
नीलाभ कृष्ण
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में मीडिया की भूमिका केवल खबरें दिखाने या घटनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में मीडिया जनता की आंख और कान होने के साथ-साथ सत्ता से सवाल पूछने, व्यवस्था की खामियों को उजागर करने और नागरिकों को सही जानकारी देने का माध्यम भी है। लेकिन आज एक बड़ा सवाल सामने खड़ा है—क्या भारतीय मीडिया वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर अपना दायित्व निभा रहा है, या पत्रकारिता का एक हिस्सा राजनीतिक दलों, कारोबारी हितों और वैचारिक खेमेबाजी के बीच उलझकर रह गया है?
इस सवाल का जवाब किसी एक अखबार, एक न्यूज चैनल या किसी एक राजनीतिक दल के आधार पर नहीं दिया जा सकता। भारत का मीडिया संसार बहुत व्यापक है। इसमें ऐसे पत्रकार भी हैं, जिन्होंने सत्ता के दबाव के बावजूद सच सामने लाने का जोखिम उठाया है, और ऐसे संस्थान भी हैं जिनकी रिपोर्टिंग पर राजनीतिक पक्षधरता, कारोबारी हितों और चयनात्मक पत्रकारिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए असली कसौटी यह नहीं हो सकती कि मीडिया सरकार की आलोचना कितनी बार करता है। असली कसौटी यह है कि वह सरकार और विपक्ष, दोनों से सवाल पूछने का साहस रखता है या नहीं।
आपातकाल से आज तक: सत्ता और मीडिया का रिश्ता
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में 1975 का आपातकाल एक ऐसा अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लागू की। अखबारों को खबरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। सत्ता की असहमति को दबाने की कोशिशों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब सरकार सूचना पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है, तब लोकतंत्र की बुनियाद तक हिल सकती है।
उस दौर में कुछ समाचार संस्थानों और पत्रकारों ने दबाव के सामने झुकने के बजाय प्रतिरोध का रास्ता चुना। द इंडियन एक्सप्रेस का नाम भी इसी संदर्भ में लिया जाता है। आपातकाल की यह विरासत भारतीय लोकतंत्र को लगातार याद दिलाती है कि प्रेस की स्वतंत्रता सरकार की कृपा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।
लेकिन इस इतिहास का एक दूसरा सबक भी है। मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ केवल सरकार से स्वतंत्र होना नहीं है। पत्रकारिता को राजनीतिक दलों, बड़े कारोबारी समूहों, विज्ञापनदाताओं, वैचारिक संगठनों और अपने व्यावसायिक हितों के अनुचित प्रभाव से भी मुक्त रहना चाहिए। यदि कोई समाचार संस्थान सरकार के दबाव से बचकर किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में आ जाता है, तो क्या उसे वास्तव में स्वतंत्र पत्रकारिता कहा जा सकता है?
'गोदी मीडिया' का नैरेटिव और कांग्रेस की राजनीति
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में 'गोदी मीडिया' शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ है। कांग्रेस और विपक्ष के कई नेता उन समाचार संस्थानों पर यह आरोप लगाते रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग सरकार के पक्ष में जाती दिखाई देती है या जो विपक्ष के दावों पर सवाल उठाते हैं। इस आलोचना के पीछे कुछ मामलों में मीडिया की वास्तविक कार्यशैली को लेकर सवाल हो सकते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब किसी खबर की सत्यता पर बहस करने के बजाय उसे प्रकाशित करने वाले पत्रकार की राजनीतिक निष्ठा पर हमला शुरू कर दिया जाता है।
अगर कोई अखबार सरकार की किसी योजना के सकारात्मक परिणामों की खबर प्रकाशित करता है, तो क्या केवल इस आधार पर वह सरकार का प्रचारक बन जाता है? यदि किसी पत्रकार को विपक्ष के किसी दावे में तथ्यात्मक कमी दिखाई देती है और वह उस पर सवाल उठाता है, तो क्या वह अपने आप सत्ता का समर्थक हो जाता है? पत्रकारिता को राजनीतिक चश्मे से देखने की यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है।
लेकिन यही कसौटी कांग्रेस पर भी लागू होनी चाहिए। यदि कांग्रेस किसी मीडिया संस्थान को सरकार के करीब होने के कारण कठघरे में खड़ा करती है, तो उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि विपक्षी दलों और मीडिया संस्थानों के बीच संबंधों की जांच करना भी उतना ही जायज है। मीडिया की निष्पक्षता का प्रमाणपत्र किसी राजनीतिक दल के हाथ में नहीं हो सकता।
यही वजह है कि मीडिया के साथ कांग्रेस के अपने संबंधों पर उठने वाले सवालों को भी गंभीरता से देखना जरूरी है। कांग्रेस के चुनावी खर्च के विवरण में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान एक अखबार को लगभग 81.45 लाख रुपये के भुगतान का उल्लेख सामने आया है। इस प्रविष्टि के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अखबार की पत्रकारिता खरीदी गई थी या उसकी रिपोर्टिंग पर कांग्रेस का प्रभाव था। ऐसा दावा करने के लिए अलग और ठोस प्रमाण जरूरी होंगे। लेकिन यह पूछना बिल्कुल जायज है कि इतनी बड़ी रकम किस सेवा के लिए दी गई? क्या यह विज्ञापन था, चुनाव प्रचार से जुड़ी कोई सेवा थी या कोई अन्य वैध खर्च?
यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि इसी समाचार संस्थान ने निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवादों पर रिपोर्टिंग की, जिसे राहुल गांधी और कांग्रेस ने अपने राजनीतिक आरोपों के समर्थन में इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में निर्वाचन आयुक्तों के बीच विभिन्न मुद्दों पर दर्ज आपत्तियों का उल्लेख किया गया था। कांग्रेस ने इसे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के आधार के रूप में पेश किया।
यहां मुद्दा यह नहीं है कि कांग्रेस को किसी अखबार की रिपोर्ट का हवाला देने का अधिकार है या नहीं। उसे पूरा अधिकार है। मुद्दा यह है कि यदि कोई राजनीतिक दल मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, तो उसे अपने मीडिया संबंधों के बारे में भी पारदर्शिता बरतनी चाहिए। भुगतान का विवरण अपने आप में किसी अनुचित लेन-देन का प्रमाण नहीं है, लेकिन उसका उद्देश्य स्पष्ट करना पारदर्शिता की सामान्य अपेक्षा है।
यदि रकम विज्ञापन के लिए दी गई थी, तो उसका विवरण सामने रखा जा सकता है। यदि वह किसी अन्य वैध सेवा के लिए थी, तो उसकी जानकारी दी जा सकती है। इसी तरह, संबंधित समाचार संस्थान भी अपने व्यावसायिक और संपादकीय कामकाज के बीच अंतर स्पष्ट कर सकता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना किसी संस्था को दोषी ठहराना नहीं है। सवालों का जवाब देना ही जवाबदेही की बुनियाद है।

पत्रकारिता या राजनीतिक प्रचार?
आज मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि खबर और राजनीतिक प्रचार के बीच की रेखा कई बार धुंधली होती दिखाई देती है। किसी नेता का बयान खबर हो सकता है, लेकिन उस बयान को बिना जांचे-परखे सच के रूप में प्रस्तुत करना पत्रकारिता नहीं है। किसी सरकार की आलोचना करना पत्रकारिता का अधिकार है, लेकिन विपक्ष के आरोपों को बिना प्रमाण अंतिम सत्य मान लेना भी उतना ही गलत है।
मान लीजिए, कोई नेता आरोप लगाता है कि निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की है। मीडिया का काम उस आरोप को दबाना नहीं, बल्कि उसकी जांच करना है। उसे संबंधित दस्तावेज देखने चाहिए, निर्वाचन आयोग का पक्ष लेना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि उपलब्ध प्रमाण वास्तव में क्या साबित करते हैं। आयोग के भीतर मतभेद सामने आना एक महत्वपूर्ण खबर हो सकती है, लेकिन उससे अपने आप चुनावी धांधली साबित नहीं हो जाती। दूसरी ओर, आयोग का खंडन भी अपने आप सारे सवालों का जवाब नहीं बन जाता।
यही नियम सरकार की उपलब्धियों और दावों पर भी लागू होना चाहिए। रोजगार, आर्थिक विकास, निवेश, महंगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा या कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े सरकारी दावों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लेकिन जब विपक्ष सरकार पर गंभीर आरोप लगाए, तब भी तथ्यों की वही कसौटी अपनाई जानी चाहिए। पत्रकारिता का धर्म किसी एक पक्ष को सही साबित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर जनता को वास्तविक स्थिति समझाना है।
पैसे, विज्ञापन और मीडिया की स्वतंत्रता
पत्रकारिता केवल विचारों की दुनिया नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक व्यवस्था भी है। अखबारों, न्यूज चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को चलाने के लिए पैसा चाहिए। विज्ञापन, सदस्यता, निवेश और अन्य व्यावसायिक स्रोत मीडिया संस्थानों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन यही आर्थिक निर्भरता कई बार संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े करती है।
यदि किसी समाचार संस्थान को सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या आर्थिक हित उसकी रिपोर्टिंग को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह, बड़े कारोबारी समूहों के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थानों में भी हितों के टकराव की आशंका की जांच होनी चाहिए। राजनीतिक दलों से मिलने वाला विज्ञापन या किसी राजनीतिक अभियान के लिए दी जाने वाली व्यावसायिक सेवाएं भी पारदर्शिता के दायरे में आती हैं।
