ममता ने मई 2011 में 34 साल के कम्युनिस्ट शासन को उखाड कर पश्चिमी बंगाल का शासन संभाला था। लेकिन इस सत्ता पलट के पीछे नंदी ग्राम का वह जन आन्दोलन था जिसने कम्युनिस्टों का जन विरोधी चेहरा नंगा कर दिया था। 2006 के आसपास ही यह आन्दोलन शुरु हुआ था। सरकार विकास के नाम पर किसानों की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास कर रही थी। यह जमीन किसी इंडोनेशिया की कम्पनी को देनी थी। औने-पौने दामों पर ली जा रही जमीन इस जमीन से ग़रीब किसानों की रोज़ी रोटी चलती थी। इसलिए किसान इसका विरोध कर रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी अपने उस वक्त के “शाहजहों” के बल पर किसानों को ‘लाल सबक’ सिखा रही थी। ममता बनर्जी ने उस वक्त लाल झंडे वालों की इस गुंडागर्दी का विरोध किया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि नंदी ग्राम के इस आन्दोलन को चलाने के पीछे असली ताक़त शुभेन्दु अधिकारी की थी। दोनों की इस रणनीति में ममता बनर्जी को इस आन्दोलन का सार्वजनिक चेहरा बनना था और शुभेन्दु अधिकारी को आन्दोलन को संगठित करना था। उसका सही परिणाम भी निकला। पश्चिमी बंगाल से कम्युनिस्टों की दशकों पुरानी सत्ता ढेरी हो गई ।
लगता है सत्ता संभालने पर ममता बनर्जी ने गहराई से अध्ययन किया होगा कि आख़िर बंगाल जैसे प्रान्त में, जो देश की बौद्धिक चेतना का केन्द्र माना जाता है, कम्युनिस्ट इतने लम्बे अरसे तक सत्ता पर गेंडुली मार कर कैसे बैठे रहे ? वह भी तब जब उनके शासन काल में हर क्षेत्र में पिछड़ रहा था। उद्योग धन्धे प्राय: समाप्त हो गए थे। विश्वविद्यालय अध्ययन का केन्द्र न रह कर राजनीति का अड्डा बन गए थे। कम्युनिस्टों के शासन काल की कार्य प्रणाली का कोई भी गहराई से अध्ययन करेगा तो वह तुरन्त उसके मुख्य बिन्दुओं को पकड़ सकता है। सबसे बड़ा कारक था पश्चिमी बंगाल में ‘शाहजहाँ’ जैसे ज़मींदार स्थापित करना। इस प्रकार के ज़मींदारों को पार्टी किसी क्षेत्र विशेष का ठेका दे देती थी। उस क्षेत्र के वोटरों को पार्टी के पक्ष में पोलिंग बूथ तक लेकर आने और उनको लाल झगड़े के पक्ष में भुगताने का महत्वपूर्ण काम पार्टी ने इन ज़मींदारों को सौंप रखा था। बौद्धिक शब्दावली में पार्टी ने इसी की व्याख्या ‘सर्वहारा की क्रान्ति’ के नाम से कर दी थी। व्याख्या करने का यह काम पार्टी ने विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों को दे रखा था, जो इसे बख़ूबी निभा रहे थे। कम्युनिस्टों ने यह शासन पद्धति अंग्रेज़ों से ही सीखी थी। अंग्रेजों ने जब बंगाल पर कब्जा किया था को उन्होंने स्थानीय लोगों को डराने धमकाने के लिए यही पद्धति अपनाई थी। कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत में शासन की इस अंग्रेज़ी पद्धति को और गहराई से तब समझ लिया था जब वे 1942 के विश्व युद्ध में सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ मोर्चा लगा कर डट गए थे और इंग्लैंड के साथ मिल कर क़दम ताल करने लगे थे। कम्युनिस्टों से यह रणनीति ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्दी ही उधार ले ली लगती है। कम्युनिस्टों की सत्ता चली गई तो बंगाल के ऐसे सभी शाहजहाँ एकदम अनाथ हो गए। वैसे भी अब लाल फुदकना लगा कर बाँस लेकर