ओडिशा अपनी सीमाओं के भीतर माओवादी उपस्थिति को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। राज्य पुलिस ने जनवरी–फरवरी 2026 के दौरान चरणबद्ध तरीके से नुआपाड़ा, नबरंगपुर, मलकानगिरि, कोरापुट और बौध जिलों को नक्सल-मुक्त घोषित किया है। इन क्षेत्रों में सक्रिय अंतिम कैडरों के आत्मसमर्पण के बाद यह घोषणा की गई।
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, अब कंधमाल राज्य का अंतिम प्रमुख फोकस क्षेत्र रह गया है। इसे आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। यह अभियान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित 31 मार्च 2026 की समयसीमा के अनुरूप संचालित हो रहा है, जिसका लक्ष्य देश से वामपंथी उग्रवाद का समूल उन्मूलन है।
दोहरी रणनीति: दबाव और पुनर्वास
राज्य की सफलता का श्रेय दोहरी रणनीति को दिया जा रहा है—
ओडिशा सरकार ने पहली बार 2006 में आत्मसमर्पण नीति लागू की थी। तब से अब तक 610 से अधिक माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं। नई नीति के तहत आर्थिक सहायता, हथियार जमा करने पर प्रोत्साहन राशि, आवास, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं।
नवंबर 2025 में नीति के पुनर्प्रभावी होने के बाद 45 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि फरवरी 2026 तक इस महीने 19 और कैडर मुख्यधारा में लौटे हैं। अधिकारियों का दावा है कि अब राज्य में 50 से कम सक्रिय माओवादी बचे हैं।

बड़े नेताओं का आत्मसमर्पण
हाल ही में राज्य समिति सदस्य निरंजन राउत उर्फ निखिल और उनकी पत्नी रश्मिता लेंका उर्फ इंदु ने आत्मसमर्पण किया। दोनों पर कुल 1.1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
रायगढ़ा में आयोजित समारोह में 15 माओवादियों ने 14 अत्याधुनिक हथियार (एके-47, एसएलआर, इंसास राइफल) सुरक्षा बलों को सौंपे। कंधमाल में भी चार सक्रिय कैडरों ने आत्मसमर्पण किया।एडीजी (एंटी-नक्सल ऑपरेशन) संजीब पंडा के नेतृत्व में, आईजी ऑपरेशंस डॉ. दीपक कुमार और स्टेट इंटेलिजेंस विंग के डीआईजी अखिलेश्वर सिंह की टीम समन्वित कमान के तहत अभियान चला रही है।
ओडिशा में नक्सलवाद और प्रमुख घटनाएँ
‘लाल गलियारा’ सिमटा
जिस तथाकथित “लाल गलियारे” का प्रभाव 2000 के दशक के उत्तरार्ध में देश मे लगभग 180 जिलों तक फैला था, वह 2025 तक घटकर लगभग 12 जिलों तक सीमित रह गया है। देश 2015 से 2025 के बीच 10,000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि 5,000 से अधिक उग्रवादी सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों में मारे गए। यह सुरक्षा और विकास आधारित संयुक्त रणनीति का परिणाम माना जा रहा है।
अंतिम चरण: कंधमाल पर फोकस
पुलिस आकलन के अनुसार कंधमाल में अब 30–40 के बीच कैडर सक्रिय हैं। पहले सक्रिय दो डिवीजन बंसाधारा-घुमुसर-नागावली (BGN), कालाहांडी-कंधमाल-बौध-नयागढ़ (KKBN) में से अधिकांश सदस्य आत्मसमर्पण कर चुके हैं। दक्षिणी रेंज के आईजी नीति शेखर ने कहा कि सुरक्षा बल स्पष्ट लक्ष्य के साथ कार्य कर रहे हैं और माह के अंत तक कंधमाल को भी नक्सल-मुक्त घोषित किए जाने की संभावना है।
‘हिंसा में कोई भविष्य नहीं’
आत्मसमर्पण करने वाली कैडर गंगा कुंजामी ने कहा— “जंगलों में लगातार अभियान और नेताओं के मारे जाने के बाद हमने समझ लिया कि हिंसा का कोई भविष्य नहीं। सरकार की पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर हमने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।”
ओडिशा में लगातार आत्मसमर्पण, सुरक्षा अभियानों की सफलता और विकास कार्यों के विस्तार ने माओवादी नेटवर्क को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है। राज्य सरकार को विश्वास है कि 31 मार्च 2026 तक ओडिशा को पूर्णतः नक्सल-मुक्त घोषित किया जा सकेगा।
ओड़िशा में नक्सलवाद की कहानी संघर्ष, हिंसा और विकास के बीच संतुलन खोजने की कहानी रही है। पिछले एक दशक में सुरक्षा और विकास की संयुक्त रणनीति से हालात में सुधार हुआ है, लेकिन सामाजिक न्याय, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार ही स्थायी शांति ला सकेगा।
भुवनेश्वर से सतीश शर्मा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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