पिछले बारह सालों में, नरेंद्र मोदी आज के भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं में से एक बनकर उभरे हैं। उनके समर्थक इस दौर को बदलाव का युग मानते हैं, जबकि उनके आलोचक उनकी नीतियों और कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाते रहते हैं। इन बारह सालों की उपलब्धियों, चुनौतियों और विरासत पर चर्चा करने के लिए, 'उदय इंडिया' के समूह संपादक दीपक कुमार रथ ने बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी से बात की। डॉ. त्रिवेदी भारतीय इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी सोच की गहरी समझ के लिए जाने जाते हैं। चाहे रामायण, महाभारत, भगवद गीता हो, संवैधानिक मुद्दे हों या आज की राजनीतिक बहसें—उन्हें बीजेपी की सबसे मुखर आवाज़ों में से एक माना जाता है। प्रस्तुत हैं इस साक्षात्कार के सम्पादित अंश ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शासन के सर्वोच्च स्तर पर जनसेवा के बारह साल पूरे कर लिए हैं। देश भर में उनके समर्थक इसे सेलिब्रेट कर रहे हैं। इन बारह सालों पर नज़र डालें तो आप उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियाँ किसे मानेंगे, और क्या आपको लगता है कि कुछ क्षेत्रों में और बेहतर काम किया जा सकता था?
देखिए, जब हमारी सरकार आई और प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में हमें स्पष्ट बहुमत मिला, तो 16 मई 2014 के ठीक दो दिन बाद, 18 मई 2014 को लंदन के अख़बार The Sunday Guardian ने एक संपादकीय लिखा, जिसका शीर्षक था In-dia's Second Tryst With Destiny। उसने अपने संपादकीय में Second Tryst With Destiny क्यों कहा? क्योंकि यह पंडित जवाहरलाल नेहरू के उस प्रसिद्ध भाषण Tryst With Destiny की ओर संकेत था, जो उन्होंने 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को दिया था। दोनों की तुलना इसलिए की गई क्योंकि संपादकीय के अनुसार, भारत की आज़ादी के बाद लंबे समय तक यहाँ उन दलों का शासन रहा जिनकी सोच और मानसिकता पर ब्रिटिश उपनिवेशवादी प्रभाव या उसकी विरासत का असर था। पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता ऐसे विचार के हाथ में आई थी, जिस पर ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत का कोई प्रभाव नहीं था। अटल जी के समय भी सरकार थी, लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं था।
जानते हैं उस संपादकीय में क्या लिखा गया था? उसमें कहा गया था कि “16 May 2014 should be remembered in Indian history as the day on which the Brit-ish finally left India.” मुझे लगता है कि यह अपने आप में बताने के लिए पर्याप्त है कि उस समय केवल सरकार नहीं बदली थी, बल्कि एक विचार बदला था। भारत को 1947 में स्वराज्य तो मिला था, लेकिन वास्तविक अर्थों में स्वतंत्रता की प्रक्रिया अभी अधूरी थी, क्योंकि शासन-तंत्र में विदेशी प्रभाव बना हुआ था। 2014 में उस तंत्र में ‘स्व’ के प्रभाव की स्थापना की एक नई शुरुआत हुई।
यदि आप पिछले 12 वर्षों को देखें, तो प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में चार प्रकार के कार्य हुए। वैसे तो हम इन 12 वर्षों को विश्वास, विकास और जन-कल्याण के 12 वर्ष कहते हैं, लेकिन इन उपलब्धियों को चार प्रमुख श्रेणियों में समझा जा सकता है।
पहली श्रेणी में वे कार्य आते हैं जो पिछली सरकारें भी कर रही थीं और हमने भी किए, लेकिन कहीं अधिक गति, बड़े पैमाने और अधिक पारदर्शिता के साथ किए। अर्थात Speed, Scale and Transparency के सिद्धांत पर कार्य किया गया। जैसे सड़क निर्माण, एयरपोर्ट निर्माण, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण, रेलवे का विद्युतीकरण आदि।
दूसरी श्रेणी में वे कार्य आते हैं जिनके बारे में पिछली सरकारें सोचती तो रहीं, लेकिन उन्हें लागू करने का साहस नहीं जुटा सकीं। हमने उन कार्यों को पूरा किया। उदाहरण के लिए, जीएसटी और महिला आरक्षण विधेयक।
तीसरी श्रेणी में वे कार्य हैं जिनकी कल्पना भी पहले की सरकारों ने नहीं की थी। जैसे भारत का दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल शक्तियों में शामिल होना, या International Solar Al-liance का नेतृत्व भारत के हाथ में आना। सौर ऊर्जा का विस्तार होना एक बात है, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का गठन हो और उसका मुख्यालय भारत में हो, यह पहले किसी ने नहीं सोचा था। इसी प्रकार World Health Organi-zation (WHO) के अंतर्गत Centre for Tradition-al Medicine की स्थापना भारत में होना और उसका आधार आयुर्वेद जैसी भारतीय परंपरागत चिकित्सा पद्धतियाँ बनना भी ऐसी उपलब्धि है जिसकी पहले शायद ही किसी ने कल्पना की हो।
