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हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के संदेश

Messages from Haryana and Jammu and Kashmir

1999 के लोकसभा चुनावों के पहले तब के चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने एक्जिट पोल को लेकर बड़ी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि एक्जिट पोल काला जादू नहीं होता। हरियाणा के चुनाव नतीजों ने साबित किया है कि एक्जिट पोल सचमुच काला जादू नहीं होता। पांच अक्टूबर की शाम को चुनाव खत्म होने के बाद शायद ही कोई एक्जिट पोल था, जो कांग्रेस की भारी जीत की मुनादी नहीं कर रहा था। एक्जिट पोल की खुशफहमी आठ अक्टूबर को मतगणना शुरू होने के कुछ देर तक बनी भी रही, जब पहले दौर की गिनती के दौरान कांग्रेस भारी बहुमत की ओर बढ़ती नजर आ रही थी। लेकिन दस बजते-बजते खेल पलटना शुरू हुआ और भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार जीत की ओर बढ़ती दिखने लगी। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीते चुनावों के बाद यह तीसरा मौका है, जब एक्जिट पोल पूरी तरह फेल हुए हैं। वैसे 2019 के हरियाणा विधानसभा चुनावों के दौरान भी एक्जिट पोल फेल हुए थे। सभी बीजेपी की भारी जीत की घोषणा कर रहे थे, लेकिन असल नतीजों में बीजेपी को बहुमत के लाले पड़ गए थे। ऐसे में अब सियासी दलों, मीडिया हाउसों और चुनाव विश्लेषकों को सोचना होगा कि एक्जिट पोल में कमी कहां है या फिर इनकी जरूरत है भी या नहीं?

हरियाणा की सामाजिक स्थिति और वहां के लोगों के स्वभाव को जो गहरे से जानते हैं,  उन्हें पता था कि राज्य के चुनावी नतीजे वैसे नहीं आने जा रहे, जैसा मीडिया में बढ़-चढ़कर दिखाया जा रहा है। हरियाणा के जातीय गणित में 23 फीसद की हिस्सेदारी के साथ जाट सबसे बड़ा समूह है। संघर्षशील जाट समुदाय की दो विशेषताएं हैं। उसे साफ बोलना पसंद है और वह दिल से साफ होता है। लड़ाका समुदाय के होने की वजह से वह मुखर भी रहा है। किसानों और पहलवानों के आंदोलन में भी उसकी बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी रही। इस हिस्सेदारी और उसकी मुखरता ने चुनावी माहौल में ऐसा कोलाज रचा कि लगा कि पूरा हरियाणा बीजेपी के विरोध में खड़ा हो गया। हरियाणा का एक सच और भी है। हरियाणा में करीब 35 फीसद ओबीसी मतदाता हैं। इसके साथ ही करीब 21 फीसद दलित हैं और बाकी में ब्राह्मण, बनिया, पंजाबी, गूजर और यादव हैं। चूंकि जाट समुदाय के पास जमीनें अपेक्षाकृत ज्यादा है, इसलिए किसान आंदोलन में इनकी हिस्सेदारी ज्यादा रही। कांग्रेस का किसान आंदोलन को साथ था। लिहाजा उसने पूरी राजनीति जाट केंद्रित ही कर दी। उसे भरोसा था कि लोकसभा चुनावों के दौरान दलित आरक्षण और संविधान का जो नैरेटिव चला था, वह विधानसभा चुनावों में भी जारी रहेगा। उसे भरोसा था कि जाट और दलित मिलकर राज्य में उसकी एक दशक बाद सत्ता में वापसी करा देंगे। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 28 जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे, जबकि बीजेपी ने 16 उम्मीदवारों पर ही भरोसा किया। हरियाणा में कांग्रेस की पूरी कमान भूपिंदर सिंह हुड्डा ने संभाल ली, जबकि उनके बरक्स दलित नेता कुमारी सैलजा की नहीं चली। सैलजा और हुड्डा के बीच अनबन की खबरें छाई रहीं। कांग्रेस से दलित नाराज हुआ, विनेश फोगाट की कांग्रेस में शामिल होने से जाटों का एक समुदाय भी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा। इसका कांग्रेस को खामियाजा भुगतना पड़ा।  इसका ही असर हुआ कि हरियाणा में कांग्रेस की ना तो आंधी आई और ना ही सुनामी।

