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नए साल में लें तनावमुक्त रहने का संकल्प

Make a resolution to stay stress-free in the new year

हर नए साल के साथ हमने दो चीजें करना अपना लिया है। नया कैलेंडर को हम अपने घर की दीवार पर ही नहीं सजाते-टांगते, बल्कि उसके साथ ही नववर्ष के पहले दिन कोई न कोई संकल्प लेते हैं। संकल्प लेना तो बहुत आसान होता है, उस पर टिके रहना और संकल्प को फलीभूत करना आसान नहीं होता। उसके लिए आवश्यक होता है, संकल्प की स्मृति को बनाए रखना और उसे पूरा करने के लिए जरूरी मेहनत करते रहना। संकल्प की स्मृति बनाना क्या है, दरअसल संकल्पित लक्ष्य को याद रखना होता है। लेकिन जैसे-जैसे कैलेंडर की तारीखें बदलनी शुरू होती हैं, हम में से ज्यादातर लोग अपने संकल्पित लक्ष्य की ओर से विमुख होने लगते हैं। संकल्प पर विस्मृति की धूल जमने लगती है और धीरे-धीरे वह संकल्पित लक्ष्य विस्मृति की खोह में समा जाता है। लेकिन आइए इस बार हम एक ऐसा संकल्प लें, जो आज हर मानव के लिए जरूरी है। आपने ठीक समझा, हम संकल्प लें कि इस साल पूरे साल हम तनावमुक्त रहेंगे, खुद तो रहेंगे ही, किसी अन्य को भी तनाव में डालेंगे, किसी की जिंदगी में तनाव का कारण भी नहीं बनेंगे।

खुलेपन की अर्थव्यवस्था और उदारीकरण ने हमारे सामने चकाचौंध का वातावरण दिया है, जिंदगी की तमाम तरह की सहूलियतें भी दीं हैं, जीवनोपयोगी इन उपहारों के साथ एक और भी सौगात हमें आज के दौर ने बख्शी है। वह सौगात है, तनाव। आजकल दुनिया में बड़ी संख्या में लोग तनावग्रस्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में तकरीबन 79 प्रतिशत लोग किसी न किसी स्तर पर तनाव महसूस करते हैं। कुछ विश्वस्तरीय सर्वेक्षणों के अनुसार, 62 प्रतिशत तक लोग कभी न कभी तनाव महसूस करते हैं। इसकी वजह से उनकी रोजाना की जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विशेषकर युवा और कामकाजी लोग ज्यादा तनावग्रस्त हैं। एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में करीब  एक अरब से ज़्यादा लोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। आजकल कामकाज की शैली, लक्ष्य पूरा करने का दबाव इतना बढ़गया है कि कार्यस्थल पर सबसे ज्यादा लोग तनाव से जूझ रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार, कामकाजी 10 में से 6  लोग कार्यस्थल तनाव का सामना कर रहे हैं।  विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 3.8 यानी करीब 24  करोड़ लोग मानसिक दबाव के चलते अवसाद यानी डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं। तनाव की मुख्य वजह चिंता है, इससे अवसाद पैदा होता है और लोग अकेलेपन से जूझने लगते हैं। तनाव की एक वजह मौजूदा आर्थिक दौड़ में पिछड़ना भी है। तमाम चकाचौंध के बावजूद दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो रोजाना के खर्च लायक और सही वातावरण में रहने लायक भी कमाई नहीं कर पाते। जब वे देखते हैं कि उनके पड़ोसी, उनके रिश्तेदार उनकी तुलना में बेहतर जिंदगी जी रहे हैं, वे अपने बच्चों को अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, अच्छी रिहायश और अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे तो वे तनाव में आ जाते हैं। उनकी असफलताएं उस तनाव को और बढ़ा देती हैं। पड़ोसी या रिश्तेदार की तुलना में कैरियर और आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ना उन्हें तनाव और फिर अवसाद में डाल देता है। आर्थिक दुश्वारियां इसे बढ़ा देती हैं और फिर उसके नतीजतन आदमी में आत्महंता प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। धीरे-धीरे वह बढ़ने लगती है और उसका नतीजा होता है आत्महत्या। कई बार ऐसा होता है कि पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार तक किसी के तनाव और अवसाद को नहीं को नहीं समझ पाते और जब तक वे समस्या की ओर रूख करते हैं, उनका अवसादग्रस्त रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी मौत को गले लगा चुका होता है। तनाव से जूझते छात्रों, गृहिणियों, किसानों आदि की आत्महत्याओं की खबरें आती हैं, कुछ वक्त तक इसे लेकर चिंताएं जताई जाती हैं, कुछ चर्चा होती है और फिर लोग भूल जाते हैं और जिंदगी की आपाधापी में एक बार फिर जुट जाते हैं।

