साल 2024 के चुनाव में जो सबसे बड़ा और दूरगामी बदलाव देखा गया, वह था ओडिशा में नवीन पटनायक की 25 साल पुरानी सत्ता का समाप्त होना। लेकिन यह अनायास ही नहीं हो गया। बल्कि सत्ता की रेत आहिस्ता-आहिस्ता नवीन बाबू की मुट्ठी से फिसलती रही, लेकिन उन्हें इसका अहसास भी नहीं हो पाया। क्योंकि वह अपने करीबी प्रशासनिक अधिकारी वी.के पांडियन द्वारा दिखाए जा रहे सुख सपनों में डूबे हुए थे। इन पंक्तियों के लेखक ने चुनाव के दौरान ओडिशा में एक पखवाड़े से ज्यादा का समय बिताया। ओडिशा के नगरीय, ग्रामीण, औद्योगिक, जनजातीय सभी इलाकों का दौरा किया। सैकड़ों लोगों से मुलाकात और चर्चा की, तब जाकर समझ में आया कि आखिर कैसे ओडिशा में इतना बड़ा परिवर्तन आया?
साल 2024 की चुनावी कवरेज के लिए उदय इंडिया की टीम जब दिल्ली से सड़क के रास्ते उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड होते हुए ओडिशा रवाना हुई थी, तब नवीन पटनायक का इकबाल बुलंद था। इसके बाद सभी चरणों का मतदान समाप्त करके एक थका देने वाली चुनावी यात्रा के आखिर में हम सभी पत्रकार साथी लौट रहे थे, तो सभी एक विचार पर जरुर एकमत थे कि इस बार ओडिशा में नवीन बाबू को बड़ी मुश्किल होने वाली है। भले ही चुनाव परिणाम में दो दिन और बाकी थे, लेकिन सैकड़ों की संख्या में लोगों से की हुई बातचीत, उनकी शिकायतें, उनकी रोजमर्रा की परेशानियां, दुख-दर्द जैसे रील की तरह दिमाग में चल रहे थे।
क्योंझर के आदिवासी क्षेत्र का रहस्यमय संदेश

झारखंड के रास्ते जब हम लोग ओडिशा की सीमा में घुसे तो हरे भरे जंगलों के झूमते पेड़ों ने स्वागत किया। जिनके साथ खड़े थे जनजातीय समाज के हमारे भाई बंधु, जिनके चेहरे का भोलापन उनके आंतरिक सौंदर्य को दर्शा रहा था। ये ओडिशा का क्योंझर जिला था। रास्ते में एक जगह जब हमारी टीम खाने के लिए ढाबे पर रुकी, तो सहज उत्सुकता वश मैनें ढाबे के मालिक और वहां मौजूद ग्राहकों से पूछा कि 'इस बार के चुनाव में आप लोगों को आखिर किसका पलड़ा भारी दिख रहा है।' तब कई लोगों ने बड़ी रहस्यमय मुस्कुराहट दिखाई, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया। पत्रकार के दिमाग की बत्ती झट से जली, उसने संकेत दिया कि यह तो सत्ता विरोधी रुझान है। लोग सत्ताधारी बीजू जनता दल के विरुद्ध बोलने से घबरा रहे हैं, लेकिन दिल में विरोध इतना है कि झूठ-मूठ ही सही समर्थन भी नहीं कर पा रहे हैं। इसके बाद हम लोग आगे बढ़े और क्योंझर के एक मंझोले शहर बड़बिल पहुंचे, जो कि माइनिंग के लिए 'विख्यात या कुख्यात' है। बड़बिल और उसके आस पास के क्षेत्रों में लौह और मैंगनीज अयस्कों की भरमार है। यहां की लाल मिट्टी में अरबों-खरबों की कीमत के अयस्क मौजूद हैं। पूरे बड़बिल शहर में ट्रकों और हैवी लोडर गाड़ियों की भरमार दिखी। लेकिन शहर में विकास की हालत यह थी कि एक भी सड़क ढंग की नहीं थी, बिजली के तार झूलते दिख रहे थे, साइन बोर्ड्स पर मिट्टी चढ़ी हुई थी, ट्रैफिक व्यवस्था चरमराई हुई थी, प्रशासन अपने कानों में तेल डाले शहर को अपने हाल पर छोड़कर ऊंघता सोता हुआ दिखाई दे रहा था। यह वो बड़बिल शहर है, जहां से प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ का कारोबार होता है। लेकिन इस शहर को सुविधा के नाम पर सड़क और स्ट्रीट लाइट तक मयस्सर नहीं थी।
