खुद को विद्वान प्रकट करने वाले और सेक्युलरिज्म के नाम पर रोटी सेंकने वाले लोग कहते कि नाम में क्या रखा है। उसके बदलने से वस्तुस्थिति नहीं बदल सकती। वो एक घटिया सा उदाहरण भी शेक्सपियर के नाम पर देते है कि गुलाब का नाम बदलकर कुछ भी रख लो पर वो गुलाब ही रहेगा। यह उदाहरण तलवारों की नोक पर किसी देश की संस्कृति मिटा कर अपने स्वार्थ के लिये अपने हिसाब से शहरों, नगरों, स्थलों और स्मारकों के नाम रखने वालों पर कतई लागू नहीं होता। क्योंकि उन्होंने मूल नाम ही बदल डाला था। मूल नाम की वापसी के लिये लोगों के नाम मिटाना और अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनः जीवित रखना आवश्यक है और हमारा कर्तव्य भी है कि न तो इसे राजनीति से प्रेरित कहा जा सकता न ही उसका धर्म या सेक्युलरिज्म से कुछ लेना देना है।
हाल ही में डॉ. दिनेश शर्मा राज्यसभा सांसद ने दिल्ली में अपने आवासी बंगले पर लगी नेम प्लेट पर तुगलक़ रोड के साथ स्वामी विवेकानंद मार्ग लिखा जिसको बेवजह तूल दिया जा रहा है जबकि ऐसा लिखना किसी भी रूप में गलत नहीं है। बल्कि यहाँ तक कि उस पर तुगलक रोड लिखा हुआ भी है। राष्ट्रहित, जनहित और स्वाभिमान के लिये अक्सर मांग उठायी जाती रही है और उठायी जाती रहेंगी । अपनी मांगों को रखने वालों ने विगत कुछ दिनों में जाम लगाये, बाजारों को जबरदस्ती बंद करवाया, यहाँ तक कि बसों में आग लगाए, रेलवे लाइन मिटाई और सरकारी संपत्तियों तक को नष्ट किया है। सामाजिक कार्यकर्ता तथा राज्यसभा सांसद प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रोफेसर दिनेश शर्मा ने अपनी मांग पर अत्यंत शालीनता और विनम्रता से सरकार का ध्यान खींचने का प्रयास किया है कि तुगलक रोड/तुगलक लेन का नाम बदल देना चाहिए। बाहर से आकर भारत पर राज करने वाले आक्रांता लुटेरे, हिंसक प्रवृत्ति के हमलावरों या शासकों के नाम के स्मृति चिन्ह नहीं बने रह सकते । तुगलक को सम्मान देना हमारे लिये गर्व की बात नहीं है। डॉ. शर्मा ने इसे बदलकर स्वामी विवेकानंद मार्ग सुझाया है। जिन्होंने भारत को एक नई राह दिखायी और वे हमारे पथ प्रदर्शक हैं। स्वामी जी ने विश्व भर में भारत की संस्कृति और विद्वता का डंका बजाया है स इस प्रस्ताव को एक और सांसद कृष्ण पाल सिंह गुर्जर ने भी अपने निवास की प्लेट पर यह लिखकर उनका साथ दिया है।
चूंकि नामों को बदलने की बात चली है तो हमें हाल में हुए घटना क्रम और इतिहास के पन्ने पलटने होंगे ताकि खुले मन से इस पर चर्चा हो सके। यदि स्थलों को नया नाम देने से या बदलने से कुछ नहीं होता है तो क्यों मुसलमान शासकों ने और खास तौर से मुगलिया वंश ने स्थलों के नाम अपने हिसाब से पूरे भारत भर में रख दिये। उन्हें याद करें तो लगेगा कि हम भारत में नहीं किसी मुस्लिम देश में आ गये हों, या फिर शायद पाकिस्तान में ही रहने लगे हों। हिन्दू संस्कृति और सनातन धर्म को मिटाकर उसे क्षतिग्रस्त करने और नष्ट करने का काम हुआ है उसे पुनः स्थापित करना कहीं से भी गलत नहीं कहा जा सकता।