इसी वजह से जरूरी है कि हमें कुछ हद तक ग्रामीण जीवन की पारंपरिक शैली की ओर लौटें। आज से तीस-चालीस साल पहले के गांवों को याद करें। तब गांवों में अभाव खूब था, लेकिन अवसाद नहीं था। तब लोग कबीर की तरह जिंदगी गुजारकर मस्त रहते थे। कबीर ने कहा है,

रूखा-सूखा खाई के ठंडा पानी पीव। देखि पराई चुपड़ी, मत ललचावे जीव।।

यानी आपके पास जो भी रूखा-सूखा है, वही खाकर ठंडा पानी पी लो और दूसरे की घी चुपड़ी रोटी देखकर कर लालच मत पालो।

पहले के दौर में जीवन का एक और फलसफा था। इसी दार्शनिकता में भारतीय समाज जीता रहा है। वह क्या था, गोधन, गजधन, बाजिधन,  और रतनधन खाना। जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।। दुनिया में सबसे बड़ा धन है गायों का समूह होना, हाथियों का झुंड होना, घोड़े होना, सोने-चांदी से भरा संदूक होना, लेकिन जब व्यक्ति के पास संतोष आ जाता है तो ये सारे धन धूल के समान हो जाते हैं।

जीवन का यही मूल दर्शन है। आज की दुनिया इसे भूल गई है। वह गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन को हासिल करने के लिए लगातार जुटी रहती है। यह जुटे रहना भी गलत नहीं है। लेकिन दूसरे से तुलना करना और उसके विकास से तुलना करते हुए खुद को दोयम समझना या पिछड़ा मानना, यह गलत है। दरअसल तनाव का जन्म यहीं से होता है और फिर वह बढ़ते-बढ़ते अवसाद में बदल जाता है। इसलिए नए साल के दिन तय करें कि इस साल हम मेहनत तो करेंगे, अपना सौ प्रतिशत अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए देंगे। फिर भी पड़ोसी, रिश्तेदार या दोस्त की तुलना में पीछे रह गए तो उसे प्रकृति के सामान्य नियम के तहत लेंगे और तनाव नहीं पालेंगे।

वैसे तनाव मुक्त रहने का सबसे बेहतर टिप है, नियमित रूप से व्यायाम करना, संतुलित आहार लेना, पर्याप्त नींद लेना, और ध्यान एवं योग अभ्यास करना। हमारी संस्कृति में परिवार की कल्पना है। परिवार क्या है,अपनों के बीच अपने दुख-सुख को साझा करना। अपनों का सुख अपना मानना और अपनों के दुख में दुखी होने की बजाय उसे दुख से उबारना। जानकार कहते हैं कि तनाव मुक्त रहने के लिए अपनों से बात करना बेहतर निदान है। इसके साथ ही पालतू जानवरों के साथ समय बिताना, प्रकृति से सीधा संपर्क रखना, नदियों, जंगलों, पेड़-पौधों की बीच घूमना और अपनी हॉबी को पूरा करना भी तनाव से मुक्तिका बड़ा जरिया है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है, कर्मण्येवाधिकारस्ते, माफलेषुकदाचन। यानी फल की चिंता किए बिना लगातार अपना कर्म करना। यह कर्म करना दरअसल अपनी दिनचर्या में जुटे रहना भी है। तनाव मुक्ति के लिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी दिनचर्या को सरल बनाए। ऐसी स्थिति में वह खुद को बेहतर महसूस कर सकता है।

स्वास्थ्य विज्ञानी कहते हैं कि रोजाना कम से कम 30 मिनट का शारीरिक व्यायाम, जैसे तेज चलना, योग करना, नृत्य करना, खेलना-कूदना, व्यक्ति के शरीर में खुशी के हार्मोन एंडोर्फिन के स्राव का कारण बनता है। इससे व्यक्ति खुश महसूस करता है। इसी तरह बाहर टहलना या प्रकृति के करीब समय बिताना भी इसी प्रक्रिया का एक तरह से विस्तार है। इसलिए हर व्यक्ति को टहलना चाहिए, प्रकृति के बीच कुछ वक्त गुजारना चाहिए। ऐसा सुझाव डॉक्टर भी देते हैं।