चौथी श्रेणी में वे कार्य आते हैं जिन्होंने विपक्ष को झकझोरकर रख दिया। विपक्ष पूरी तैयारी के साथ बैठा था कि ये कार्य कभी नहीं होंगे और होने भी नहीं दिए जाएंगे। लेकिन धारा 370 को हटाने और राम मंदिर निर्माण जैसे कार्यों को पूरा किया गया। आज पूरा विश्व इन घटनाओं का साक्षी है।
मुझे लगता है कि इन चारों प्रकार के कार्यों में प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और एनडीए को जो व्यापक सफलता मिली है, उसने भारत के मान, सम्मान, गौरव और वैश्विक स्थान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का कार्य किया है।

ये उपलब्धियाँ हैं। लेकिन हर सरकार की सीमाएं होती हैं। आपकी नज़र में, बारह साल बाद भी क्या काम अधूरा रह गया है?
देखिए, जिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री मोदी जी सत्ता में आए और उसके बाद जिन वैश्विक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उन्हें भी ध्यान में रखना चाहिए। यदि दूसरे कार्यकाल में कोविड-19 महामारी नहीं आई होती, रूस-यूक्रेन युद्ध जैसा बड़ा संघर्ष नहीं हुआ होता और वर्तमान में पश्चिम एशिया (गल्फ) में तनाव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई होती, तो मुझे लगता है कि भारत आज विकास की और भी अधिक ऊँचाइयों पर पहुँच चुका होता।
यदि कोई 12 वर्षों के कार्यकाल में कमियों की दृष्टि से मूल्यांकन करना चाहता है, तो मेरी राय में उन कमियों के लिए सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी जी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके पीछे एक बड़ा कारण देश के भीतर मौजूद कुछ राजनीतिक और वैचारिक प्रवृत्तियाँ भी हैं। भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जो दशकों से आतंकवाद के विरुद्ध लगातार संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि यहाँ विपक्ष के कुछ नेता ऐसे बयान देते रहे हैं जिन्हें आतंकवाद के प्रति नरम रुख या सहानुभूति के रूप में देखा जाता है। दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में ऐसे उदाहरण बहुत कम दिखाई देते हैं।
उदाहरण के लिए, अमेरिका में 9/11 जैसे भीषण आतंकी हमले के बाद किसी प्रमुख राजनीतिक नेता ने हमले के मुख्य आरोपियों, जैसे खालिद शेख मोहम्मद या मोहम्मद अट्टा, के पक्ष में सार्वजनिक रूप से कोई सहानुभूतिपूर्ण बयान नहीं दिया। इसके विपरीत, भारत में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को लेकर कुछ नेताओं द्वारा यह कहा गया कि वह “हालात का मारा” था। इसी प्रकार, 1993 मुंबई बम विस्फोट मामले में दोषी याकूब मेमन की फाँसी को लेकर भी कुछ नेताओं ने इसे “न्यायिक हत्या” (Judicial Killing) बताया था।
इसके अलावा, कुछ विश्वविद्यालय परिसरों में ऐसे नारे भी सुनाई दिए, जिनमें अफजल गुरु के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई। इन घटनाओं ने देश में एक व्यापक राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म दिया। ऐसे मामलों में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि जब किसी व्यक्ति को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया हो, उसकी दया याचिका पर संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो और उसे कानून के अनुसार दंड दिया गया हो, तब उसके पक्ष में दिए गए ऐसे बयानों का क्या संदेश जाता है।
मेरा मानना है कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष केवल सुरक्षा बलों या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए पूरे समाज और राजनीतिक वर्ग की एकजुटता भी आवश्यक होती है। यदि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर देश में अधिक व्यापक सहमति और स्पष्टता होती, तो संभव है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई और अधिक प्रभावी होती। आज जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का दायरा पहले की तुलना में काफी सीमित हो चुका है और मुख्यतः कुछ क्षेत्रों तक सिमट गया है। मेरा मानना है कि यदि इस विषय पर राजनीतिक मतभेदों के बजाय राष्ट्रीय सहमति अधिक मजबूत होती, तो आतंकवाद के पूर्ण उन्मूलन की दिशा में और भी तेज़ी से प्रगति संभव होती।
आपने विपक्ष का ज़िक्र किया। राहुल गांधी अक्सर कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के दौर में भारत की तरक्की धीमी हुई है और सरकार का ज़्यादातर प्रचार नतीजों के बजाय नारों पर आधारित है। इस पर आप क्या कहेंगे?
