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आने वाली पीढ़ियों को पता चले क्या था इितहास का काला अध्याय

Let the coming generations know what was the dark chapter of history

जब से केंद्र सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का फैसला किया है, तब से आपातकाल एक बार फिर से चर्चा में है। स्वाधीन भारत राजनीतिक इतिहास के काले अध्याय के रूप में दर्ज आपातकाल की चर्चा इन दिनों जरूरी भी मानी जा रही है। केंद्र की मोदी सरकार पर बड़ा आरोप यह है कि वह संविधान को बदल देगी। संविधान को बदलने और उसके जरिए आरक्षण व्यवस्था खत्म करने के नैरेटिव को पिछले चुनाव में मोदी विरोधी विपक्ष सफल रहा। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में बीजेपी की अनपेक्षित असफलता और मोदी विरोधी विपक्ष की जीत के पीछे इसी नैरेटिव को माना जा रहा है।

चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी इस नैरेटिव का ठीक से जवाब नहीं दे पाई। वरिष्ठ पत्रकार ए सूर्यप्रकाश का मानना है कि अगर बीजेपी ने विपक्ष के इस फर्जी नैरेटिव का उसने तीखेपन से जवाब दिया होता तो लोगों तक सही संदेश पहुंचा सकती थी। सूर्यप्रकाश उस आपातकाल के भुक्तभोगी है, जो देश पर सचमुच थोपा गया था। 25 जून 1975 की आधी रात को जब समूचा देश नींद के आगोश में था, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था। जब लोग सुबह जगे तो उनके संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार तक छीन लिए गए थे। यानी राज्य चाहे तो किसी की जान भी ले सकता था। समूचा देश तकरीबन उसी दिन से जेल में तब्दील होता चला गया। बीस सूत्रीय कार्यक्रम देश पर थोप दिया गया। यह स्थिति 21 मार्च 1977 तक बनी रही, जब तक कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल को वापस नहीं ले लिया।

भारतीय संविधान के मुताबिक, देश की सर्वोच्च कार्यपालक संस्था केंद्रीय कैबिनेट होती है। जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होता है। लेकिन सर्वोच्च फैसले प्रधानमंत्री अकेले नहीं ले सकता, बल्कि कैबिनेट लेती है, जिसके सदस्य कैबिनेट स्तर के मंत्री होते हैं। देश पर आपातकाल थोपने का फैसला बिना कैबिनेट की मंजूरी के ही ले लिया गया। 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद को जगाया गया, उनसे आपातकाल लागू करने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कराया गया और देश को एक तरह से राजनीतिक एकाधिकार के हवाले कर दिया गया। कैबिनेट के मंजूरी की औपचारिकता अगली सुबह यानी 26 जून 1975 को पूरी की गई। सवाल यह है कि जिस कांग्रेस पार्टी की सर्वोच्च नेता ने संविधान को दरकिनार करते हुए अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया हो, वह अगर दूसरे दल पर संविधान के उल्लंघन और उसको बदलने का आरोप लगाए तो हैरत होगी ही।\

दरअसल आजकल राजनीति सिर्फ और सिर्फ सत्ता का खेल होकर रह गई है। इसलिए राजनीतिक दलों को अपनी वैचारिक धुरी के इतर गठबंधन बनाने और गठबंधनों के लिहाज से विचार बनाने या बदलने में हिचक नहीं होती। इसे यूं समझा जा सकता है कि आपातकाल की बलिबेदी पर जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, एन एम घटाटे, जेपी माथुर, कुशाभाऊ ठाकरे, रामप्रकाश गुप्ता जैसे जनसंघ के नेताओं को ही जेल यात्रा नहीं करनी पड़ी थी, बल्कि समाजवादी धड़े जयप्रकाश नारायण, मधु लिमये, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव आदि को भी गिरफ्तार किया गया था। लेकिन राजनीतिक की उलटबांसी देखिए कि मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव खुद कांग्रेस के संविधान बदलने के नैरेटिव के साथ हैं। आपातकाल में जनसंघ के साथ रहे मुलायम के बेटे अब कांग्रेस के साथ हैं। लिहाजा ‘संविधान हत्या दिवस’  की राजनीति पर वे भी कांग्रेस के सुर में सुर मिला रहे हैं। लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा यादव का जन्म आपातकाल के ही दौरान हुआ। उस दौरान लालू मीसा के तहत जेल में बंद थे। मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट यानी आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत आपातकाल में तमाम नेता गिरफ्तार किए गए थे। इसीलिए लालू ने अपनी बेटी का नाम  मीसा रखा। अब वे लालू यादव भी कांग्रेस के साथ हैं, और बीजेपी के संविधान हत्या दिवस मनाए जाने के खिलाफ हैं। 

