
प्रो.बलदेव भाई शर्मा
स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि शिक्षा मनुष्य की दिव्यता को प्रकट करती है। इसलिए शिक्षा को व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण का उपकरण माना गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की शुरुआत राष्ट्रहित में हमारे नवयुवकों और विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण में इसी भावबोध को मजबूत करने के लिए की गई। परंतु विडंबना यह है कि तंत्र, चाहे मंत्रालय के स्तर पर हो या विश्वविद्यालयीन शिक्षा व्यवस्था अथवा इससे जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण एजेंसियां इन सब ने इस महत्वपूर्ण और सार्थक उद्देश्य की पूर्ति में अनायास ही अनेक व्यवधान उत्पन्न किए जो अपयश का कारण बन रहे हैं। दरअसल जिन लोगों के कंधों पर इसकी जिम्मेदारी डाली गई उनमें से अनेक इसके पात्र ही नहीं दिखते। वास्तव में शिक्षा केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है बल्कि एक नैतिक उद्यम है। किसी कवि ने इसे बड़े सार्थक शब्दों में निरूपित किया है- शिक्षा क्या सुर साध सकेगी / यदि नैतिक आधार नहीं है। आज शायद इन जिम्मेदार लोगों के चयन में नैतिकता कोई पैमाना नहीं दिखती । बस डिग्री, शोध अनुभव जैसे मानक योग्यता का आधार बना लिए गए।
योग्यता का मूल्यांकन करने में ये मानक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इनका आकलन तो ईमानदारी से हो। इस आकलन में पसंद-नापसंद ही ज्यादा हावी रहती दिखेगी तो परिणाम भयावह होंगे जैसा कि आज कई स्तरों पर दिख रहा है। उच्च स्तर पर नियुक्त कुछ लोगों के शोध दूसरों के शोध से चुराए पन्नों से भरे हो, डिग्रियां फर्जी हों, शिक्षण का या प्रशासनिक अनुभव नगण्य, व्यक्तित्व में दुर्गुणों को भरमार, पर पसंद है या चहेता है तो नीचे हो ऊपर तक कहीं भी बिठा दो। यह प्रक्रिया शायद उचित नहीं कही जा सकती और न इससे शिक्षा विशेषकर उच्च शिक्षा का भला होने वाला है। यह बर्बादी के लक्षण हैं। नियुक्तियों में भ्रष्टाचार की लगातार जोर पकड़ती चर्चाएं भी अच्छा संकेत नहीं मानी जा सकतीं। ( अगर यह चर्चा आम है हो जाए कि कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शैक्षणिक या अकादमिक पदों पर नियुक्तियों के लिए पदानुसार कारण इतने- इतने रेट तय हैं तो शिक्षा की सामाजिक छवि क्या बनेगी ? भारत की सर्वतोमुखी प्रगति के बीच यह प्रश्न गंभीर इस पर गौर किया जाना भीर है, इस किया जाना जरूरी है। क्या कारण है कि आए दिन कोई न कोई कुलपति हटाया जा रहा है? पिछले 6-7 साल में केंद्रीय विश्वविद्यालय से करीब डेढ़ दर्जन कुलपति हटाए गए हैं। कुछ लोग तो 5-5 टर्म तक कुलपति रहते हैं। जबकि सुपात्र VC IN WAITING रह जाते हैं।
आज देश को विश्व गुरु बनाने की चर्चा खूब होती है। यह अनुभूति बड़ी सुखद है। लेकिन क्या भारत डिग्रियों या शैक्षणिक योग्यता के कारण विश्व गुरु रहा ? भारत ने विश्व को मनुष्यता का ज्ञान दिया, मानवीय संवेदना का-जीवन मूल्यों का संदेश दिया, विश्व को सुख-शांति - सौहार्द से जीने का रास्ता बताया, फ्रांस की क्रांति से हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने दुनिया को बंधुता, समानता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया। यही भारत की शिक्षा का मूल चिंतन है। इसी के आधार पर पर पूरी पूरी दुनिया ने भारत को विश्व गुरु माना। आज भी अर्नाल्ड टायनबी जैसे समाज विज्ञानी और इतिहासकार अपनी पुस्तक A STUDY OF HISTORY में लिखते हैं कि इस परमाणु युग में विनाश के कगार पर खड़ी दुनिया को भारत में परिवार की संकल्पना जैसा विचार ही बचा सकता है। यह है भारत की शिक्षा का संदेश- कोई सुन रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित जी 20 के शिखर सम्मेलन का ध्येय वाक्य 'बसुधैव कुटुम्बकम करवाया जिसे one Earth-One Family - On Future के रूप में आत्मार्पित किया गया। यह भारत की शिक्षा का संस्कार है। इसी को संत तुलसीदास ने मानस में 'जड़ चेतन जल जीव नभ सकल राममय जान' लिखकर व्यापक दृष्टि दी है। यह विडंबना ही है कि आज शिक्षा का अर्थ पढ़ाई-लिखाई तकनीकी योग्यता, डिग्री पाना और रोजगार तक सीमित कर दिया गया है। उसमें जीवन का संस्कार या सामाजिक दायित्व और लोकोपकारी भाव कहीं दिखता नहीं । ज्यादा पढ़ा-लिखा या बड़ी डिग्रीधारी आदमी कम पढ़े-लिखों को हेय दृष्टि से देखता है, अनपढ़ को तो शायद मनुष्य मानने को तैयार नहीं। लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त आईएएस-आईपीएस जेल की सजा काटने को मजबूर - हैं भ्रष्टाचार या अन्य अपराधों में। यह आम राय भी बन गई है कि जो जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा, उसमें गिरावट की उतनी ही ज्यादा संभावना। एक धारावाहिक में यह संवाद शिक्षा की विनाशकारी सोच को दर्शाता है। आईएएस तो तुम अपने कैलीवर से बने हो, पर इस युद्ध को एन्जॉय करना इसकी असली ताकत है। इसमें कहीं सामाजिक दायित्व या लोकोपकारी भावना नहीं है। यह केवल एक धारावाहिक का संवाद भर नहीं, बल्कि शिक्षा के आधार पर खड़े किए गए पूरे ढांचे की अनैतिकता की ओर इशारा है।