देखिए, कौन जुमलेबाजी करता है और कौन यथार्थ करता है, यह सभी को पता है। 2011 में राहुल गांधी जी ने बयान दिया था कि आतंकवाद पर पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है। उस समय देश की क्या स्थिति थी? देश का कौन-सा इलाका था जहाँ धमाके नहीं होते थे? चाहे वह दिल्ली हो, मुंबई हो, बेंगलुरु हो, नागपुर हो, जयपुर हो, सूरत हो, लखनऊ हो, फैजाबाद हो, वाराणसी हो या गुवाहाटी—सभी जगहों पर धमाके होते थे। चलती ट्रेन में धमाका हो जाता था, चलती बस में धमाका हो जाता था। सार्वजनिक जगहों पर यह लिखा रहता था कि यदि कोई संदिग्ध वस्तु दिखे तो उसे छुएँ नहीं, उसमें धमाका हो सकता है।
वह सब कुछ समाप्त हुआ। आज लोग बिना भय के कहीं भी जा सकते हैं। पहले की तुलना में महंगाई दर में कमी आई है, ग्रोथ रेट लगभग दोगुना हो गया है और यही राह रही तो भारत विकासशील से विकसित देश जल्द ही बन जाएगा। भारत इस समय मोदी कार्यकाल में काफी तेजी से तरक्की कर रहा है। आज दुनिया के सभी देश भारत में निवेश कर रहे हैं। चाहे वह मैन्युफैक्चरिंग हो, डिफेंस प्रोडक्शन हो या कोई अन्य क्षेत्र, हर जगह भारत ने अपने अस्तित्व का परचम लहराया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार शासन करने वाले प्रधानमंत्री बन गए हैं और उन्होंने नेहरू जी का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि कोई रिकॉर्ड नहीं टूटा है तथा नेहरू और मोदी की तुलना ही नहीं की जा सकती। यहाँ तक कहा जा रहा है कि यदि नेहरू सूरज थे, तो मोदी एक दीपक के बराबर भी नहीं हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?
देखिए, राहुल गांधी और विपक्ष जो बात कह रहे हैं, वह सही है कि नेहरू जी और मोदी जी में कोई तुलना नहीं हो सकती। नेहरू जी जो थे, वे मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर और हाथ में चाँदी का गिलास लेकर पैदा हुए थे। और नरेंद्र मोदी जी जो थे, वे हाथ में चाय की केतली लेकर रेलवे स्टेशन पर दौड़ते थे। एक पुराना गाना इस बात को परिभाषित करता है कि, "फूलों की सेज छोड़ के, दौड़े जवाहरलाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।" तो पीएम मोदी और नेहरू जी में कोई तुलना है ही नहीं। जवाहरलाल नेहरू जी जवाहरात के लाल थे, वहीं मोदी जी गुदड़ी के लाल थे। कैसे तुलना हो सकती है?
