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नुआपाड़ा उपचुनाव : सभी दलों की अग्नि परीक्षा

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आगामी नवंबर महीने में राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत जागरूक राज्य बिहार विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। कहने को तो यह एक राज्य के चुनाव हैं पर इसके संभावित परिणाम से सारे देश पर पड़ने वाले प्रभाव की वजह से सभी की निगाहें इसपर टिकी हुई हैं।  बिहार विधानसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों में खाली पड़े विधानसभा क्षेत्रों में भी उपचुनाव होने वाले हैं। इनमें ओड़िशा की एक सीट नुआपाड़ा भी शामिल है। ओड़िशा-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित नुआपाड़ा (रायपुर से 110 किमी दूर) सीट बीजू जनता दल के विधायक राजेंद्र ढोलकिया के 8 सितंबर को निधन के बाद खाली हुई है।

गत वर्ष हुए आमचुनाव के बाद राज्य में यह पहला चुनाव होने जा रहा है। अतः तीनों प्रमुख दल के लिए यह भविष्य की राजनीति तय करने वाला है। राजेंद्र ढोलकिया के निधन के बाद 147 सदस्यीय ओडिशा विधानसभा में बीजद के सदस्यों की संख्या 50 रह गई है, जबकि भाजपा के पास 78, कांग्रेस के 14, सीपीआई(एम) का एक और तीन निर्दलीय विधायक हैं।

गत वर्ष हुए चुनाव में अप्रत्याशित पराजय के बाद से बीजू जनता दल सदमे में है। वे अभी भी अपने दल को ही राज्य में सर्वाधिक जनप्रिय दल मानते हैं। गत वर्ष के चुनाव परिणाम को वे जनता द्वारा 'भावावेश' में लिये गये निर्णय के रूप में देखते हैं। ऐसे में बीजद इस उपचुनाव को जीतकर दल और नवीन पटनायक को अभी भी राज्य जनता की पहली पसंद सिद्ध करना चाहती है। बीजद अपने विधायक की मृत्यु के बाद सहानुभूति की लहर पर सवार होकर चुनाव जीतने की योजना पर काम कर रही थी।  राजेंद्र ढोलकिया के पुत्र जय ढोलकिया को उम्मीदवार बनाना लगभग तय कर चुकी थी। पर भाजपा ने उसके इस दांव को जबर्दस्त झटका देते हुए जय ढोलकिया को भाजपा में शामिल करा लिया। अब बीजद ने राज्य महिला मोर्चा की प्रमुख व पूर्व मंत्री श्रीमती स्नेहांगिनी छुरिया को अपना  उम्मीदवार बनाया है। अनुसूचित जाति (क्षेत्र में लगभग 14 प्रतिशत आबादी है) की श्रीमती छुरिया बरगढ़ जिले के अताबिरा क्षेत्र से दो बार विधायक रही हैं। गत वर्ष के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के घासीराम माझी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस क्षेत्र में 34 प्रतिशत आदिवासी मतदाता है। ,

इसीको ध्यान में रखकर कांग्रेस ने घासीराम माझी को अपना उम्मीदवार बनाया है। घासीराम माझी ने 2014 और 2019 में भी नुआपाड़ा से चुनाव लड़ा था, जिसमें वे क्रमशः तीसरे और दूसरे स्थान पर रहे थे। गत चुनाव में कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज घासीराम निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और पचास हजार से अधिक वोट प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे थे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शरत पटनायक मात्र पंद्रह हजार वोट लेकर चौथे स्थान पर रहे थे।

भाजपा ने दिवंगत बीजद विधायक और पूर्व मंत्री राजेंद्र ढोलकिया के पुत्र जय ढोलकिया को दल में शामिल कर टिकट दिया है। बीजद ने जय ढोलकिया को टिकट देना तय कर लिया था। पर उनके भाजपा में चले जाने से दल को करारा झटका लगा है। इधर भाजपा में भी दलीय टिकट की आशा लगाए नेताओं और उनके समर्थकों में असंतोष और नाराजगी उत्पन्न हुई है। परंतु वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि सभी असंतुष्टों को मना लिया गया है और सब एकजुट होकर भाजपा उम्मीदवार को जिताने में पूरा दमखम लगाएंगे।

