हैं।

 विशेष बात यह है कि यह सभी सातो सांसद भाजपा के हैं, जिन्हें जनता ने जबरदस्त समर्थन प्रदान किया।  इसमें से पहला नंबर आता है, इंदौर के भाजपा सांसद शंकर लालवानी का, जो कि 78.54 फीसदी वोट हासिल करके जीते हैं।

जबकि दूसरे नंबर पर गुजरात के नवसारी से जीते सीआर पाटिल हैं। जिन्हें 77 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं।  उधर मध्य प्रदेश के विदिशा से पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी 77 फीसदी वोट पाकर जबरदस्त जीत दर्ज की है।

गुजरात की गांधीनगर सीट से गृहमंत्री अमित शाह ने भी 76.5 फीसदी वोट पाकर बंपर जीत हासिल की।  त्रिपुरा वेस्ट लोकसभा सीट से बिप्लब देव को 72.85 फीसदी वोट मिले। जबकि वडोदरा के सांसद हेमांग जोशी को 72.04 प्रतिशत वोट हासिल हुए। पंचमहल से सांसद राजपाल सिंह महेन्द्र सिंह जादव को 70.22 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं।

खास बात है कि 70 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करने वालों में कांग्रेस नीत इंडी गठबंधन का कोई भी नेता मौजूद नहीं है। बल्कि कांग्रेस के तीन सांसद तो ऐसे हैं, जिन्हें 30 फीसदी से कम वोट हासिल हुए हैं।
 

विपक्ष की नैतिक हार

इन आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि इंडी गठबंधन के सांसदों की संख्या में जो बढ़ोत्तरी हुई है।  वह रणनीतिक तौर तो गलत नहीं है। उनकी जीत तो हुई है, भले ही वो कम मार्जिन से ही जीते हैं। लेकिन विपक्ष के इन सांसदों की यह जीत नैतिक नहीं है। क्योंकि मतदाताओं को वोट बंट जाने की वजह से विपक्ष के सांसद जीते, ना कि अपनी लोकप्रियता के आधार पर। उन्हें अपने क्षेत्र की जनता का ज्यादा समर्थन हासिल नहीं हुआ। जिन सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र की आधी जनता का भी समर्थन हासिल नहीं हो क्या ऐसे सासंदों को वास्तविक जन प्रतिनिधि कहा जा सकता है?
 

सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों को आत्ममंथन की जरुरत

इन  हालातों में देखें तो विपक्षी गठबंधन को अपनी जीत का जश्न मनाने और संसद में बेवजह हंगामा करने की बजाए आत्ममंथन करने की जरुरत है। क्योंकि देखा जा रहा है कि विपक्ष इस बार मिली अपनी सीटों से बेहद उत्साहित है। अगर विपक्ष बेहद थिन मार्जिन से इतनी ही सीटें पाकर अहंकार में अंधा हो जाएगा, तो वह कभी भी बहुमत में नहीं आ पाएगा। हालांकि आत्ममंथन की जरुरत भाजपा को भी है। क्योंकि अगर भाजपा नेताओं ने पूरी चुनाव जिताने की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर नहीं छोड़ी होती। सर्व सम्मति से अच्छे उम्मीदवारों का चयन किया होता या फिर मतदाताओं को बूथ पर लाने के लिए ज्यादा प्रयास किया होता, हमेशा की तरह आरएसएस के स्वयंसेवकों का पूरा सहयोग लिया होता तो शायद साल 2024 की 18वीं लोकसभा में भी भाजपा को 2014 और 2019 की तरह जीत हासिल होती।       

 

 



अंशुमान आनंद

Leave Your Comment

 

 

Top