जब मोदी जी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बने, 13 सितंबर 2013 को शाम 6:30 बजे भारतीय जनता पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह जी ने इसकी घोषणा की। उस समय पार्लियामेंट्री बोर्ड के सभी सदस्य सर्वसम्मति से उनके पक्ष में थे। वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बने, पूरे कार्यकर्ताओं ने उत्साह मनाया और जनता ने उन्हें पूर्ण समर्थन दिया। दूसरी तरफ, जवाहरलाल नेहरू जी के साथ कुछ अलग हुआ था। जब कैबिनेट मिशन प्लान के तहत अप्रैल 1946 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई गई, तो इस बैठक में नेहरू जी को कोई वोट ही नहीं मिला, यानी उन्हें शून्य वोट प्राप्त हुए। और अगर वे शून्य वोट पाकर प्रधानमंत्री बन गए, तो मोदी जी बेचारे उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं? जिस व्यक्ति को एक भी वोट न मिले और वह प्रधानमंत्री बन जाए, ऐसा रिकॉर्ड तो दुनिया में शायद कोई बना ही नहीं सकता।
नेहरू जी ने यूनियन जैक के नीचे शपथ ली, वह भी लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा शपथ दिलाए जाने के बाद, और मोदी जी तो प्रणब मुखर्जी जी द्वारा शपथ लेकर प्रधानमंत्री बने। तो कैसे बराबरी हो सकती है? दोनों में बराबरी की कोई तुलना ही नहीं है।
नेहरू जी आए तो भारत से आधा पंजाब गया, कश्मीर गया, बंगाल गया और चीन के हाथों मानसरोवर का क्षेत्र गया। और जब मोदी जी आए, तो सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर हुआ। नेहरू जी के समय जब चीन से युद्ध हुआ, तो उन्हें अमेरिका के सामने घुटने टेकने पड़े थे, जिसका सबूत उनके भतीजे द्वारा दिया गया था। वहीं, पीएम मोदी के समय जब बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई, तो पाकिस्तान के आर्मी चीफ काँप रहे थे और अभिनंदन को वापस करने के लिए गुहार लगा रहे थे।
इसलिए बराबरी तो हो ही नहीं सकती। वाकई, मोदी जी नेहरू जी के सामने अतुलनीय हैं।

प्रधानमंत्री मोदी 16 जून, 2026 को फ्रांस के एवियन में
G7 शिखर सम्मेलन स्थल पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ बातचीत करते हुए।
कांग्रेस नेता अक्सर यह तर्क देते हैं कि आधुनिक भारत की नींव—जैसे IIT, AIIMS, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और बड़े बुनियादी ढाँचे के प्रोजेक्ट—कांग्रेस सरकारों के दौरान ही रखी गई थीं। इस दावे पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
राजीव गांधी जी के समय में एक अच्छा प्रयास हुआ था, जिसे भारत के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने शुरू किया था। सी-डैक (C-DAC) की स्थापना 1987 में हुई। तब तक ताइवान ने अपना चिप मिशन भी शुरू नहीं किया था। अगर हम उस दिशा में आगे बढ़े होते, तो आज स्थिति कुछ और होती। लेकिन कांग्रेस सरकारों की निष्क्रियता और निकम्मेपन की वजह से वह पूरा प्रोजेक्ट ही ठप पड़ गया। कांग्रेस दूसरों पर ठीकरा फोड़ना जानती है और अपने किए गए कामों पर परदा डालने का काम करती है।
क्योंकि अगर कांग्रेस के कामों की बात करें, तो नेहरू जी के बचपन में ही भारत में कई ऐसे विकास कार्यों की नींव रखी जा चुकी थी, जिनमें उस समय नेहरू जी की कोई भूमिका नहीं थी। नेहरू जी ने बस उन्हें अपना बताया और जनता को भ्रमित किया। जैसे हाइडल पावर प्लांट की स्थापना (1897), भारत में पहला स्ट्रीट लाइट प्रोजेक्ट (1902), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु (1916), भारत का पहला डैम (1922-24), सी. वी. रमन को 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिलना, एयर इंडिया का 1932 में स्थापित होना, सत्येंद्रनाथ बोस का 1924 में वह कार्य जिसके आधार पर बाद में हिग्स बोसॉन का नामकरण हुआ। इसके अलावा भी कई ऐसी उपलब्धियाँ थीं, जो आज़ादी से पहले और नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले भारत में हो चुकी थीं।
मगर कांग्रेस ऐसे डफली पीटती है कि जैसे सारा ज्ञान और विज्ञान मानो उन्होंने ही दिए हों। मुझे लगता है कि यदि यथार्थ के धरातल पर देखें, तो क्या हकीकत है और क्या फ़साना, यह बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है। नेहरू जी और गांधी परिवार ने देश को सिर्फ टोपी पहनाने की कोशिश की है। उन्होंने देश के भरोसे के साथ खिलवाड़ किया है।
