हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के मंचर कस्बे में मरम्मत कार्य के दौरान एक मस्जिद के नीचे मंदिर की संरचना मिलने की घटना ने एक बार फिर उस बहस को तेज़ कर दिया है, जिसे आज़ाद भारत लगातार टालता आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस खुलासे की जाँच शुरू कर दी है, लेकिन असली सवाल इस एक स्थल तक सीमित नहीं है। असली सवाल हमारी पूरी सभ्यता की स्मृति से जुड़ा है—कब तक इस देश में मंदिरों को तोड़कर उन पर बनी मस्जिदों और नष्ट किए गए तीर्थस्थलों के सत्य को तथाकथित सेक्युलरिज़्म के नाम पर दबाया जाएगा?
मंचर की घटना कोई अकेली मिसाल नहीं है। भारत के कोने-कोने में, काशी विश्वनाथ से लेकर मथुरा तक, मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला से लेकर गुजरात और बंगाल के खंडहरों तक, धरती आज भी उन घावों को अपने भीतर समेटे हुए है जो विदेशी आक्रांताओं ने इस भूमि पर किए। टूटी-फूटी मूर्तियाँ, भग्न शिखर, मंदिर की दीवारों को मस्जिदों में जड़कर बनाए गए खंभे, देवी-देवताओं की आकृतियों पर हथौड़े के निशान—ये सब साक्ष्य इस सच्चाई की चीखते हुए गवाही देते हैं कि इस भूमि पर एक सभ्यता ने व्यवस्थित रूप से आक्रमण झेला। फिर भी, स्वतंत्रता के बाद हमारे राजनीतिक तंत्र ने इन घावों पर स्मृति का परदा डाल दिया, और इसे “साम्प्रदायिक सौहार्द्र” का नाम देकर केवल हिंदू स्मृति और अस्मिता को मिटाने का काम किया।
सेक्युलरिज़्म का असली चेहरा: चयनात्मक विस्मृति
भारत में सेक्युलरिज़्म का स्वरूप पश्चिमी देशों की तरह नहीं रहा। वहाँ चर्च और राज्य का अलगाव होता है, लेकिन भारत में इसे “सर्वधर्म समभाव” कहकर गढ़ा गया। सुनने में यह समानता का सिद्धांत लगता है, लेकिन व्यवहार में यह एक राजनीतिक औज़ार बन गया जिसने खासतौर पर मंदिरों के विध्वंस और सांस्कृतिक विनाश की चर्चा पर प्रतिबंध लगा दिया। आज़ादी के बाद से ऐसा वातावरण बनाया गया कि अगर कोई यह प्रश्न उठाए कि किस तरह हजारों मंदिर तोड़े गए और उनके ऊपर मस्जिदें खड़ी की गईं, तो उसे तुरंत “सांप्रदायिक” कहकर चुप करा दिया जाए।
मंचर का खुलासा इसी बनावटी ढाँचे को उजागर करता है। जैसे ही किसी मंदिर के अवशेष मिलते हैं, तत्काल राजनीतिक और बौद्धिक तंत्र यह कोशिश करता है कि उसे दबा दिया जाए, या कानूनी बहानों में उलझा दिया जाए। असलियत यह है कि भारत का तथाकथित सेक्युलर ढाँचा इस प्रकार गढ़ा गया है कि हिंदू पीड़ा को मान्यता ही न मिले, जबकि अल्पसंख्यकों की मामूली शिकायतें भी बड़े-बड़े मुद्दों में तब्दील कर दी जाती हैं।
पूजा स्थल अधिनियम 1992: कानूनी ताला
इस दमन का सबसे बड़ा औज़ार है पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम(1992)। नरसिंह राव सरकार ने इसे राम जन्मभूमि आंदोलन की चरम स्थिति के दौरान लागू किया। इस क़ानून ने 15 अगस्त 1947 की स्थिति को “स्थायी” मानते हुए सभी धार्मिक स्थलों के स्वरूप को उसी रूप में बनाए रखने का आदेश दिया। अपवाद केवल अयोध्या का राम जन्मभूमि स्थल रखा गया।
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि यदि किसी मंदिर को सन् 1670 में औरंगज़ेब ने तोड़ दिया और उस पर मस्जिद बना दी गई, तो 1947 में मस्जिद की जो स्थिति थी वही “कानूनी सत्य” मान ली जाएगी। किसी भी हिंदू समुदाय को यह अधिकार नहीं रहेगा कि वह अदालत में जाकर अपने मंदिर की माँग कर सके या जाँच की अपील कर सके। इस प्रकार यह कानून ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के बजाय उसे स्थायी बना देता है।
पूजा स्थल अधिनियम को “सौहार्द्र” का प्रतीक बताया गया, लेकिन असल में यह एक कानूनी हथकड़ी है जो हिंदुओं की आवाज़ दबाने के लिए तैयार की गई। यह अधिनियम मानकर चलता है कि सत्य खतरनाक है, इतिहास से सामना नहीं किया जा सकता, और शांति तभी संभव है जब हिंदू अपनी स्मृति और घावों को दफना दें। यह दुनिया का शायद अकेला कानून है जो अन्याय को वैध ठहराता है, न कि उसका उपचार करता है।
न्यायपालिका की भूमिका: चुप्पी या मिलीभगत?
