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SIR का विरोध कहीं हार की स्वीकारोक्ति तो नहीं

 Is opposition to SIR an admission of defeat?

बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष के मंसूबे पूरे हो पाएंगे या नहीं, इसकी जानकारी नतीजे ही देंगे। लेकिन राज्य में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन परीक्षण को लेकर जिस तरह विपक्ष जोर-आजमाइश कर रहा है, उससे लगता है कि वह लोकसभा चुनावों की तरह अपने पक्ष में मतदाताओं का मूड मोड़ने की कोशिश कर रहा है। विशेष गहन परीक्षण यानी एसआईआर को विपक्ष कुछ उसी अंदाज में तूल दे रहा है, जिस तरह लोकसभा चुनावों के दौरान उसने संविधान बदलने का नैरेटिव फैलाया। बीजेपी के बहुमत से 33 सीटें पीछे रहने की वजह इस नैरेटिव और उसके प्रभाव को ही माना गया था।

एसआईआर को तूल देने के पीछे विपक्ष की मंशा साफ है। विपक्ष इसे मुस्लिम और कुछ खास जाति विरोधी बताने की कोशिश कर रहा है। वह यह संकेत देने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर का मकसद विपक्ष समर्थक मतदाताओं का नाम कटवाना है। इसके जरिए वह चाहता है कि लोग मान लें कि चुनाव आयोग मोदी सरकार की कठपुतली बन गया है और उसके इशारे पर काम कर रहा है। संसद के मानसून सत्र को भी ठप करने के विपक्ष की रणनीति के पीछे बड़ी वजह एसआईआर भी रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विपक्षी राजनीति की यह रणनीति जमीन पर फलीभूत होती दिख रही है? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। इसका जवाब चुनाव आयोग के आंकड़े ही दे रहे हैं। बिहार में चुनाव आयोग ने अपने अभियान में जितने वोटर फॉर्म बांटे हैं, उनमें से 94.68 प्रतिशत चुनाव आयोग को वापस मिल चुके हैं। जिनके आधार पर चुनाव आयोग ने प्रारंभिक मतदाता सूची का प्रकाशन किया है। इसका मतलब यह है कि अगर लोगों को शक होता और विपक्षी रणनीति में भरोसा होता तो लोग विरोध स्वरूप यह फॉर्म वापस ही नहीं भेजते। कम से कम विपक्षी दलों के आधार वोट बैंक की ओर से इसके खिलाफ विरोध के सुर भी उठते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनाव कराने का अधिकार मिला हुआ है। इसके साथ ही जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत उसे इन चुनावों के लिए मतदाता मंडल गठित करने, उसकी जांच करने और उसका पुनरीक्षण करने का अधिकार मिला हुआ है। बिहार में इसके पहले 2003 में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण हुआ था। दिलचस्प यह है कि राज्य का जो विपक्ष इस परीक्षण का विरोध कर रहा है, उसका प्रमुख हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल उस समय राज्य की सत्ता में था। राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। लेकिन उनकी ओर से तब इस पर सवाल नहीं उठाया गया था। चुनाव आयोग का मानना है कि तब से लेकर अब तक राज्य की डेमोग्राफी में बहुत बदलाव आ गया है। कई तरह की गड़बड़ियों की भी सूचना आती रही है। उन्हीं में से एक गड़बड़ी है, राज्य में आधार कार्ड की उपलब्धता के आंकड़े। आधारकार्ड के आंकड़ों से प्रथम दृष्टया लगता है कि राज्य में फर्जी वोटरों की संख्या ज्यादा है। राज्य के सीमांचल के जिलों मसलन अररिया, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज जिलों में मुस्लिम आबादी करीब 39 से लेकर 68 प्रतिशत तक है, लेकिन इनकी सीमाएं पश्चिम बंगाल और नेपाल से जुड़ी हैं। पश्चिम बंगाल के सीमांचल के नजदीकी जिले बांग्लादेश से सटे हैं। इसकी वजह से इस इलाके में घुसपैठ का भी आरोप लगता रहा है। बिहार सरकार द्वारा जाति-आधारित सर्वेक्षण के दौरान एकत्र किए गए आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो इस आरोप में दम नजर आता है। इस आंकड़े के मुताबिक, राज्य का औसत आधार कवरेज लगभग 94 प्रतिशत है,

