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कांवड़ यात्रा : आस्था की पदयात्रा, युवा चेतना का महापर्व और सनातन संस्कृति का जीवंत स्वर, श्रावण की पावन बेला में श्रद्धा, सेवा, समरसता और राष्ट्रभाव का विराट उत्सव

Kanwar Yatra: A pilgrimage of faith, a grand festival of youth consciousness, and a vibrant expression of Sanatan culture.

लेखक- सुबोध चंद्र, प्रान्त संगठन मंत्री, विश्व हिन्दू परिषद (इंद्रप्रस्थ प्रान्त)


"हर-हर महादेव।"

"बोल बम।"

श्रावण मास का प्रथम मेघ जब हिमालय की चोटियों से टकराकर भारतभूमि पर बरसता है, तब केवल ऋतु नहीं बदलती, भारत की आत्मा जाग उठती है। वर्षा की पहली बूँद जैसे ही धरती को स्पर्श करती है, वैसे ही करोड़ों शिवभक्तों के हृदयों में भक्ति का एक अथाह सागर उमड़ पड़ता है। उत्तर भारत की सड़कें, गाँवों की पगडंडियाँ, महानगरों के राजमार्ग, कस्बों की गलियाँ और तीर्थों के पावन तट एक ही स्वर से गूंज उठते हैं- "बोल बम। हर-हर महादेव।"

उस समय भारत केवल एक भूभाग नहीं रह जाता, वह चलता-फिरता शिवमय तीर्थ बन जाता है।

यदि आधुनिक विज्ञान के उपग्रहों, विमानों अथवा आकाश में उड़ते ड्रोन से श्रावण मास में भारत की इस यात्रा को देखा जाए, तो एक अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो करोड़ों शिवभक्तों ने अपने भगवा वस्त्रों से संपूर्ण माँ भारती का श्रृंगार कर दिया हो। हरिद्वार से लेकर दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखण्ड, बिहार, झारखंड और देश के अनेक भागों तक भगवा रंग की अनगिनत धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती दिखाई देती हैं। यह दृश्य केवल यात्रियों का नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित भारतीय संस्कृति की जीवनधारा का दृश्य है।

यह किसी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं, किसी संस्था का अभियान नहीं और किसी प्रचार का आयोजन भी नहीं है। यह लोकआस्था का वह महासागर है जो बिना किसी निमंत्रण के स्वयं उमड़ पड़ता है। करोड़ों लोग अपने श्रम, अपने समय और अपने संसाधनों से केवल एक संकल्प लेकर निकलते हैं-भगवान शिव का जलाभिषेक करना है। यही सनातन की शक्ति है, यही भारत की सांस्कृतिक चेतना है।

दुनिया के अनेक देशों में विशाल धार्मिक आयोजन होते हैं, किंतु करोड़ों लोगों का बिना किसी सरकारी आदेश, बिना किसी आर्थिक प्रलोभन और बिना किसी प्रचार अभियान के सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल पड़ना-यह दृश्य भारत की सनातन परंपरा को अद्वितीय बनाता है। यह यात्रा सिद्ध करती है कि भारतीय समाज की आत्मा आज भी अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है।

काँवड़ यात्रा केवल जल लाने की यात्रा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर सोई हुई श्रद्धा को जगाने की यात्रा है। यह अहंकार को उतारकर समर्पण को कंधे पर उठाने की यात्रा है। यह शरीर को कष्ट देकर आत्मा को प्रसन्न करने की यात्रा है। यह अपने लिए नहीं, अपने आराध्य के लिए चलने की यात्रा है।

लोकआस्था की अनन्त परंपरा

भारतीय पुराणों में वर्णित समुद्र-मंथन की कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि त्याग और लोकमंगल का सर्वोच्च संदेश है। जब कालकूट विष से समस्त सृष्टि संकट में पड़ी, तब भगवान शिव ने समस्त जगत के कल्याण के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण किया। स्वयं कष्ट सहकर संसार को बचाने का यह आदर्श भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च मानदंड है।

ऐसी मान्यता है कि उस विष की ज्वाला को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव को पवित्र जल अर्पित किया। तभी से श्रावण मास में शिव पर जलाभिषेक की परंपरा प्रारंभ हुई। गंगा स्वयं शिव की जटाओं से पृथ्वी पर अवतरित हुई हैं, इसलिए गंगाजल को शिवपूजन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज, देवघर, उज्जैन, ओंकारेश्वर, काशी, त्र्यंबकेश्वर, सोमनाथ, रामेश्वरम् और देश के अनेक शिवधाम इस आस्था के साक्षी हैं। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तट तक, पूर्व में बैद्यनाथ धाम से लेकर पश्चिम में सोमनाथ तक, भगवान शिव के प्रति भारतीय समाज की श्रद्धा एक ही सूत्र में पिरोई हुई दिखाई देती है। यही भारत की सांस्कृतिक एकात्मता का सबसे सशक्त प्रमाण है।
युवा शक्ति का सबसे बड़ा सांस्कृतिक अभियान

आज का समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, त्वरित मनोरंजन और डिजिटल जीवनशैली का समय है। आज की पीढ़ी को "Gen Z" कहा जाता है। अनेक बार यह कहा जाता है कि यह पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूर हो रही है, उसका संबंध केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित रह गया है। किंतु श्रावण मास का दृश्य इन सभी धारणाओं को पूरी तरह असत्य सिद्ध कर देता है।

जैसे ही सावन प्रारंभ होता है, वही युवा जो वर्षभर आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं में दिखाई देता है, भगवा धारण कर अपने मित्रों के साथ गंगाजल लेने निकल पड़ता है। वह किलोमीटरों नहीं, सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलता है। वह वर्षा, धूप, थकान, भूख और पीड़ा को मुस्कुराकर स्वीकार करता है। उसके पैरों में छाले होते हैं, किंतु उसके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि आनंद झलकता है। उसके कंधे पर कॉंवड़ होती है, पर वास्तव में वह अपने संस्कारों, अपनी परंपरा और अपनी सभ्यता की जिम्मेदारी उठा रहा होता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि यही युवा शक्ति केवल श्रावण मास तक सीमित न रहे। जिस उत्साह से वह काँवड़ यात्रा करता है, उसी ऊर्जा से यदि वह रक्तदान करे, वृक्ष लगाए, नदियों को स्वच्छ रखे, गौसेवा करे, निर्धनों की सहायता करे, परिवारों को जोड़ने का कार्य करे, सामाजिक समरसता बढ़ाए और राष्ट्र निर्माण में अपना समय लगाए, तो भारत के भविष्य को नई दिशा मिलेगी।

काँवड़ यात्रा हमें बताती है कि भारत का युवा दिशाहीन नहीं है। उसे केवल सही दिशा, सही प्रेरणा और सही नेतृत्व की आवश्यकता है। उसके भीतर अपार ऊर्जा है। वही ऊर्जा जब भगवान शिव के चरणों में समर्पित होती है, तब वह तपस्या बन जाती है; और जब राष्ट्र के चरणों में समर्पित होती है, तब वही ऊर्जा राष्ट्रनिर्माण का आधार बन जाती है।

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Commendable

I

Good Article

M

Informative &insightful

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