मुख्यमंत्री मोहनचरण माझी ने जय ढोलकिया को जितवाने की जिम्मेदारी स्वयं ली है। उन्होंने अंचलवासियों को क्षेत्र के विकास का आश्वासन देने के साथ ग्यारह सौ करोड़ रुपये की विकास योजनाओं की घोषणा भी कर दी है।

नामांकन के बाद अब कांग्रेस के आदिवासी नेता घासीराम माझी, बीजद की अनुसूचित जाति की स्नेहांगिनी छुरिया और भाजपा के सामान्य वर्ग के जय ढोलकिया के बीच रोचक मुकाबला देखने को मिलने वाला है।

चुनावी जानकार नामांकन के बाद से ही बीजद को दौड़ से बाहर बताने लगे हैं। यहां मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच होना तय माना जा रहा है। आत्मविश्वास से लबरेज़ कांग्रेस मतदान से पहले ही अपने को विजयी मान रही है। वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भक्तचरण दास गत चुनाव में घासीराम को मिले पचास हजार और कांग्रेस के पंद्रह हजार को निश्चित मानकर अभी से अपनी विजय का दावा करने लगे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि गत चुनाव में घासीराम माझी को अलग परिस्थितियों में आदिवासियों के एकमुश्त वोट मिले थे।

भाजपा विरासत और सहानुभूति के सहारे नैया पार करना चाहती है।  भाजपा जय ढोलकिया के पिता को मिले 61 हजार और भाजपा के 35 हजार को जोड़कर विशाल जीत का ख्वाब बुन रही है। इसके अलावा

अब राज्य में भाजपा की सरकार है और उसके मुखिया एक आदिवासी मोहनचरण माझी हैं । एक आदिवासी मुख्यमंत्री निश्चित तौर पर आदिवासी मतदाताओं को प्रभावित करने की बेहतर स्थिति में है।

बीजद को नुआपाड़ा जिले में कोई प्रार्थी नहीं मिला। उसे बरगढ़ जिले के अताबिरा की पूर्व विधायिका श्रीमती स्नेहांगिनी छुरिया को लाना पड़ा है। उनपर "बाहरी" होने का ठप्पा लगना सबसे बड़ी कमजोरी माना जा रहा है। 

बीजद प्रार्थी की घोषणा के बाद से ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास ने  बीजद पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि बीजद ने जानबूझकर कमजोर प्रत्याशी को मैदान में उतारा है।

पर बीजद उन्हें महिला चेहरे की तरह पेश करके वोट लेना चाहती है। यहां महिला मतदाता पुरूष मतदाताओं से अधिक हैं। पर उन्हें कमजोर प्रार्थी माना जा रहा है। बीजद सत्ता में नही है ऐसे में उसके लिये इस बार चुनाव के संसाधन जुटाना भी एक चुनौती होने वाली है। बीजद सुप्रीमो नवीन पटनायक ने घोषणा की है कि वे प्रचार के लिए मैदान में उतरेंगे। चुनाव परिणाम उनकी लोकप्रियता की भी परीक्षा होगी। बीजद के शासनकाल में महिलाओं के सशक्तिकरण पर बहुत जोर था। महिला स्वयं सहायता ग्रुप द्वारा महिलाओं में नवीन बाबू  बहुत लोकप्रिय बन गये थे।

एक बात तो तय है कि इस  उपचुनाव के परिणाम राज्य राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाले हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चुनाव परिणाम सिद्ध करेंगे कि गत वर्ष की जीत कोई संयोग नहीं था।

बीजद को सिद्ध करना है कि हार एक दुर्योग था। कांग्रेस को सिद्ध करना है कि अब वे राज्य के मुख्य विपक्षी दल है। इस विजय से वे राज्य में दल की वापसी का मंसूबा भी पाले बैठे हैं।

अब नुआपाड़ा के मतदाता (पुरूष 1,24,108, महिला 1,29,495 अन्य 21 कुल 2,53,624) 11 नवंबर के मतदान में तय करेंगे कि वे अपने प्रतिनिधि को सत्ता पक्ष में बैठा देखना चाहते हैं या विपक्षी बेंच में।  इसके जवाब के लिए 14 नवंबर की मतगणना तक इंतजार करना पड़ेगा।



सतीश शर्मा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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