महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा, राकांपा के अजीत पवार गुट और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के शिवसेना गुट के गठबंधन को मिले आश्चर्यजनक जनादेश के पीछे छिपा संदेश एक व्यापक जीत से ज्यादा मायने रखता है। यह जीत नकद वितरण, जाति संयोजन और धार्मिक अपील जैसे किसी एक फार्मूले की वजह से नहीं हुई है, जिन्हें भाजपा ने हरियाणा में अपनी सफलता के बाद शुरु किया। इसकी बजाय यह जीत इस बात का एहसास दिलाती है कि लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक, मतदाताओं का मूड चार से पांच महीनों में नाटकीय रूप से बदल सकता है।
भाजपा नीत महायुति ने दिखाया कि मतदाताओं के विभिन्न वर्गों को लुभाने और लोगों के सामने जमीनी मुद्दों को समझने के लिए एकजुट नेतृत्व की लगभग अचूक रणनीति के संयोजन से एक शानदार जीत हासिल की जा सकती है। धार्मिक, क्षेत्रीय, जाति और वर्ग आधारित भावनाओं को फिर से अपने पक्ष में किया जा सकता है, विरोधियों को परास्त किया जा सकता है और शरद पवार या उद्धव ठाकरे जैसे स्थापित दिग्गजों की विरासत को अप्रासंगिक बनाया जा सकता है। इसीलिए महाराष्ट्र की यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के बाद आकार ले रही राजनीतिक गतिशीलता में भाजपा के प्रभुत्व की बहाली को दर्शाती है। यह निस्संदेह नई दिल्ली में उनकी सरकार को और अधिक स्थिर बनाए रखने में मदद करेगा। हरियाणा की जीत के ठीक बाद महाराष्ट्र की जीत ने दिखाया है कि भाजपा अपनी असफलताओं से सबक सीखने में कोताही नहीं बरतती है।
अमित शाह और उनके चुनाव रणनीतिकारों की टीम के साथ देवेन्द्र फड़नवीस और एकनाथ शिंदे जैसे अनुभवी नेताओं ने दिखा दिया है कि ठोस जमीनी कार्य और सीटों तथा उम्मीदवारों के कुशल चयन के अलावा जीत का कोई जादुई फॉर्मूला नहीं होता है। ऐसा करके बीजेपी ने लचीलापन दिखाया। उन्होंने उसी राज्य में सफल सुधारों के जरिए जीत हासिल की, जहां कुछ महीने पहले ही भाजपा को अपमान का सामना करना पड़ा था। 2019 में यहां भाजपा ने 28 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन इस साल वह केवल 13 सीटें जीत पाई थी। इससे भाजपा की कुल सीटें कम हो गईं। उत्तर प्रदेश में सीटों के नुकसान के साथ-साथ महाराष्ट्र में सीटों की गिरावट ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया था। क्योंकि उत्तर प्रदेश के बाद, महाराष्ट्र दूसरी सबसे ज्यादा 48 की संख्या में सांसद भेजता है। लेकिन भाजपा के लिए राज्य सरकार द्वारा महिलाओं, आदिवासियों और अन्य वर्गों के लिए संतुलित कल्याणकारी उपाय, उम्मीदवारों पर अधिक ध्यान देना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मशीनरी द्वारा जमीनी स्तर पर किए गए कार्यों के संतुलन ने रंग दिखाया।

"लाड़ली बहन" योजना, जिसके तहत राज्य सरकार ने महिलाओं को प्रति माह 1,500 रुपये का नकद हस्तांतरण किया, एक गेम चेंजर साबित हुई। हालांकि विपक्ष ने शुरू में इस योजना की आलोचना की, लेकिन बाद में खुद ही राशि दोगुनी करने का वादा करने लगी। जिसके बाद भाजपा ने सत्ता में आने पर इसे बढ़ाकर ₹ 2,100 करने का वादा किया।
भाजपा ने एक और महत्वपूर्ण कारक: अन्य पिछड़ी जातियों को मजबूत करने के लिए काम किया। इसके नेताओं ने ओबीसी के विभिन्न जाति समूहों तक पहुंचने के लिए 300 से अधिक बैठकें कीं। पीएम मोदी के निर्देशन में भाजपा नेताओं ने उन्हें समझाया कि उनके अधिकारों की रक्षा की जाएगी और यह भी बताया कि कांग्रेस नकली कहानी बना रही है कि उनका आरक्षण छीनने के लिए संविधान को बदल दिया जाएगा। कोटा लागू करने में देरी से परेशान मराठा समुदाय को भी आश्वासन दिया गया कि भाजपा इस विषय में बेहतर से बेहतर काम करके दिखाएगी।
उत्तर महाराष्ट्र के आंदोलनकारी प्याज किसानों और विदर्भ के कपास और सोयाबीन किसानों को महायुति के सत्ता में लौटने के बाद आने वाले सीज़न में राहत का आश्वासन दिया गया था। जिन नाराज किसानों ने लोकसभा चुनाव में पार्टी को वोट नहीं दिया था, वे ऋण माफी का वादा मिलने के भाजपा के पाले में वापस आ गए।