खैर रात्रि विश्राम के बाद हम सब बड़बिल से लगे आदिवासी इलाकों का दौरा करने निकले। रास्ते में सजी हुई आदिवासी हाटें, सड़कों के किनारे फल सब्जियां बेचते ग्रामीण, गांव के चौक चौराहों पर बैठे लोग उन सभी से चर्चा करते हुए जो बात समझ में आई, वह ये थी कि इन आदिवासियों को ये तो पता है कि उनके इलाके में हो रही माइनिंग से व्यापारी, अधिकारी और नेतागण रातोंरात अमीर हो रहे हैं, लेकिन इलाके और वहां के रहवासियों की हालत जस की तस है। यहां तक कि इस इलाके में माइनिंग से पैसा कमाने वाले लोग यहां एक पैसे का निवेश नहीं करना चाहते, बल्कि पड़ोस के कोलकाता, रांची या दिल्ली-मुंबई दूसरे बड़े शहरों में प्रॉपर्टी खरीदते हैं और यहां के लोगों को फटेहाली में दिन गुजारने पड़ते हैं। इससे लोगों ने नाराजगी थी। जिसका नतीजा यह निकला कि क्योंझर सीट से बीजेडी के धनुर्जय सिडू को भाजपा के अनंत नायक के हाथों मात खानी पड़ी।
ढेंकनाल में दिखा स्पष्ट बदलाव का संकेत
क्योंझर से जब आगे हमारी टीम बढ़ी तो ढेंकनाल जिला शुरु हो गया। कई जगहों पर हाथियों से सावधान रहने के बोर्ड दिखाई दिए। लेकिन जब इस क्षेत्र के लोगों से बात की, तो लोगों ने यहां हाथियों से ज्यादा सत्तारुढ़ बीजेडी के नेताओं के भ्रष्टाचार से सावधान रहने की जरुरत बताई। ढेंकनाल में जहां नेशनल हाईवे का इलाका था, वहां तो सड़कें अच्छी हालत में थीं। लेकिन जिस स्थान पर राज्य सरकार की सड़कें थीं, उनकी दुर्गति हो रखी थी। कई सड़कों पर तो थोड़ी-थोड़ी दूर पर इतने ब्रेकर बने हुए थे कि पसलियों में दर्द होने लगा। गौर से देखा तो यह ब्रेकर नहीं बल्कि 'रम्बल स्ट्रीप' थे। जिसमें कई छोटे-छोटे ब्रेकर एक साथ बनाए जाते हैं। पूछने पर लोगों ने बताया कि ये खतरनाक ब्रेकर स्थानीय दबंग बीजेडी नेताओं ने सड़क बनाने वाले ठेकेदारों से मिलीभगत करके बनवा रखे हैं। जिससे कि उनके घर के पास से गाड़ियां धीमे गुजरें और नवीन पटनायक की लक्ष्मी बस सेवा पर अपनी मर्जी से लोगों को चढ़ाया या उतारा जा सके। लोग धीमी आवाज में स्थानीय नेताओं के भ्रष्टाचार और उनकी कारगुजारियों के किस्से तो सुनाते थे, लेकिन एक मासूम सी गुजारिश के साथ कि "भाई साहब हम गरीब लोग हैं, हमारा नाम कहीं नहीं आना चाहिए"। अब जहां की जनता ऐसी डरी सहमी रहती हो, वहां के चुनाव परिणाम का अंदाजा आप तो साफ तौर पर लगा सकते हैं। नतीजा वही रहा ढेंकनाल से भी बीजेडी का सूपड़ा साफ हो गया।
पांडियन से नफरत