सुधांशु जी, गुड गवर्नेंस के लिए मोदी जी का नाम लिया जाता है.. गवर्नेंस का मतलब डिलीवरी है, जबकि पॉलिटिक्स का मतलब परसेप्शन है, और दोनों हमेशा एक साथ चलते हैं। फिर भी, ऐसा लगता है कि मोदी जी पॉलिटिक्स में परसेप्शन की लड़ाई लगातार हार रहे हैं...आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
क्योंकि असल में गवर्नेंस का मतलब काम करके दिखाना है। नागरिक सरकारों को नारों से नहीं, बल्कि नतीजों से परखते हैं। लोग सड़कें, रेलवे, एयरपोर्ट, डिजिटल सर्विस और अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सुधार देखना चाहते हैं।
मोदी की लीडरशिप में, काम को लागू करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा अब सीधे नागरिकों तक पहुँच रहा है। टेक्नोलॉजी की वजह से सरकारी प्रोग्राम में होने वाली गड़बड़ियाँ कम हुई हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तेज़ी से पूरे हो रहे हैं। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए सरकारी सेवाएँ ज़्यादा आसानी से मिल रही हैं।
अच्छा गवर्नेंस कोई अमूर्त या काल्पनिक चीज़ नहीं है। यह दिखना चाहिए और इसे मापा जा सकता है। जब नागरिक असल सुधार देखते हैं, तो उन्हें लीडरशिप पर भरोसा होता है। यही एक वजह है कि मोदी का गवर्नेंस मॉडल वोटरों के एक बड़े हिस्से को पसंद आता है।
और अगर हम लोगों की सोच या राय की बात करें, तो अगर जनता की राय सचमुच नकारात्मक होती, तो नरेंद्र मोदी तीन बार प्रधानमंत्री नहीं चुने जाते। चुनावी सफलता ही यह बताती है कि जनता का एक बड़ा हिस्सा उनके नेतृत्व को पसंद करता है।
अपनी बात खत्म करने से पहले, मैं हाल ही में हुए एक विवाद के बारे में पूछना चाहता हूँ। कांग्रेस नेताओं, खासकर प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया है कि RSS का रजिस्ट्रेशन उसी तरह क्यों नहीं है, जैसे कई दूसरे संगठनों का है। इस पर आपका क्या कहना है?
मैं प्रियांक खरगे जी को बता दूँ कि अगर आरएसएस का पंजीकरण नहीं होता, तो नेहरू जी की सरकार, इंदिरा जी की सरकार और नरसिम्हा राव जी की सरकार आरएसएस पर प्रतिबंध कैसे लगा पाती? आखिरी बार जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब भी अदालत के फैसले ने कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया था, क्योंकि वह संघ के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाई थी। इसके बाद भी कई मौकों पर संघ के खिलाफ लगाए गए आरोप कांग्रेस पर ही उल्टे पड़े। इसलिए यह सिर्फ एक वैचारिक पूर्वाग्रह है, जो उन्हें बार-बार आरएसएस के खिलाफ बोलने के लिए प्रेरित करता है। संघ पर लगातार आरोप लगाना और झूठे नैरेटिव गढ़ना कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक शैली रही है।
मैं प्रियांक खरगे जी से यह भी कहना चाहता हूँ कि आरएसएस पर सवाल उठाने से पहले उसके कार्यों को देखिए। वनवासी कल्याण, दलितों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के लिए सेवा कार्य, विद्या भारती के विद्यालय, किसानों और मजदूरों के संगठन, विद्यार्थियों के बीच कार्य करने वाला एबीवीपी, तथा धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्य करने वाला विश्व हिंदू परिषद—ये सभी संघ की प्रेरणा से जुड़े संगठन हैं। विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी के दोनों प्रधानमंत्री भी संघ के प्रचारक रहे हैं।
देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में संघ के अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है। संघ और उसके स्वयंसेवकों ने देश के विकास और समाज सेवा के लिए हर स्तर पर काम किया है। संघ के कार्यों का मूल्य न कांग्रेस समझ पाई है और न ही प्रियांक खरगे जी समझ पाएंगे। शायद यही कारण है कि कांग्रेस संघ के कार्यों पर चर्चा करने के बजाय उस पर लगातार सवाल उठाने और आरोप लगाने का रास्ता चुनती है।
जब भी राहुल गांधी विदेश जाते हैं—जब भी वे भारत से बाहर जाते हैं—तो वे चीन की भाषा बोलने लगते हैं। वे भारत के खिलाफ बोलते हैं और झूठी बातें फैलाते हैं; वे ऐसा क्यों करते हैं?