जबकि 68 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले किशनगंज में कुल जनसंख्या से करीब 105.16 प्रतिशत आधार है। इसी तरह, कटिहार में 45 प्रतिशत और अररिया में 50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, लेकिन यहां आधार कुल जनसंख्या का करीब 101.92 और 102.23 प्रतिशत ज्यादा है। सीमांचल के ही जिले पूर्णिया में 39 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, लेकिन यहां आधार कुल जनसंख्या का 101 प्रतिशत है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सीमांचल हर 100 निवासी पर 120 से अधिक आधार कार्ड हैं। यही वजह है कि चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में इन जिलों में मतदाता सूची में नाम के सत्यापन के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं माना है।

वैसे मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आधार कार्ड और राशन कार्ड को वैध प्रमाण

पत्र माना जाता रहा है। लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारी संख्या में फर्जी राशन कार्ड हो सकते हैं या आधार कार्ड भी बन सकते हैं।

स्वच्छ लोकतंत्र के लिए जरूरी स्वच्छ और स्पष्ट मतदाता सूची है। चुनाव आयोग का यह वैधानिक दायित्व है कि फर्जी वोटरों को मतदाता सूची से बाहर करे। लेकिन आज की राजनीति अपने वोटरों को साधने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि अपने प्रतिबद्ध वोटरों की रक्षा करने की हो गई है। बिहार में माना जाता है कि एम वाई समीकरण यानी मुस्लिम और यादव वोटर राष्ट्रीय जनता दल का समर्थक है। विपक्षी दलों को आशंका है कि बीजेपी के इशारे पर उसके इन्हीं वोटरों को काटा जा सकता है। चुनाव आयोग के प्रमुख के रूप में टीएन शेषन और केजे राव जैसे अधिकारियों के आने के पहले तक राज्य में बूथ लूट की घटनाएं खुलेआम होती थीं। अब तो खैर वैसा नहीं होता, लेकिन फर्जी वोटरों के नाम पर कुछ भी हो सकता है। दबंग उम्मीदवार चाहे तो अपने पक्ष में फर्जी या मृत वोटरों के नाम पर मतदान कराकर अपने पक्ष में नतीजे मोड़ सकते हैं।

फर्जी वोटरों की आशंका पर चर्चा से पहले एक हालिया शोध का भी जिक्र किया जाना जरूरी है, जिसके अनुसार बिहार में करीब 77 लाख फर्जी वोटर हैं। ये वोटर अल्पसंख्यक वर्ग वाले सिर्फ विदेशी घुसपैठिये ही नहीं है, बल्कि इसमें मृत और अपनी रिहायश छोड़ चुके मतदाता भी हैं। डेमोग्रॉफिक रिकंस्ट्रक्शन एंड इलेक्टोरल रोल इन्फ्लेशन, एस्टीमेटिंग दी लेजिटिमेट वोटर बेस इन बिहार, इंडिया नाम शोध अध्ययन के मुताबिक बिहार की मतदाता सूची में ही ऐसी गड़बड़ियां नहीं है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसी गड़बड़ियां बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की मतदाता सूची में हो सकती है। इस शोध अध्ययन को मुंबई के एसपी जैन इंस्टीट्यूट एंड मैनेजमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर विधु शेखर और और आईआईएम, विशाखापत्तनम के असिस्टेंट प्रोफेसर मिलन कुमार ने मिल कर किया है। एसएसआरएन में प्रकाशित यह अध्ययन किसी अनुमान पर नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़ों, मसलन राज्य की जन्म और मृत्यु दर के साथ ही राज्य से हुए पलायन और आयु प्रत्याशा के सरकारी आंकड़ों के गहन अध्ययन और विश्लेषण पर आधारित है।

विधु शेखर और मिलन कुमार के अध्ययन के मुताबिक, बिहार में इस समय करीब सात करोड़ 89 लाख वोटरों का नाम मतदाता सूची में दर्ज है। इस अध्ययन के मुताबिक, इनमें से करीब 77 हजार नाम फर्जी हैं। यानी ये मतदाता या तो मर चुके हैं या बरसों पहले से अपनी बताई या दर्ज जगह से पलायन करके कहीं और जा बसे हैं। फर्जी या गलत मतदाताओं का यह आंकड़ा करीब 9.7 प्रतिशत होता है। इसका मतलब यह हुआ कि करीब दस प्रतिशत मतदाता ज्यादा हैं या असल में हैं ही नहीं। विधु शेखर और मिलन कुमार अपने शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि राज्य की हर विधानसभा सीट पर करीब तीस हजार मतदाताओं का नाम गलत तरीके से दर्ज है।