उदय इंडिया की टीम ने ओडिशा के हर इलाके का दौरा किया। सबकी समस्याएं अलग-अलग थीं, सबकी जरुरतें अलग थीं। कॉमन बस एक बात थी कि ओडिशा के हर क्षेत्र के लोग नवीन पटनायक के करीबी प्रशासनिक अधिकारी वी.के.पांडियन से एक जैसी नफरत कर रहे थे। चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी, आदिवासी इलाका हो या औद्योगिक क्षेत्र। हर ओडिशा निवासी पांडियन का नाम लेते ही नकारात्मक विचार प्रकट करने लगता था। उन्हें लगता था कि पांडियन तमिलनाडु से आकर ओडिशा को लूट रहे हैं और नवीन पटनायक को अपने चंगुल में ले चुके हैं। ओडिशा में हर खास और आम लोगों को ये लगता था कि अगर बीजू जनता दल की जीत होती है तो सत्ता नवीन पटनायक के हाथ से फिसलकर उनके निजी सचिव रहे पांडियन के हाथ में चली जाएगी। जनता का गुस्सा पांडियन द्वारा बनवाए गए जगन्नाथ कॉरिडोर में कथित भ्रष्टाचार की आशंका पर था। इसके अलावा भाजपा ने जगन्नाथ महाप्रभु के रत्न भंडार की गायब हुई चाबी का मसला उठाया था। लोगों को आशंका थी कि रत्नभंडार की चाबी भी पांडियन ने ही गुम करवाई है। इसके अलावा ओडिशा की बिजली सस्ती कीमतों पर तमिलनाडु भेजे जाना और ओडिया लोगों को ज्यादा कीमत पर बिल भुगतान देना भी पांडियन के खिलाफ जनता के गुस्से की आग में घी का काम कर रहा था। यहां तक कि लक्ष्मी बस सेवा जैसी जन कल्याणकारी योजना भी पांडियन की वजह से विवादों में फंस गई थी। क्योंकि जनता को लगता था कि लक्ष्मी बस का कांट्रेक्ट तमिल कांट्रेक्टरों को मिला है, जिससे ओडिशा का पैसा तमिलनाडु की तरफ ले जाने की साजिश रची जा रही है। इन आरोपों में सच हो या ना हो। लेकिन सार्वजनिक सभाओं के दौरान भी जिस तरह पांडियन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को नियंत्रित करने की कोशिश करने की कोशिश की थी। उसे ओडिशा की जनता बहुत बारीकी से नोटिस कर रही थी। उसे इंतजार था तो बस मतदान का। कहना नहीं होगा कि पांडियन के खिलाफ गुस्से की वजह से ओडिशा के लोगों ने बीजू जनता दल को दंडित किया। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की 25 सालों की विश्वसनीयता धूल में मिल गई। आखिरकार चुनावी हार के बाद पांडियन की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं पर विराम लग गया और उन्हें इस्तीफा देना ही पड़ गया।
कटक की जनता की राय थी अलग

अपनी चुनाव यात्रा को आगे बढ़ाते हुए उदय इंडिया की टीम ओडिशा की प्राचीन राजधानी कटक पहुंची थी। जो कि एक ऐतिहासिक शहर है, जो कि सामाजिक तथा राजनैतिक रुप से बेहद प्रबुद्ध क्षेत्र है। यहां मध्य वर्ग की संख्या ज्यादा है। कटक का दहीबड़ा आलूदम बहुत प्रसिद्ध है। तो उदय इंडिया की टीम ने भी इसका स्वाद लेने की सोची। शाम का समय था दहीबड़े की दुकान पर भारी भीड़ इकट्ठा थी। अब जहां भीड़ होती है वहां पत्रकार के मन में लोगों से बात करने की अकुलाहट होने लगती है। वैसे भी हम दिल्ली से इतनी दूर ओडिशा जनता की नब्ज भांपने के लिए ही तो पहुंचे थे। कटक के लोगों से बात करने पर भी यही समझ में आया कि लोगों के मन