भाजपा से लड़ने के बजाय कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है विपक्ष कांग्रेस समझे न समझे पर विपक्षी पार्टियां जानती हैं कि उन्हें जिन्दा रहना है तो कांग्रेस को कमजोर करना पड़ेगा। मजबूत से मजबूत कोई भी पार्टी अपने क्षेत्र से बाहर आज तक कोई जनाधार नहीं बना पायी और एक प्रदेश में सिमट होकर रह गयी। कांग्रेस पार्टी के हाईकमान की चैकड़ी के नेता अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये विपक्षी पार्टियों से समझौते करवाते रहते हैं। जिससे वे स्वयं को कहीं न कहीं स्थापित कर लेते हैं पर पार्टी कमजोर होती जाती है। अति आवश्यक परिस्थितियों में या राजनैतिक आवश्यकतानुसार समझौता कर चुनाव लड़ना एक अलग बात है पर हर प्रदेश में हारनें के डर से वहां की क्षेत्रीय पार्टी से उसके सहयोगी बन कर खुद अपना अस्तित्व कम करना कांग्रेस को भारी पड़ता जा रहा है।
दूसरी बात कांग्रेस के हाईकमान ने अपने ही नेता जिनका क्षेत्र में प्रभाव था और प्रदेश में अपना खुद का बजूद रहा हो उसे महत्व न देकर अपने इर्द गिर्द घूमनें वालों की सलाह पर चलता है। एैसे नेता अपने को प्रांसलिक बनाये रखने के लिये या खुद के स्वार्थ के लिये किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनाव के लिये दिल्ली प्रदेश के पूर्व पार्टी अध्यक्ष और कई बार सांसद रह चुके जे.पी. अग्रवाल को प्रभारी बना कर भेेजा। उन्हें विधान सभा के प्रत्याशी तलाशने का काम दिया गया। उनका ईमानदारी का इतिहास है स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र होने के कारण कांग्रेस के बफादार भी है, कभी पार्टी से अलग नहीं हुये। अग्रवाल मध्यप्रदेश के सभी बड़े नेताओं से मिले फिर जमींनी स्तर पर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे। प्रदेश के नेताओं को ये अच्छा नहीं लगा, वे चाहते थे जे.पी. उनके इशारों पर लिस्ट बनायें। तुरन्त दिग्विजय सिंह दिग्गी राजा, कमलनाथ आदि ने उन्हें बदलवाने की चाल चली। राहुल गांधी से कह कर ऐन वक्त पर जे.पी. के स्थान पर रणजीत सिंह सुरजेवाला के हाथ में मध्यप्रदेश की कमान दी गयी।
जो हरियाणा में लोकसभा और विधान सभा के चुनाव में जमानत जब्त करवा चुके हैं। राहुल गांधी के आस पास घूमते रहते हैं खुद हारे, हरयाणा भी निवट गया। जब प्रत्याशियों का चयन हुआ तो जे.पी. को साथ तक नहीं बैठाया गया। मध्य प्रदेश में कांग्रेस को थोड़ी बहुत उम्मीद थी वो भी चली गयी। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ आदि ने हिस्सा बांट कर लिया।
यही काम राहुल गांधी को कब्जे में लेकर दिग्गी राजा ने 2009 में भी किया था जब मनमोहन सिंह की सरकार दुबारा बनी तो अर्जुन सिंह जैसे कद्दावर, प्रधानमंत्री के दावेदार राष्ट्रीय नेता को केबिनेट में मंत्री तक नहीं बनाया गया। सोनिया गांधी के सबसे भरोसे वाले नेता को राहुल की जिद से शपथ से पहले लिस्ट से हटाया गया। इसमें दिग्गी राजा ने मनमोहन सिंह का सहारा भी लिया नतीजा मध्यप्रदेश मंे कांग्रेस को बराबर हार
रही है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आज पूरी तरह पटरी पर हो गयी है एक-एक दो-दो विधान सभा और लोक सभा सीटों के लिये तरस गयी है। इसका इतिहास भी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ समझौतों से शुरू हुआ। पहला समझौता मायावती के साथ हुआ जिसमें नरसिम्हाराव के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुये उनके खास सलाहकार जितेन्द्र प्रसाद ने बसपा के साथ करवाया। कांग्रेस ने लगभग 30 प्रतिशत सीटों पर चुनाव लड़ा और बाकी लगभग 270 बसपा को दे दी। समझौते के बाद भी पार्टी को कोई