घूमने का कोई लाभ नहीं रह गया था। लेकिन यहाँ एक प्रश्न अवश्य पैदा होता है जिसका उत्तर दिए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। यह प्रश्न है कि पूरे बंगाल जिले में ऐसे शाहजहाँ होते हुए भी मतदाताओं की हिम्मत सीपीएम को हराने की कैसे पड़ी ? उसका एक ही उत्तर है कि जब शुभेन्दु अधिकारी और ममता बनर्जी ने अपने जीवट से नंदी ग्राम में कम्युनिस्टों को आक्रामक से सुरक्षात्मक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया तो आम लोगों को विश्वास हो गया कि कम्युनिस्टों के शाहजहांओं को भी पराजित किया जा सकता है। यदि पशुबल से नहीं तो वोट के बल से, और बंगालियों ने सचमुच कम्युनिस्टों को पोलिंग बूथों में धूल चटा दी।

अब जैसे जैसे ममता बनर्जी का बंगाल की आम जनता से सम्बध टूटता जा रहा है, वैसे वैसे उसे भी सत्ता में बने रहने के लिए ‘शाहजहों’ की जरुरत पड़ने लगी। लेकिन नए शाहजहाँ बनाने में तो बहुत समय दरकार था। इसलिए ममता बनर्जी ने शार्टकट ही अपनाया। उसने कम्युनिस्टों द्वारा बनाए और पाले पोसे शाहजहांओं को ही तृणमूल की टोपी पहनाने का निर्णय कर लिया। उधर कम्युनिस्ट पार्टी के शाहजहाँ भी बदले हालात में लाल टोपी पहनने में असहज महसूस कर रहे थे। उन्होंने फुंदने वाली हरी टोपी पहन ली थी। ममता बनर्जी को भी इसी प्रकार की हरी टोपी वाले शाहजहाँ चाहिए थे । इस टोपी से मजहब का लाभ भी लिया जा सकता था और हिन्दु रीति रिवाजों वालों को पशुबल से डराया जा सकता था। ये शाहजहाँ ममता बनर्जी की पार्टी के लिए ‘टू इन वन’ की भूमिका अदा कर रहे थे। लेकिन अपने इस पूरे प्रयोग में ममता बनर्जी यह भूल गईं कि इस प्रकार के शाहजहाँओं के बलबूते देर तक किसी जनता को बन्धक बना कर नहीं रखा जा सकता। इस प्रकार के शाहजहांओं के खिलाफ पहला विद्रोह नंदी ग्राम से शुरु हुआ था और अब यह दूसरा विद्रोह संदेशखाली से शुरु हुआ है। नंदी ग्राम आन्दोलन का नेतृत्व शुभेन्दु अधिकारी और ममता बनर्जी कर रहीं थीं और संदेशखली आन्दोलन का नेतृत्व शुभेन्दु अधिकारी और भारतीय जनता पार्टी कर रही है। उस वक्त सत्ता के नशे में मदहोश कम्युनिस्ट नंदी ग्राम के संदेश को पकड़ नहीं पाए थे। इसका एक कारण यह भी था कि उनका सम्बध प्रदेश की आम जनता से टूट चुका था। अब सत्ता के नशे में मदहोश ममता बनर्जी संदेशखली के संदेश को पकड़ नहीं पा रही हैं क्योंकि उसका भी प्रदेश की आम जनता से टूट चुका लगता है। इतिहास का एक चक्र पूरा हो गया है। लगता है बंगाल में इतिहास एक बार फिर अपने आप को दोहराने के मुहाने पर आ गया है।
जिला चौबीस परगना का संदेशखाली, जो सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, पिछले लगभग एकमास से सुर्खियों मे है। सुर्खियों में रहने का कारण तृणमूल कांग्रेस के एक बड़े नेता शाहजहाँ शेख के व्यवहार से हुआ लेकिन जब ज्वालामुखी फटा तो उसके नीचे से शाहजहाँ द्वारा बनाया गया ऐसा नर्क सामने आया जिससे किसी का भी दम घुटने लगे। शाहजहाँ तृणमूल कांग्रेस का नेता है और पार्टी की ओर से जिला परिषद का निर्वाचित सदस्य है। उसके अनेक प्रकार के धन्धे हैं। उनमें से एक मनी लांड्रिंग का भी है। मनीलांड्रिंग का अर्थ हैकाले धन को सफ़ेद करना। यानि नाजायज़ साधनों से प्राप्त नाजायज़ काले धन को सफ़ेद