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हरि जननी, मैं बालक तेरा

O mother of God, I am a thirteen year old child.

नवरात्रि भारतीय संस्कृति का केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है। यह आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का पर्व है। इन नौ दिनों में मनुष्य अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करता है और अपनी आदि शक्ति, अपनी आदि माँ से जुड़ता है।
 

आदि शक्ति कौन?
 

आदि शक्ति वही मूल सत्ता है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ। हर धर्म और दर्शन इस तथ्य को मानता है कि सृष्टि का प्रारंभ किसी सुप्रीम पावर से हुआ। भारतीय संस्कृति ने उस शक्ति को माँ कहा—क्योंकि जन्म देना, पोषण करना और रक्षा करना—इन तीनों का संपूर्ण संगम केवल माँ में ही संभव है।

“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुस्तेनैदं विश्वं भुवनं जनस्थ।” -ऋग्वेद

—यह सम्पूर्ण जगत एक ही परम शक्ति से उत्पन्न हुआ है।
 

माँ की करुणा का प्रमाण
 

यदि हम चारों ओर दृष्टि डालें, तो माँ की करुणा और कृपा सर्वत्र प्रकट होती है। सृष्टि का प्रत्येक तत्व उनके मातृभाव और दिव्य स्पर्श का प्रमाण है।


•    सूर्य — उन्होंने सूर्य की रचना की, जो दिनभर प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करता है। दार्शनिक दृष्टि से सूर्य ज्ञान और चेतना का प्रतीक है। जैसे सूर्य अंधकार मिटाता है, वैसे ही माँ की कृपा अज्ञान को दूर करती है।

•    चंद्रमा — उन्होंने चंद्रमा बनाया, जो रात्रि में शीतलता और शांति बिखेरता है। चंद्रमा संतुलन और मानसिक शांति का प्रतीक है। वह सिखाता है कि जीवन केवल कठोरता से नहीं, कोमलता और शीतलता से भी चलता है।

•     वायु — उन्होंने वायु प्रवाहित की, जो प्राणों का संचार करती है। वायु जीवन की निरंतरता और गति का प्रतीक है। यह बताती है कि माँ की कृपा हमारे प्रत्येक श्वास में विद्यमान है।

•     नदियाँ — उन्होंने नदियाँ बहाईं, जो जीवन का पोषण करती हैं। नदियाँ त्याग और निरंतरता का प्रतीक हैं—स्वयं बहकर सबका कल्याण करती हैं।

•     पर्वत — उन्होंने पर्वत खड़े किए, जो स्थिरता और धैर्य का द्योतक हैं। पर्वत सिखाते हैं कि माँ हमें हर परिस्थिति में अडिग और स्थिर रहने का सामर्थ्य देती हैं।

•     अग्नि — उन्होंने अग्नि दी, जो ताप और शक्ति प्रदान करती है। अग्नि शुद्धि और परिवर्तन का प्रतीक है—माँ हमें जड़ता से मुक्त कर निरंतर नूतनता की ओर ले जाती हैं।

•     प्राणतत्व — उन्होंने ही प्राणतत्व स्थापित किया, जिससे शरीर में चेतना आई और जीवन संभव हुआ। यह दैवीय स्पंदन स्वयं माँ की उपस्थिति है। उन्होंने ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड को उत्पन्न किया, उसका नियमन किया और अपनी असीम कृपा से उसमें संतुलन स्थापित किया।


“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

 

यह श्लोक उद्घोष करता है कि देवी ही समस्त शक्तियों के रूप में सम्पूर्ण जगत में विद्यमान हैं। वही शक्ति सूर्य की ज्योति है, चंद्र की शीतलता है, वायु का स्पंदन है, नदियों का प्रवाह है और पर्वतों की स्थिरता है।


