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पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के संकेत

Indications of election results of five states

 

मोदी और भारतीय जनता पार्टी के चिरविरोधियों को भले ही पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव नतीजों ने चौंकाया हो, लेकिन नतीजे ज्यादातर विश्लेषकों की उम्मीदों के अनुरूप ही रहे। अगर चौंकाने वाला नतीजा किसी को कहा जा सकता है तो वह तमिलनाडु का है, जहां महज दो साल पुरानी पार्टी ने आजादी के पहले की गठित द्रविड़ मुनेत्र कषगम् ही नहीं, 1972 में स्थापित अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कषगम् को भी धूल चटा दी।

इन विधानसभा चुनाव नतीजों ने मोटे तौर पर तीन संदेश दिए हैं। पहला संदेश यह है कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति के उस स्तर पर पहुंच गई है, जहां उसे चुनौती देना फिलहाल किसी भी सियासी दल के लिए संभव नहीं रह गया है। दूसरा संदेश यह है कि अब युवाओं को राजनीतिक दल ठग नहीं सकते। सूचना और संचार क्रांति के जरिए उसके पास सूचनाओं और जानकारियों की बाढ़ है। अब वह घिसे-पिटे सियासी मुद्दे और राजनीतिक दलों द्वारा रचे स्वार्थी भ्रम जाल में नहीं फंसने वाला है और तीसरा संदेश यह है कि अगर राजनीतिक दल सुधरेंगे नहीं तो उन्हें सबक सिखाने के लिए जनता तैयार है। इन सबके बीच इन पांच विधानसभा चुनाव नतीजों का एक सबक यह भी है कि विदेशी उत्स वाली वैचारिकी के लिहाज से भारत को परखने और उसे समझने का दौर बीत गया है। केरल से वामपंथ की विदाई, सिर्फ केरल से ही नहीं है, बल्कि 1977 से चली रही उस परंपरा का भी तिरोहित हो जाना है, जिसके तहत देश के किसी किसी कोने में वामपंथ की सत्ता रहती रही।

कुछ साल पहले अमेरिका की एक समाचार पत्रिका ने ममता बनर्जी के बारे में लिखा था कि वह दक्षिण एशिया में पहली ऐसी महिला नेता हैं, जो किसी बड़े राजनीतिक परिवार से नहीं हैं या फिर वह किसी स्थापित राजनीतिक घराने से नहीं हैं। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है, अपने दम पर हासिल किया है। ममता बनर्जी ने बेशक राजनीति की शुरूआत कांग्रेस के साथ की, लेकिन उनका पूरा राजनीतिक जीवन पश्चिम बंगाल की वामपंथी विचारधारा वाली सरकार के खिलाफ रहा। इसी सरकार ने जब पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में अपने नीतियों को बदलते हुए औद्योगीकरण की शुरूआत की, ममता ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। इसी अभियान की बुनियाद पर शुरू सिंगूर के संग्राम ने 2011 के विधानसभा चुनावों में वामपंथ के 34 साल पुराने किले को ढहा दिया। ममता को अपार बहुमत मिला। वह बहुमत वामपंथी शासन व्यवस्था के तहत पिछड़े बंगाल की सूरत बदलने के लिए था, ममता ने शुरू में सूरत तो बदली, लेकिन बाद में उनकी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी ठीक उसी तरह का व्यवहार करने लगे, जैसे वामपंथी शासन के दौरान उसके कार्यकर्ता करने लगे। वामपंथी शासन में पार्टी की स्थानीय इकाइयां प्रशासन से भी ज्यादा ताकतवर हो गईं थीं, ठीक उसी तरह तृणमूल के कार्यकर्ता भी ताकतवर होते चले गए। नारदा, शारदा, शिक्षक भर्ती घोटाला आदि जैसे कितने ही घोटाले सामने आने लगे। ममता खुद तो सूती साड़ी पहनती रहीं, हवाई चप्पल पहनती रहीं, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की अगुआई में तृणमूल में अनाचारी तंत्र स्थापित होता चला गया। प्रशासन पंगु हो गया। केंद्रीय योजनाओं को ममता ने किनारे रखना शुरू कर दिया, केंद्रीय एजेंसियों पर सीधा हमला बोलने लगीं, अपने भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों को बचाने के लिए वे सीधे मैदान पर उतर जातीं। इसी बीच कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की रेजिडेंट डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। इस मामले की जिस तरह ममता सरकार ने लीपापोती की, उससे पश्चिम बंगाल का भद्र समाज चिढ़ गया। तृणमूल के नेताओं द्वारा खुलेआम बलात्कार को अंजाम देना, संदेशखाली की घटना इसका उदाहरण रही। फिर ममता की सरकार ऐसा व्यवहार करने लगी, जैसे वह भारतीय सीमाओं से बाहर की सरकार हो। इसे राष्ट्रवाद के उपज की धरती ने स्वीकार नहीं किया और ममता की सत्ता को उखाड़ फेंका। निश्चित तौर पर ममता के इस गढ़ को ढहाने का श्रेय उस भारतीय जनता पार्टी को जाता है, जिसके सहयोग से ममता पहली बार केंद्रीय कैबिनेट की प्रभावी मंत्री बनीं। इस पूरी चर्चा में अगर अमित शाह का जिक्र नहीं किया जाए तो पश्चिम बंगाल में ममता की हार को लेकर अधूरी समझ बनेगी। ममता अपने संघर्षशील तरीके से डाल-डाल चलती रहीं तो अमित शाह रणनीतिक रूप से पात-पात चलते रहे। अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता की बुनियाद पर संघर्षशील कार्यकर्ताओं को रणनीतिक और वैचारिक नेतृत्व दिया। स्थानीय मुद्दों पर ममता को उन्हीं की भाषा में जवाब देना अमित शाह के लिए ही संभव था।

