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वायुसेना में स्वदेशी तकनीक

Indigenous technology in the Air Force

भारतीय सुरक्षा को चाकचौबंद बनाने में भारतीय वायुसेना की बड़ी भूमिका है। वैसे सुरक्षा में तीनों सेनाओं की अपनी-अपनी भूमिका है। लेकिन भारतीय वायुसेना की चुनौती ज्यादा है। क्योंकि उसकी निर्भरता सबसे ज्यादा प्रौद्योगिकी पर ज्यादा है। अब भी भारतीय वायुसेना की निर्भरता सबसे ज्यादा  विदेशी तकनीक पर रही है। लेकिन अब यह निर्भरता कम होने लगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अगुआई में एयरफोर्स लगातार स्वदेशी तकनीक पर निर्भर होता जा रहा है।

भारतीय सशस्त्र बलों का उद्देश्य अपने लिए बेहतर सैन्य क्षमता हासिल करना है, जिसके देश अपने निकटतम पड़ोसियों और विरोधियों से मिलने वाली चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सके। हाल के दिनों में अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से रूस चीन की ओर झुक रहा है तो ईरान से अमेरिका के अलग होने के बाद रूस और चीन ईरान के करीब आ रहे हैं। क्षेत्रीय और सीमा पार आतंकवाद की चुनौतियों से पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर भारत का पड़ोसियों से तनाव बढ़ा है। अफगानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण भी भारतीय सुरक्षा की चिंता का विषय है। अफगानिस्तान में भारत का  इससे असर घटा है, जिससे अफगानिस्तान में पाकिस्तान और चीन के प्रभाव में वृद्धि देखी जा सकती है। इससे भारत को कट्टरपंथ, सीमा पार आतंकवाद और अफगानिस्तान से होने वाले ड्रग्स और नशीले पदार्थों के व्यापार के रूप में समस्या पैदा कर सकता है। हाल ही में, चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर यथास्थिति को बदलने का प्रयास करके भारत के लिए बहुत असुविधा पैदा कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान को उसके मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम के लिए हथियार और तकनीक मुहैया कराकर चीन ने दिखाया है कि वह भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। इस वजह से भारत की ना सिर्फ अपनी सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं, बल्कि उसकी वजह से उसे तकनीक आधारित अपने दम पर ताकतवर बनने की तैयारी में है। इसमें स्वदेशीकरण ने नया अध्याय रच दिया है। इसका असर भी दिख रहा है। वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ़ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट (WDMMA) ने 2022 की ग्लोबल एयर पॉवर्स रैंकिंग जारी की थी, जिसमें भारतीय वायुसेना को दुनिया की छठी सबसे मजबूत वायु सेना के रूप में स्थान दिया गया है। इस रैंकिंग में विमानों की संख्या और उनकी लड़ाकू क्षमता को आधार बनाया गया है।

भारतीय वायुसेना को शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए लड़ाकू प्लेटफार्मों, हेलीकॉप्टरों, रात्रि दृष्टि उपकरणों और अन्य महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के बेड़े को कम करने जैसी बुनियादी ढांचे की कमियों को मजबूत करने की भी जरूरत है। जिसे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए देश में संयुक्त उद्यम लगाकर हासिल किया जा रहा है। इसमें रूस, इज़राइल, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका की तकनीकियों का हस्तांतरण हो रहा है। इससे भारत के अपने घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने में मदद मिल रही है।

भारतीय वायु सेना ने हाल ही में एक घोषणा की, जिसके मुताबिक, स्वदेशी एयरोस्पेस क्षेत्र को बढ़ावा देते हुए करीब 100 से अधिक भारत-निर्मित एलसीए मार्क 1ए लड़ाकू जेट खरीदने की योजना लागू की जा रही है। जिसकी अब आधिकारिक घोषणा की जा चुकी है। भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने इसकी घोषणा स्पेन में तब की, जब उन्होंने पहला सी-295 परिवहन विमान प्राप्त किया। उसी मौके पर उन्होंने एक एजेंसी से बातचीत में यह स्वीकार किया है। वायुसेना प्रमुख के मुताबिक,  मिग 23 और मिग -27 विमानों सहित बड़े मिग श्रृंखला के बेड़े के प्रतिस्थापन के लिए विकसित किया गया था। उन्हें नियमानुसार बदलने के लिए जरूरी है कि देश के पास पर्याप्त संख्या में एलसीए श्रेणी के विमान हों। इसलिए, 83 एलसीए मार्क 1ए के अलावा लगभग 100 और विमानों के लिए मामला आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय वायु सेना की योजना के अनुसार, भारत में बने ये विमान उसके बेड़े में मिग-श्रृंखला के लड़ाकू विमानों की जगह लेंगे। इसकी योजना रक्षा मंत्रालय के साथ ही बाकी संबंधित पक्षों तक  प्रस्तुत कर दी गई हैं।