राहुल गांधी जिस प्रकार से और जितनी प्रचुर मात्रा में विदेश की यात्राएं करते हैं। भारत के इतिहास में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं हुआ जिसने इतनी विदेश यात्राएं करके इतना अनापशनाप भारत के बारे में बोला हो। राहुल गांधी कांग्रेस के केवल ऐसे नेता हैं जो विदेशी मंच पर भारत के खिलाफ बात करते हैं फेक नैरेटिव फैलाते हैं लेकिन कबी किसी अन्य कांग्रेसी नेता चाहे वो इंदिरा जी हों, सोनिया जी हों, खरगे जी हों, अधिरंजन चौधरी हों या फिर पूर्व का कोई भी कांग्रेस नेता किसी ने कभी विदेशी मंच पर भारत के खिलाफ नहीं बोला है। बस राहुल एकलौते ऐसे नेता हैं जो ऐसा करते हैं जिसका परिणाम उन्हें देखने को मिल जाता है। भारत में जहां भी कांग्रेस की सरकारें हैं तेलंगाना, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश वहां कि भी यूनिवर्सिटी राहुल गांधी को नहीं बुलाती। क्योंकि राहुल के कारण उन्हें आगे भुगतना पड़ेगा। कांग्रेस और राहुल का मामना ये है कि उन देशों से दुश्मनी मोल ले लो जो भारत के साथ हैं या भारत के नजरिये से अहम हैं।
राहुल गांधी ने हाल ही में अपने जन्मदिन पर कोटा का दौरा किया, जहाँ उन्होंने युवाओं से मुलाकात की, सिविल सेवा परीक्षाओं में चयन से जुड़े आँकड़ों पर चर्चा की और नीट परीक्षा से जुड़े विवादों तथा कथित विफलताओं का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने इन मामलों के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। आगे भी उनकी कई ऐसी बैठकों और संवाद कार्यक्रमों की योजना बताई जा रही है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि राहुल गांधी जिन मुद्दों को उठाते हैं और जिस तरह की राजनीति करते हैं, उसका लाभ अंततः प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को ही मिलता है। आप इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह देखते हैं? क्या राहुल गांधी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में सफल हो रहे हैं, या अनजाने में वे मोदी जी की राजनीतिक मदद ही कर रहे हैं?
बड़ा विचित्र-सा तर्क दिया गया। कहा गया कि 3000 बच्चों में एक आईएएस बनता है। सही बात है। यूपीएससी की परीक्षा में 16-17 लाख अभ्यर्थी बैठते हैं और चयनित होते हैं लगभग 800-850। जिनको आप प्रॉपर आईएएस और आईपीएस कहते हैं, उनकी संख्या तो 150-200 के आसपास ही होती है। अब राहुल गांधी जी कह रहे हैं कि यह Process of Selection नहीं, बल्कि Process of Rejection है।
मैं राहुल गांधी जी से पूछना चाहता हूँ कि आपके करोड़ों कार्यकर्ता हैं। उनमें से विधायक और सांसद कितने बनते हैं? राजनीति में भी तो यही व्यवस्था है। फिर बताइए, वह Process of Selec-tion है या Process of Rejection? हर क्षेत्र में सीमित अवसर होते हैं और योग्यता, परिश्रम तथा प्रतिस्पर्धा के आधार पर चयन होता है। इसलिए इस तरह के तर्क देना केवल युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास है।
मेरा मानना है कि यह कांग्रेस और राहुल गांधी की पुरानी राजनीति का हिस्सा है, जिसमें युवाओं की सोच को सीमित करने की कोशिश की जाती है। वे चाहते हैं कि युवा केवल एक संकीर्ण दायरे में सोचता रहे, जबकि आज भारत के सामने अवसरों का एक विशाल वैश्विक बाज़ार खुला हुआ है। स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च, उद्यमिता और अनेक नए क्षेत्रों में अपार संभावनाएँ हैं। भारत के युवाओं को उन अवसरों का लाभ उठाना चाहिए जो उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