से नवीन पटनायक की छवि धूमिल होती जा रही है। पांडियन से नाराजगी वैसी ही दिखी। लेकिन कटक में एक विशेष बात थी, जो ओडिशा के दूसरे क्षेत्रों से अलग दिखाई दी। दरअसल ओडिशा के हर क्षेत्र में बीजू जनता दल की नाराजगी का फायदा भाजपा को होता हुआ दिखाई दे रहा था। लेकिन कटक में कुछ लोग दोनों से समान रुप से नाराज थे। हालांकि मुझे यह असामान्य लगा। लेकिन थोड़ी गहराई से लोगों से बात की तो पता चला कि कटक के मतदाताओं का एक हिस्सा यह मानता था कि बीजेडी और भाजपा में अंदरखाने मिलीभगत है। दोनों बस दिखावे के लिए अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव संपन्न होने के बाद दोनों वापस एक साथ आ जाएंगे। इस अफवाह को बल इस बात से भी मिला था कि चुनाव से पहले बीजेडी और भाजपा में गठबंधन की खबरों ने बहुत जोर पकड़ा था। इसके अलावा भाजपा के हाई प्रोफाइल मंत्री अश्विनी वैष्णव को राज्यसभा में पहुंचाने में बीजेडी का अहम योगदान था। खुद पीएम मोदी कई बार सार्वजनिक मंचों से नवीन पटनायक की तारीफ कर चुके थे। तो इन वजहों से कटक के लोगों को लगता था कि दोनों ही आपस में मिले हुए हैं। क्योंकि जैसा कि मैनें पहले भी बताया कि कटक एक राजनैतिक रुप से जागरुक लोगों का क्षेत्र है। यहां के लोग राजनीति को बारीकी से देखते समझते हैं और उसपर निगाह बनाए रखते हैं। हालांकि जब चुनाव परिणाम आए तो यहां की लोकसभा सीट भाजपा के भर्तृहरि माहताब के पास गई। लेकिन भाजपा- बीजेडी से दूरी बनाने वाले लोगों ने एक विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की विधायक को जीता दिया।
जगन्नाथ क्षेत्र की जनता थी पांडियन से बेहद नाराज
ओडिशा को भगवान जगन्नाथ का निज धाम कहा जाता है। जिसकी राजधानी भले ही भुवनेश्वर हो। लेकिन हृदय क्षेत्र है पुरी। जहां भाजपा के चर्चित नेता संबित पात्रा चुनाव लड़ रहे थे। पुरी की जनता नवीन बाबू के करीबी पांडियन से विशेष तौर पर बहुत ज्यादा नाराज दिखाई दी। क्योंकि पुरी के विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में ही तथाकथित जगन्नाथ कॉरिडोर का निर्माण किया गया था। जिसके लिए मंदिर परिसर में मौजूद बहुत से पुरावशेषों को ध्वस्त कर दिया गया। जिसमें कई प्राचीन संन्यासियों की आसंदियां भी मौजूद थीं। यही नहीं जगन्नाथ कॉरिडोर बनवाते समय वहां टॉयलेट्स भी बनाए गए थे। जिसे लोगों ने जगन्नाथ मंदिर की पवित्रता का हनन बताया। पुरी के लोगों की सबसे ज्यादा आपत्ति जगन्नाथ कॉरिडोर के बजट पर थी, जो कि 943 करोड़ रुपए का था। यहां की जनता को लगता था कि कॉरिडोर बनाने के नाम पर सिर्फ लाल पत्थर का परिक्रमा पथ तैयार किया गया था। ऐसे में 943 करोड़ रुपए कहां खपा दिए गए। जनता ने मुझे यह भी बताया कि 1800 करोड़ रुपए में अयोध्या में भव्य राम मंदिर तैयार हो गया। लेकिन उससे आधा बजट यानी 943 करोड़ रुपए खर्च करके सिर्फ थोड़ी तोड़-फोड़ करके परिक्रमा पथ बनाया गया। लोगों को इस कार्य