भारत में नजीराबाद, मलीहाबाद, फैजाबाद, फतेहाबाद, औरंगाबाद, गाज़ियाबाद, हैदराबाद, जाफराबाद, जहानाबाद, महमूदाबाद, मुरादाबाद, होशंगाबाद ,स्लीमनाबाद, इलाहाबाद, आदि ऐसे कई नगर, गाँव और मुहल्ले ऐसे हजारों नामों से भरे पड़े है। जो कभी भारत में थे ही नहीं। सारे स्थानों के मूल नाम बदलकर अपने मजहब और आकाओं के हिसाब से रख दिये गये। मूल नामों को बदलकर हिन्दुओं की छाती पर मूंग दली। आजादी मिलने के बाद भी पांच-छह दशक तक कांग्रेस पार्टी चुप्पी साधे रखी। हालांकि कांग्रेस ने अंग्रेजों द्वारा स्थापित शहर स्मारक मार्गों के नाम जिन्हें अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों और महारानियों के नाम दिये गये थे उन्हें जरूर बदला था। दिल्ली में ही क्लाइव स्क्वायर, डलहौजी स्क्वायर, वेलेजली रोड, कॉर्न वालिस रोड, लिटन रोड, इरविन अस्पताल, विलिंगडन अस्पताल, विक्टोरिया अस्पताल इन सबके नामों को बदला गया । कुछ कांग्रेस पार्टी सरकार द्वारा और कुछ जनता पार्टी द्वारा बदले गये और सबने अपने पार्टी के नेताओं के नाम रख दिये। जब भाजपा सरकार ने ऐसा किया तो इन्हें तकलीफ हो रही है। धर्म के आधार पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने वाले नेताओं ने वोटों के लिये अपना कुचक्र चला। यहाँ तक कि राम जन्म भूमि अयोध्या के मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गये और हारने के बाद भी तरह तरह के हथकंडे मंदिर निर्माण रोकने के लिये अपनाये। कभी रिव्यू पिटीशन डलवाए कभी मुसलमानों को उकसाने का काम किया।
प्रयागराज, हिन्दुओं का और सनातन धर्म के अनुयायियों का सबसे महत्वपूर्ण पवित्र तीर्थ स्थल है। प्रयाग का अर्थ है संगम - जहाँ तीन पवित्र नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती है। उस स्थल को प्रयागराज कहा गया। पुरातन काल से यही नाम चला आ रहा है। मुग़ल बादशाह अकबर की शेखी बघारने वाले लोग इतिहास में झाँकें। प्रयागराज का नाम इलाहाबाद बदलकर हिन्दुओं की भावनाओं से खेलने का काम अकबर ने ही किया था। राम मंदिर के बारे में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। पूरा विश्व जान गया कि भगवान् राम की जन्म भूमि पर मुग़ल बादशाह बाबर ने ही मस्जिद बनवाने का काम किया।
अब जब प्रजातंत्र का राज है तो न्याय होगा। लूट-खसोट कर कब्ज़ा की गयी जमीन जायजाद जिसकी है उसे स्वत: रुप मिलना चाहिये थी । जब ये अधिकारों की लड़ाई लड़ते है तो कुछ स्वार्थी तत्व धार्मिक उन्माद फैलाकर उसे सेक्यूलरिज्म का नाम देकर हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने का काम करते हैं। हिंसक लुटेरे राजाओं ने स्वार्थ वश जिन जगहों के नाम रखे थे या खुद के नाम से स्थानों का नामकरण किया था बस उन्हीं स्थानों के नाम भाजपा सरकार मूल रूप से वापिस रख रही है। कांग्रेस को उन जननायक नेताओं, सामाजिक सेवकों के नाम जो भाजपा द्वारा रखे जा रहे हैं इसमें किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए और ना ही बाधा पैदा करनी चाहिए।
