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महाकुंभ: आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राष्ट्रवाद का प्रतीक

Mahakumbh: Symbol of spiritual, cultural and economic nationalism

महाकुंभ का प्रचार चारों तरफ हो रहा है। तीर्थयात्रियों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ रही है। सरकारी स्तर पर भी अभूतपूर्व व्यवस्था की गई है। आखिर एक धार्मिक आयोजन में सरकार ने अपनी पूरी ताकत क्यों झोंक रखी है? इस का जवाब इस उदाहरण से समझिए- अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद से चीन को ट्रंप की बायकॉट नीति का डर सता रहा है। इसीलिए चीन ने इंटरस्टेट यानी अपने राज्यों के बीच घरेलू व्यापार को बढ़ावा देने की घोषणा की है।

 लेकिन भविष्यदर्शी मोदी सरकार ने इस परिस्थिति को पहले ही भांप लिया था। क्योंकि आर्थिक मंदी की कगार पर खड़ी दुनिया भर के लगभग सभी देशों की विकास दर थमती जा रही है। इसीलिए केन्द्र सरकार ने देश की आध्यात्मिक विरासत के जरिए इंटरस्टेट (राज्यों के बीच) व्यापार को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है। जिसकी झलक हम इस समय महाकुंभ के आयोजन में देख रहे हैं। इसके पहले धार्मिक पर्यटन के जरिए अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की कोशिशों की झलक अयोध्या, वाराणसी,बद्रीनाथ, केदारनाथ,  तिरुपति, सबरीमला, द्वारका में दिखाई दी थी।

दुनिया के बड़े-बड़े आर्थिक विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि साल 2025 में दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है। कई देशों की अर्थव्यवस्था में अभी से तनाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। एनर्जी की कीमतों में तेजी, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका व चीन के बीच व्यापार को लेकर तनातनी ने भी मंदी की आशंका को बढ़ा दिया है। यही वजह है कि भारत की जीडीपी विकास दर कम रहने की आशंका जताई गई है।


लेकिन यह तो समस्या है। इसका समाधान क्या है? 
भारत पूरी दुनिया से अलग है। हमारी ताकत देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में छिपी है। जिसमें हमारे देश के पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह और धार्मिक पर्यटन जैसे सेक्टर आते हैं। सदियों से हम इन परंपराओं के बीच जीते आ रहे हैं। हालांकि पूरी दुनिया की तरह भारत में भी भोजन, चिकित्सा और शिक्षा सबसे अहम सेक्टर हैं, जिनमें कभी मंदी नहीं आ सकती। लेकिन इसी श्रेणी में हमारे पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज तथा धार्मिक पर्यटन भी आते हैं, जिनमें कभी मंदी नहीं आती। 

केन्द्र सरकार भी इस बात को बहुत अच्छी तरह समझती है। इसीलिए मंदी और वैश्विक संघर्ष की आशंका को देखते हुए मोदी सरकार तीन क्षेत्रों पर विशेष रुप से ध्यान दे रही है- रक्षा, संचार और इंटरस्टेट ट्रेड(राज्यों के बीच व्यापार)। वाराणसी, बद्रीनाथ-केदारनाथ, अयोध्या जैसे स्थलों पर तीर्थयात्रा न केवल इंटरस्टेट ट्रेड के कीर्तिमान बना रही है बल्कि रोजगार सृजन के साथ साथ आध्यात्मिक एकता की नींव को भी मजबूत बना रही है। प्रयागराज में कुम्भ जैसे आयोजन, अयोध्या में सामूहिक दीपोत्सव, बनारस की देव-दीपावली, कांवड़ यात्रा, पवित्र नदियों के तट पर सामूहिक आरती जैसे उत्सव ना केवल हमारी अर्थव्यवस्था में प्राणवायु फूंकते हैं, बल्कि सनातन धर्म को पूरी शक्ति से प्रतिष्ठित भी करते हैं। जो कि इस समय की सबसे बड़ी जरुरत है।


सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का उत्सव है महाकुंभ
हिन्दू धर्म जिन तथ्‍यों और सिद्धांतों पर आधारित हैं वे मानव निर्मित नहीं हैं, वे इस सृष्टि में स्वमेव अस्तित्व में आए हैं। यह सृष्टि का स्‍वाभाविक धर्म है, इसलिए इसे सनातन धर्म कहा जाता है। जिसका मूल आधार सत्य, न्याय, करुणा जैसे तत्व हैं, जिनकी व्याख्या यम-नियमों के अंतर्गत की गई है। जीवित और मृत में सिर्फ चेतना का फर्क होता है। चेतना के विलुप्त होते ही जीवित प्राणी की गिनती मृतकों में होने लगती है। यह चेतना एक वृहत्तर चैतन्य का हिस्सा है। जिसे हम ईश्वर कहते है। इसी परम चैतन्य या ईश्वर की तलाश के लिए सनातन धर्म के मूल सिद्धांतो की स्थापना हुई है।

किंतु वर्तमान युग में पीर-पैगंबरवाद, दो बोरी चावल या नौकरी, मजारों का भ्रमजाल, विदेशी वीजा का लालच, लव-लैंड-ड्रग्स जिहाद वगैरह वगैरह जैसे अनेक भ्रमजाल फैलाए जा रहे हैं। जिनकी वजह से सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों पर से खुद सनातनियों का ध्यान हटता जा रहा है। भारतीयों की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा मोबाइल, टीवी, आधुनिक जीवन शैली, भोगवाद, नशाखोरी, मांसाहार, उच्छृंखलता में लिप्त होकर अपने मूल सनातनी स्वरुप को भुला बैठा है। ऐसे लोगों को उनकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के विराट स्वरुप की झलक दिखलाए जाने के लिए महाकुंभ जैसे आयोजनों की जरुरत है। जिससे कि आधुनिक जीवन शैली वाले लोगों को भी अपनी परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्राप्त हो। लोग यह समझ पाएं कि भारत ही एक ऐसी सभ्यता है जिसमें हमारे जीने की कला और उसका विज्ञान समाहित है। भारत ही एक ऐसी सभ्यता है जहां मानवीय मूल्यों से हम प्रकृति को सिंचित करते हैं। प्रकृति हमें पालती है और हम प्रकृति का ध्यान रखते हैं।   

 भारत की एक बड़ी आबादी के पास इस समय पर्याप्त क्रय शक्ति है, यानी कि खर्च करने के लिए भरपूर पैसा मौजूद है। जो कि दिशाहीन होकर अनावश्यक रुप से मल्टीप्लेक्स सिनेमा, महंगे रेस्टोरेंट्स, शॉपिंग कांप्लेक्स, खर्चीली गाड़ियों पर बर्बाद होता है। केन्द्र सरकार ने कुंभ जैसा आयोजन करवा कर उस क्रय शक्ति को भारतीय संस्कृति, परंपरा, स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूती, मंदिरों और संन्यासियों को दान, स्थानीय कलाकारों को प्रश्रय देने जैसे पुनीत कार्यों की ओर मोड़ने का प्रयास किया है।     

 

आंकड़ों से जानिए कैसे महाकुंभ से आया आर्थिकी में उछाल

प्रयागराज में चल रहा महाकुंभ कितना वृहत है और इससे अर्थव्यवस्था में कैसा उछाल आया है। इस बात की झलक आपको इन आंकड़ों में दिखाई देगी- 