बनाना। हिन्दी वालेइसे धन शोधन कहते हैं ,यानि धन को शुद्ध करना। पिछले दिनों प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने मनीलांड्रिंग के मामलों को लेकर उसके घर छापा मारा था। अलबत्ता जब ईडी के बड़े अधिकारी शाहजहाँ शेख के घर पहुँचे तो उसने उनके स्वागत के लिए पुराने मुगल बादशाह शाहजहाँ की तरह की ही व्यवस्था कर रखी थी। उसके लोगों ने ईडी के अधिकारियों को घेर लिया और दौडा दौड़ा कर पीटा। किसी की यह हिम्मत कि शाहजहाँ के महल पर छापा मारे ? ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी की पुलिस भी शाहजहाँ शेख को मुगल बादशाह शाहजहाँ ही समझ रही थी। पुलिस ने ईडी के अधिकारियों की मदद करने की बजाए उन पर हमला कर रहीशाहजहाँ की सेना की ही मदद करनी शुरु की। इतना ही नहीं ईडी के अधिकारियों पर केस दर्ज कर दिया किउन्होंने शाहजहाँ के महल में चोरी की है। पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आग उगलनी शुरु कर दी। उनके लिए यह जरुरी था क्योंकि उनके आसपास के लोग उन्हें अग्निकन्या कहते हैं। अग्निकन्या का कहनाथा कि केन्द्र सरकार उनकी पार्टी के लोगों को बिना कारण के तंग कर रही है। लेकिन शाहजहाँ शेख इतना मूर्ख नहीं था। वह समझ गया था कि अग्निकन्या को अन्दाज़ा नहीं कि मामला ज्यादा बढ़ गया है। अब वह ममताबनर्जी की छत्रछाया में रहकर भी बच नहीं पाएगा। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है। इसलिए वह संदेशखाली में अपना महल और सिंहासन छोड़ कर भाग निकला। अब भाग निकला या पुलिस ने ही भगा दिया , यह अपने आप में अलग जाँच का विषय है। वैसे ममता की पुलिस का कहना है कि वह उसे तलाश करने में आकाश पाताल एक कर रही है।

जब वहाँ के लोगों को यक़ीन हो गया कि शाहजहाँ शेख अपनी खाल बचाता घूम रहा है तो उनमेंभी अपना दर्द बयान करने का साहस आ गया। लेकिन जब वहाँ की औरतों ने अपना दर्द बयान करना शुरुकिया तो सचमुच भूकम्प आ गया। उनका कहना था कि तृणमूल के कार्यकर्ता बाक़ायदा हिन्दु घरों में जा जाकरसर्वे करते हैं । पहली नज़र में कोई भी समझेगा कि इसमें क्या बुरा है। सरकार अपनी लोक कल्याणकारी योजनाओं को असली ग़रीबों तक पहुँचाने के लिए यदि सर्वे कर रही है तबतो इसका स्वागत ही होना चाहिए । लेकिन पता चला की शाहजहाँ के कार्यकर्ता कल्याणकारी योजनाओं केलिए सर्वे नहीं करते बल्कि परिवारों में सुन्दर विवाहित/अविवाहित औरतों की तलाश में सर्वे करते हैं और जहाँ सेभी सुन्दर औरत मिलती है , उसको उठाकर ले जाते हैं और सामूहिक बलात्कार करते हैं। उनका अपहरण करते हैं। कई परिवार तो शाहजहाँ के इस सर्वे के आतंक से अपनी युवा लड़कियों को बाहर रिश्तेदारों के पास भेजनेलगे थे। यह भी आरोप लग रहे हैं कि इस सर्वे का शिकार हिन्दु लड़कियाँ ही होती थीं। इतने साथ सामूहिक बलात्कार होता था। इनके पतियों को या तो भगा दिया जाता था या फिर उन्हें वक्त से समझौता करना पड़ता था। और उस मामले में उस व्यक्ति का नाम शाहजहाँ था। इतना ही नहीं लड़कियों को उठा लेने के बाद धीरे-धीरे उनकी जमीन जायदाद पर भी कब्जा कर लिया जाता था। उन सब के लिए संदेश खली एक जीता जागतादोजख बन गया था। यह शाहजहाँ की वह ‘सरकार’ थी जहाँ हिन्दु औरतों को सैक्स के लिए दास बना लिया गया था। लगता है सत्ता के लालच में उन्होंने बंगाल के कुछ हिस्सों की ठेकेदारी कुछ शाहजहाँ जैसे ठेकेदारों को सौंप रखी है जो अपने इलाक़े की एक मुश्त वोटें ‘अग्निकन्या’ को दिलवा दें , उसके बाद वे अपनी ‘रिआया’ केसाथ वह सब कुछ करें जो शाहजहाँ और उसकी सर्वे टीम संदेशखली में कर रही है।
