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नितिन के जरिए पीढ़ीगत बदलाव का संदेश

Message of generational change through Nitin

भारतीय जनता पार्टी के बारहवें अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन  ने बीती बीस जनवरी को औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण किया, तब माहौल भावुक भी था और गंभीर भी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे जैसे तप:पूतों, जेना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसे संगठकों और जेपी नड्डा जैसे युवतर अध्यक्ष की तुलना में नवीन महज 45 वर्ष के ही हैं। इस लिहाज से देखें तो वे भारतीय जनता पार्टी के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। नई दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में आयोजित जिस कार्यक्रम में नवीन ने कार्यभार संभाला, तब उन्हें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अध्यक्ष की कुर्सी पर ना सिर्फ बैठाया, बल्कि मिठाई खिलाकर स्वागत भी किया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें पार्टी का "बॉस" बताते हुए कहा कि संगठन के नाते वे अब उनके यानी प्रधानमंत्री के भी मुखिया हैं और उनके भी कामकाज का आकलन करेंगे।
अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी समेत पार्टी के तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में नवीन की ताजपोशी के गहरे संदेश हैं। नितिन नवीन बिहार के बांकीपुर से पांचवीं बार विधायक चुने गए हैं। युवतर नवीन ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद औपचारिक संबोधन में जो कहा, वह उनकी गहरी राजनीतिक समझ और सोच का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भाजपा सिर्फ सियासी ढांचा भर नहीं, बल्कि "सेवा का माध्यम" है। पार्टी अध्यक्ष के नाते उनके कहे ये शब्द सियासी परीक्षा में कितने पास हुए, यह तो भविष्य के निकष पर ही पता चलेगा। लेकिन यह तय है कि नवीन के जरिए पार्टी और उसके अलंबरदारों ने नई राजनीतिक संस्कृति को जन्म दिया है। नवीन के जरिए एक तरह से पार्टी ने पीढ़ीगत परिवर्तन की शुरूआत की है। नवीन के आलोचकों का कहना है कि सही मायने में अखिल भारतीय बन चुकी भाजपा के नए अध्यक्ष की अखिल भारतीय पहचान नहीं है। उसका जवाब पार्टी के ही सूत्र देते हैं। नितिन गडकरी का उदाहरण देते हुए बीजेपी के ही सूत्र कह रहे हैं कि अध्यक्ष बनने से पहले गडकरी की महाराष्ट्र के बाहर कोई खास पहचान नहीं थी, लेकिन अब वे राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित और मान्य नेता बन चुके हैं। कुछ इसी तरह नवीन भी स्थापित हो जाएंगे।
नरेंद्र मोदी के दौर की बीजेपी का जब इतिहास लिखा जाएगा, तब उसकी तमाम खूबियों और खामियों के साथ एक तथ्य को शिद्दत से याद किया जाएगा। वह है उनका हर बार चौंकाने वाला फैसला लेना। राजनीति में युवाओं को शीर्ष पर बैठाने की परंपरा कम ही रही है। लेकिन बीजेपी ने 45 साल के नितिन नवीन को अपना बॉस बनाकर इस परंपरा को एक तरह से धत्ता बता दिया। नितिन को पहले पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, और फिर उन्हें पार्टी की नियमित कमान सौंप दी गई। नितिन की ताजपोशी पर चर्चा से पहले बीजेपी से ही जुड़े अतीत के एक किस्से को याद किया जाना चाहिए। मई 1996 में तेरह दिनी वाजपेयी सरकार के विश्वासमत पर चर्चा के दौरान सुषमा स्वराज ने कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व से पूछा था, कहां है आपकी सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप। हमारी ओर देखिए, वेंकैया हैं, अनंत हैं, प्रमोद हैं। अटल-आडवाणी और जोशी के दौर की बीजेपी में बिना शक ये तीनों ही नाम शीर्ष नेतृत्व में शामिल थे। पार्टी की दूसरी पांत के नेताओं में सुषमा के बताए तीन नामों के साथ ही उनका भी नाम भी शामिल था। बाद के दिनों में अरूण जेटली को भी इसी पंक्ति में शामिल कर लिया गया था। इस संदर्भ में सवाल पूछा जा सकता है कि नितिन नवीन का नाम क्या दूसरी पंक्ति के नेताओं में शुमार होता है। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। भले ही वे पांच बार के विधायक हैं। बीजेपी के मुख्य संगठन में छत्तीसगढ़ के प्रभार की जिम्मेदारी छोड़ दें तो इसके पहले कोई बड़ी भूमिका भी उन्हें नहीं सौंपी गई। भारतीय जनता युवा मोर्चा की बिहार इकाई के वे अध्यक्ष और इसी मोर्चे के राष्ट्रीय महामंत्री जरूर रहे हैं। युवा मोर्चा और मुख्यधारा के संगठन को संभालना अलग है। ऐसे में नवीन के सामने बड़े और दिग्गज नेताओं से भरी बीजेपी को संभालना बड़ी चुनौती होगी। वैसे बीजेपी कैडर आधारित पार्टी है, लिहाजा यह भी माना जा सकता है कि उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होनी है।