2019 में जीत के बाद बीजेपी ने अप्रत्याशित रूप से राज्य की ताकतवर जातियों और समुदायों की बजाय पंजाबी मनोहर लाल खट्टर को सत्ता की कमान सौंप दी। इससे जाट समुदाय के बड़े हिस्से में नाराजगी बढ़ी। बीजेपी ने लोकसभा चुनावों से ठीक पहले इस नाराजगी को भांपा और खट्टर की जगह पिछड़े वर्ग से आने वाले नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया। बीजेपी की इस सोशल इंजीनियरिंग का ही असर कह सकते हैं कि राज्य के करीब 35 फीसद ओबीसी मतदाताओं के बड़े वर्ग ने बीजेपी का साथ दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उपलब्ध चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी को जहां 39.93 प्रतिशत मत मिले हैं, वहीं कांग्रेस को उससे कुछ ही कम यानी 39.26 प्रतिशत वोट मिले। किस समुदाय का  वोट किस पार्टी को मिला, इसका ठोस विश्लेषण तो पूरी तसवीर सामने आने के बाद ही हो सकेगा। लेकिन मोटे तौर पर ऐसा लग रहा है कि यादव और गूजर समेत ओबीसी समुदाय के दूसरे वोटरों के साथ ही बीजेपी को पारंपरिक पंजाबी, ब्राह्मण और बनिया समुदाय का तकरीबन समूचा वोट मिला है। जिसकी वजह से पार्टी तीसरी बार सत्ता में धमाके के साथ लौट रही है।

इसमें दो राय नहीं कि लगातार दो बार सत्ता में रहने के चलते बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी। लेकिन यह लहर भी विशेषकर क वर्ग पर टिकी थी, क यानी किसान और कुश्ती। चूंकि यही वर्ग मुखर भी रहता है तो हरियाणा पर निगाह रखने वालों को लगता था कि जैसा यह मुखर समुदाय बोल और सोच रहा है, तकरीबन समूचे हरियाणा की ही यही सोच है। विश्लेषक इसी बिंदु पर गलती कर गए और बीजेपी की अंदरूनी इंजीनयरिंग को भांपने में गलती कर गए। बीजेपी को अंदाजा लग गया था कि तीसरी बार हरियाणा में लौटने की राह की चुनौतियां बड़ी हैं। पिछले एक दशक में पार्टी के चुनाव प्रचार की रणनीति मेगा शो के आयोजन पर केंद्रित रही है। लेकिन हरियाणा में पार्टी ने मेगा शो की बजाय पंचायत और स्थानीय स्तर पर काम किया। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं की भी बड़ी भूमिका रही। उन्होंने वोटरों को जहां जरूरी लगा, वहां समझाया और बूथों तक पहुंचाने में भी बड़ी भूमिका निभाई। वैसे यह भी सच है कि पिछली बार यानी 2019 की तुलना में हरियाणा में इस बार कम मतदान हुआ। इसे लेकर माना जा रहा था कि हरियाणा में बीजेपी के कम समर्थक घर से निकले। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि बीजेपी और संघ के कार्यकर्ताओं की मौन साधना ने काम किया, बीजेपी के वोटर ना सिर्फ घर से निकले, बल्कि उन्होंने बीजेपी का साथ भी दिया। वैसे एक बात और ध्यान देने की है कि हरियाणा के शहरी इलाकों में बीजेपी ने एकतरफा जीत हासिल की है। राज्य की 12 शहरी सीटों में से दस पर बीजेपी का परचम लहराया है। बल्लभगढ़ की सीट पर तो कांग्रेस प्रत्याशी चौथे नंबर के लिए संघर्ष करते रहे।

लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल ना करने की वजह से बीजेपी में कुछ हद तक निराशा का भाव रहा है। यह निराशा हरियाणा के प्रचार अभियान में भी कुछ हद तक नजर आ रही थी। लेकिन जमीनी स्तर पर जिस तरह काम हुआ, पंचायत स्तर पर लोगों को साधने की कोशिश हुई, उसका असर साफ नजर आ रहा है। इसका पार्टी के मनोबल पर बेहतर असर होगा। पार्टी कार्यकर्ता दोगुने उत्साह से महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावी मैदान में उतरेंगे। जिसका असर बीजेपी गठबंधन के लिए कठिन समझे जाने वाले महाराष्ट्र में दिख सकता है। हरियाणा में कांग्रेस की सुनामी और आंधी देखने वाले विश्लेषक भी कहने लगे हैं कि कांग्रेस को सोचना होगा कि आखिर उसकी रणनीति में कहां चूक हो रही है या फिर वह कुछ ज्यादा ही उत्साह में गलतियां कर रही है? यहां ध्यान देने की बात यह है कि हरियाणा में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिए पड़ोसी उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी ने अपना एक भी उम्मीदवार राज्य में नहीं उतारा था। जबकि उसकी चाहत भी राष्ट्रीय पार्टी बनने की है। जाहिर है कि हरियाणा की हार का असर कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन की अंदरूनी राजनीति पर भी पड़ेगा। फिलहाल लोकतंत्र का तकाजा है कि हरियाणा की जनता को सलाम किया जाए।

अब बात करते हैं जम्मू और कश्मीर की। एक सवाल यह उठता है कि इस राज्य एवं राम मंदिर में क्या कोई समानता हो सकती है? मोटे तौर पर देखें तो इनमें कोई समानता नहीं हो सकती। लेकिन जब भारतीय जनता पार्टी के संदर्भ में दोनों को ही देखें तो समानता नजर आती है। राममंदिर और जम्मू-कश्मीर, भारतीय जनता पार्टी के कोर मुद्दे रहे हैं। लेकिन चुनावी मोर्चे पर दोनों ही मुद्दे कम से कम स्थानीय स्तर पर भाजपा को निराश ही करते रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 370 और कैबिनेट के प्रस्ताव 35 ए की वजह से जम्मू-कश्मीर की स्थिति देश के अन्य राज्यों से अलग रही है। यह अलग स्थिति ही वहां के अलगाववाद की नासूर का कारण मानी जाती रही है। भारतीय जनता पार्टी ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करके एक तरह से इस नासूर को ही खत्म कर दिया। ऐसे में इसका चुनावी श्रेय भारतीय जनता पार्टी को मिलने की उम्मीद होना स्वाभाविक है। लेकिन विधानसभा चुनाव नतीजों ने पार्टी को निराश ही किया है।

यहां पर राममंदिर आंदोलन और उस बीच हुए उत्तर प्रदेश के चुनावों की याद आना स्वाभाविक है। छह दिसंबर1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद अव्वल तो होना चाहिए था कि आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को अपने दम पर भारी जीत मिलती। लेकिन 1993 के विधानसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर भले ही उभरी,लेकिन वह बहुमत से दूर रही। जनवरी 2024 में अयोध्या में भव्य राममंदिर बनकर तैयार हो गया। देश और दुनिया में राममंदिर को लेकर अलग तरह का उत्साह देखा गया। पांच सौ वर्षों के संघर्ष का अंत हुआ। इस संघर्ष की अगुआ भारतीय जनता पार्टी ही रही। इसलिए इस संघर्ष का उसे चुनावों में फायदा मिलना चाहिए था। लेकिन उलटबांसी देखिए कि कुछ ही महीनों बाद हुए लोकसभा चुनावों में अयोध्या वाली फैजाबाद सीट भारतीय  जनता पार्टी हार गई। इस कड़ी में कोर मुद्दे से जुड़े इलाके जम्मू-कश्मीर में बीजेपी को चुनावी बढ़त ना मिलना, पार्टी के लिए तीसरा झटका कहा जा सकता है।

जम्मू-कश्मीर में जिस नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के गठबंधन को बहुमत मिला है, उसका चुनावी वादा है कि राज्य की पुरानी स्थिति बहाल करेंगे यानी अनुच्छेद 370 को फिर से प्रभावी बनाएंगे। यह बात और है कि इस महत्वपूर्ण अनुच्छेद की बहाली जम्मू-कश्मीर की आधी-अधूरी विधानसभा के वश की बात नहीं है। लेकिन इस जीत के जरिए नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस नैतिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश तो जरूर ही करेंगी। इसका उसे राष्ट्रीय फायदा भले ही न मिले,लेकिन केंद्रीय सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परेशानी खड़ी करने का जरिया वे बनाते रहेंगे। वैसे भी भारत की राजनीति आज जिस मुकाम पर है, उसमें राजनीतिक दलों को सिर्फ अपने सियासी स्वार्थ और फायदे की चिंता है। उनकी प्राथमिकता में राष्ट्र बाद में आता है। इसलिए अंदरूनी मुद्दों को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालने में दलों को कोई हिचक नहीं होती। विपक्ष के नेता राहुल गांधी के लंदन और अमेरिका के भाषण इसके उदाहरण हैं।