अगर राजनीति ने यह कानूनी ढांचा गढ़ा, तो न्यायपालिका ने उसे मज़बूती से लागू किया। 2019 में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अदालत ने पूजा स्थल अधिनियम को संवैधानिक मानते हुए कहा कि यह “सेक्युलरिज़्म की रक्षा करता है।” अदालत ने माना कि इतिहास में मंदिरों को तोड़ा गया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि उन घावों को अब कुरेदना नहीं चाहिए।
न्यायपालिका का यह रवैया तटस्थता नहीं बल्कि एक प्रकार की सहमति और मिलीभगत है। दशकों से अदालतें हिंदू परंपराओं और मंदिर प्रबंधन में हस्तक्षेप करती रही हैं—दीवाली की आतिशबाज़ी पर रोक, तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर रोक, सबरीमाला की परंपराओं पर हस्तक्षेप—लेकिन जब बात मंदिर विध्वंस और ऐतिहासिक अन्याय की आती है, तो वही अदालतें अचानक “सयंम” दिखाने लगती हैं। असलियत यह है कि अगर न्यायपालिका खुले तौर पर मान ले कि मंदिरों को व्यवस्थित ढंग से तोड़ा गया और उनके ऊपर मस्जिदें बनीं, तो “गंगा-जमुनी तहज़ीब” और “सांझी संस्कृति” का वह नकली तर्क ढह जाएगा जिसे आज़ादी के बाद से पोषित किया गया। फिर सवाल उठेगा—क्या मंदिर वापस दिए जाएँ? क्या न्याय केवल एकतरफ़ा होना चाहिए? क्या सेक्युलरिज़्म का अर्थ हिंदू पीड़ा को दबाना है? इन सवालों का सामना करने से बचने के लिए ही अदालतें चुप्पी साध लेती हैं।
सभ्यता की स्मृति बनाम राजनीति की सुविधा
यह इनकार केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं है, यह हमारी सभ्यता की आत्मा पर दूसरा आघात है। भारत में मंदिर केवल पूजा स्थलों तक सीमित नहीं थे। वे शिक्षा, कला, संस्कृति और सामाजिक जीवन के केंद्र थे। उनका विध्वंस केवल पत्थरों का टूटना नहीं था, बल्कि एक पूरे समाज की रीढ़ तोड़ने का सुनियोजित प्रयास था।
मंचर की खोज हमें यही याद दिलाती है कि सत्य हमेशा दबा नहीं रह सकता। चाहे उसे कितनी भी मिट्टी के नीचे दबाया जाए, इतिहास समय-समय पर बाहर आता है। हर टूटी मूर्ति, हर दीवार में जड़ा मंदिर का खंभा, हर ज़मीन के नीचे मिला गर्भगृह यह कहता है कि यह भूमि सब कुछ याद रखती है।
बनावटी सेक्युलरिज़्म का बोझ
सेक्युलरिज़्म के पैरोकार अक्सर कहते हैं कि पुराने घाव कुरेदने से समाज अस्थिर हो जाएगा। लेकिन क्या समाज ज़्यादा अस्थिर तब नहीं होता जब एक समुदाय की स्मृति और घावों को ज़बरन भुलवाया जाए? असली सौहार्द्र तभी संभव है जब अन्याय को स्वीकार किया जाए, पीड़ित समुदाय को न्याय मिले और उसकी स्मृति का सम्मान किया जाए।
आज का सेक्युलरिज़्म हिंदुओं से कहता है कि वे अपने मंदिरों की याद छोड़ दें, उन मस्जिदों को देखें जिनकी दीवारों में उनके देवताओं की मूर्तियाँ जड़ी हैं और फिर भी चुप रहें। दूसरी ओर, यही सेक्युलरिज़्म अल्पसंख्यकों की हर मांग पर झुक जाता है। यह विषमता लंबे समय तक नहीं टिक सकती।
सत्य और मेल-मिलाप की ओर
मंचर की घटना को केवल स्थानीय विवाद मानकर दबा देना आसान रास्ता होगा, लेकिन सही रास्ता नहीं। ज़रूरी है कि एएसआई बिना किसी राजनीतिक दबाव के इसकी जाँच पूरी करे और निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएँ। संसद में इस अधिनियम की वैधता पर चर्चा होनी चाहिए। न्यायपालिका को भी सोचना चाहिए कि क्या “सेक्युलरिज़्म” की रक्षा का मतलब सत्य को दबाना है।