  • 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर 3.5 करोड़ श्रद्धालुओं ने स्नान किया था। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रयागराज महाकुंभ के छह दिन बीत चुके थे। तब तक देश-विदेश से आए करीब 7 करोड़ श्रद्धालु संगम में डुबकी लगा चुके हैं। जो कि दुनिया के कई देशों की आबादी से भी ज्यादा है।
  • महाकुंभ में IRCTC यानी इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन द्वारा तैयार टेंट सिटी 30 जनवरी तक फुल हो गई है। अगर आप अब बुकिंग करवाते हैं तो आपको फरवरी के पहले सप्ताह का इंतजार करना होगा। यहां दो व्यक्तियों के लिए सुपर डीलक्स रूम बुक करने पर 16,200 रुपए का खर्च आएगा, जबकि विला बुक करने के लिए 20,000 चुकाने होंगे।
  • प्रयागराज आने वाली फ्लाइट्स का किराया औसतन 21% तक बढ़ गया है। उदाहण के तौर पर भोपाल और प्रयागराज के बीच एकतरफा हवाई किराया पिछले साल जहां 2,977 रुपए था, वहीं अब यह करीब 6 गुना बढ़कर 17,796 रुपए हो गया है।
  • स्थानीय और अंतरराज्यीय सेवाओं, माल ढुलाई और टैक्सियों सहित परिवहन और रसद से 10,000 करोड़ रुपये का योगदान होने की
  • उम्मीद है।
  • पर्यटन सेवाएं, जैसे टूर गाइड, यात्रा पैकेज और संबंधित गतिविधियां से 10,000 करोड़ रुपये का योगदान देने की संभावना है।
  • अस्थायी चिकित्सा शिविर, आयुर्वेदिक उत्पाद और दवाइयों से 3,000 करोड़ रुपये की आय हो सकती है, जबकि ई-टिकटिंग, डिजिटल भुगतान, वाई-फाई सेवाएं और मोबाइल चार्जिंग स्टेशन जैसे क्षेत्रों से 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार होने की उम्मीद है।
  • डेयरी उत्पादों पर 4 हजार करोड़ खर्च किए जाएंगे। फूलों पर 800 करोड़ रुपए खर्च होंगे। धार्मिक वस्तुएं और प्रसाद, जैसे तेल, दीपक, गंगा जल, मूर्तियां, अगरबत्ती और धार्मिक पुस्तकें, आर्थिक गतिविधि का एक और प्रमुख क्षेत्र हैं, जिनसे अनुमानित से 20,000 करोड़ रुपये के योगदान की उम्मीद है।
  • विज्ञापन और प्रचार गतिविधियों सहित मनोरंजन और मीडिया से 10,000 करोड़ रुपये का व्यापार होने का अनुमान है।
  • उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने महाकुंभ क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास और स्वच्छता के लिए  6,990 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। जिससे  549 परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस बार आवंटित की गई राशि साल 2019 में हुए कुंभ के दौरान 700 परियोजनाओं पर खर्च किए गए ₹3,700 करोड़ से लगभग दोगुना है।
  • एक अनुमान के मुताबिक 45 दिनों तक चलने वाले इस महाकुंभ के दौरान हुए व्यापार से ₹25,000 करोड़ का राजस्व उत्पन्न होगा और राज्य की अर्थव्यवस्था में ₹2 लाख करोड़ का योगदान होगा।
     

महाकुंभ की आर्थिकी पर व्यापार जगत का अनुमान

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स(CAIT) ने अनुमान लगाया है कि महाकुंभ के दौरान ₹2 लाख करोड़ से ज्यादा का टर्नओवर होगा।

महाकुंभ के दौरान होटल, होम स्टे, लग्जरी टेंट, अतिथि गृह, रेस्टोरेंट्स जैसे बिजनेस का टर्नओवर  आसमान छू रहा है। जिनसे अकेले अर्थव्यवस्था में 6 हजार करोड़ के योगदान का अनुमान है। मेला क्षेत्र में 1.6 लाख टेंट लगाए गए हैं। जिसमें 2200 लग्जरी टेंट हैं। जिनका एक रात का किराया औसतन 18 से 20 हजार रुपए है। संगम के बिल्कुल पास के कुछ टेंट के लिए तो धनाढ्य लोग एक रात का लाख रुपया तक खर्च करने के लिए तैयार हैं। जिसमें प्राईवेट बाथरुम, वाई-फाई और बटलर सर्विस जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश स्टेट टूरिज्म ने 1500 रुपए प्रति रात से हिसाब से बजट फ्रेंडली डोरमैटरी की व्यवस्था भी कर रखी है। कई होटल और टूर कंपनियां महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिए उन्हें स्थानीय मंदिरों और आस पास के दर्शनीय क्षेत्रों की यात्रा का पूरा पैकेज प्रदान कर रहे हैं। जिससे कुंभ क्षेत्र के आस पास की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

  • महाकुंभ क्षेत्र में 14 फूड कोर्ट खोले गए हैं। जिनमें देश के अलग अलग हिस्सों के व्यंजन परोसे जा रहे हैं।
  • मेला क्षेत्र में स्टारबक्स, कोका-कोला, कैंपा-कोला, डोमिनोज जैसी कंपनियां भी अपने स्टॉल खोले बैठी हैं। 
  • यहां तक कि शारीरिक श्रम से अपना जीवन यापन करने वाले अप्रशिक्षित कामगारों को भी 200 करोड़ का रोजगार मिलने की उम्मीद जताई गई है।

 