21 महीने तक चले आपातकाल के दौरान आधिकारिक रूप से पूरे देश से एक लाख 11 हजार से ज्यादा लोगों को निवारक कानूनों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। न्यायालयों को संवैधानिक और कानूनी समीक्षा का अधिकार नहीं रह गया था, लिहाजा पुलिस जिसे चाहे गिरफ्तार करके जेल भेज सकती थी। उनके खिलाफ न्यायालय तक कार्रवाई नहीं कर सकते थे। पुलिस ने लोगों पर खूब अत्याचार किए, इन पंक्तियों के लेखक के गांव में तो उन दिनों के थानेदार ने एक व्यक्ति की मूंछें सिर्फ इसलिए उखाड़ दी थी,  क्योंकि थानेदार के पूछे सवाल का उसने जवाब नहीं दिया था। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने बीस सूत्री कार्यक्रम लागू किया था। उनमें पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम जहां इंदिरा के थे, वहीं पांच सूत्रीय कार्यक्रम उनके बेटे संजय गांधी के थे। संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम में एक कार्यक्रम परिवार नियोजन भी था। परिवार नियोजन के लिए उन पुरूषों की नसबंदी अनिवार्य कर दी गई, जिनके दो बच्चे थे। इसके लिए ग्राम प्रधान, थानेदार, स्कूल अध्यापक, पटवारी, लेखपाल आदि तमाम सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए कोटा तय कर दिया गया। कोटा पूरा करने के चक्कर में पुलिस वालों ने कई अविवाहित किशोरों तक की जबरिया नसबंदी करा दी थी।

संजय गांधी की चर्चा चली है तो एक और बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए। संजय गांधी, इंदिरा गांधी के छोटे बेटे थे। आपातकाल के दौरान वे समानांतर सत्ता के केंद्र बन गए थे। उनके पास कोई संवैधानिक दायित्व नहीं था, लेकिन देश में एक तरह से उनकी ही मर्जी की सरकार चल रही थी। दिल्ली के तुर्कमान गेट पर अवैध निर्माण हटाने के नाम पर लोगों पर थोपा अत्याचार हो या जबरिया नसबंदी या फिर मनमर्जी से मंत्रियों को हटाना, युवा कांग्रेस की रैली में गाना गाने से इनकार करने पर तब के लोकप्रिय गायक किशोर कुमार को आकाशवाणी पर प्रतिबंधित करना, सबकुछ संजय के ही आदेश से हुआ था। इतना ही नहीं, उनके ये आदेश तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने नहीं माने तो उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था।

सवाल यह है कि जिस दल ने संविधानेत्तर सत्ता को बढ़ावा दिया, जिसने अपने तरीके से देश के आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों तक को निलंबित कर दिया, जिसकी वजह से हजारों मासूम लोगों को जेल जाना पड़ा, जिसकी वजह से प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गई, जिसकी वजह से देश 21 महीनों तक एक तरह से जेलखाना बना रहा, वह अगर संविधान रक्षा की बात करेगी तो कम से कम उन लोगों को हंसी जरूर आएगी, जिन्होंने आपातकाल को देखा, झेला या महसूस किया है।

वैसे यह भी सच है कि आज एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई है, जिसने आपातकाल के बारे में ठीक से सुना भी नहीं है। इस पीढ़ी को आपातकाल के बारे में बताना होगा। यह भी जताना होगा कि देश के संविधान को किस तरह हाशिए पर डाल दिया गया था। इससे आने वाली पीढ़ियां सचेत होंगी और इतिहास के काले अध्याय से परिचित हो सकेंगी।

 

 

 

उमेश चतुर्वेदी

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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