में भारी घोटाले की गंध आ रही थी। अब सत्य क्या है यह तो गहन छानबीन का विषय है लेकिन पुरी की जनता की नाराजगी बीजेडी को भारी पड़ी और संबित पात्रा ने जीत हासिल कर ली। पुरी लोकसभा क्षेत्र का ही हिस्सा चिल्का भी है। जहां पर विश्वप्रसिद्ध चिल्का झील है। अर्द्धखारे पानी की यह झील अपने आप में प्रकृति का एक अजूबा है। यहां पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। जब हमारी टीम चिल्का पहुंची को हमें लगा था कि चिल्का जैसे प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र में अच्छे होटल और गेस्ट हाउस जरुर होंगे। लेकिन यहां पहुंचने पर हमें जैसे तैसे करके एक छोटा कमरा ही ठहरने को मिला। तो समझिए कि यहां आने वाले पर्यटकों को कितनी मुश्किल होती होगी। मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में भी चिल्का क्षेत्र में काफी काम किया जा सकता है। क्योंकि देश ही नहीं बल्कि विदेश के भी समिषभोजियों को चिल्का की मछलियां बहुत पसंद आती हैं। लेकिन चिल्का क्षेत्र में पकड़ी हुई मछलियों को स्टोर करने के लिए कोल्ड स्टोरेज की कमी है। राज्य सरकार की उदासीनता के कारण यहां कोई विकास नहीं हो पाया। जनता को इस बात का अहसास पूरी तरह था। उदय इंडिया की टीम जब चिल्का के लोगों से बात कर रही थी उसी समय वहां नवीन पटनायक की बहुप्रचारित लक्ष्मी बस सेवा गुजरी। जिसका संचालन कथित रुप से तमिलनाडु की कंपनी करती है। लोगों ने इसपर सख्त नाराजगी जाहिर की थी। जिसका नतीजा रहा कि चिल्का विधानसभा से भाजपा के पृथ्वीराज हरिचंदन चुनाव जीत गए और बीजेडी को मात खानी पड़ गई।
भुवनेश्वर के लोगों की थी मिश्रित राय

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के लोगों की राय मुझे बहुत ही संतुलित लगी। वहां जब हमारी टीम पहुंची तो राजपथ इलाके में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की रैली चल रही थी। जिसमें शामिल होने के लिए राज्य के अलग अलग हिस्सों के लोग पहुंचे थे। उदय इंडिया की टीम ने उन लोगों की राय जाननी चाही। जिसका जवाब बड़ा दिलचस्प आया। खुद मुख्यमंत्री की रैली में शामिल होने आई कुछ महिलाओं ने जवाब दिया कि वह विधानसभा में नवीन पटनायक को वोट देंगी, लेकिन लोकसभा के लिए उनकी पसंद नरेन्द्र मोदी हैं। क्योंकि उन्हें लगता था कि नवीन बाबू ओडिशा के लिए अच्छे हैं, वहीं मोदी देश के लिए अच्छे हैं। यह मेरे लिए सचमुच आश्चर्यजनक था। क्योंकि मैनें बातचीत के लिए महिलाओं के जिस समूह को चुना था। वह ग्रामीण परिवेश की महिलाएं थीं, लेकिन उनकी समझ और सोचने की शैली किसी परिपक्व राजनीतिक विश्लेषक से कतई कम नहीं थी। ओडिशा के उच्च मध्य वर्गीय लोगों की राय भी कमोबेश इन महिलाओं जैसी ही थी। यही वजह है कि भुवनेश्वर में मिश्रित परिणाम सामने आए। वहां कुछ महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों पर बीजेडी को जीत मिली, जबकि लोकसभा की सीट भाजपा की अपराजिता षड़ंगी को प्राप्त हुई।