लेकिन ममता बनर्जी के लिए इन चीज़ों का कोई अर्थ नहीं है। वे संदेशखली को इस प्रकार देख रही थी जिस प्रकार कभी सीपीएम नंदी ग्राम को देखा करता था। वे संदेशखली की औरतों की पीड़ा या तो समझनहीं पाई या फिर सत्ता के अहंकार में समझना नहीं चाहतीं। ध्यान रखना चाहिए कि संदेशखाली कोलकाता सेमहज़ सौ किलोमीटर दूर है। कोलकाता की नाक के नीचे “शाहजहाँ” ने वहाँ की महिलाओं के लिए जितना भयंकर नर्क तैयार किया हुआ था, वह सरकारी मशीनरी की प्रत्यक्ष - परोक्ष सहायता के बिना सम्भव नहीं है। पता चला है पुलिस यौन शोषण के प्रत्यक्ष गवाह माँग रही है। ममता बनर्जी ने संदेशखली की इन महिलाओं कोसबक़ सिखाने की सोची। इन औरतों की इतनी हिम्मत की तृणमूल के “शाहजहाँ” को ललकारें। इसलिए ममता ने संदेशखली में किसी के भी जाने पर ही पावन्दी लगा दी। धारा 144 लगा दी । यानि तगड़ा मारे भीऔर रोने भी न दे। पत्रकारों को रोका ही नहीं गया बल्कि उनको कैमरों के सामने ही गिरफ्तार कर लिया। पश्चिमी बंगाल विधान सभा में विपक्ष के नेता शुभेन्दु अधिकारी को संदेशखाली जाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्टजाना पड़ा। न्यायालय के दख़लन्दाज़ी के बाद शुभेन्दु अधिकारी वहाँ पहुँचे तो पीड़ित महिलाएँ विलख विलखकर होने लगीं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा० सुकान्त मजूमदार को पुलिस ने बन्दी बना लिया । ममता की सरकार इतनी निर्मम हो गई है कि न तो उसे पीड़ित शोषित महिलाओं की चीख़ें सुन रही हैं और न ही वे किसीऔर को उनकी सहायता के लिए जाने देना चाहती हैं । रहा प्रश्न बंगाल के नए ‘शाहजहाँ’ का , कहा जाता है वहपुलिस की पकड़ से बाहर है । यह भी कहा जा रहा है कि सरकार ने क़ानून के लम्बे हाथ ही काट दिए हैं ताकि वेइस नए शाहजहाँ तक न पहुँच पाएँ । कोलकाता का उच्च नायायालय हैरान है कि शाहजहाँ पकड़ में क्यों नहींआ रहा ।
बंगाल में शाहजहाँ शेख ने उनसे पूछताछ करने के लिए गई ईडी की टीम पर अपने लोगों से हमला करवा दिया था । इसके बाद वह ‘सरकारी कागजों’ में फ़रार हो गया था । ईडी ने उसके खिलाफ पुलिस के पास एफ आई आर दर्ज करवा दी । ऐसे मामलों में सामान्यतया पुलिस आरोपी को गिरफ्तार करती है । लेकिन पुलिस ने ज्यादा रुचि ईडी की टीम के खिलाफ कारवाही करने में रुचि दिखाई । लेकिन तब तक इस नए शाहजहाँ के बारे में यौन शोषण व ज़मीनें हड़पने के कई मामले सामने आने लगे । लोग सड़कों पर , विशेषकर महिलाएँ , सड़कों पर उतरने लगे तो शाहजहाँ के खिलाफ नए नए केस दर्ज होने लगे । लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई । अलबत्ता ममता बनर्जी ईडी के खिलाफ जरुर भाषण देती रही । यह भी बताती रही कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को जानबूझकर तंग किया जा रहा है । अब बंगाल की पुलिस को इतना तो पता ही थी कि यह शाहजहाँ मुगल वंश का शाहजहाँ नहीं है बल्कि तृणमूल वंश का शाहजहाँ है । इसलिए उसने कूट भाषा