लाभ नहीं हुआ पार्टी लगभग जहां की तहां रही मुश्किल से सात आठ सीटें बड़ी। उसके बाद क्षेत्रीय पार्टियों से समझौता शुरू हुआ। पहली बार आप पार्टी की सरकार कांग्रेस की मदद से दिल्ली में बनी यदि कांग्रेस आप की सरकार न बनवाती तो आप पार्टी भी जड़ से खत्म हो जाती और दिल्ली में भाजपा का विकल्प कांग्रेस बनी रहती। आप पार्टी की सरकार को समर्थन कर अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाना कांग्रेस को सांप को दूध पिलाना जैसा साबित हुआ। केजरीवाल जानते थे कि उन्हें कांग्रेस को ही डसना है ताकि भाजपा का विकल्प आप पार्टी बने। उन्होंने भाजपा से ज्यादा कांगेस को खत्म करने का काम किया। जब दुबारा सत्ता में आयी कांग्रेस को दिल्ली में बिल्कुल सड़क पर कर दिया और भाजपा के खिलाफ अपने को स्थापित कर लिया। कांग्रेस मुंह ताकती रह गयी और अब दिल्ली में भी एक-एक सीट को तरस गयी।
राजस्थान में विधान सभा के चुनाव है जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच तलवार खिच गयी तो पायलट को ही प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री का पद गंवाना पड़ा। जब पायलट के भाजपा में जानें की खबर फैली तो उन्हें मनानें की कोशिश की गयी। उन्हे मना लिया पर उनकी हैसियत कम कर दी। जनाधार होते हुये भी उन्हें दुबारा उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया। इस तरह पार्टी ने अपने ही नेता की हैसियत कम करके उनका जनाधार तोडा।़ कांग्रेस ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। कहा जाता है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दुधारू गाय हैं और दूध देने वाली गाय की लातें भी खा ली जाती हैं भले चोट लग जाये। भाजपा में क्या चल रहा यह एक अलग बात है क्योंकि अस्तित्व की लड़ाई कांग्रेस लड़ रही है। राजस्थान में पायलट का चेहरा कमजोर करके, जाटों के वोट पर असर तो हुआ ही साथ-साथ दूसरी लाईन के नेता का गला घोंट कर आगे चल कर होने वाले खामियाजा
भी हुआ।
बिहार में पार्टी ने लालू यादव से हाथ मिलाया कांग्रेस भूल गयी कि लालू की पार्टी की छवि अपराधिक है जुल्म और लूट खसोट के लिये बदनाम हो गयी है यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्ट प्रमाणित कर लम्बी अवधि की सजा दी है पर कुछ सीटों के लालच में उससे भी गठबंधन करने को तैयार हो गयी। सीटें नहीं मिली, कोई विशेष लाभ भी नहीं मिला। अपनी छवि भी कांग्रेस ने खराब की बिहार और उत्तर प्रदेश में हाल ये हुआ कि गये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। बिहार में लालू से समझौता कर कांग्रेस ने अपने को पूरे देश में बदनाम कर लिया। भ्रष्टों के बादशाह बने लालू यादव के छोटे भाई बन कर पूरे देश में हंसी का पात्र बने। वही भाजपा कदम फूंक फूंक कर चलती है। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार में अकेले दम पर खड़ी रहती और दूसरी लाइन के नेताओं को अपनी कोटरी (राहुल गैंग) की सलाह पर खत्म नहीं करती तो आज कांग्रेस उन्हीं नेताओं से फसल काट रही होती। पार्टी सचिन पायलट का कद कम न करती तो राजस्थान में भाजपा से चुनाव में बराबरी का सौदा होता। उत्तर प्रदेश में पिछला समझौता सपा से भी किया था पर उसमें भी कुछ नहीं मिला। उल्टा सपा जिन्दा हो गयी और भाजपा के सामनें विकल्प बन कर खड़ी हो गयी।
राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के नाम पर देश घूमा, मेहनत की, समय लगाया पर नतीजा क्या जब उससे कुछ सीखा नहीं। यदि राहुल चाहते है कि पार्टी तुरन्त खड़ी हो जाये सारी विपक्षी पार्टियों को जोड़ कर वे प्रधानमंत्री बन जाये तो भारी मुगालते में है। एक तो विपक्ष को हर क्षेत्र में बड़ा भाई बना कर उनका साथ देकर अपनी पार्टी खत्म करते चले जा रहे हैं और जब कभी विपक्ष सरकार बनाने के आस-पास पहुंचा भी तो राहुल को प्रधानमंत्री बनाने पर बाधाओं का अम्बार भरा होेगा। 60, 70 सीटों पर प्रधानमंत्री का सपना भी टूटेगा और कभी बने भी तो कठपुतली की तरह नचेंगे। कंाग्रेस विहीन भारत मोदी तो कह रहे हैं पर ये काम विपक्षी पार्टियां कर रही हैं।
बंगाल, केरल जहां-जहां भी कम्यूनिष्ट पार्टी थोड़ी बहुत जिन्दा है वो भी राहुल भैया की कृपा पर बनी रही यदि कांग्रेस शुरू से ही सोच लेती कि कम्यूनिष्ट को खत्म करना है तो आज अपने पैरों पर खड़ी होती। यही कारण पूरे नार्थ ईस्ट से उखड़ने का रहा जहां कभी भाजपा सपनें में भी वही सोचती थी आज पूरे नार्थ ईस्ट पर पूरा कब्जा हो गया। जैसे ही नार्थ ईस्ट में खड़ी हुयी, काम करने का मौका मिला तो वहां विकास करके अपने पैर गहरे जमा लिये।
महाराष्ट्र में कांग्रेस मध्य प्रदेश की तरह मजबूती से खड़ी थी पर वहां अपनी पार्टी को पूरी तरह शरद पवार के भरोसे छोड़ दिया। उनकी पार्टी जिन्दा हो गयी, कांग्रेस डूबती चली गयी। दक्षिण भारत में मजबूरी समझी जा सकती है वहां की राजनीति भाषा, जाति, पिछड़े और विपक्ष के भारी भरकम नेताओं के कारण मजबूत है। वहां समझौते के बिना किसी की दाल फिलहान नहीं गल पा रही है। पूरे देश से कांग्रेस के पांव उखड़ते जा रहे हैं। एक तो नेतृत्व कमजोर ऊपर से सलाहकार वो हैं जो चाटूकारिता और चालाकी की दम पर 10 जनपथ के ठेकेदार बने हुये हैं।
पिछली बार हिरयाणा की कमान हुड्डा को आखिरी समय से पहले दी होती तो चुनाव में हरयाणा में भी कड़ा मुकाबला होता। फिलहाल मध्य प्रदेश में यकायक जे.पी. अग्रवाल को चयन समिति से हटा कर सूरजेवाला को रखने और राजस्थान में पिछले पांच साल में सचिन पायलट को औकात दिखा कर दोनो प्रदेशों में कांग्रेस ने अपनी दुर्गति का रास्ता चुना है। कांग्रेस को जिन्दा रहना है तो तुरन्त कुर्सी पाने का मोह छोड़ना होगा, दीर्घकालीन नीतियां बनानी होगी, क्षेत्रीय पार्टियों से समझौता अति सीमित रखना होगा। अपने सलाहकार तुरन्त हटाने होंगे। अभी भी कांग्रेस के पास मोहसिना किदवई, वीरप्पा मोमुली, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, जे.पी. अग्रवाल जैसे अनुभवी लोगों से लाभ उठाया जा सकता है।
जब अहमद पटेल दुनिया से चले गये तब अल्पसंख्यकों के राष्ट्रीय नेता अकेले गुलामनबी आजाद बचे थे क्योंकि तारिक अनवर पार्टी छोड़कर जा चुके थे। तारिक अनवर की वापिसी हुयी तो अंदाजा लगाया जा रहा था कि वे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालेंगे क्योंकि तारिक NSUI युवक कांग्रेस और कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय मुखिया के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके थे। तारिक को बड़ी जिम्मेदारी जैसे उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरयाणा, राजस्थान आदि का प्रभार देेते तो पार्टी को लाभ मिलता पर कोटरी नहीं चाहती कि कोटरी का महत्व कम हो चाहे पार्टी का सत्यानाश होता जाये।
2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में लालू यादव से समझौते से पूरे देश में अपनी छवि खराब करना भारी पड़ेगा। विपक्ष अब कांग्रेस के लिये कैंसर हो गया है जो लाइलाज है। विपक्षी पार्टियां भाजपा से लड़ने से ज्यादा कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करता रहेगा और कांग्रेस के पेड़ को एक दिन सुखा डालेगा।

डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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