निश्चित ही, सैकड़ों सालों के अन्याय को एक झटके में सही नहीं किया जा सकता। लेकिन कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार किया जाए, जो संभव हो उसे पुनर्स्थापित किया जाए और हिंदुओं को उनकी स्मृति और गरिमा लौटाई जाए। इसके बिना शांति केवल सतही रहेगी।
निष्कर्ष: याद रखने वाली सभ्यता
मंचर का मंदिर केवल महाराष्ट्र का मसला नहीं है। यह भारत की आत्मा का प्रतीक है—एक सभ्यता जिसका इतिहास दबाया गया, जिनके पवित्र स्थल मिटाए गए, जिनकी स्मृति को राजनीतिक सौदेबाज़ी में दफना दिया गया। लेकिन जैसे मंचर में मस्जिद के नीचे मंदिर सामने आया, वैसे ही सत्य भी बार-बार ज़मीन फाड़कर सामने आता रहेगा।
असल सवाल यह है कि क्या भारत में वह साहस है कि वह इस सत्य को स्वीकार कर सके? क्या हम बनावटी सेक्युलरिज़्म की बेड़ियाँ तोड़कर वास्तविक बहुलतावाद को अपनाएँगे, जो सबसे पहले ऐतिहासिक अन्याय को मान्यता देने से शुरू होता है? यही प्रश्न तय करेगा कि मंचर जैसे मंदिरों का भविष्य क्या होगा और भारतीय गणराज्य का नैतिक आधार कितना मज़बूत रहेगा।
अंतकारी देवी

यह विखंडित प्रतिमा भी भेड़ाघाट जबलपुर में स्थित है। जैसा कि नाम से जाहिर है कि यह मृत्यु के देवता यमराज की सहचरी हैं। इसलिए इनका स्वरुप उग्र और भयावह बनाया गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस प्रतिमा को धर्मांध कट्टरपंथी मुगल शासक औरंगजेब ने अपने हाथों से तोड़ा था। इस देवी को महिष यानी भैंसे के वाहन पर सवार दिखाया गया है। लेकिन महिष का शीश खंडित है, दाहिना पैर भी जंघा के पास से तोड़ दिया गया है। प्रतिमा की दो भुजाएं भी तोड़ दी गई हैं।
श्रीविभत्सा देवी

यह विखंडित प्रतिमा देवी के किसी उग्र स्वरुप की है और जैसा कि इसके नाम से ही जाहिर है कि यह प्रतिमा नौ रसों में से एक वीभत्स रस का दर्शन कराती है। इस प्रतिमा को शव पर आरुढ़ दिखाया गया है। जिससे यह ज्ञात होता है कि इस देवी की उपासना तांत्रिक उद्देश्यों के लिए की जाती होगी। इस प्रतिमा को भी मुगलों ने बुरी तरह से खंडित करने का प्रयास किया है। इनके दोनों हाथ और दाहिने स्तन को खंडित कर दिया गया है। प्रतिमा के पीछे स्थित मंडलचक्र को भी नष्ट करने की कोशिश की गई है।
वाराही देवी

यह खंडित प्रतिमा वाराही देवी की है। जो कि सप्त मातृकाओं में से एक मानी जाती हैं। वाराही देवी भगवान नारायण के वाराह अवतार का नारी स्वरुप हैं। अर्द्ध पद्मासन की मुद्रा में स्थित इस प्रतिमा का मुख शूकर के समान दर्शाया गया है, जो कि अपने बांई तरफ देख रही हैं। इस प्रतिमा के दोनों हाथ और एक पैर को खंडित किया गया है। यह प्रतिमा भेड़ा घाट के चौंसठ योगिनी मंदिर में स्थित है। जहां हुए इस्लामी आक्रमण के दौरान इस प्रतिमा को क्षति पहुंचाई गई।

नीलाभ कृष्ण
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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