भारतीय प्रेस परिषद ने 'पेड न्यूज' को एक गंभीर समस्या माना है। जब किसी खबर या विश्लेषण के प्रकाशन के बदले नकद या किसी अन्य रूप में लाभ लिया जाता है और उसे स्वतंत्र पत्रकारिता की तरह प्रस्तुत किया जाता है, तो पाठक के साथ धोखा होता है। चुनाव के दौरान इसका खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि मतदाता उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के बारे में मिलने वाली जानकारी के आधार पर निर्णय लेते हैं।
इसलिए जरूरी है कि विज्ञापन को विज्ञापन के रूप में पहचाना जा सके और संपादकीय सामग्री को संपादकीय सामग्री के रूप में। किसी राजनीतिक दल का विज्ञापन देना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन भुगतान के बदले पक्षपातपूर्ण सामग्री को स्वतंत्र खबर की तरह पेश करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है।
डिजिटल मीडिया: अवसर भी, चुनौती भी
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भारतीय पत्रकारिता का स्वरूप बदल दिया है। अब खबरों के लिए नागरिक केवल अखबारों या टेलीविजन चैनलों पर निर्भर नहीं हैं। यूट्यूब, स्वतंत्र डिजिटल पोर्टल और सोशल मीडिया के माध्यम से नए पत्रकार और छोटे समाचार संस्थान भी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच रहे हैं। इससे उन विषयों और आवाजों को भी जगह मिली है, जिन्हें पहले मुख्यधारा के मीडिया में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता था।
लेकिन इस बदलाव का दूसरा पहलू भी है। सोशल मीडिया पर सनसनीखेज सामग्री, अधूरी जानकारी और भ्रामक दावे तेजी से फैल सकते हैं। कई बार किसी आरोप का छोटा-सा वीडियो क्लिप उसके मूल संदर्भ से काटकर प्रसारित किया जाता है। फिर वही क्लिप राजनीतिक बहस का आधार बन जाती है और लाखों लोग बिना मूल सामग्री देखे उसके आधार पर राय बना लेते हैं।
एल्गोरिदम और दर्शकों की पसंद भी इस समस्या को बढ़ाते हैं। लोग अक्सर वही समाचार चैनल और डिजिटल मंच देखते हैं, जो उनकी पहले से बनी राजनीतिक धारणाओं से मेल खाते हैं। परिणामस्वरूप, एक वर्ग को लगता है कि पूरा मीडिया सरकार के पक्ष में है, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार के खिलाफ अभियान चला रहा है। दोनों ही स्थितियों में तथ्यों की स्वतंत्र जांच पीछे छूटने का खतरा रहता है। इस चुनौती का समाधान किसी एक वैचारिक खेमे को मजबूत करना नहीं है। समाधान है—तथ्यों की पुष्टि, स्रोतों की पारदर्शिता, गलतियों को स्वीकार करना और खबर तथा विचार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना।

स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी
मीडिया की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता को सरकार के दबाव से बचाना चाहिए, लेकिन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को भी अपनी गलतियों, पक्षपात और हितों के टकराव पर सवालों का जवाब देना चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी समाचार संस्थान की आलोचना करना ही प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जाए।
इसी तरह, मीडिया की आलोचना के नाम पर पत्रकारों को धमकाना, उनके काम में बाधा डालना या उन्हें बिना प्रमाण किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा बताना भी स्वीकार्य नहीं है। सवाल पूछने और डराने-धमकाने के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया संस्थानों की जांच भी होनी चाहिए और उन्हें स्वतंत्र होकर काम करने की सुरक्षा भी मिलनी चाहिए।
कांग्रेस हो या भाजपा, तृणमूल कांग्रेस हो या आम आदमी पार्टी—किसी भी राजनीतिक दल को अपनी सुविधा के अनुसार पत्रकारिता की परिभाषा तय करने का अधिकार नहीं है। जो पार्टी सत्ता में है, उसे मीडिया की आलोचना सहने का साहस रखना चाहिए। जो पार्टी विपक्ष में है, उसे भी मीडिया के सवालों का जवाब देना चाहिए। और जो मीडिया संस्थान स्वतंत्र होने का दावा करते हैं, उन्हें अपने कामकाज में उस स्वतंत्रता को साबित करना चाहिए।
असली कसौटी क्या है?