महिषासुरमर्दिनी : बुराई पर विजय का प्रतीक

आदि शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप है—महिषासुरमर्दिनी। देवी ने असुरराज महिषासुर का वध करके देवताओं को सामर्थ्य लौटाया। यह कथा केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक सत्य है। महिषासुर हमारे भीतर और बाहर छिपी हुई तमोगुणी प्रवृत्तियों का प्रतीक है—अहंकार, लालच, अन्याय, अत्याचार और अज्ञान। देवी सत्य, धर्म, करुणा और न्याय की प्रतिनिधि हैं। उनकी उपासना से महिषरूपी आसुरी शक्तियों का नाश होता है और हमारे भीतर की देवता-स्वरूप दिव्य शक्तियों का उदय होता है।
 

माँ का विस्मरण – मानव की भूल
 

इतना सब कुछ मिलने के बावजूद हम अपनी जननी को भूल जाते हैं। आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य भौतिक साधनों में इतना उलझ गया कि अपनी मूल सत्ता, अपनी जड़ों को भूल बैठा।
 

“यद्भावं तद्भवति।” - ऋषिवाक्य
 

—जिस भाव का चिंतन करते हो, वही गुण तुममें प्रकट होते हैं।

इसलिए यदि हम माँ के दिव्य स्वरूपों का चिंतन करें, तो हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ नष्ट होकर सकारात्मक शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं।


सोई हुई शक्तियों का जागरण
 

सत्य यह है कि माँ हमें सब कुछ देना चाहती हैं। दोष केवल हमारा है कि हम उनसे विमुख होकर अभाव का अनुभव करते हैं।आदि शक्ति ने हमें अपार क्षमताएँ प्रदान की हैं। उनके अंशस्वरूप हमारी आत्मा में उनकी ही दिव्य शक्तियाँ सुप्त पड़ी हैं। जैसे एक छोटे से बीज में संपूर्ण वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही हमारे भीतर माँ की समस्त दिव्यताएँ निहित हैं।


“अहं बीजं सर्वभूतानां।” - भगवद्गीता (7.10)

—मैं ही सभी प्राणियों का मूल बीज हूँ।
 

जब हम ध्यान और साधना द्वारा माँ का स्मरण करते हैं, तब उनकी कृपा से हमारी सुप्त शक्तियाँ जाग उठती हैं। यही जागरण नवरात्रि का सच्चा उद्देश्य है।


नवरात्रि का दार्शनिक संदेश:
नवरात्रि केवल देवी-पूजन का अनुष्ठान नहीं है, यह जीवन को पुनः दिव्यता से जोड़ने का मार्ग है। इसमें आत्मसंयम है—उपवास के रूप में। इसमें आत्मशुद्धि है—पठन-पाठन और जप के रूप में।इसमें आत्मजागरण है—ध्यान और साधना के रूप में।

नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि हम केवल शरीर और मन नहीं हैं; हम माँ के अंशस्वरूप हैं। हमारे भीतर वही दिव्यता, वही शक्ति और वही सामर्थ्य छिपा है। आवश्यकता है तो केवल उसे जगाने की।
 

निष्कर्ष : स्मरण और समर्पण
 

नवरात्रि हमें यही शिक्षा देती है कि अपनी आदि शक्ति, अपनी आदि माँ का स्मरण करो। उनकी महिषासुरमर्दिनी शक्ति को पहचानो—वह शक्ति जो अंधकार, अन्याय और आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करती है, और भीतर के देवत्व को जाग्रत करती है। उनकी कृपा से हमारे भीतर की सुप्त शक्तियाँ जाग उठती हैं और जीवन में पवित्रता, सामर्थ्य और आनंद का अविरल प्रवाह प्रारंभ हो जाता है।आज की भौतिकतावादी दुनिया में यह स्मरण और भी आवश्यक है। हमें याद रखना होगा कि हम केवल शरीर नहीं, माँ के अंशस्वरूप हैं।और तब हम पूरे विश्वास और भक्ति से कह सकेंगे—
 

“हरि जननि, मैं बालक तेरा।” (कबीर)





अरविन्द सिंह
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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