बिहार में विधानसभा की 243 सीटें हैं। विधानसभाओं में कुछ सौ मतदाताओं का अंतर ही जीत-हार पर असर डाल देता है। साल 2020 के विधानसभा चुनावों में करीब बीस प्रतिशत सीटों पर जीत और हार का अंतर महज ढाई फीसद तक ही था। इनमें से 17 सीटों पर जीत तो एक प्रतिशत के कम वोट से ही हुई थी। विधु शेखर और मिलन कुमार को आशंका है कि अगर गहन पुनरीक्षण में इन मतदातओं के नाम नहीं काटे गए तो उनके नाम पर चुनावी नतीजों को बदला जा सकता है।

इस अध्ययन के अनुसार, बिहार के गांवों में जहां मृत्यु के आंकड़े अपडेट ना होने की वजह से फर्जी नाम ज्यादा हैं, वहीं शहरी इलाकों में पलायन के बावजूद नाम काटे नहीं गए हैं। राज्य में पिछली बार मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण 2003 में हुआ था। उस समय राज्य में करीब तीन करोड़ 41 लाख मतदाता थे। राज्य की मौजूदा जन्म और मृत्यु दर के हिसाब से इसके बाद 4.83 जुड़ने चाहिए थे। इसके साथ ही सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन वर्षों में राज्य से करीब एक करोड़ 12 लाख वोटरों ने पलायन किया है। उन्होंने अपना स्थायी ठिकाना राज्य से बाहर बना लिया है। इसे दिल्ली, मुंबई, पंजाब जैसे शहरों और राज्यों में देखा भी जा रहा है, जहां भारी संख्या में बिहारी मूल के मतदाता हैं। इस शोध अध्ययन के मुताबिक, पुराने वोटरों, जन्म-मृत्यु दर की गणना और पलायन के बाद के आंकड़ों को मिलाकर राज्य में असल मतदाताओं की संख्या सात करोड़ 12 लाख के ही आसपास ही बैठती है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि राज्य में जो सतहत्तर लाख ज्यादा वोटरों के नाम हैं, वे इन वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर गड़ब़ड़ हैं।

विधु शेखर और मिलन कुमार का शोध अध्ययन को चुनाव आयोग के आंकड़े भी साबित करते हैं। अकेले सीमांचल में ही दो लाख 55,276 ऐसे मतदाताओं की पहचान हुई है, जो मृत हैं। इसके बावजूद उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज था। चुनाव आयोग ने 27 जुलाई को जो आंकड़े जारी किए हैं, उनमें  22 लाख यानी कुल मतदाता सूची का करीब 2.83% प्रतिशत मतदाता मृत मिले हैं। जबकि 36 लाख यानी 4.59 फीसद वोटर अपनी दर्ज जगह को हमेशा के लिए छोड़ चुके हैं। इनमें से काफी लापता भी हैं। इनके अलावा सात लाख यानी करीब 0.89 प्रतिशत मतदाताओं के नाम एक से अधिक जगहों की मतदाता सूची में दर्ज हैं। अभी फाइनल लिस्ट बनने तक इसमें और नाम घट-बढ़ सकते हैं। इस लिहाज से राज्य के मौजूदा दर्ज मतदाताओं की तुलना में करीब 8.31 प्रतिशत के नाम कटने तय हैं।  क्योंकि उनका अस्तित्व या उनकी मौजूदगी अब नहीं है।

चुनाव आयोग के इन आंकड़ों पर विपक्ष शायद ही भरोसा करे। वैसे भी चुनाव आयोग को वह सरकार का पिछलग्गू बताने से नहीं हिचक रहा है। उसकी निष्पक्षता की साख को भी तार-तार कर चुका है। इसलिए उम्मीद कम ही है कि विपक्ष चुनाव आयोग के विशेष  गहन पुनरीक्षण को स्वीकार करे। वैसे तेजस्वी यादव तो एक बार चुनाव बहिष्कार का संकेत तक दे चुके हैं। वैसे विपक्ष का यह अभियान अगर जारी रहा तो उसके लिए खतरा भी है। खतरा यह कि कहीं इसे उसकी भावी हार की स्वीकारोक्ति न मान ली जाए।



 


उमेश चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार
राजनीतिक समीक्षक

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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