असम के लिए घुसपैठ का मुद्दा बहुत पुराना मुद्दा रहा है। वामपंथी शासन के दौरान ममता भी घुसपैठ का मुद्दा खूब उछालती रहीं। लेकिन सत्ता में आने के बाद वे घुसपैठ को भूलती चली गईं। घुसपैठ उनके लिए वोट बैंक का एक तरह से जरिया बनता गया। ठीक उसी तरह, जैसे कभी वामपंथ का होता गया। इसलिए उन्होंने भी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाई। असम में भारतीय जनता पार्टी ने घुसपैठ को मुद्दा बनाया। हिमंत विस्व सरमा घुसपैठ के साथ ही इस राज्य में स्पष्टवादी और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के प्रतीक बनकर उभरते गए। आज वे असम में ही बीजेपी का चेहरा नहीं हैं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर का भाजपाई चेहरा है। पूर्वोत्तर भारत में वे भारतीय जनता पार्टी का बड़ा चेहरा हैं। केंद्रीय स्तर पर अमित शाह की जैसी कड़क छवि है, हिमंत की भी कुछ वैसी ही छवि स्थानीय स्तर पर है। अमित शाह जिस तरह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय रणनीतिकार के तौर पर स्थापित हो चुके हैं, पूर्वोत्तर में हिमंत भी कुछ उसी तरह स्थापित हो चुके हैं।

केरल में जैसा कि उम्मीद थी, वामपंथ के दस साल के शासन का अंत होगा और हो गया। केरल में सीपीएम की अगुआई में जहां वामपंथी दलों का धड़ा संघर्षशील रहता है, वहीं वहां कांग्रेस का गठबंधन इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी आईयूएमएल के साथ है। इसलिए कह सकते हैं कि कांग्रेस की अगुआई वाला संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा मुस्लिम प्रभाव वाला धड़ा है। जब तक केरल बीजेपी कमजोर रही, उसका असर कम रहा, केरल के हिंदुओं का वोट वाममोर्चे को मिलता रहा। लेकिन अब केरल में बीजेपी प्रभावी होती जा रही है। इस बार उसने तीन सीटें जीतकर एक तरह से इतिहास रचा है। दस साल पहले उसका विधानसभा में खाता खुला था। इसकी वजह से केरल के वाममोर्चे को हिंदू समर्थन घटा है। देश के तमाम कोनों की सत्ता से बाहर होती रही कांग्रेस के लिए केरल की सत्ता में वापसी राहत की बात हो सकती है। लेकिन यह तय है कि आने वाले दिनों में अब केरल का राजनीतिक परिदृश्य भी कुछ उसी तरह बदलेगा, जैसे पश्चिम बंगाल में बदला है। दस साल पहले पश्चिम बंगाल में बीजेपी को दस प्रतिशत के कुछ ज्यादा वोट और महज तीन सीटें मिली थीं। केरल में तो बीजेपी को करीब बारह प्रतिशत वोट मिले हैं। कह सकते हैं कि अब राज्य में वाममोर्चा और संयुक्त मोर्चा के एकाधिकार को वह चुनौती देने की स्थिति में गई है।

तमिलनाडु ने पांच दशक पुराना इतिहास दोहराया है। 1977 के चुनाव में तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एम जी रामचंद्रन की अगुआई वाली नवगठित अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कषगम को जीत मिली थी। तब तक उनकी पार्टी की स्थापना के पांच साल हो चुके थे। लेकिन इस बार तो तमिल सुपरस्टार चंद्रशेखर जोसेफ विजयन की जिस पार्टी को सबसे ज्यादा साथ मिला है, वह टीवीके तो महज दो साल पहले ही स्थापित हुई थी। विजयन की जीत एक तरह से उस राजनीति को भी शिकस्त है, जिसका एक मात्र हथियार केद्रीय राजनीति की मुखालफत और सनातन परंपराओं को गाली देना था। टीवीके की जीत में हिंदी के विरोध में हथियार बनाकर राजनीति करना, उत्तर भारत को गाली देना और केंद्रीय राजनीति को राजनीतिक की बजाय निजी दुश्मन मानने की डीएमके की राजनीति की विदाई का भी संदेश छुपा है। पड़ोसी केंद्र शासित पुद्दुचेरी के नतीजे भी अपेक्षा के ही अनुरूप रहे,जहां एनडीए को जीत मिली।

इन चुनाव नतीजों के संदेश साफ है कि अब लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा, भ्रष्टाचार को दूर भगाना होगा और घिसे-पिटे मुद्दों से राजनीति को दूरी बनानी होगी, दुनिया के साथ देश को भी कदमताल लायक बनाने की नीतियां लानी होंगी, तुष्टिकरण से दूरी बनानी होगी।


 


उमेश
 चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

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