भारत के मीडिया को लेकर एक ही वाक्य में फैसला सुनाना उचित नहीं होगा। देश में साहसी खोजी पत्रकारिता भी है, गंभीर और तथ्यपरक रिपोर्टिंग भी है, वैचारिक पत्रकारिता भी है और सनसनीखेज खबरों की समस्या भी। राजनीतिक दबाव, कारोबारी हित, स्वामित्व का केंद्रीकरण और सोशल मीडिया की खेमेबाजी जैसी चुनौतियां वास्तविक बहस की मांग करती हैं। लेकिन इन चुनौतियों के आधार पर पूरे भारतीय मीडिया को एक ही रंग में रंग देना भी सही नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता के लिए एक समान कसौटी तय हो। सरकार के विज्ञापन पर सवाल उठते हैं, तो राजनीतिक दलों के विज्ञापन पर भी सवाल उठने चाहिए। सरकार के दबाव की जांच होती है, तो विपक्ष के दबाव की भी होनी चाहिए। किसी मीडिया संस्थान के कारोबारी संबंध महत्वपूर्ण हैं, तो दूसरे संस्थान के संबंध भी जांच के दायरे में आने चाहिए। किसी राजनीतिक नेता का आरोप खबर बन सकता है, लेकिन आरोप को सच मानने से पहले प्रमाण देखना जरूरी है।
'गोदी मीडिया' का तमगा लगाने से न पत्रकारिता की गुणवत्ता साबित होती है, न किसी संस्थान की स्वतंत्रता। असली सवाल यह है कि खबर के पीछे प्रमाण क्या हैं, स्रोत कितने विश्वसनीय हैं और क्या संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। आखिरकार, भारत को ऐसा मीडिया नहीं चाहिए जो केवल सरकार के पक्ष में बोले या केवल विपक्ष के आरोपों को दोहराए। भारत को ऐसा मीडिया चाहिए जो जरूरत पड़ने पर सरकार को असहज करे, विपक्ष से कठिन सवाल पूछे, संवैधानिक संस्थाओं की जांच करे और अपनी गलतियों पर भी जवाबदेह रहे।
पत्रकारिता की पहली निष्ठा किसी राजनीतिक दल, सरकार, विचारधारा, विज्ञापनदाता या मीडिया मालिक के प्रति नहीं, बल्कि तथ्यों के प्रति होनी चाहिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता का असली परीक्षण इस बात से नहीं होगा कि वह किसकी आलोचना करता है, बल्कि इस बात से होगा कि क्या वह सबके लिए एक ही पैमाना अपनाता है। यदि सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र की जरूरत है, तो विपक्ष से सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है। यदि मीडिया को जनता के सामने सत्ता का हिसाब रखना है, तो उसे अपने प्रभाव, अपने हितों और अपने कामकाज पर उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना होगा।
आखिरकार, सवाल यह नहीं है कि मीडिया किसकी गोद में बैठा है। सवाल यह है कि क्या वह सच के साथ खड़ा है। और इस सवाल से न सरकार को छूट मिल सकती है, न विपक्ष को और न ही खुद मीडिया को।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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