बीजेपी के जानकारों का तर्क है कि नितिन नवीन को राष्ट्रीय भूमिका देकर पार्टी ने एक तरह से पीढ़ीगत बदलाव की शुरूआत की है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में बीजेपी में और भी युवा चेहरों को मौका मिलेगा। वैसे देखा जाए तो आजकल बीजेपी में युवाओं और महिलाओं पर जोर है। हालिया बिहार विधानसभा के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी एमवाई का नया विश्लेषण युवा और महिला के रूप में कर ही चुके हैं। वैसे भी वे गरीब, किसान, महिला और जवान की जाति का अक्सर जिक्र करते हैं। कह सकते हैं कि नितिन नवीन भाजपा की इसी नई वर्ग व्यवस्था के सशक्त प्रतीक हैं।
हाल के दिनों में बीजेपी में पिछड़ा नेतृत्व पर कुछ ज्यादा ही फोकस किया गया। इससे बीजेपी का पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक दबे स्वर से नाराजगी भी जाहिर करता रहा है। विराट उभार से पहले बीजेपी को बाभन-बनिया की पार्टी भी कहा जाता था। इसमें कायस्थ और किंचित क्षत्रिय वर्ग भी जुड़ा हुआ था। नितिन नवीन इन्हीं में से एक कायस्थ वर्ग से आते हैं। वैसे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान पाटलिपुत्र से कायस्थ उम्मीदवार ना देने की वजह से बीजेपी का कायस्थ वोटर किंचित नाराज भी दिखा था। इस संदर्भ को देखते हुए एक वर्ग कह रहा है कि नितिन को केंद्रीय नेतृत्व सौंपकर बीजेपी ने अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाता वर्ग को साधने की कोशिश की है। वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नितिन नवीन की ताजपोशी आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव को भी ध्यान में रखकर किया गया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक कायस्थ समाज का दबदबा रहा है। राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु और पहले मुख्यमंत्री विधानचंद्र रॉय इसी समुदाय से थे। ज्योति बसु जहां 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे, वहीं विधानचंद्र रॉय के हाथ 14 साल तक राज्य की कमान रही। नितिन नवीन के जरिए बंगाल के इस वर्ग के वोटरों को भी पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है।
नितिन नवीन को नेतृत्व सौंपे जाने को लेकर कुछ महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भाजपा को मिले संकेतों का भी जिक्र किया जा रहा है। संघ ने बीजेपी को संकेत दिया था कि पिछड़े - दलित आदि को शासन और प्रशासन से मिले फायदों का जिक्र भले ही करे, लेकिन संगठन के मामलों में जातीय आधार पर फैसले ना ले। संघ का पार्टी को यह भी संकेत था कि वह संगठन की भूमिकाएं तय करते वक्त कार्यकर्ताभाव और उसकी संगठन क्षमता और निष्ठा को देखे। नितिन नवीन की नियुक्ति को इस निकष पर भी कसा जा सकता है। नवीन पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे हैं। 
संगठन ने जो भी भूमिका सौंपी, उसे संगठन के लिहाज से पूरा करने की कोशिश की है। छत्तीसगढ़ राज्य में बीजेपी की पिछली जीत ने उनके संगठन कौशल की ओर झांकने का मौका दिया। कह सकते हैं कि उनकी नियुक्ति के पीछे ये भी कारण रहे होंगे। हालांकि आलोचक कह सकते हैं कि नितिन की तुलना में संगठन में खुद को खपाने वाले बहुत लोग अब भी सक्रिय हैं। फिर उन्हें क्यों नहीं मौका मिलना चाहिए। यह तर्क वाजिब हो सकता है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीतिक फैसले लेते वक्त कई बिंदुओं पर ध्यान दिया जाता है।
बीजेपी अक्सर दावा करती है कि वह पढ़े-लिखे लोगों को तवज्जो देती है। बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कुछ विपक्षी दलों के प्रवक्ताओं की उनकी आक्रामक और बदतमीज व्यवहार के चलते आलोचना की थी। तब उसने अपने पढ़े-लिखे प्रवक्ताओं पर जोर दिया था। इस आधार पर नितिन नवीन को लेकर बीजेपी असहज हो सकती है। विपक्षी कह सकते हैं कि पार्टी को अपने अध्यक्ष के लिए पढ़ा-लिखा कार्यकर्ता नहीं मिला। क्योंकि नितिन महज बारहवीं पास ही हैं। बीजेपी अक्सर वंशवाद का विरोध करती है। तकरीबन हर मंच पर वह इसके खिलाफ आवाज उठाती है। जब पार्टी के अंदर के वंशवाद पर विपक्षी खेमे से सवाल उठता रहा, तब पार्टी का तर्क होता था कि शीर्ष पर उसके यहां वंशवाद नहीं रहा।
नितिन के संदर्भ में वह क्या जवाब देगी, यह देखना महत्वपूर्ण रहेगा। क्योंकि नितिन के पिता नवीन किशोर सिन्हा बिहार बीजेपी के कद्दावर नेता रहे हैं। बिहार में बीजेपी को खड़ा करने वाले नेताओं में नवीन किशोर का योगदान माना जाता रहा है। आखिर में एक और तथ्य की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। 1959 में जब दिग्गज नेताओं के रहते हुए भी कांग्रेस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को अध्यक्ष बनाया, तब इंदिरा की उम्र महज 42 साल थी। ठीक 66 साल बाद आज की सत्ताधारी बीजेपी ने पैंतालिस साल के नितिन नवीन पर भरोसा जताया है। अध्यक्ष बनने के सिर्फ छह साल बाद ही वे देश की प्रधानमंत्री बन गई थीं, नितिन आगे और कितनी ऊंचाई पर जाएंगे, यह देखने के लिए इंतजार करना होगा।

 


उमेश चतुर्वेदी
 वरिष्ठ पत्रकार 
 राजनीतिक समीक्षक 
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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