महाकुंभ ने पूरे देश को सांस्कृतिक धागों में पिरोया
इस बार के महाकुंभ में दुनिया भर से 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के जुटने का अनुमान है। जो कि अपने साथ देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों की विरासत लेकर आएंगे और साथ में भारत की एकात्म संस्कृति की यादें लेकर विदा होंगे। इस आवागमन से प्रयागराज संगम पर भारत की आध्यात्मिकता, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का पवित्र समागम भारत की एकता और आध्यात्मिक शक्ति की चिरस्थायी भावना की पुष्टि करेगा। यूनेस्को ने महाकुंभ को "मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के हिस्से" के रूप में मान्यता प्रदान की है। क्योंकि यह मात्र एक आयोजन नहीं है, बल्कि एक गहन अनुभव है जो सीमाओं को पार करता है और दुनिया भर के लोगों को एकजुट करता है। 4,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह मेला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और उन्नत संगठनात्मक क्षमताओं के सामंजस्यपूर्ण मिश्रण का प्रतिनिधित्व करता है।

इस बार के महाकुंभ में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने कलाग्राम की स्थापना की है। जिसमें देश भर के कलाकारों को उनकी प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया है। यह आयोजन भारत की विविधता में एकता को दर्शाता है। इस जीवंत कलाग्राम में 10,000 क्षमता वाला भव्य गंगा पंडाल है। साथ ही झूंसी और त्रिवेणी क्षेत्रों में तीन अतिरिक्त मंच बनाए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक में 2,000 से 4,000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है।

महाकुंभ के इस कलाग्राम में 15,000 कलाकार शामिल हो रहे हैं। जिनमें प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार विजेता और संगीत नाटक अकादमी के सम्मानित कलाकार शामिल हैं।

दर्शकों को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और श्रीराम भारतीय कला केंद्र द्वारा भव्य कलाग्राम मंच पर एक सप्ताह तक विशेष प्रस्तुतियों का भी आनंद मिलेगा

 

अध्यात्म,कला, संस्कृति और अर्थशास्त्र का महाकुंभ
प्रयागराज महाकुंभ के इन पहलुओं के बारे में जानने के बाद पाठक अच्छी तरह समझ गए होंगे कि महाकुंभ जैसे वृहत आयोजन की आवश्यकता क्या थी। प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का संगम है। लेकिन इस समय महाकुंभ क्षेत्र पूरे भारत की कला, स्थानीय संस्कृति, पाक-कला और व्यंजन, वस्त्र-आभूषण और परंपराओं का संगम बना हुआ दिख रहा है। जिसमें मिनी भारत की झलक मिल रही है।

महाकुंभ का स्नान केवल तन और मन की शुद्धि तक सीमित नहीं है। इससे ना केवल हमारे आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है। बल्कि भारत देश की एकत्मता की प्रत्यक्ष अनुभूति भी होती है। इसके साथ ही महाकुंभ मेले में हमारा जाना इंटस्टेट व्यापार के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को भी आवश्यक पुष्टि प्रदान करता है, जो कि हमें वैश्विक मंदी से जूझने की क्षमता देता है।   

 

महाकुंभ में सांस्कृतिक आंगन की परंपरा

महाकुंभ मेला क्षेत्र में सात भारतीय सांस्कृतिक आंगन की स्थापना की गई है। जिनकी विशिष्टता इस प्रकार है- 

  • हरिद्वार आंगन में लकड़ी की मूर्तियां, पीतल के शिवलिंग, ऊनी शॉल प्रदर्शित किए जा रहे हैं।
  • पुष्कर आंगन में मिट्टी के बर्तन, कठपुतलियां, लघु चित्रकारी दिखाई जा रही है।
  • कोलकाता आंगन में टेराकोटा मूर्तियाँ, पट्टचित्र, कांथा कढ़ाई का प्रदर्शन दर्शकों को लुभा रहा है।
  • कुंभकोणम आंगन में तंजौर चित्रकारी, रेशमी वस्त्र, मंदिर आभूषण दिखाए जा रहे हैं।
  • उज्जैन आंगन में जनजातीय कला, चंदेरी साड़ियाँ, पत्थर की नक्काशी में पर्यटक खूब रुचि ले रहे  हैं।
  • गुवाहाटी आंगन में बाँस शिल्प, असमिया रेशम, आदिवासी आभूषण का प्रदर्शन जारी है।
  • नासिक आंगन में  पैठानी साड़ियाँ, वर्ली कला, लकड़ी की कलाकृतियाँ दिखाई जा रही हैं।








अंशुमान आनंद

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