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सनातन की अजस्र धारा का  प्रतीक महाकुंभ

Mahakumbh, symbol of Sanatan's Ajasra stream

प्रयागराज के महाकुंभ चल रहा है। महाकुंभ का मूल शब्द है कुंभ। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि कुंभ मतलब क्या होता है? कुंभ का अर्थ  होता है कलश या घड़ा। इस संदर्भ में देखें तो यह कुंभ समुद्र मंथन से निकले अमृत को जिस घड़े में रखा गया था, उसका प्रतीक है। समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों में से एक अमृत के लिए बारह दिनों तक देवासुर संग्राम चला था।

देवासुर संग्राम के दौरान अमृत कलश को लेकर देवराज इंद्र के बेटे जयंत स्वर्ग की ओर भाग निकले। कुंभ की कथाओं के अनुसार, जब जयंत अमृत कलश लेकर भागे, तब उनके साथ सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति और शनि भी थे। जिन्हें देवताओं ने अमृत की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी थी। सूर्य देव पर कुंभ यानी कलश को न  टूटने देने की जिम्मेदारी थी तो चंद्रमा को  देखना यह था कि अमृत किसी तरह न छलके। वहीं देवगुरू बृहस्पति की जिम्मेदारी थी कि अमृत की ओर आने से असुरों को रोकें,जबकि शनि  की  जिम्मेदारी थी कि  जयंत किसी  भी तरह से अमृत का पान न कर सकें। इसी दौरान कहा जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिर पड़ीं। जिनमें से कहा जाता है कि एक-एक बूंद प्रयागराज, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार में गिरीं। तब से ये जगहें पवित्र मानी जाने लगीं और इन जगहों पर सूर्य, चंद्र, शनि और बृहस्पति की विशेष युतियों के दौरान हर बार साल पर कुंभ का आयोजन होने लगा।

ऐसी मान्यता है कि जिन जगहों पर अमृत बूंदें गिरीं, उन जगहों पर हर बारह साल बाद होने वाले कुंभ के आयोजन में स्नान और तप करने से मुक्ति मिल जाएगी। भारतीय परंपरा में जीवन का  लक्ष्य भौतिक  संसाधनों को जुटाने की बजाय मुक्ति पर ज्यादा केंद्रित है। भारतीय परंपरा में जीवन के चार कार्य माने गए हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष यानी मुक्ति चरम लक्ष्य है। प्रयागराज का मौजूदा कुंभ एक तरह से उस मुक्ति की चाहत का ही प्रतीक है। इसी चाहत में करोड़ों लोग तीन नदियों गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती के संगम हर बारह साल बाद देश-दुनिया के श्रद्रालुओं का जुटान हो जाता है।

मकर संक्रांति के दिन कुंभ की शुरूआत हुई। लेकिन इसके ठीक एक दिन पहले ही करीब एक करोड़ पैंसठ लाख लोग प्रयागराज के पवित्र संगम में डुबकी लगा चुके थे। अधिकारियों के मुताबिक कुंभ के प्रारंभिक यानी मकरसंक्रांति के दिन करीब दस करोड़ लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। दुनिया में कई देशों की जनसंख्या इतनी नहीं हैं,  जितना दो दिनों में अकेले प्रयागराज में श्रद्धालु उमड़ पड़े। प्रयागराज से आ रही सूचनओं के मुताबिक, प्रयागराज के हर उस रास्ते और गलियों में श्रद्धा और भक्ति का संगम नजर आ रहा। मकर संक्रांति के दिन हर गली और घाट की ओर जाने वाले हर राह पर स्थानीय लोगों और संस्थाओं की ओर से भंडारे लगाए गए। दस करोड़ की जनसंख्या जुटी, लेकिन भंडारे खत्म नहीं हुए। यह उस भारत का एक चमकीला चेहरा है, जिसके बारे में कभी वैश्विक स्तर पर एक ही राय रखी जाती थी। देश को गरीबों, संपेरों और भिखारियों का देश कहा जाता था। जिस देश को अपनी जनता की भूख शांत करने के लिए विदेशी गेहूं पर निर्भर रहना पड़ता था, आधुनिक अर्थों में उसी देश के एक छोटे शहर में दुनिया जुट जाती है, लेकिन दुनिया के लिए भोजन कम नहीं पड़ता।

तुलसीदास ने लिखा है, को कहि सकऊ परयाग परभाऊ। तुलसी के प्रयाग का प्रभाव हर साल माघ मेले में दिखता है, लेकिन कुंभ के आयोजन में उसने अपने इस प्रभाव का नया वितान रच दिया है। भीड़ की वजह से होने वाली कुछ असुविधाओं को छोड़ दें तो इतनी बड़ी जनसंख्या को संभालने के लिए इस बार जो इंतजाम किए गए, वे अभूतपूर्व रहे।