जहाँ तक तुगलक रोड के बोर्ड पर स्वामी विवेकानंद मार्ग का नाम जोड़ने का सवाल है तो एक बात याद दिलाना चाहता हूँ कि समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया हिंदी को राष्ट्र भाषा और देश के जनता की भाषा बनाना चाहते थे। उन्होंने अंग्रेजी भाषा में लिखे बोर्डों को पोतने का आह्वान किया था। उनके समर्थकों ने ऐसे हजारों-लाखों अंग्रेजी के बोर्ड पूरे देश में कोलतार से पोते, तोड़े और उखाड़ फेकें थे। लोग अपनी मांगों के समर्थन में कई बार रेलवे का चक्का जाम कर चुके हैं। साथ ही वाहन -पुतले भी जलाते रहे हैं। डॉ. दिनेश शर्मा ने तो अपनी मांग अपना आन्दोलन साधारण रूप से और विनम्र भाव से विनय पूर्वक बोर्ड को बिना पोते, बिना तोड़े एक नाम भारत के महापुरुष विवेकानंद जी का लिखा है। जो अपनी मांग रखकर सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करने का गांधीवादी तरीका है।
अब एक नज़र इतिहास पर डालें : तैमूरलंग ने दिल्ली में खून की होली खेली थी। हजारों लोगों के सर काट कर लटकाये, औरतों के साथ बलात्कार किया और लगातार महीनों तक ऐसा ही चला। दिल्ली का ये हाल किया कि सैकड़ों साल तक भारत बर्बादी से उबर नहीं पाये। ऐसे अपराधी शख्स के नाम पर भी दिल्ली में एक कालोनी का नाम तैमूर नगर रखा गया । जिससे हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम हुआ है। मुहम्मद गौरी ने भारत पर 1175 में आक्रमण किया और पंजाब जीतता हुआ दिल्ली तक आया था। ऐसे लुटेरों के नाम स्वतंत्र भारत में गर्व से नहीं लिये जा सकते हैं। किसी स्थल को उनके नाम पर नामकरण करना हमारे गौरव और देश के सम्मान को ठेस पहुंचाता है सनातन धर्म के मंदिर इतने पुराने हैं कि जब किसी मुसलमान राजा या मुगलिया वंश का भारत में कहीं नामों निशान तक नहीं था। उससे पहले से ही भगवान केदारनाथ का मंदिर था। और यह 10 हजार साल पुराना है मनु का समय 30 हजार वर्ष पहले था। फिर भगवान् श्री राम के पूर्वजों ने राज किया। कलयुग में हिन्दुओं के राजा बिन्दुसार के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ईसा से पूर्व 340 में राजा बने। मौर्य वंशज के बाद हर्षवर्धन के राज के बाद बिन कासिम तुगलक़ और तैमूरलंग हमलावर की तरह भारत में आये । पहला इस्लामी राज मुहम्मद गौरी ने 1175 इश्वी में भारत पर कब्ज़ा करने के बाद बनाया। उसके बाद लगभग 500 वर्ष मुगलों का शासन रहा। वे अपनी पूरी शक्ति से जुल्म करने के बाद भी सनातन धर्म को मिटा नहीं सके। मंदिर गिराये, मस्जिद बनायी फिर भी हिन्दू और उनका धर्म जीवित रहा । मुगलों ने अपने और वंशजों के नामों से पूरे देश में शहर सड़कों के नाम रखकर जाल विछा दिया। उसके बाद अंग्रेज आये उन्होंने भी अपने खुद के आकाओं के नामों से दिल्ली पाट दी और पूरे देश में यही काम किया स प्रजातंत्र में हिन्दुओं और सनातन धर्मियों को उनका अधिकार मिलना चाहिये स जुल्म करने वाले आतंकी राजाओं, हमलावरों और देश को लूटने वाले हत्यारों का नाम मिटा देना सर्वथा उचित है गुलामी के चिन्हों को गौरवान्वित करना कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।

डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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