अब एक बात मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में कहना चाहूँगा। अंग्रेज़ी साहित्य और यूरोपीय इतिहास में किंग जेम्स के बारे में कहा जाता था कि उनके दरबारी उन्हें अत्यंत बुद्धिमान मानते थे, जबकि आम जनता उन्हें मूर्ख समझती थी। एक प्रसिद्ध टिप्पणी है कि वे “ईसाई जगत के सबसे बुद्धिमान मूर्ख” थे। मैं इस टिप्पणी की पुष्टि नहीं करता, लेकिन उसी संदर्भ में कहा जा सकता है कि राहुल गांधी जी कांग्रेस जगत के “सबसे बुद्धिमान मूर्ख” प्रतीत होते हैं।
कारण यह है कि कांग्रेस में कभी एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली और अनुभवी नेता हुए, जिन्होंने अपने काम से पहचान बनाई। लेकिन राहुल गांधी जी अक्सर ऐसे तर्क और बयान देते हैं, जो स्वयं उनकी राजनीतिक समझ पर प्रश्नचिह्न खड़े कर देते हैं।
और जहाँ तक यह कहना कि प्रधानमंत्री मोदी जी कांग्रेस के विरोधी हैं, तो मैं इससे सहमत नहीं हूँ। वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विपक्ष के नेताओं को जितना सम्मान प्रधानमंत्री मोदी जी ने दिया है, उसके उदाहरण भी सामने हैं। कांग्रेस से हमारा गहरा वैचारिक मतभेद रहा है, फिर भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन किया गया है।
राहुल गांधी जी वह सम्मान इसलिए प्राप्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् याति पात्रताम्।” अर्थात विद्या से विनय आता है और विनय से पात्रता। यदि विद्या और विनय दोनों का अभाव हो, तो पात्रता का विकास कैसे होगा? यही मूल समस्या है, और यही कारण है कि राहुल गांधी जी को वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसकी अपेक्षा वे करते हैं।
वैसे आपको मैं थोड़ा सा अपडेट करना चाहता हूं। अभी हमने एक बहुत बड़े फेमस न्यूमरोलॉजिस्ट से से बातचीत की, उन्होंने बताया कि राहुल गांधी के जीवन में कभी राजयोग नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि 2029 में हो सकता है राहुल गांधी शादी कर लें। और खास बात यह है कि आप भी एस्ट्रोलॉजी पर अच्छा ज्ञान रखते हैं। तो आपका क्या मानना है?
मेरा कहना है कि राहुल गांधी जी का राजयोग है या नहीं, इसके लिए जन्मकुंडली देखने की जरूरत नहीं है। उनकी कर्मकुंडली ही सब कुछ बता रही है। वैसे भी वे भारतीय राजनीति के चिर युवा, चिर व्याकुल, चिर व्यथित और चिरकुपित नेता हैं। इसलिए वे अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या निर्णय लेते हैं, यह उनका नितांत व्यक्तिगत विषय है। उस पर हम लोगों को किसी प्रकार की कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
भारत के विषय में अनर्गल, निरर्थक, भ्रामक और विद्वेषपूर्ण प्रचार करना—यह वे जानबूझकर कर रहे हैं या अनजाने में, यह कहना कठिन है। मगर यदि राहुल गांधी यह सब अनजाने में कर रहे हैं, तो वे बहुत बड़े नासमझ हैं। वे उन शक्तियों के हाथों का खिलौना बने हुए हैं, जो भारत की छवि को धूमिल करने का काम कर रही हैं। और यदि राहुल गांधी यह सब जानबूझकर कर रहे हैं, तो फिर भैया, खुदा ही मालिक है।
राहुल गांधी बार-बार ऐसे आरोप लगाते हैं। अक्सर विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कार्यप्रणाली को निशाना बनाया जाता है तथा उस पर सवाल खड़े किए जाते हैं। यह कहा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार द्वारा शुरू किए गए जितने भी बड़े विकास परियोजनाएँ हैं, वे सभी अदाणी समूह को ही क्यों दिए जा रहे हैं? आखिर अदाणी और मोदी के बीच क्या रिश्ता है? साथ ही, विपक्ष यह भी आरोप लगाता है कि सरकार की नीतियाँ और फैसले देश के भविष्य को अंधकार में डालने का काम कर रहे हैं। आप इन आरोपों को किस तरह देखते हैं और इस पर आपका क्या कहना है?