दुनिया में भारत का दबदबा भले ही बढ़ रहा हो, भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था भले ही हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ ताकतें ऐसी भी हैं, जो भारत में उथल-पुथल देखना चाहती हैं। इसके लिए वे अपने तईं प्रयास भी करती रहती हैं। जम्मू -कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की  जीत को ये ताकतें बहाना बनाएंगी और यह नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश करेंगी कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा स्थिति उसकी अवाम को ही स्वीकार्य नहीं है। इस बहाने घूम-फिरकर उसी तर्क को बढ़ावा दिया जाएगा, जो पाकिस्तान देता रहा है। जिसकी वकालत नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे दल भी करते रहे हैं। पाकिस्तान कश्मीर को लेकर जनमत संग्रह की बात करता रहा है तो नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी प्रकारांतर से पाकिस्तानी मंशा को ही आगे बढ़ाते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में भाजपा की चुनावी जीत ना मिलने के बाद वे फिर भाजपा के नजरिए को गलत साबित करने की कोशिश करेंगे ।

जम्मू-कश्मीर के चुनावी अभियान के दौरान विशेषकर कश्मीर घाटी के वोटरों के जो विचार सामने आ रहे थे, उससे ऐसे ही चुनाव नतीजों की उम्मीद थी। जिस घाटी में पत्थरबाजी रूक गई, जहां आतंकी घटनाओं पर लगाम लग गई, जहां ढाई दशक से पहले की तरह पर्यटकों की आमद बढ़ी, जहां अमन बढ़ा, वहां के लोग खुलकर कहते रहे कि उन्हें हिंदू राज नहीं चाहिए। नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार की वजह से उन्हें ये सारी सहूलियतें मिलीं, राज्य में बदलाव आया। विकास की नई बयार बही। फिर घाटी के लोगों को ना तो नरेंद्र मोदी पसंद हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी। फिर कश्मीर घाटी में नवगठित विधानसभा की 47 सीटें आती हैं, जबकि जम्मू इलाके में 43 सीटें हैं। घाटी की सीटों पर भाजपा की चुनावी संभावनाओं की कोई उम्मीद भी नहीं लगाए हुए था। वैसे भी घाटी की 28 सीटों पर बीजेपी ने अपने उम्मीदवार भी नहीं दिए थे। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय का आंदोलन जिस प्रजा मंडल ने चलाया, उसका आधार जम्मू इलाके में ही रहा। वह एक तरह से भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ का ही हिस्सा था। देश मान कर चल रहा था कि जम्मू इलाके की 43 सीटों में ज्यादातर पर बीजेपी की जीत होगी। लेकिन वहां बीजेपी 29 सीटें ही जीत पाई। जाहिर है कि 14 सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा। वैसे बीजेपी का एक धड़ा मान रहा है कि पार्टी की आपसी गुटबाजी और गलत टिकट बंटवारा पार्टी की सफलता की राह में बाधा बन गया। वैसे पार्टी के लिए संतोष की बात यह भी है कि घाटी की कई सीटों पर उसके उम्मीदवार हजार-दोहजार वोटों के ही अंतर से हारे हैं...फिर भी बीजेपी को सोचना होगा कि आखिर उससे चूक कहां हुई कि अपने गढ़ में वह शत-प्रतिशत सफलता हासिल क्यों नहीं कर पाई। वैसे बीजेपी इस बात से राहत की सांस ले सकती है कि हरियाणा में वह धमाकेदार जीत के साथ वापस लौट रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण हुआ मतदान और लोगों की उसमें भरपूर भागीदारी ने कम से कम इस्लामी देशों के उस नैरेटिव को जरूर खंडित कर दिया है कि कश्मीर की जनता अलगाववादी सोच की है। बेशक उसने शांति लाने वाली पार्टी यानी बीजेपी का साथ नहीं दिया, लेकिन यह सच है कि उसने दुनिया को संदेश तो दिया है....संदेश यह कि जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और रहेगा।






उमेश चतुर्वेदी
कंसल्टेंट, प्रसार भारती, भारत सरकार

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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