भारत आज एक कठिन दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के द्वारा उठाए गए कठोर आर्थिक कदमों ने हमारी बुनियादी आर्थिक हितों को गहरी चोट पहुँचाई है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत मित्रता और समीकरणों को किनारे रखकर देश के हित को सर्वोपरि माना, यह स्पष्ट संदेश है कि भारत किसी भी कीमत पर अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। यह त्याग और दूरदृष्टि सराहना योग्य है, न कि उपहास का विषय।
लेकिन दुखद यह है कि कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी, जिसने दशकों तक देश की सत्ता संभाली, आज अवसरवादी राजनीति का प्रतीक बन चुकी है। वही कांग्रेस, जिसने अपने कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ “पड़ोसीपन” के नाम पर समझौते किए और चीन के साथ हमेशा शांति की दुहाई दी, अब अचानक बदले हुए स्वर में आक्रामकता की वकालत कर रही है। यह बदलाव सिद्धांतों का नहीं, बल्कि सत्ता के लालच का परिणाम है। जब सत्ता में थीं, तब उनका रवैया नर्म था; जब विपक्ष में हैं, तो कठोरता दिखाना उनके लिए राजनीतिक हथियार बन गया है। यह देशहित की राजनीति नहीं, बल्कि पूरी तरह से अवसरवाद है।
प्रधानमंत्री मोदी ने “राष्ट्र प्रथम” की नीति को केंद्र में रखकर दुनिया से रिश्ते बनाए और निभाए हैं। आज जब अमेरिका बार-बार भारत पर दबाव डाल रहा है—चाहे वह शुल्क नीति हो, ऊर्जा समझौते हों या रक्षा सहयोग—भारत ने धैर्य और गरिमा के साथ जवाब दिया है। मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत न तो किसी गुट का हिस्सा बनेगा और न ही किसी महाशक्ति की कठपुतली। यही स्वतंत्र विदेश नीति का असली परिचय है।

विपक्ष का यह कर्तव्य होना चाहिए कि ऐसे कठिन समय में वह सरकार का साथ दे और दुनिया के सामने यह संदेश दे कि भारत की आंतरिक राजनीति भले अलग-अलग हो, लेकिन राष्ट्रीय हित पर सभी दल एकजुट हैं। लेकिन कांग्रेस इसके ठीक उलट कर रही है। वह अपनी संकीर्ण राजनीतिक महत्वाकांक्षा को राष्ट्रहित से ऊपर रखकर प्रधानमंत्री और सरकार पर निशाना साध रही है। इससे न केवल सरकार की स्थिति कमजोर होती है बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की एकजुटता भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
इतिहास गवाह है कि जब भी देश किसी संकट में पड़ा है, भारतीय जनता ने अपनी राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर एकता दिखाई है। आज भी वही समय है। चाहे वह पाकिस्तान की चुनौती हो, चीन की सीमा पर दबाव हो, या अमेरिका की आर्थिक नीतियाँ हों—हमें आंतरिक कलह से बचकर सामूहिक संकल्प दिखाना होगा। कांग्रेस की यह “बदलती आवाज़” न तो जनता को भ्रमित कर पाएगी और न ही देश की विदेश नीति की दिशा बदल पाएगी।
भारत के लोग यह भलीभाँति समझते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय किसी व्यक्ति विशेष की मित्रता या दुश्मनी पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि चाहे कितना भी दबाव क्यों न हो, भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों पर समझौता नहीं करेगा। यही दृढ़ता और साहस हमें एक सशक्त राष्ट्र बनाता है।
आज समय की माँग है कि हम सभी—सत्ता पक्ष और विपक्ष—एक साथ खड़े हों और यह संदेश दें कि भारत अपने राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए किसी भी त्याग के लिए तैयार है। अवसरवादी राजनीति से ऊपर उठकर यदि विपक्ष भी सरकार का समर्थन करे तो यह न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति को मज़बूत करेगा, बल्कि जनता का विश्वास भी और गहरा होगा।
कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि राष्ट्रहित से ऊपर कोई दल या नेता नहीं होता। आज जब देश कठिन परीक्षा से गुजर रहा है, तब उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। दुर्भाग्य है कि वह इसे समझने के बजाय केवल राजनीतिक लाभ-हानि का हिसाब लगा रही है। लेकिन जनता सब देख रही है और जानती है कि असली राष्ट्रसेवा कौन कर रहा है।
राष्ट्र की एकता और सम्मान हमारे लिए सर्वोपरि हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने यह साबित किया है कि व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर भारत का स्वाभिमान है। अब विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह संकीर्ण राजनीति छोड़कर एक बार फिर यह दिखाए कि जब देश पर संकट आता है, तब भारत एकजुट होकर खड़ा होता है। यही सच्चे लोकतंत्र और राष्ट्रवाद की पहचान है।
उदय इंडिया ब्यूरो
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