भारतीय वायुसेना प्रमुख ने स्वदेशी फाइटर जेट कार्यक्रम को लेकर पिछले महीने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड समेत सभी संबंधित पक्षों के साथ समीक्षा बैठक की थी। उस समय, इनमें से लगभग 100 अतिरिक्त विमान खरीदने का निर्णय लिया गया था। इसका मतलब यह है कि एलसीए तेजस लड़ाकू विमान वास्तव में बड़ी संख्या में भारतीय वायु सेना की ताकत बढ़ा देंगे। आने वाले 15 दिनों में वायुसेना के पास 40 एलसीए, 180 से ज्यादा एलसीए मार्क-1ए और कम से कम 120 एलसीए मार्क-2 हवाई जहाज होंगे।

एलसीए मार्क1ए के लिए आखिरी ऑर्डर 83 विमानों के लिए था और पहला हवाई जहाज फरवरी 2024 के आसपास वितरित किया जाएगा। एलसीए मार्क 1ए तेजस विमान की उन्नत व्याख्या है। एलसीए मार्क 1ए हवाई जहाज में वायु सेना को आपूर्ति किए जा रहे मूल 40 एलसीए की तुलना में कहीं अधिक उन्नत एवियोनिक्स और रडार हैं। नए एलसीए मार्क 1ए में स्वदेशी सामग्री 65 प्रतिशत से भी अधिक होने वाली है। भारतीय वायु सेना प्रमुख ने पिछले महीने डिजाइन समीक्षा बैठक में आसानी से कहा था कि एलसीए अपने विमान श्रृंखला के स्वदेशीकरण की दिशा में बल के पसीने का ध्वजवाहक रहा है। यह कार्यक्रम देश के आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया उद्यम का अग्रदूत रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एयरोस्पेस क्षेत्र में  भारत की निर्भरता का ध्वजवाहक है। करीब एक साल पहले जोधपुर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा डिजाइन और विकसित किए गए लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (एलसीएच) को भारतीय वायु सेना (आईएएफ) में औपचारिक रूप से शामिल किया था। वह भी स्वदेशी तकनीक पर ही आधारित था। जिसे "प्रचंड" नाम दिया गया है। तब रक्षा मंत्री ने कहा था कि इसका समावेश अमृत काल के दौरान होता है जब राष्ट्र आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा होता है और यह भविष्य का संकेत है जब भारतीय वायुसेना दुनिया में सबसे बड़ी ताकत होगी, साथ ही देश को भी मजबूत बनाएगी। रक्षा उत्पादन आवश्यकताओं में पूरी तरह से आत्मनिर्भर। भारतीय वायुसेना में शामिल होने के तुरंत बाद रक्षा मंत्री ने एलसीएच पर उड़ान भी भरी।

तब रक्षा मंत्री ने स्वीकार किया था कि एलसीएच के वायुसेना में शामिल होना न केवल भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमताओं को बढ़ा रहा है, बल्कि रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक बड़ा कदम है, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल्पना की है। स्वदेशी डिजाइन और विकास के प्रति भारतीय वायुसेना द्वारा जताया गया भरोसा और समर्थन मारुत, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, आकाश मिसाइल सिस्टम, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर और लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर जैसे उदाहरणों से स्पष्ट है। उन्होंने कहा, "एलसीएच का शामिल होना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जिस तरह देश भारतीय वायु सेना पर भरोसा करता है, उसी तरह भारतीय वायुसेना भी स्वदेशी उपकरणों पर उतना ही भरोसा करती है।"

यह सच है कि आजादी के बाद लंबे समय तक स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टरों के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। हालाँकि, 1999 में कारगिल युद्ध के बाद से, एलसीएच की आवश्यकता अधिक महसूस की गई थी और आज का एलसीएच उस दिशा में दो दशकों के अनुसंधान एवं विकास और स्वदेशी प्रयासों का परिणाम था।  एलसीएच न केवल अपने रोटर्स, इंजन और ब्लेड के बल पर, बल्कि कई वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अन्य लोगों की तपस्या, धैर्य, समर्पण और देशभक्ति के बल पर भी उड़ान भर रहा है।