हालांकि भाजपा ने एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के साथ हुए चुनावी समझौते को बिगाड़ने की कोई मंशा नहीं दिखाई, लेकिन पार्टी ने संकेत दिया कि वह मुख्यमंत्री पद के सवाल को खुला रखने के विरुद्ध नहीं है। इसकी वजह से विदर्भ में भाजपा की राह आसान हुई, जहां फड़णवीस की लोकप्रियता बरकरार है। बीजेपी ने कई बागी नेताओं को मनाया और उन्हें मुकाबले से हटने के लिए राजी किया।
महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि वह ऐसे कदम नहीं उठा पाई। साथ ही उनका गठबंधन आत्मसंतुष्ट भी दिखाई दिया, जिससे पता चलता है कि इसमें रणनीति और एकजुटता की कमी है। संकेत यह मिला कि यह एक ढीला-ढाला विपक्षी मोर्चा था, भले ही एक वक्त था जब ज़मीनी मुद्दे इसके पक्ष में थे। एमवीए पिछले चार से पांच महीनों से मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा था लेकिन उसके अंदरूनी सूत्र इस बात से आश्चर्यचकित रह गए कि उनका गठबंधन इतनी बुरी तरह चुनाव क्यों हार गया, जबकि वह आसानी से जीत सकता था।
महायुति ने कुल 288 विधानसभा सीटों में से 234 सीटें हासिल कीं, जो राज्य में भाजपा का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। भाजपा को 132 सीटें मिलीं, जो 288 सदस्यीय विधानसभा में
बहुमत के बहुत करीब है। महायुति को मिली सीटों संख्या एमवीए से लगभग पांच गुना है,जिसके सभी सहयोगियों की सीटें मिलाकर भी 50 से भी कम सीटों तक सीमित हो गई। महायुति की जीत में शिवसेना (54 सीटें) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (41 सीटें) ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव में प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाली एमवीए की करारी हार हुई। इसकी कुल 48 संख्या एनडीए को मिली सीटों के एक-चौथाई से भी कम थी। पूरे राज्य में कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और शरद पवार की एनसीपी के गठबंधन के प्रदर्शन में भारी गिरावट देखी गई।
क्या मोदी की प्रतिष्ठा फिर से बहाल हुई?
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का संसदीय बहुमत खोना मोदी के लिए एक निजी तौर पर लगा बड़ा झटका था। एक दशक तक संसद में प्रभावशाली बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व करने के बाद, मोदी को बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्हें तेलुगु देशम पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) का समर्थन हासिल करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को पुनर्जीवित करना पड़ा।
भाजपा ने हरियाणा अभियान में भी मोदी के ब्रांड का संयम से इस्तेमाल किया, जहां भाजपा सत्ता विरोधी लहर के बावजूद अधिक संख्या में स्थानीय चेहरों को आगे करके सत्ता में लौट आई। इसी तरह, हालांकि महाराष्ट्र में मोदी ने महत्वपूर्ण चुनाव अभियानों का नेतृत्व किया, लेकिन पहले की तरह 'धुआंधार बमबारी' नहीं की।
वांछित प्रभाव के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ पीएम मोदी की रैलियों को संयोजित किया गया था। अपने क्षेत्रों में चुनाव प्रचार को अधिकतम करने का जिम्मा फड़णवीस, शिंदे और अजित पवार पर छोड़ दिया गया था। जीत के उपलक्ष्य में आयोजित एक रैली में मोदी ने भाजपा द्वारा एक बड़ी चुनौती को नियंत्रित करने पर संतुष्टि का भाव दिखाया। उन्होंने कहा, "यह लगातार तीसरी बार है कि भाजपा के नेतृत्व वाले किसी गठबंधन ने महाराष्ट्र में जीत हासिल की है। यह तीसरी बार है जब भाजपा महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यह ऐतिहासिक है। यह महाराष्ट्र के शासन मॉडल को दर्शाता है।" बीजेपी को अकेले पूरे एमवीए से ज्यादा सीटें मिली हैं।
उन्होंने कहा, ';महाराष्ट्र देश का ऐसा छठा राज्य बन गया है, जिसने बीजेपी को लगातार तीन बार जनादेश दिया है। हम इसी तरह काम करते रहेंगे. मैं खासतौर पर महाराष्ट्र की जनता को धन्यवाद और बधाई देना चाहता हूं, जिन्होंने तीसरी बार स्थिर सरकार चुनी है।'