तनाव पर काबू पाने के लिए सांस लेने वाले व्यायाम और प्राणायाम भी बहुत कारगर होते हैं। इसके लिए आपको चार तक गिनते हुए साँस अंदर लेना होता है और चार तक रोकना होता और फिर चार तक ही गिनते हुए छोड़ना होता है। यह अभ्यास अगर रोजाना हर व्यक्ति कुछ मिनट तक दोहराता है तो उसके तनाव का स्तर घटने लगता है। इसके साथ ही व्यक्ति को चाहिए कि वहअपनी साँसों पर ध्यान देते हुए कहीं भी उचित जगह पर ध्यान का अभ्यास करे।  इसके साथ ही उसे अपनी पसंद के अनुसार संगीत सुनना चाहिए, पेंटिंग करना चाहिए, बागवानी की सुविधा हो तो उसे करे, नहीं सुविधा हो तो सार्वजनिक पार्क में ही पौधों की सेवा करे, ऐसे कार्यों से मानसिक स्थितियों में बदलाव होता है, तनाव से ध्यान बंटता है। इससे कार्टिसोल हार्मोन का स्राव कम होता है। यही हार्मोन ज्यादातर तनाव का कारण होता है। किसान लगातार अपने पौधों, अपनी फसल से मिलता है, अपने घर पाले हुए पशुओं गाय, भैंस, बैल आदि से जुड़ा रहता है, इसलिए वह तनावमुक्त रहता है। तनाव होना स्वाभाविक है,लेकिन बड़ी बात है उसे रिलीज करना। अपनों से बातचीत के अलावा डायरी लिखना भी इसका एक तरीका है। तनावग्रस्त हों या नहीं, हर व्यक्ति को अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए डायरी लिखना चाहिए। इससे मन हल्का होता है।

तनाव पर काबू पाने में दोस्त, परिवार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना भी बहुत फलदायक होता है। अगर आप अपनी समस्याएं अपने किसी साथी और दोस्त या परिवार के व्यक्ति से साझा करते हैं तो इससे आपको मानसिक बल मिलता है। तनाव रिलीज होता है। यह प्रक्रिया भी बहुत मददगार होती है।समुचित और संतुलित आहार भी तनाव मुक्ति का बेहतर जरिया है। इसके साथ ही पूरी नींद लेना भी जरूरी है। भरपूर नींद से दिमाग की कोशिकाएं शांत होती हैं, दिल को भी आराम मिलता है, शरीर के उत्तकों तक पर्याप्त आक्सीजन पहुंचती है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह नींद पूरी करने के लिए उपाय करे। काम जरूरी है,लेकिन काम के लिए जान लड़ा देना बुद्धिमानी नहीं। काम भी आखिर जीवन के लिए है। इसलिए जीवन के लिएजरूरी है कि काम के दौरान बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लिए जाएँ। कई बार प्रतिबद्धताएं और शालीनता भी तनाव का कारण बन जाती हैं। जैसे किसी काम को आप अपनी नीति, अपनी नैतिकता या समयाभाव के चलते नहीं करना चाहते या नहीं कर सकते हैं, लेकिन आपका वरिष्ठ, आपका सहयोगी, आपका दोस्त उसे करने के लिए आपको मजबूर कर रहा है। आप शालीनता में मना नहीं कर पा रहे तो यह भी आपके तनाव की वजह बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि आप ना कहना भी सीखें, उसका तरीका ऐसा हो सकता है कि सामने वाले को बुरा न लगे और आपके रिश्तों पर कोई असर ना आए। इसके साथ ही जरूरी है कि अपनी प्रतिबद्धताओं को भी कम किया जाए। कई बार प्रतिबद्धाएं आपकी सीमाओं के बाहर उछलने लगती हैं। नए साल में आपने इन कुछ उपायों को अपना लिया तो तय मानिए, साल 2026 ना सिर्फ आपके लिए, बल्कि आपके दोस्तों और परिवार के लिए भी बढ़िया गुजरेगा, हंसीखुशी के माहौल के साथ बीतेगा।






उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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