को समझ कर शाहजहाँ को पकड़ने की बजाए उसे छिपाने में सारी शक्ति ख़र्च कर दी । लेकिन इसे ममता का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि उसके शाहजहाँ की एक के बाद एक करतूत सामने आती गई । यहाँ तक कि उसके आदमी सुन्दर लड़कियों कोउनके परिजनों के सामने ही उठा कर ले जाते थे । उनके अपने घर में या पार्टी कार्यालय में ले जाकर उनसे बलात्कार करते थे । लगता था उन्होंने अपनी इस गतिविधि को भी पार्टी चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा मान लिया हो । जब बंगाल पुलिस यौन शोषण पीड़ित महिलाएँ की पक्षधर होने की बजाए शाहजहाँ की पक्षधर बन गईं तो लोग कोलकाता हाई कोर्ट की शरण में गए । वैसे भी अब तक शाहजहाँ भी सक्रिय हो गया था और लोगों को अपने गुर्गों को माध्यम से धमकाने लगा था।
उच्च नायायालय ने शाहजहाँ को गिरफ्तार न करने पर प्रदेश सरकार के रवैए पर हैरानी जाहिर की और प्रशासन को उसे जल्द से जल्द गिरफ्तार करने का आदेश दिया। लेकिन लोग जानते थे कि प्रदेश सरकार की रुचि उसे बचाने में है न कि गिरफ्तार करने में । प्रदेश में संदेशंखाली में शाहजहाँ के शासन के काले चिट्ठे सामने आ रहे थे। इसलिए हो हल्ला बढ़ता जा रहा था । मामला यहाँ तक पहुँच गया था कि प्रदेश सरकार को कोई न कोई सफाई देना जरुरी हो गया था कि वह बताए कि वह तृणमूल नेता शाहजहाँ को आख़िर क्यों गिरफ्तार नहीं कर रही ? ‘वह मिल नहीं रहा’ यह बहाना अब काम नहीं आ रहा था । तब ममता बनर्जी के भतीजे मैदान में उतरे। जिस प्रकार ममता बनर्जी कई शाहजहाँ की सहायता से बंगाल का प्रशासन चला रही हैं उसी प्रकार उनके भतीजे अभिषेक मुखर्जी तृणमूल कांग्रेस का प्रशासन चला रहे हैं । अभिषेक ने बाक़ायदा एक प्रेस कान्फ्रेंस कर कहा कि राज्य सरकार तो शाहजहाँ को पकड़ना चाहती है लेकिन कोलकाता हाई कोर्ट ने ही इस पर रोक लगाई हुई है । वैसे भी शाहजहाँ को ‘भागे हुए’ अब पचपन दिन हो ही गए थे।
तब हाई कोर्ट ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए इस प्रकार की बहानेबाज़ी पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए शाहजहाँ को तुरन्त गिरफ्तार करने के लिए ही नहीं कहा बल्कि यहाँ तक आदेश दिया कि उसे प्रदेश पुलिस के अलावा ईडी या सीबीआई भी गिरफ्तार कर सकती हैं। जाहिर है हाई कोर्ट के इस आदेश से ममता के साम्राज्य में हलचल मचती। अब शाहजहाँ को छिपाना मुश्किल था। ख़तरा यह हो गया था कि यदि ईडी या सीबीआई ने उसे गिरंप्तार कर लिया को क़हर टूट पड़ेगा। इसलिए उसे तुरन्त बंगाल पुलिस की सुरक्षा में लेना पड़ेगा अन्यथा वह ईडी या सीबीआई के गिरफ़्त में आ जाएगा । तब पता नहीं किया किया उगल दे । इसलिए तुरन्त बंगाल पुलिस ने ‘गिरफ़्तारी’ की ढाल में उसे अपनी सुरक्षा में ले लिया । लेकिन साथ ही अपनी सफलता गा जश्न भी मनाना शुरु कर दिया कि बंगाल पुलिस कितनी चुस्त दुरुस्त है कि शाहजहाँ उसके शिकंजे से बच नहीं सका । पुलिस को लगता था बंगाल के लोग उसके इस आदेश से धोखे में आ जायेंगे। ममता बनर्जी के लोगअपनी इस सफलता पर बाक़ायदा नाचने लगे। लेकिन यह शोर शराबा ज्यादा देर नहीं चल सका । ममता और उनका भतीजा अभी यह नक़ली फुलझड़ियाँ चला ही रहे थे कि हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि शाहजहाँ तुरन्त सीबीआई के हवाले कर दिया जाए।
