Written by -अंशुमान आनंद
जम्मू-कश्मीर में हुए बंपर मतदान ने अलगाववाद की खोल दी पोल है। पहले चरण के मतदान में 61 फीसदी से ज्यादा वोट पड़े हैं। जिससे धारा 370 लौटाने का समर्थन कर रहे नेताओं के मुंह पर कालिख पुत गई है ।
जम्मू कश्मीर में पहले चरण के लिए 24 विधानसभा सीटों पर 61.1 फीसदी मतदान हुआ। सबसे ज्यादा 77.23 प्रतिशत किश्वाड़ में हुआ। जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। पिछली बार 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 60.3 रहा था। यानी इस बार जम्मू कश्मीर की जनता ने ज्यादा मतदान किया है।
इस बढ़े हुए वोटिंग प्रतिशत ने दुनिया को संदेश दे दिया कि दुनिया के इस स्वर्ग में अलगाववाद की जड़ें कमजोर हो गई हैं । वहां के डीएनए में अलगाववाद या आतंकवाद नहीं था । बल्कि इसे कुछ लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से अपने स्वार्थ के लिए जबरदस्ती वहां शुरू किया गया था । क्योंकि मतदान ऐसी चीज है जिसके लिए कोई किसी को मजबूर नहीं कर सकता । हो सकता है कि अलगाववादी आरोप लगाएं कि केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती कर रखी है । लेकिन वोट करने के लिए केंद्र भी किसी को जबरदस्ती नही कर सकता । जबकि इसके उलट सच्चाई यह हैकि पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद और वहां के मुफ़्ती-अब्दुल्ला जैसे राजनेता एक दूसरे से सांठगांठ बनाकर चलते थे। अलगाववाद की आड़ में कश्मीर में आतंक फैलाकर ऐसा माहौल बनाए रखा जाता था कि जनता कंट्रोल में रहे मतदान करने के लिए निकले ही नहीं और सीमित वोटिंग प्रतिशत के साथ वहां ये लोग सत्ता में काबिज रहें मुफ्ती, अब्दुल्ला, कांग्रेस जैसे राजनेताओं के लिए कम वोटिंग होना वरदान की तरह था क्योंकि इससे उन्हें सत्ता हासिल करने का मौका मिल जाता था। इसीलिए यह लोग अलगाववादियों और आतंकवादियों को पालकर रखते थे। इसके बदले में ये लोग आतंक का खेल करवाते थे और केंद्र को धमकाते थेकि अगर इनके खिलाफ कोई एक्शन किया तो यहां खून की नदियां बहेंगी। दूसरी तरफ देश के बाकी के हिस्सों के लोगों के बीच भ्रम फैलाया जाता था कि कश्मीर के लोग भारत की लोकांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास ही नही करते। इसीलिए मतदान नहीं करते हैं। लेकिन इस बार कश्मीरी जनता ने मतदान करके मुफ्ती, कांग्रेस, अब्दुल्ला के साथ साथ आतंकियों अलगाववादियों को भी जवाब दे दिया है। यह वही सिंडिकेट था जिसके ब्लैकमेल की वजह से जम्मू कश्मीर में हालात बिगड़े ही रहते थे। जिसे संभालने के लिए केन्द्र सरकार भर भरकर पैसा भेजती थी। ब्लैकमेलिंग के नाम पर जिसका कोई हिसाब भी न होता था। जिसे सब मिल बांटकर खाते थे और राज्य को हिंसा में ही झोंककर रखते थे। इसी का फायदा पाकिस्तान भी उठाता था और अपने पाले हुए आतंकियों के जरिए कश्मीर में आतंक का माहौल बनाए रखता था.।
एक जमाना था जब कश्मीर में पाकिस्तान की हेकड़ी ऐसी थी कि सोनिया गांधी जैसी सुपर प्राइम मिनिस्टर भी कश्मीर दौरे से पहले पाकिस्तान की परमिशन लेती थीं। हालांकि सोनिया या कांग्रेस ने हमेशा ऐसा ही जम्मू कश्मीर चाहा था क्योंकि पाकिस्तान को ऐसा जम्मू कश्मीर चाहिए था और बदले में पाकिस्तान के चंद सत्ताधीशों और वहां की फौजको फायदा पहुंचात था।
इस बंपर मतदान के बाद कश्मीर में भले कोई भी पार्टी जीते,भले ही भाजपा हाशिए पर चली जाए लेकिन कश्मीरी अवाम जिस तरह मतदान के लिए निकली है और बम्पर वोटिंग की है । उसी से पता चल जाता है कि कश्मीर के लोग अलगाववाद नहीं बल्कि अपनी बात रखने को लोकतंत्र का मार्ग चाहते थे लेकिन उन्हें कभी वो मार्ग दिखाया ही नही करवाया गया और यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की जीत है क्योंकि जिस भूभाग को दुनिया मे ये कहकर दुष्प्रचारित किया गया कि वहां पर भारत ने सेना के दम पर कब्जा किया हुआ है । वहां के लोगों ने लोकतंत्र पर भरोसा दिखाकर अलगाववादियों, आतंकियों के साथ साथ पाकिस्तानियों के मुंह पर भी तमाचा मारा है और कह दिया है कि हमें भारत पर पूरा भरोसा है लेकिन सच यह भी है कि कश्मीर में इस बंपर मतदान से दुनिया भर में पता नहीं कितनी ही अलगाववादी दुकानों पर ताला लग जाएगा जो कि दुनिया भर में कश्मीर के नाम पर चंदा इकट्ठा करने का धंधा करते हैं।
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