उनके भाषण पर धन्यवाद प्रस्तावित करते हुए शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे ने 'सीएम' शब्द की दोबारा व्याख्या की। उन्होंने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा, "मेरे लिए सीएम का फुल फॉर्म चीफ मिनिस्टर नहीं है बल्कि यह कॉमन मैन है।" प्रेस ब्रीफिंग में फड़णवीस और अजित पवार भी शामिल हुए। उन्होंने घोषणा की, "हमारी सरकार आम आदमी की सरकार थी। मैं उनके अविश्वसनीय समर्थन के लिए पीएम मोदी का आभारी हूं। महिलाएं, बच्चे और किसान हमारे लिए केंद्र बिंदु थे। हम आम आदमी को 'सुपरमैन' में बदलना चाहते हैं।"
उद्धव ठाकरे और शरद पवार के लिए गहरी निराशा और सदमे का समय विपक्षी नेताओं में गहरी निराशा व्याप्त दिखाई दी। जिसके बाद उन्हें एनडीए की जीत के 'बड़े अंतर' पर चिंता व्यक्त करने के साथ अपने पुराने मुद्दों को पुनर्जीवित किया। खासकर राज्य में लोकसभा चुनावों में महायुति के खराब प्रदर्शन को देखते हुए। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
उद्धव ठाकरे की सेना के संजय राउत और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक जैसी टिप्पणी की. 'महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव मोदी जी के नाम पर लड़ा गया। बीजेपी हार गई। वही राज्य उसी बीजेपी को 4-5 महीने के अंदर 148 में से 132 सीटें दे देता है। ये कैसा स्ट्राइक रेट है? क्या ये स्ट्राइक रेट संभव है?' चुनावी पारदर्शिता हमारी चिंता है। क्या भाजपा सत्ता विरोधी लहर को पलट सकती है? हमने लगातार शिकायत की। चाहे हम जीतें या हारें, हम चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना जारी रखेंगे। आज तक कविता के अलावा हमें चुनाव आयोग से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है।'
राउत ने चंद दिनों पहले सेवानिवृत्त हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने अविभाजित सेना के प्रतीक (धनुष और तीर) पर अपनी सेना के दावों पर फैसले में देरी की, जो एकनाथ शिंदे सेना को आवंटित किया गया था। केवल शरद पवार ने ईवीएम के आरोपों में शामिल होने से इनकार करके कुछ दूरदर्शिता दिखाई।
ये नतीजे उद्धव ठाकरे और शरद पवार के लिए बड़ा झटका हैं। इस चुनाव से यह तय होना था कि असली शिव सेना और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व कौन करता है। दोनों नेताओं ने इस
चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बताया था. हालाँकि, व्यक्तिगत स्तर पर उनकी हार चौंकाने वाली थी।
उद्धव ठाकरे ने कहा, ' मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि महाराष्ट्र, जिसने कोविड के दौरान परिवार के मुखिया के रूप में मेरी बात सुनी, वह मेरे साथ इस तरह का व्यवहार करेगा।' वह अपनी पार्टी की गहरी गिरावट और अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी एकनाथ शिंदे के उभरने के कारणों को समझ नहीं पा रहे हैं।
शरद पवार को भी इस बात का एहसास हो गया होगा कि उन्होंने अजित पवार और उनके गुट के नेताओं और कार्यकर्ताओं की वापसी की ताकत को कम आंकने में गलती की। लोकसभा चुनावों के विपरीत, शरद पवार ने अपनी विरासत की रक्षा के लिए इसे अपने भतीजे के साथ एक व्यक्तिगत लड़ाई बना लिया।
बेशक, कांग्रेस को एक संदेश मिल गया। इसके सर्वोच्च नेता राहुल गांधी फिर से अपने मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहे। उनके पसंदीदा विषय केंद्र में रहे लेकिन मतदाताओं को पसंद नहीं आए
राहुल गांधी और उद्धव ठाकरे ने अपने अभियान को धारावी के लिए अडानी परियोजना पर अधिक केंद्रित किया। उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि यह एक बड़े राज्य की 288 सीटों वाला
विधानसभा चुनाव था। वे यह पहचानने में विफल रहे कि राज्य के मतदाता महाराष्ट्र के लिए मोदी की भव्य योजनाओं के प्रति अधिक आकर्षित थे।
झारखंड से विपक्ष को मिली राहत
