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लोकतंत्र का मजाक उड़ाते : कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी

Making fun of democracy: Congress crown prince Rahul Gandhi

पिछले महीने भारत में नई लोकसभा का कार्यकाल आरंभ हुआ। और यह संयोग ही था कि उसका आरंभ एक ऐसे दिन हुआ था, जिस दिन लोकतंत्र पर आजादी के बाद सबसे काला धब्बा लगा था। अर्थात आपातकाल। 25 जून 1975 एक ऐसा दिन था, जिसे उसके भोगे हुए लोगों ने जैसे जिया था, उसे याद करके वे आज भी सिहर जाते हैं। वह ऐसा दौर था, जब आम लोगों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे और उनके पास यातनाओं का संसार रह गया था। जो मुख्य राजनीतिक व्यक्तित्व थे, उन्हें हिरासत में लेकर यातनाएं दी गई थीं और कई लोग ऐसे थे जो इन यातनागृहों से जीवित वापस ही नहीं आ पाए थे।

मगर उसके बाद भारत की संसद में उस आपातकाल की एक और झलक दिखी। वह झलक सत्ताधारी एनडीए गठबंधन ने नहीं, बल्कि उस  दल ने दिखाई, जिसकी अगुआई इंदिरा गांधी करती थीं और जिन्होनें रिकार्ड 7 साल प्रधानमंत्री रहने का रिकार्ड बनाया था। उनके पोते के नेतृत्व में कॉंग्रेस तीसरी बार बुरी तरह से चुनाव हारी है और वह 99 सीटों पर जाकर अटक गई है। वे 99 सीटें भी अब 98 रह गई हैं, क्योंकि राहुल गांधी ने वायनाड सीट छोड़ दी है।

मगर फिर भी 98 सीटें लेकर राहुल गांधी उस तानाशाही रवैये को दिखा रहे हैं, जो रवैया आज से 49 वर्ष पहले उनकी दादी ने दिखाया था। उन्होनें सत्ता को अपने कब्जे में रखने के लिए पूरे देश को आपातकाल में झोंक दिया था, तो वहीं राहुल गांधी ने नेता प्रतिपक्ष बनकर संसद में जो रवैया दिखाया है वह पूरे देश को अराजकता में झोंकने वाला है।

इससे पहले राहुल गांधी ने चुनाव अभियान के दौरान यह भी कहा था कि यदि तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश में आग लग जाएगी। और यह बात उन्होनें चेतावनी के लिए नहीं कही थी, बल्कि शायद अपनी अराजकता की मंशा बताते हुए कही थी। विगत कई वर्षों से जो भी कथित आंदोलन हुए हैं और उनमें जिस प्रकार से कॉंग्रेस ने देश को जलाने के प्रयासों में योगदान दिया है, वह किसी से छिपा नहीं है।

रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को लेकर छात्र वर्ग में रोष बढ़ाना हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम, एवं किसान आंदोलन के दौरान देश को दंगों की आग में झोंकने का प्रयास करना, सब कुछ कॉंग्रेस ने करके देख लिया है। देश ने कॉंग्रेस का असली चेहरा वैसे तो आपातकाल के दौरान देख लिया था, मगर यह भी सच है कि आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो आपातकाल को सही निर्णय बताते हैं और वही लोग भारत के तीसरी बार चुने गए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को अघोषित आपातकाल बताते नहीं थकते हैं। हालांकि अघोषित आपातकाल की परिभाषा आज तक स्पष्ट नहीं है।
 

कथित सशक्त विपक्ष की तानाशाही

यह कहा जाता है कि कॉंग्रेस अपने विरोधियों के प्रति अत्यंत निर्मम है। कॉंग्रेस के लिए लोकतंत्र की बातें केवल तभी तक हैं, जब तक वह विपक्ष में है। जैसे ही वह सत्ता में आती है, सत्ता उसके लिए महत्वपूर्ण हो जाती है और उसके सामने और कुछ नहीं रह जाता है। मगर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में तो कॉंग्रेस ने विजय भी हासिल नहीं की है, फिर तानाशाही भरा रवैया कॉंग्रेस के नेता राहुल गांधी ने क्यों अपनाया, यह समझ से परे है।

पूरे देश ने देखा कि जब नेता प्रतिपक्ष राष्ट्रपति के सम्बोधन पर अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए, तो उन्होनें बिना किसी व्यवधान के, अपनी बात रखी। हालांकि उनकी बातों पर कुछ विरोध हुआ, परंतु वह शांत हो गया और उन्होनें अपने भाषण की समाप्ति हिन्दू समाज को हिंसक ठहराकर की।