स्वदेश निर्मित एलसीएच आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं और संचालन की विभिन्न परिस्थितियों में आवश्यक गुणवत्ता मानकों को पूरा करता है। यह आत्म-सुरक्षा करने, विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद ले जाने और इसे तुरंत क्षेत्र में पहुंचाने में सक्षम है। उन्होंने कहा, यह बहुमुखी हेलीकॉप्टर विभिन्न इलाकों में हमारे सशस्त्र बलों की जरूरतों को पूरी तरह से पूरा करता है और इस तरह एलसीएच हमारी सेना और वायु सेना दोनों के लिए एक आदर्श मंच है।

एलसीएच एचएएल द्वारा डिजाइन और निर्मित पहला स्वदेशी मल्टी-रोल कॉम्बैट हेलीकॉप्टर है। इसमें शक्तिशाली जमीनी हमले और हवाई युद्ध क्षमता है। भारतीय वायुसेना की नवगठित नंबर 143 हेलीकॉप्टर यूनिट में शामिल किया गया, यह स्वदेशी डिजाइन, विकास और विनिर्माण में भारत की बढ़ती शक्ति का प्रमाण है और रक्षा में 'आत्मनिर्भरता' की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। हेलीकॉप्टर में आधुनिक स्टील्थ विशेषताएं, मजबूत कवच सुरक्षा और जबरदस्त रात में हमला करने की क्षमता है। जहाज पर उन्नत नेविगेशन प्रणाली, नज़दीकी लड़ाई के लिए तैयार बंदूकें और शक्तिशाली हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें एलसीएच को आधुनिक युद्धक्षेत्र के लिए विशेष रूप से अनुकूल बनाती हैं। उच्च ऊंचाई वाले इलाके से संचालन करने और उच्च ऊंचाई वाले लक्ष्यों पर सटीक हमला करने में सक्षम, हेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना के शस्त्रागार में एक जबरदस्त अतिरिक्त है। आज भारतीय सेना ना सिर्फ स्वदेशी तकनीक आधारित शस्त्रों और सहयोगी रक्षा उत्पादनों में सक्रिय है, बल्कि रक्षा उत्पादन का कारोबार भी बढ़ाया हुआ है। केंद्र सरकार का लक्ष्य साल

2027 तक देश की रक्षा जरूरतों का अधिकांश हिस्सा खुद उत्पादित करने और इसके जरिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत का लक्ष्य रखा है। स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने इस दिशा में जहां शोध और तकनीकी विकास पर फोकस किया, वहीं रक्षा उद्योग के लिए कार्यरत भारत डायनेमिक्स लिमिटेड समेत सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा उत्पादन कंपनियों ने अपने कामकाज की शैली में बदलाव लाने की दिशा में तेजी दिखाई। इस सिलसिले में रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण पर भी फोकस हुआ। इसका असर यह हुआ है कि पिछले पाँच वर्षों में भारत सरकार ने प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के साथ 200 से अधिक रक्षा अधिग्रहण प्रस्तावों को मंज़ूरी दी है, जिसका मूल्य लगभग चार खरब रूपए है। हालांकि अभी अधिकांश प्रसंस्करण के अपेक्षाकृत प्रारंभिक चरण में हैं। यहां ध्यान देने की बात यह है कि दुनिया के शीर्ष 100 सबसे बड़े हथियार उत्पादकों में से चार कंपनियाँ भारत की हैं। इस सूची में भारतीय आयुध कारखाना, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड शामिल हैं। ये सभी कंपनियाँ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम हैं और घरेलू आयुध मांग के बड़े हिस्से को पूरा करने की जिम्मेदारी इन्हीं पर हैं। वैसे एक बात और ध्यान देने की है कि ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत जहां अन्य उद्योगों के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं रक्षा उत्पादन के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर सरकारी स्तर पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। एक तरह से रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को विशेषाधिकार दिया गया है। इसमें एयरफोर्स में शामिल किए जा रहे तकनीकी संसाधनों की बड़ी हिस्सेदारी है। जाहिर है कि यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की वजह से संभव हो पाया है।

 

 


उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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