झारखंड के परिणाम विपक्षी इंडी गठबंधन के लिए निश्चित राहत थी, जहां झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 81 सदस्यीय विधानसभा में ना केवल 56 सीटें जीतीं। बल्कि 2019 में मिले बहुमत में सुधार करते हुए आरामदायक बहुमत हासिल किया। "घुसपैठिया विरोधी" अभियान चलाने वाले एनडीए को राज्य में केवल 24 सीटें मिलीं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) आदिवासी मतदाताओं की सबसे बड़ी पसंद बन गई है। कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और सीपीआई (एमएल) के साथ झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन ने मतदाताओं का विश्वास अर्जित किया। उनका प्रभाव अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों से आगे तक बढ़ा। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी और उसके बाद जमानत पर रिहाई से उत्पन्न 'सहानुभूति' ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
झामुमो के मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के आरोपों और सोरेन सरकार के बारे में भाजपा के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। सोरेन ने दिखाया कि झामुमो 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी सफलता को आगे बढ़ा सकता है। जब झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य की 14 संसदीय सीटों में से नौ पर जीत हासिल की थी। भाजपा ने भी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी (एजेएसयूपी) के साथ गठबंधन किया था और पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन को उनके झामुमो से तोड़कर अपने गठबंधन में शामिल किया था। लेकिन ये प्रयास आदिवासी मतदाताओं पर झामुमो के प्रभाव को कम नहीं कर पाया। चंपई सोरेन का जादू उनके निर्वाचन क्षेत्र तक ही सीमित था। उधर एजेएसयूपी ने जिन दस सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से केवल एक पर जीत हासिल कर पाई।
नतीजों से पता चला कि झामुमो और इंडी गठबंधन पूर्वोत्तर झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में "बांग्लादेशी प्रवासियों की घुसपैठ" के मुद्दे पर भाजपा के नेतृत्व वाले अभियान का मुकाबला करने में सफल रहे। इस रणनीति ने विपक्ष के आदिवासी-मुस्लिम आधार को तोड़ने में कुछ खास सफलता हासिल नहीं की।
एनडीए और इंडी गठबंधन को मिली सीटों की संख्या में काफी अंतर दिखाई दिया। झामुमो के नेतृत्व वाले मोर्चे को 56 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा के गठबंधन को 22 सीटें मिलीं। बेशक, वोट शेयर की बात करें तो 68 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी को 33.2% वोट मिले। यह झामुमो के नेतृत्व वाले मोर्चे की संयुक्त हिस्सेदारी 39.02% से केवल छह प्रतिशत ही कम था। बीजेपी का वोट शेयर 2019 में मिले 33.37% के आस पास ही रहा।
भाजपा के सह-प्रभारी के रूप में, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में कथित बांग्लादेशी घुसपैठ का आरोप लगाते रहे। अन्य भाजपा नेताओं ने इसी लाइन पर बयानबाजी की और इसे "लव और जमीन जिहाद" जैसी परिभाषाएं गढ़ते हुए ये दावा किया कि ये 'घुसपैठिए' आदिवासी महिलाओं से उनकी जमीन लेने के लिए शादी कर रहे थे। इसलिए भाजपा ने आदिवासियों की 'रोटी, माटी, बेटी' की रक्षा के लिए अभियान चलाया।
इस तरह के कैंपेन के बावजूद, भाजपा संथाल परगना में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। हालाँकि भाजपा की रणनीति शहरी उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में कुछ हद तक सफल होती हुई दिखाई दी। जहां भाजपा और उसके सहयोगियों ने 25 में से 14 सीटें जीत ली हैं। प्राथमिक तौर पर भाजपा की भ्रष्टाचार को उजागर करने में असफल दिखाई दी।
उनकी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) पार्टी के तहत कुड़मी नेता जयराम महतो की भूमिका ने भाजपा और उसके सहयोगी, AJSUP और JMM को प्रभावित किया। एक विश्लेषण से पता चला कि सिल्ली, बोकारो, गोमिया, गिरिडीह, टुंडी, इचागढ़, तमाड़, चक्रधरपुर, चंदनक्यारी, कांके और खरसावां जैसी 11 सीटों में जेएलकेएम को मिले वोट जीत के अंतर से अधिक थे। यानी जयराम महतो की पार्टी को मिले वोटों ने एनडीए को चुनाव हरवा दिया। एजेएसयूपी प्रमुख सुदेश महतो खुद सिल्ली से हार गये, जबकि जयराम महतो ओबीसी नेता के रूप में उभरते दिखाई दिए।