ब्रह्मपुर के लोग बदलाव के लिए थे तैयार

उदय इंडिया की चुनाव यात्रा जब ओडिशा के ब्रह्मपुर में पहुंची, तो वहां अलग ही माहौल था। हमारी टीम जब ब्रह्मपुर पहुंची, तो वहां अगले ही दिन मतदान होना था। लेकिन वहां चुनाव को लेकर कोई गहमागहमी नहीं थी। हमने ब्रह्मपुर शहर में स्थित एक सार्वजनिक स्थान पर लोगों की प्रतिक्रिया ली। आप यकीन नहीं करेंगे वहां मौजूद सैकड़ों लोगों में हमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जिसने बीजेडी और नवीन पटनायक के पक्ष में अपनी राय प्रकट की हो। सबको लगता था कि 25 साल बहुत हो चुके हैं अब उन्हें बदलाव की जरुरत है। लोगों का यह दृढ़ निश्चय चुनाव परिणामों के बाद सामने आ गया और यहां से बीजेडी का सूपड़ा साफ हो गया।
केन्द्रापड़ा की शांति दे रही थी बदलाव का संकेत

ओडिशा का केन्द्रापड़ा कभी बीजेडी का गढ़ माना जाता रहा है। नवीन पटनायक के पिता और बीजेडी के संस्थापक लीजेंड्री नेता बीजू पटनायक का यह कार्यक्षेत्र रहा है। वह दो बार केंद्रापड़ा से ही लोकसभा सदस्य चुने गए थे। यही वजह है कि बीजेडी इस सीट पर बहुत मजबूत रही थी। उदय इंडिया की टीम ने केंद्रापड़ा में कई दिन बिताए और गांव-गांव का सघन दौरा किया। इस क्षेत्र में भी चुनाव को लेकर बहुत उत्सुकता नहीं दिखी। लोग चुनाव से बहुत पहले अपना मन बना चुके थे। इस इलाके से भाजपा के प्रत्याशी विजयंत जय पांडा कभी बीजेडी में रहे थे। लेकिन अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने पिछला चुनाव भी भाजपा के टिकट पर लड़ा था। लेकिन हार गए थे। पर इस बार नवीन बाबू से जनता की नाराजगी का भरपूर लाभ उन्हें प्राप्त हुआ और वह चुनाव जीत गए। उनकी जीत यह दर्शाती है कि नवीन बाबू अपने पुराने गढ़ों को भी बचाने में नाकामयाब रहे।
निष्कर्ष
ओडिशा की जीत ने भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया। हालांकि पूरे भारत के लोकसभा चुनाव परिणामों ने भाजपा के लिए थोड़ी निराशा जरुर पैदा की। क्योंकि साल 2014 और 2019 की तरह भाजपा अपने बलबूते 272 का जादुई आंकड़ा पार नहीं कर पाई थी। लेकिन इस निराशा को ओडिशा की जीत ने धो दिया। भाजपा ने यहां पर आदिवासी कार्ड खेलते हुए मोहन चरण मांझी को मुख्यमंत्री पद सौंपा है। हो सकता है कि भाजपा यह उम्मीद कर रही हो कि ओडिशा की जनता उसे नवीन बाबू की तरह 25 साल तक शासन का मौका देगी। लेकिन तब से अब तक महानदी में बहुत पानी बह चुका है। ओडिशा की जनता समझदार हो चुकी है। वह अपने हित और अहित का ध्यान रखना अच्छी तरह जान चुकी है। चुनाव प्रचार के समय भाजपा ने ओडिया अस्मिता, रत्न भंडार की चाभी जैसे कई मुद्दे उठाए थे। अगर यह मुद्दे पूरे नहीं हुए तो ओडिशा की जनता सरकार बदलने में देर नहीं लगाएगी। ओडिशा में भाजपा के लिए अवसर तो है, लेकिन साथ में अग्निपरीक्षा भी।

अंशुमान आनंद
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