धरती का स्वर्ग कश्मीर घाटी पिछले तीन दशकों से रक्तरंजित होती रही है। कश्मीर घाटी में जब भी केसर की फसल लहलहाने लगती है, जब भी कश्मीर के लोगों के चेहरे की रौनक लौटने लगती है, पाकिस्तानी सेना के पेट पर बल पड़ने लगते हैं। उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की ओर से आतंकी कश्मीर घाटी में निर्यात कर दिए जाते हैं और फिर घाटी की सुनहरे धानी रंगों की वाली धरती बेगुनाह खून से रंग दी जाती है। बीते 22 अप्रैल को पहलगाम में जो हुआ, पाकिस्तानी फितरत का ही नया रूप था। लेकिन इस बार सरकार ने तय कर लिया था कि घाटी में बेगुनाह खून बहाकर जिन मांगों का सिंदूर पोंछ दिया गया, उस सिंदूर का बदला जरूर लिया जाएगा। केंद्र सरकार की इसी बदली सोच का नतीजा रहा ऑपरेशन सिंदूर।
छह और सात मई की दरमियानी रात भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के नौ ठिकानों को अपने अचूक निशाने से तबाह कर दिया। ये सारे ठिकाने एक तरह से आतंकवाद की फैक्टरियां थे। पाकिस्तान को भारत से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। जब भारत ने 26 नवंबर 2008 के लोमहर्षक आतंकी घटना का माकूल जवाब नहीं दिया तो पाकिस्तान का ऐसी उम्मीद पालना अस्वाभाविक भी नहीं था। देश की आर्थिक राजधानी को दहलाने वाली उस घटना में आधिकारिक रूप से 174 लोगों की जान गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। बेशक पुलवामा के बाद भारत की ओर से बालाकोट पर हमले या फिर सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए आतंकी ठिकानों को नष्ट करने का इतिहास रहा हो, भारत की ओर से ऑपरेशन सिंदूर जैसी बड़ी कार्रवाई की उम्मीद पाकिस्तान को नहीं थी। इसकी वजह यह रही कि भारत ने इस कार्रवाई से पहले पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन की सूची से बाहर निकाल दिया था और विवादित सिंधु नदी जल समझौते को निलंबित करके पाकिस्तान का पानी रोक दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तानी नागरिक विमानों के लिए भारतीय हवाई क्षेत्र को प्रतिबंधित कर दिया था। पाकिस्तान की सरकार और उसकी सेना शायद सोच रही थी कि भारत की ओर से ऐसी ही कार्रवाई की रस्म होगी और जैसे हर बार मामला ठंडा पड़ता रहा है, इस बार भी पड़ जाएगा। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।
ऑपरेशन सिंदूर शुरू किए जाने के ठीक पहले भारतीय कैबिनेट ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया। इस फैसले के मुताबिक, अब भारत पर आतंकी कार्रवाई करना भारत के खिलाफ युद्ध माना जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि जब भी भारतीय क्षेत्र में अब कोई आतंकी हमला होगा तो उसके लिए जिम्मेदार विदेशी ताकत के खिलाफ सैनिक कार्रवाई ठीक उसी अंदाज में होगी, जिस अंदाज में युद्ध किया जाता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पहले दिन भारत ने सिर्फ आतंकी ठिकानों को तबाह किया और यह साफ कर दिया कि उसके निशाने पर पाकिस्तान के सैनिक और नागरिक ठिकाने नहीं हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान की ओर से भारतीय सैनिक और नागरिक ठिकानों पर अगले दिन यानी सात – आठ मई की रात को ड्रोन हमले किए गए, सीमावर्ती चौकियों पर पाकिस्तान की ओर से फायरिंग हुई। इसका भारतीय सेना को जवाब देना ही था। भारत ने पाकिस्तान के सैनिक मुख्यालय रावलपिंडी के नजदीक स्थित नूर खान हवाई अड्डे को मिसाइल हमले से निशाना बनाया। इसके बाद भारतीय रणबांकुरों को भी जवाबी कार्रवाई करनी ही थी। भारत ने अपनी सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस के जरिए पाकिस्तान के 11 हवाई ठिकानों को नष्ट कर दिया, जिसमें भोलारी, रफीकी, नूर खान और सरगोधा जैसे उसके महत्वपूर्ण हवाई ठिकाने शामिल हैं। भारत की इस कार्रवाई में पाकिस्तान का एक AWACS विमान और कई UAV भी नष्ट कर दिए गए। पाकिस्तान के पास चीन की ओर से हवाई रक्षा प्रणाली है। लेकिन वह प्रणाली एकदम बेकार साबित हुई। भारतीय मिसाइलों को उसकी रक्षा प्रणाली और उसके रडार तक नहीं पकड़ पाए और भारत ने तबाही मचा दी।