महाराष्ट्र की तरह, झारखंड में भी पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं ने अधिक संख्या में मतदान किया। यहां लगभग 91.16 लाख महिलाओं ने मतदान किया। जबकि पुरुष मतदाताओं की संख्या 85.64 लाख रही। मतदान प्रतिशत के संदर्भ में भी देखें तो 65% पुरुष मतदाताओं की तुलना में 70.46% महिला मतदाताओं ने मतदान किया। लोकसभा चुनावों में हुए मतदान से तुलना करें तो विधानसभा चुनाव जहां 1.8 लाख अधिक पुरुष मतदाताओं ने वोट डाला, वहीं 7.3 लाख अधिक महिलाओं ने मतदान किया। हेमंत सोरेन सरकार ने मैय्या सम्मान योजना के जरिए महिलाओं को लुभाने में सफलता हासिल की, जिसमें 21-49 वर्ष की महिलाओं को प्रति माह 1,000 रुपये प्रदान किए जाते हैं। सोरेन ने जेल में रहते हुए इस योजना पर काम किया, उनकी पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन इस योजना का चेहरा बनीं।
बीजेपी और आदिवासी मतदाताओं के बीच दूरियां बरकरार रहीं. किरायेदारी कानूनों में बदलाव की कोशिश के लिए 2014 और 2019 की रघुबर दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की यादें
मतदाताओं के मन में बनी रहीं।
उपचुनाव : लोकसभा के उप-चुनाव में, भाजपा ने महाराष्ट्र की नांदेड़ सीट जीती, और कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने चुनावी डेब्यू में वायनाड में 4 लाख से अधिक वोटों से भारी जीत हासिल की। विधानसभा की 48 रिक्तियों को भरने के लिए हुए उपचुनावों में एनडीए को असम, बिहार और राजस्थान में बढ़त मिली, जबकि कर्नाटक में कांग्रेस सभी तीन सीटें जीतने में सफल रही। जैसा कि अपेक्षित था, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जीत हुई और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका लगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 'बटेंगे तो कटेंगे' का नारा, सपा के ';पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' या पीडीए पर हावी हो गया। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने नौ में से छह सीटें हासिल कीं।
भाजपा ने गाजियाबाद सदर, खैर (सुरक्षित), फूलपुर और मझावन को बरकरार रखा, कुंदरकी और कटेहरी को सपा से छीन लिया, और उसके सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) ने राष्ट्रीय
जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होने के बाद मीरापुर को बरकरार रखा। सपा ने करहल और सीसामऊ के पारिवारिक गढ़ को बरकरार रखा। हालांकि दोनों सीटों पर उसकी जीत का अंतर काफी कम हो गया।
कुंदरकी में सपा प्रत्याशी की हार अखिलेश यादव के लिए चौंकाने वाली रही। पुनर्मतदान की मांग करने वाले उनके उम्मीदवार मोहम्मद रिज़वान ने नौ निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे अधिक 65% मुस्लिम आबादी और 57.7% मतदान वाली सीट पर अपनी जमानत गंवा दी।
योगी ने नतीजों को मतदाताओं की 'सुरक्षा और विकास प्रदान करने की डबल इंजन सरकार की प्रतिबद्धता पर मुहर' बताया। अखिलेश यादव हक्के-बक्के रह गये। वह केवल भाजपा सरकार पर चुनावों को अपने पक्ष में 'धांधली' करने के लिए प्रशासनिक मशीनरी का 'दुरुपयोग' करके 'चुनाव को भ्रष्टाचार का पर्याय' बनाने का आरोप पा रहे हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि यूपी में लोकसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीद से कम प्रदर्शन के पांच महीने बाद योगी ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। हिंदुत्व के निर्विवाद प्रतीक के रूप में, योगी भाजपा के लिए एक मजबूत अखिल भारतीय प्रचारक बने रहे। योगी ने यूपी, महाराष्ट्र और झारखंड में 13 दिनों में 37 जनसभाएं कीं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह भी रही कि कांग्रेस कार्यकर्ता मैदान से नदारद दिखाई दिए। सपा द्वारा केवल दो सीटों की पेशकश किए जाने के बाद कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया और नाराज राहुल गांधी ने अखिलेश यादव के साथ मंच भी साझा नहीं किया। क्या अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम और दलित वोटों को इंडी गठबंधन की ओर आकर्षित करने में कांग्रेस की क्षमता को भांपने में विफल रहे?

शेखर अय्यर
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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