जब प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें टोका कि पूरे हिन्दू समाज को हिंसक आप कैसे कह सकते हैं, तो उन्होनें कहा कि उन्होनें भाजपा के लोगों को कहा है। काश राहुल गांधी यह बता पाते कि भाजपा को मानने वाले लोग कैसे हिंसक हैं? भाजपा के कितने कार्यकर्ता लगातार राजनीतिक हिंसा का शिकार हो रहे हैं, मगर भाजपा के कार्यकर्ताओं ने निर्दोषों के साथ हिंसा की होगी, उसके उदाहरण शायद ही मिलेंगे।

ये भाजपा के ही कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल में लगातार कॉंग्रेस की सहयोगी तृणमूल कॉंग्रेस के नेताओं की हिंसा का शिकार हो रहे हैं, और अभी हाल ही में भाजपा की मुस्लिम महिला कार्यकर्ता को निर्वस्त्र कर दिया गया था, मगर इस पर भी राहुल गांधी भाजपा के कार्यकर्ताओं को हिंसक ठहराते हैं।

ये भाजपा के ही कार्यकर्ता हैं, जो कश्मीर में आतंकवादियों की गोली का शिकार होते हैं, मगर राहुल गांधी की नजर में भाजपा के लोग हिंसक हैं। कर्नाटक में प्रवीण नेत्टारू की हत्या किसने की थी या फिर कन्हैया लाल की हत्या उदयपुर में किसने की थी, यह बताने में राहुल गांधी हिचक जाते हैं। राहुल गांधी को यह भी आपत्ति होती है कि आपातकाल की चर्चा आखिर सदन में क्यों की गई? मगर राहुल गांधी यह नहीं बताते कि आखिर सदन में चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए आपातकाल की? क्या 1990 के दशक में बाद जन्में लोगों को यह अधिकार नहीं है कि वे यह जान सकें कि आखिर वर्ष 1975 में हुआ क्या था? आखिर कैसे एक महिला ने सत्ता की हनक में देशवासियों के अधिकारों पर डाका डाल दिया था? आखिर क्यों न बात हो उन महीनों में जब नेताओं को केवल इसलिए जेल में डाल दिया गया था क्योंकि विपक्ष के एक नेता ने चुनावों में धांधली को लेकर सत्ता के लिए कुछ भी करने वाली इंदिरा गांधी को न्यायालय में तर्कों से शिकस्त दे दी थी और इंदिरा गांधी ने गद्दी जाने के डर के कारण पूरे देश को डर के माहौल में धकेल दिया था।

इस चुनाव अभियान में और नतीजों के बाद भी कॉंग्रेस के नेता राहुल गांधी के हाथों से संविधान की एक प्रति हमेशा साथ रही और उन्होनें यह दावा किया कि यह चुनाव संविधान बचाने को लेकर लड़ा गया। और यदि संविधान बचाने को लेकर ही यह चुनाव था तो उसमें भी एनडीए को बहुमत प्राप्त हुआ है, अर्थात जनता को यह विश्वास है कि अंतत: संविधान कहाँ पर सुरक्षित है। और जहां पर संविधान सुरक्षित रहेगा उन्हें उसने गद्दी सौंप दी है। राहुल गांधी और उनके ईकोसिस्टम के पत्रकारों द्वारा यह झूठा अभियान अब नहीं चलाया जा सकता है कि जीत दरअसल राहुल गांधी की हुई है और मोदी की हार हुई है। यह पूरी तरह से झूठ है, यह सत्य है कि कुछ सीटें भाजपा की कम हुई हैं, मगर यह भी उतना ही सच है कि भारतीय जनता पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और एनडीए गठबंधन की सरकार है।

इस सरकार को राहुल गांधी पचा नहीं पा रहे हैं, जैसे इंदिरा गांधी नहीं पचा पाई थीं वह मुकदमा, जिसमें उनकी सारी तिकड़में फेल हो गई थी और अंतत: उनके निर्वाचन क्षेत्र से उनके निर्वाचन पर प्रश्न लगा दिए गए थे। वह सत्ता के वर्चस्व के टूटने की पीड़ा थी, जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अनुमोदन दिया था और रेडियो से जब यह घोषणा पूरे देश में प्रसारित हुई थी, उसके बाद समाचारपत्रों आदि पर दमन का एक दूसरा ही दौर देखा था।

वह दमन उस अपमान से कम कतई नहीं था, जो अभी राहुल गांधी एवं अन्य कॉंग्रेस के नेता लोकतंत्र के पाँचवे स्तम्भ के साथ करते हैं। जैसे ही कोई राहुल गांधी के मन के विपरीत प्रश्न पूछता है, वह भाजपा का गुलाम हो जाता है। वह संघी हो जाता है। यह नया ट्रेंड दिखा है, हालांकि प्रेस को नियंत्रण में लाना इंदिरा गांधी से राहुल गांधी तक सभी को आता है। जहां इंदिरा गांधी ने सत्ता की हनक के चलते मीडिया पर तानाशाही रूप दिखाया तो वहीं कॉंग्रेस के युवराज और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पोते राहुल गांधी प्रेस का अपमान दूसरी तरह से करते हैं।

