बिहार विधानसभा चुनावों के ताज़ा नतीजों ने एक बार फिर कांग्रेस के भीतर गहराई तक घुसे संकट को उजागर कर दिया है। एनडीए की प्रचंड जीत और कांग्रेस की लगभग ऐतिहासिक पराजय ने साफ कर दिया कि पार्टी अपनी जड़ें खो चुकी है। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण था कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेरा का वह बयान जिसमें उन्होंने परिणामों पर मुख्य चुनाव आयुक्त `ज्ञानेश कुमार की “छाप” होने का आरोप लगाया। यह प्रतिक्रिया न केवल पराजय के प्रति पार्टी के रवैये को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कांग्रेस नेतृत्व आज भी वास्तविक समस्याओं की पहचान करने से बच रहा है। जब किसी दल की पहली प्रतिक्रिया आत्ममंथन के बजाय “बहाने” बन जाती है, तो समझ जाइए कि पतन की प्रक्रिया तेज हो चुकी है।
कांग्रेस की बिहार में यह पराजय अचानक नहीं हुई। पिछले एक दशक से पार्टी लगातार संगठनात्मक ढांचे, जमीनी कार्यकर्ताओं की प्रेरणा, नेतृत्व की उपलब्धता और स्पष्ट राजनीतिक लाइन—इन सभी मोर्चों पर विफल रही है। बिहार उन राज्यों में है जहाँ चुनाव सिर्फ पोस्टर, भाषण और सोशल मीडिया रणनीति से नहीं जीते जाते। वहाँ मजबूत कैडर, विश्वसनीय नेतृत्व और निरंतर जनसंपर्क की ज़रूरत होती है। दुखद यह है कि कांग्रेस इन तीनों में फिसड्डी साबित हुई।
पहली बड़ी विफलता नेतृत्व की है। बिहार में कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को यह समझ ही नहीं आता कि रणनीति किसके हाथ में है—दिल्ली में बैठे "हाई कमांड" के या प्रादेशिक चेहरों के? यही भ्रम लोकतांत्रिक राजनीति की असली दुश्मन है। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान राहुल गांधी की मौजूदगी नाममात्र की रही। भाषणों का कार्यक्रम सीमित, जमीनी दौरे नगण्य, और चुनावी नैरेटिव सेट करने का कोई ठोस प्रयास नहीं—यह सब दर्शाता है कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व के लिए बिहार कोई प्राथमिकता थी ही नहीं। अगर नेता खुद अपने घर की लड़ाई में उपस्थित न हो, तो कार्यकर्ताओं में लड़ने की प्रेरणा कहाँ से आएगी?

दूसरी पराजय विचारधारा और संदेश के मोर्चे पर हुई। बिहार के मतदाताओं ने विकास, स्थिरता, कानून-व्यवस्था और नेतृत्व की मजबूती के आधार पर वोट किया। बीजेपी और एनडीए ने इन मुद्दों को लगातार मजबूती से उठाया, अपने कामकाज के आँकड़े गिनाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा जनता के सामने रखा। इसके विपरीत कांग्रेस एक बार फिर केवल नकारात्मक राजनीति, डर फैलाने की बयानबाज़ी और मोदी-विरोध की एक थकी हुई रणनीति पर निर्भर रही। न कोई सकारात्मक दृष्टि, न कोई वैकल्पिक एजेंडा, न कोई गंभीर आर्थिक या सामाजिक रोडमैप—इसलिए जनता ने कांग्रेस को अप्रासंगिक मानकर दरकिनार कर दिया।
तीसरी विफलता संगठनात्मक ढांचे में है। बिहार में कांग्रेस का संगठन वर्षों से केवल नाम मात्र का रह गया है। बूथ स्तर तक पार्टी की पकड़ ढीली है, आपसी गुटबाज़ी चरम पर है और चुनाव के समय टिकट वितरण में भी तर्क नहीं, पक्षपात का बोलबाला रहा। कांग्रेस यह समझने को तैयार ही नहीं कि बूथ-स्तर का कार्यकर्ता ही किसी भी चुनाव का आधार होता है। बिना मजबूत संगठन के कोई भी पार्टी चुनावी लड़ाई को गंभीरता से नहीं लड़ सकती।
महात्मा गांधी ने कहा था कि आज़ादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए ताकि देश में नई, स्वच्छ और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप राजनीति उभर सके। राहुल गांधी की राजनीति, अनजाने ही सही, लेकिन कांग्रेस को उसी दिशा में ले जा रही है। उनके निर्णय, उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएँ, और चुनावी समय पर उनकी उदासीनता—सब मिलकर कांग्रेस को कमजोर कर रही हैं। पार्टी का लगातार सिकुड़ना और चुनावी मानचित्र से गायब होना इस बात का संकेत है कि राहुल गांधी शायद अनजाने में महात्मा गांधी की “कांग्रेस विसर्जन” वाली इच्छा को पूरा कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी धीरे–धीरे राजनीतिक आत्महत्या की राह पर चल पड़ी है—जहाँ न लक्ष्य साफ है, न रणनीति, और न ही भविष्य का कोई स्पष्ट रोडमैप।
बिहार की पराजय कांग्रेस के उस लंबे पतन का नवीनतम अध्याय है जो वर्षों से जारी है। यदि पार्टी अभी भी अपने नेतृत्व और रणनीति को लेकर बदलाव नहीं करती, यदि वह अपनी असफलताओं को बाहर के कारकों पर मढ़ने की बजाय आत्ममंथन नहीं करती, और यदि वह मोदी-विरोध को ही अपनी एकमात्र राजनीतिक पहचान बनाए रखती है—तो कांग्रेस जल्द ही इतिहास की एक फुटनोट बन जाएगी। बिहार ने यह संदेश बहुत स्पष्ट दे दिया है: जनता उन पार्टियों को मौका देती है जो जमीनी स्तर पर काम करती हैं, जनभावनाओं को समझती हैं और नेतृत्व में दृढ़ता दिखाती हैं। कांग्रेस इन तीनों में लगातार असफल रही है।
इसलिए, बिहार के नतीजे सिर्फ एक चुनावी हार नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस के लिए एक सावधानी का सबक हैं। परंतु दुर्भाग्य यह है कि पार्टी इसे भी शायद “चेतावनी” नहीं, बल्कि “शिकायत” का विषय बनाएगी—और यही कांग्रेस के भविष्य का सबसे बड़ा संकट है।
उदय इंडिया ब्यूरो
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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