प्रयागराज का यह महाकुंभ है। महाकुंभ एक सौ चौवालिस(144) साल के बाद आता है। यानी बारह कुंभों के बाद का कुंभ। महाकुंभ को हम विश्व कह सकते हैं। पिछली सदी के पचास  के दशक में प्रयागराज में हुए आजादी के बाद के सबसे पहले कुंभ में अव्यवस्था फैल गई थी, हजारों तीर्थयात्रियों की जान चली गई थी, उसी प्रयागराज में दो दिनों में बारह करोड़ के लोग स्नान करते हैं, देश-दुनिया से आते हैं और फिर पवित्र डुबकी के बाद धीरे-धीरे अपने शहरों, गांवों और तीर्थों की ओर लौट जाते हैं। कहीं कोई अव्यवस्था नहीं दिखती तो आज की सरकार और उसकी व्यवस्था की इसके लिए प्रशंसा होनी ही चाहिए। निश्चित तौर पर इसके लिए उस उत्तर प्रदेश की सरकार के प्रमुख योगी आदित्यनाथ प्रशंसा और धन्यवाद के हकदार हैं, जिस उत्तर प्रदेश में प्रयागराज स्थित है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने महाकुंभ के आयोजन के लिए 5500 करोड़ खर्च किए हैं।  रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, रेलवे ने अलग से पांच हजार करोड़ का खर्च किया है। इसके अतिरिक्त स्थानीय कारोबारियों ने भी अपनी ओर से खर्च किया है, जिसका ठीकठाक आंकड़ा किसी के पास नहीं। कई राज्यों का बजट ही दस हजार करोड़ का नहीं है। इतने खर्च की वजह से सुविधाओं की कुंभ में बाढ़ है। पुलिस इंतजाम हो या प्रशासनिक देखभाल, एकाध अपवादों को छोड़ सबकुछ ठीकठाक है। राज्य का काम क्या है? राज्य का काम है व्यवस्था को बेहतर बनाना और बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराना। मोक्षाभिलाषियों के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने यही काम किया है। अब सोचिए कि इन मोक्षाभिलाषियों ने प्रयाग आते वक्त कितना खर्च किया होगा। इंतजाम और मोक्षाभिमुखी यात्रा के बीच आर्थिक चक्र भी चला है। इस चक्र के साथ उत्तर प्रदेश में आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ीं हैं और एक महीने तक इनका रूप दिखता रहेगा। आर्थिकी के सिद्धांतों के लिहाज करोड़ों हाथों से खर्च होने वाली रकम आखिरकार आर्थिक तीव्रता को ही बढ़ाती है। महाकुंभ इन अर्थों में आर्थिक आयोजन भी है। धार्मिक आयोजन से रूप में तो उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा तो है ही।

कुंभ और उसमें अब तक जुट चुके बारह करोड़ नरमुंडों ने बिना किसी गिले-शिकवे के, तमाम परेशानियों के बीच अमृतकलश की बूंदों के साथ मुक्ति की उम्मीद में डुबकी लगाई है, वह सनातन विरोधियों को भी एक संदेश है। संदेश यह कि सनातन की अपनी अंतर्निहित धारा है। जहां किसी को कोई बल से प्रेरित नहीं करता, धार्मिक आयोजनों में अपनी चाहतों के साथ स्वेच्छा से स्वत:स्फूर्त जुट जाता है। जहां सबकी अपनी-अपनी चाहत होती है, जहां मानवता की धारा होती है। अगर मानवता की धारा नहीं होती तो डुबकी के बाद ठंड से कांपते किसी यात्री को बिना किसी पहचान के दूसरा यात्री अपनी शाल क्यों ओढ़ा जाता, यह जानते हुए भी उनके बीच कोई ना तो सीधा रिश्ता है और शायद ही कभी वे फिर मिल पाएं। हिंदू धर्म के छूआछूत की खूब चर्चा होती है। लेकिन कुंभ में नहाते वक्त, साथ चलते वक्त शायद ही कोई अपने बगल वाले की इस लिहाज से परवाह करता है कि वह ब्राह्मण है या दलित, वह शायद ही इस बारे में बात करता है, तब उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि संगम के मटमैले हो चुके जल में दलित, सवर्ण और ओबीसी की देह का भी मैल है। वह मटमैला जल पवित्र जल होता है, जिसके सामने सब एक बराबर होते हैं। कुंभ इस बराबरी का भी गहन संदेशवाहक है और संदेश प्रेषक भी...





उमेश चतुर्वेदी
कंसल्टेंट, प्रसार भारती, भारत सरकार

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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