नीट की परीक्षा को लेकर 2025 में भी कई गड़बड़ियो के कारण कई महीने देशभर में हाहाकार मचता रहा, इस साल फिर पेपर लीक जैसी गड़बड़ियों ने ईमानदारी से मेहनत कर अपना भविष्य गढ़ने की चाह रखने वाले विद्यार्थियों के सामने भविष्य का संकट खड़ा कर दिया। एनटीए जैसी उच्चाधिकार प्राप्त एजेंसी सवालों के घेरे में तब भी थी और अब भी हैं। उसके तंत्र से जुड़े कई लोग गंभीर आरोपों से घिरे हैं। एक दर्जन से ज्यादा तो जांच एजेंसी ने गिरफ्तार कर लिए हैं। यह आपोप अत्याधिक चिंताजनक हैं कि एनटीए ने जिन्हें पेपर सेटिंग का काम दिया उन्होंने ही पेपर लीक कर दिया। एनटीए के अध्यक्ष से लेकर पूरा तंत्र सवालों के कटघरे में है पर एनटीए इसे पेपर लीक मान ही नहीं रहा। कोचिंग संस्थान उन्हीं प्रश्न को संभावित के रूप में विद्यार्थियों को बता रहे थे जो असल प्रश्नपत्र में थे। और पेपर लीक क्या होता है? इस पूरी त्रासदी में पिछले साल भी और अब अध्यक्ष अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेकर कदाचित ही सामने आए हैं। शिक्षा मंत्री अवश्य सफाई दे रहे हैं, पर अध्यक्ष का शायद ही कोई बयान आया हो । अध्यक्ष पर इतनी 'कृपा' किसकी और क्यों है?
दरअसल यह भी चिंताजनक है और तंत्र की विफलता का मुख्य कारण से कि अनेक शैक्षणिक और बौद्धिक संस्थानों में कुछ लोग अपनी पहुंच के दम पर दो-दो दशक से शीर्ष पदों पर यहां से वहां, वहां से वहां विराजमान हैं तो व्यवस्था में नवाचार कहां से आएगा ? इसे ही 'पावर एन्जॉय' करना कहते हैं जो पूरे तंत्र को जर्जर कर देता है। शिक्षा. अगर राष्ट्र के नवनिर्माण का प्रमुख उपकरण है तो पहले उसके तंत्र को तो नैतिक, सुयोग्य और सुदृढ़ आधार देना होगा।
इन्हीं दिनों सीबीएसई की OSM यानी on screen marking में घोर लापरवाही और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ तथा CUET यानी विश्वविद्यालयों में प्रदेश के लिए एक परीक्षा में भी यही सब सुनने-जानने को मिलना और चिंताजनक है। भारत की विश्वविद्यालयीन शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराकर खड़ी करने वाली सोच और प्रयास समयानुकूल कहे जा सकते हैं, लेकिन इस होड़ और आधुनिक शिक्षा के नाम पर शैक्षणिक संस्कारों की अनदेखी विनाशकाटी है। भारत विश्वगुरु बना गुणसंपदा के देर, लेकिन विद्यार्थियों में यह लक्ष्य संधान क्यों नहीं दिखता । क्या डिग्री और रोजगार यही शिक्षा है? केवल नॉलेज ही शिक्षा मान ली गई है और तकनीक पर-ज्यादा जोर है। तकनीक और नॉलेज आज के युग में जरूरी माने जा सकते हैं, पर इसमें भारत कहाँ है? मनुष्यता बचेगी तो भारत बचेगा और भारत बचेगा तो दुनिया बचेगी। शिक्षा केवल धन पशु तैयार न करे, यह प्रयास हो।
एक प्रश्न यह भी है कि पार्टी संगठन का बेहतर इस्तेमाल कर एक नेता कुछ राज्यों में चुनाव जीतवाने में सफल होता है तो क्या वह किती महत्वपूर्ण मंत्रालय में मंत्री बनने के लिए भी सुयोग्य और सुपात्र हो गया ? जब एक नौकरशाह को उसके अनुभव और योग्यता के भरोसे विदेश मंत्री बनाया जा सकता है तो शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय किसी नेता की बजाय अनुभवी और अच्छी नैतिक- सामाजिक छवि के शिक्षाविद समाज विज्ञानी को क्यों नहीं सौंपा जा सकता ताकि वह शिक्षा संस्थानों को भ्रष्टाचार मुक्त बना सके और शिक्षा को आधुनिकता के साथ नैतिक आधार दे सके। हो सकता है कि ऐसे कुछ लोग नापसंद हों, लेकिन चाणक्य को आदर्श मानने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि चाणक्य ने घनानंद के मंत्री राक्षस को नापसंदगी के बावजूद राष्ट्रहित में चंद्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री बनवाया था। राष्ट्रपति को सामने रखने पर पसंद-नापसंद गौण हो जाती है। कांग्रेस-कम्युनिस्ट गठजोड़ ने शिक्षा और बौद्धिक संस्थानों को अभारतीयता के गर्त में धकेल दिया था, अब उन्हें भारतीयता का आधार देने का समय है। यह गुरुतर कार्य चहेतों और अवसरवादियों के भरोसे नहीं किया जा सकता।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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