जैसे ही कोई पत्रकार उनसे असहज करने वाले प्रश्न पूछता है तो वह यही कहते हैं कि अमुक पत्रकार भाजपा की भाषा बोल रहा है। दरअसल इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक एकालाप पसंद करने वाले नेता हैं। वे दूसरे का पक्ष चाहते ही नहीं हैं। वे अपने ही प्रश्नों के उत्तर नहीं सुनना चाहते हैं। जैसे कि हमने हाल ही में लोकसभा मे देखा कि कैसे राहुल गांधी ने अपनी तो बात पूरी रखी मगर जैसे ही प्रधानमंत्री ने अपनी बात रखना आरंभ किया, विपक्ष ने हंगामा शुरु कर दिया। इस तानाशाही की झलक पूरे देश ने देखी। हर कोई इस बात की प्रतीक्षा में था कि देखें कि भारत के प्रधानमंत्री आखिर क्या उत्तर देते हैं, तो विपक्ष अर्थात कॉंग्रेस के राहुल गांधी का यह प्रयास था कि कोई कुछ सुन न पाए। ऐसा ही राहुल की माँ सोनिया गांधी तब करती थीं, जब श्री अटल बिहारी बाजपेयी संसद में अपनी बात रखते थे।

जैसी माता, वैसा बेटा जैसे वीडियो कई वायरल हुए और वे वीडियो पूरी तरह से यह दिखाने के लिए पर्याप्त थे कि कैसे एक परिवार जब सत्ता में होता है, तो तानाशाह होता है और जब वह सत्ता से बाहर होकर विपक्ष में होता है तब भी तानाशाह होता है। वह ऐसे लोगों को बर्दाश्त ही नहीं कर पाता है, जो संविधान का, न्यायालय का सहारा लेकर, लोकतंत्र के सहारे आगे बढ़ते हैं। उस परिवार की तानाशाही अपनी पार्टी तक सीमित रहे तो बेहतर है, मगर वह पूरे देश को अपने ही इशारे पर नचाना चाहते हैं।

ये लोग सत्ता में रहते हैं तो आपातकाल थोपते हैं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ऊपर एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन करते हैं और जब विपक्ष में आते हैं तो यह कहते हैं कि यदि नरेंद्र मोदी की भारत में सरकार तीसरी बार आई तो देश में आग लग जाएगी और वह अपनी बात को चरितार्थ भी करते हैं, जब वे संसद में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के मध्य अपने गठबंधन के हर नेता को जबरन, उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रधानमंत्री का विरोध करने के लिए वेल में धकेलते हैं और वहीं लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत तस्वीर आती है जिसमें प्रधानमंत्री अपना विरोध कर रहे नेताओं को पानी पूछते हैं।

नई संसद के प्रथम सत्र ने यह तो तय कर दिया है कि आने वाले समय में विपक्ष किस प्रकार अपनी तानाशाही को ही लेकर चलेगा, तो वहीं अब सरकार को भी इस अराजकता और विपक्ष की तानाशाही से निपटने का कारगर तरीका खोजना ही होगा। क्योंकि कांग्रेस तो जब सत्ता में आएगी तो वह आपातकाल लगाने के विभिन्न तरीके ईजाद करेगी ही, जैसे वह विपक्ष में रहते हुए अपनी तानाशाही चला रही है, मोहब्बत की दुकान का दावा करने वाले नेता आज खुलकर झूठ की दुकान चला रहे हैं, फिर चाहे इसके कारण देश अराजकता में ही क्यों न फंस जाए। यह भी एक प्रकार का आपातकाल ही है, जहां पर विपक्ष का एजेंडा, कॉंग्रेस के नेता राहुल गांधी की तानाशाही 25 जून 1975 को उनकी दादी एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की पूरी तरह से याद दिला रही हैं। तभी वे चाहते हैं कि आपातकाल का संसद में उल्लेख न हो, जिससे कोई सत्तापक्ष की कांग्रेस और विपक्ष की कॉंग्रेस की तानाशाही के बीच साम्यता न खोज पाएं। परंतु छिपाने से धूल छिपती नहीं है, बल्कि एकत्र होती रहती है, परत दर परत, और जब वह सामने आती है तो सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। इसलिए यह पूरी तरह से स्पष्ट होता जा रहा है कि कौन तानाशाह है जो संसद में प्रधानमंत्री के खिलाफ वेल में नारे लगवाकर उनका भाषण अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करता है और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी जो इतने शोर में अपना भाषण ही जारी नहीं रखते हैं, बल्कि अपने खिलाफ नारे लगा रहे नेताओं को भी पानी पूछते हैं।

और यही दो तस्वीरें दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए पर्याप्त हैं।







अरविंद सिंह


(लेखक यूजीसी केअर सूचीबद्ध शोध पत्रिका “मंथन” के प्रबंध-सम्पादक हैं।)

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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