राहुल गांधी जी आरोप लगाते हैं, लेकिन मेरा सवाल है कि अडानी हों या कोई अन्य उद्योगपति, क्या वे 2014 के बाद ही उभरे हैं? क्या 2014 से पहले वे कोई छोटी-मोटी दुकान चलाते थे? यह कांग्रेस का एक राजनीतिक षड्यंत्र है, जो इस बात को दर्शाता है कि "मोदी-अडानी" का मुद्दा उनकी राजनीति चमकाने का आधार बन चुका है। यह उनके लिए एक राजनीतिक हथियार है।
क्योंकि मोदी जी ने अडानी सहित विभिन्न औद्योगिक समूहों के साथ मिलकर विकास कार्य किए, जबकि कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब वह बड़े औद्योगिक घरानों के साथ केवल व्यापारिक संबंध नहीं रखती थी, बल्कि उनके साथ राजनीतिक समीकरण भी साधती थी। यही मोदी जी और कांग्रेस के बीच का अंतर है।
इसलिए उनके आरोपों को जनता अब गंभीरता से नहीं लेती।
जहाँ तक विदेशी कंपनियों और विदेशी हितों के प्रति कांग्रेस के झुकाव का प्रश्न है, वह भी समय-समय पर उनके बयानों और राजनीतिक रुख से साफ दिखाई देता रहा है।
कांग्रेस और राहुल गांधी लगातार एसआईआर (SIR) के मुद्दे को उठा रहे हैं और सरकार पर विभिन्न आरोप लगा रहे हैं। वहीं, ऐसी चर्चाएँ भी हैं कि सरकार आगामी संसदीय सत्र में महिला आरक्षण तथा परिसीमन (Delimitation) से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। अब जबकि एनडीए के संख्याबल और राजनीतिक समीकरण पहले की तुलना में बदल चुके हैं, आप इन प्रस्तावों के भविष्य को किस प्रकार देखते हैं? क्या आपको लगता है कि ऐसे महत्वपूर्ण विधायी कदम संसद से सफलतापूर्वक पारित हो पाएंगे?
देखिए, महिला आरक्षण विधेयक को लेकर प्रधानमंत्री मोदी जी के मन में एक स्पष्ट प्रतिबद्धता है। यह केवल राजनीतिक घोषणा नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए किए गए कार्यों की एक स्वाभाविक कड़ी है। मुद्रा योजना के लाभार्थियों में आज लगभग 55% महिलाएँ हैं। स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। लाखों "ड्रोन दीदी" और "लखपति दीदी" आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई पहचान बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने लगभग 4 करोड़ आवासों में से 3 करोड़ से अधिक में महिलाओं का मालिकाना हक सुनिश्चित किया गया है।
इसके अलावा, ग्राम पंचायतों में महिलाओं को व्यापक प्रतिनिधित्व मिला है। पहली बार सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन मिला, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में उनके लिए विशेष व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, और 2024 के गणतंत्र दिवस समारोह में ऑल-वुमेन कंटिंजेंट ने देश का नेतृत्व किया। आज केंद्र सरकार की कैबिनेट में भी महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक है। इन सबके बाद महिला आरक्षण विधेयक का आना किसी राजनीतिक मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सोच का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री जी की महिला शक्ति के प्रति प्रतिबद्धता केवल योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके प्रतीकों और दृष्टिकोण में भी दिखाई देती है। जब भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचा, तो उस स्थान का नाम "शिव शक्ति" रखा गया। यह केवल नामकरण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और नारी शक्ति के प्रति सम्मान का प्रतीक था। इसलिए मैं मानता हूँ कि महिला आरक्षण विधेयक के पीछे एक भाव है, एक दृष्टि है, केवल राजनीति नहीं।
जहाँ तक परिसीमन और संसद के नए स्वरूप का प्रश्न है, तो देश की जनता चाहती है कि बदलती जनसंख्या, बदलती आवश्यकताओं और नए भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी विकसित हों। मेरा मानना है कि संसद अंततः जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। यदि जनता की भावना महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और लोकतांत्रिक संरचनाओं को अधिक प्रतिनिधिक बनाने की है, तो संसद को भी उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
हाँ, राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हो सकते हैं और होने भी चाहिए। लोकतंत्र का यही सौंदर्य है। लेकिन कुछ मूलभूत प्रश्न ऐसे होते हैं जिन पर देश को एक स्वर में खड़ा होना चाहिए। जैसा अटल जी ने कहा था—चुनाव होंगे, खत्म होंगे, पार्टियाँ आएँगी, जाएँगी, चुनाव जीते भी जाएँगे और हारे भी जाएँगे, लेकिन देश रहना चाहिए। राष्ट्र के प्रति निष्ठा असंदिग्ध रहनी चाहिए।
आप सरकार की आलोचना कीजिए, मोदी जी की आलोचना कीजिए, भाजपा की आलोचना कीजिए—यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन भारत की आलोचना और भारत की संस्थाओं के प्रति अविश्वास का वातावरण खड़ा करना अलग बात है। जब राहुल गांधी जैसे नेता कहते हैं, "I have to fight with the Indian State", तब स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। लोकतंत्र में सरकार से संघर्ष हो सकता है, नीतियों से असहमति हो सकती है, लेकिन भारत राष्ट्र और उसकी मूल संस्थाओं के प्रति अविश्वास का भाव स्वीकार्य नहीं हो सकता।
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