अब मामला टेढ़ा हो गया था। हाई कोर्ट ने कहा था शाम साढ़े चार बजे तक अपराधी को सीबीआई के हवाले कर दिया जाए । आम तौर पर होता यह है कि इस प्रकार के मामलों में अपराधी कोर्ट की तरफ़ भागते हैं कि मुझे सीबीआई के हबाले न किया जाए । जितना बड़ा अपराधी उतना बड़ा वकील । सरकार अपराधियों की इस प्रकार की अपीलों का विरोध करती हैं । लेकिन शाहजहाँ के मामले में उलटा हुआ । बंगाल सरकार रात को ही दिल्ली स्थित उच्चतम न्यायालय की ओर भागी । गुज़ारिश यह थी कि हुज़ूर किसी तरह हमारे शाहजहाँ को सीबीआई की कस्टडी में जाने से रोकिए । उधर साढ़े चार बजे का घंटा बज रहा है । सीबीआई के अधिकारी बंगाल पुलिस के दरबाजे पर खड़े हैं , हाईकोर्ट का आदेश लेकर । शाहजहाँ को हमारे हवाले कीजिए । बंगाल पुलिस का कहना है कि ममता बनर्जी सरकार सुप्रीम कोर्ट गई हुई है शाहजहाँ गो सीबीआई से बचाने के लिए। सीबीआई के अधिकारी पूछ रहे हैं सुप्रीम कोर्ट ने कोई स्टे बगैरह दिया हो तो दिखा दें । लेकिन कोई सीटें नहीं हैं । दिल्ली में ममता के वकील गुहार लगा रहे हैं , हुज़ूर यह मसला बहुत जरुरी है । सब काम छोड़ कर तुरन्त सुनवाई करें । लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसमें कोई जल्दी नहीं देखता । वह तारीख़ दे देता है। अब ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के पास कोई रास्ता नहीं बचा । तब उन्होंने ‘ममता बनर्जी’ वाला सूत्र अपनाया । शाहजहाँ को सीबीआई को नहीं दिया । जो करना हो कर लो । सारा बंगाल देख रहा है। आखिर ममता बनर्जी शाहजहाँ को इस सीमा तक जाकर भी क्यों बचाना चाहती हैं ? यह प्रश्न शेषनाग की तरह फ़न तान कर उसके सामने खड़ा है। ममता बनर्जी को किस बात का डर है ? दूसरे दिन हाई कोर्ट फिर आदेश देता है। शाहजहाँ को बंगाल पुलिस की सुरक्षा से निकाल कर सीबीआई को सौंप दिया जाए । लगता हाईब्रिड तक ममता सरकार के शाहजहाँ को बचाने के सारे हथियार ख़त्म हो गए हैं । आख़िर शाहजहाँ सीबीआई की कस्टडी में पहुँच गया है । सुना है इसको लेकर ममता बहुत बडी रैली करने जा रही हैं । पार्टी ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया कि रैली प्रदेश की पीड़ित महिलाओं के पक्ष में होगी या शाहजहाँ के पक्ष में ?
ममता बनर्जी यदि अपना इतिहास ही देख लेतीं तो शायद वे संदेशखाली की महिलाएँ का इस प्रकार अपमान न करतीं । यह दिसम्बर 1992 की घटना है । फेलानी बसाक नाम एक विकलांग युवती से बलात्कार हुआ था। आरोप यह था कि सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने यह जघन्य अपराध किया है। ममता उस युवती के लेकर मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मिलने के लिए राईटरज बिल्डिंग पहुँच गई थीं । पुलिस ने ममता बनर्जी को रोक ही नहीं लिया लाठी चार्ज भी किया । आज जब संदेशखली की बलात्कार से पीड़ित महिलाएँ प्रधानमंत्री से मिलने के लिए जा रही थीं को ममता की पुलिस ने उन्हें रोकने का हर संभव यत्न किया। बंगाल का इतिहास गवाह है बंगाल को अंग्रेज़ों के शाहजहाँ डरा नहीं सगे तो ममता के शाहजहाँ क्या कर पाएँगे।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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