इसके बावजूद पाकिस्तान ने सीमावर्ती इलाकों में भय का माहौल बनाने की भरपूर कोशिश की। उसने अगली रात को ड्रोन हमले जारी रखे। उसने भारत को मिसाइल से निशाना बनाया, जिसे भारतीय वायु रक्षा प्रणाली ने सिरसा के आसमान में ही मार कर नष्ट कर दिया। भारत की अचूक सैनिक कार्रवाई से पाकिस्तान की हालत खराब हो गई। पश्चिमी मीडिया के जरिए आई खबरों के मुताबिक, भारतीय हमलों के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर को बंकर में छिपना पड़ा। भारतीय सेना की कार्रवाई से पाकिस्तानी सेना में जहां दहशत का माहौल रहा, वहीं भारतीय इलाकों में लोग ब्लैकआउट जैसी परेशानियों के बावजूद राष्ट्रीय सरकार और सेना की कार्रवाई के साथ खड़े रहे।
भारत में जब भी संकट आता है, हमला होता है, भारतीय रगों में बहता राष्ट्रवाद नई कुलांचे भरने लगता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ऐसा ही कुछ नजर आया। लोग भारतीय सैनिक कार्रवाई की ओर और ज्यादा उम्मीद लगा बैठे। लेकिन पाकिस्तान नौ मई की रात से ही बिलबिलाने लगा और अगले दिन भारत के सैन्य अभियान के महानिदेशक के सामने गुहार लगाई और भारत संघर्ष विराम के लिए तैयार हो गया। संघर्ष विराम को लेकर जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने दावे किए, उससे निश्चित तौर पर भारत सरकार की स्थिति थोड़ी कमजोर हुई। लेकिन इस पूरी दावेबाजी ट्रंप की छवि भारत में हंसी के पात्र के रूप में नजर आने लगी। ट्रंप की गंभीर छवि तो वैसे भी पहले नहीं थी, कम से कम भारत में और खराब हुई है। भारत की राष्ट्रवादी जनता भी संघर्ष विराम से थोड़ी निराश नजर आई। इसकी वजह यह है कि भारतीय जनता मानती है कि पाकिस्तान को जब तक ठीक से सबक नहीं सिखाया जाएगा, भारतीय समस्याओं की जड़ को खत्म नहीं किया जा सकता। लोगों का कहना था कि कम से कम भारतीय सेना को और दो दिनों तक कार्रवाई करने की छूट मिलनी चाहिए थी। आम लोगों की राय है कि पाकिस्तान की गर्दन पर भारत का जूता था, जरूरत उसे दबाने की थी। बारह मई को बुद्ध पूर्णिमा थी। भगवान बुद्ध की इस जयंती के दिन तक कार्रवाई की जा सकती थी और उस दिन बुद्ध की तरह भारत की ओर से शांति का संदेश देने के लिए संघर्ष विराम का सहारा लिया जा सकता था।
बहरहाल केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर खत्म नहीं हुआ है, बल्कि वह कुछ वक्त के लिए निलंबित है। इसका मतलब यह है कि अगर सीमा पार से भारतीय बेगुनाह खून बहाने की कोशिश हुई, आग लगाने का प्रयास हुआ, भारत को अशांत करने की कोशिश हुई, भारतीय रणबांकुरे, भारतीय वायु रक्षा प्रणाली, भारतीय नौसेना सबक सिखाने से पीछे नहीं हटेगी। पाकिस्तान को यह पता होना चाहिए कि उसकी जीडीपी में अकेले साठ फीसद की हिस्सेदारी उसके कराची बंदरगाह की है, उसे भारतीय सेना और नौसेना कभी भी तबाह कर सकती है।
ऑपरेशन सिंदूर ने साबित किया है कि आतंकवाद को लेकर भारत की नीति बदली है। भारत की विदेश नीति में भी बदलाव नजर आ रहा है। बेशक अब भी उसका प्रमुख तत्व किसी देश पर हमला न करना है, लेकिन यह बदलाव जरूर हुआ है कि अब जरूरत पड़ी तो हमला किया जा सकता है। भारत को विश्व स्तर पर आक्रामक समर्थन भले ही नजर नहीं आ रहा, लेकिन यह भी सच है कि महाशक्तियों की तरह भारत इससे बेपरवाह नजर आया। इसका मतलब यह भी है कि भारत महाशक्ति बनने की ओर कदम बढ़ा चुका है। भारत वैसे भी दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और चौथी बड़ी सैनिक शक्ति है। ऑपरेशन सिंदूर से दोनों ही क्षेत्रों में भारत के कदम आगे बढ़े हैं। भारतीय रक्षा उत्पादन उद्योग की वैश्विक मांग बढ़ी है। ब्रह्मोस खरीदने के लिए मलयेशिया, फिलीपीन्स समेत कई देश आगे आ रहे हैं। भारत का रक्षा निर्यात बाजार जो पांच हजार करोड़ सालाना का है, वह बढ़ता नजर आ रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सैन्य क्षमता को नए सिरे से वैश्विक स्तर पर जहां स्थापित किया है, वहां एक बार फिर साबित किया है कि भारतीय सेनाएं दुनिया की सबसे अनुशासित सेना हैं। जिनका मकसद आम जानमाल को नुकसान पहुंचाने की बजाय दोषियों को दंडित करना है। भारतीय रक्षा उत्पादन का बाजार दुनिया में बढ़ा है और इसके साथ ही भारतीय तकनीकी कुशलता की साख भी बढ़ी है। कह सकते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को आर्थिक, सैनिक और कूटनीतिक ताकतवर देश बनाने की दिशा में बड़ा योगदान दिया है।

उमेश चतुर्वेदी,
वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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