
बिंदिया कुमारी
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो तत्काल सुर्खियों में भले ही सीमित समय के लिए दिखाई दें, लेकिन उनके निहितार्थ वर्षों तक वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करते हैं। हाल के महीनों में दो ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने दुनिया की बदलती कूटनीतिक दिशा को समझने का अवसर दिया। पहली घटना थी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा और दूसरी थी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा। सतही तौर पर देखें तो ये सामान्य राजनयिक दौरे प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन यदि इन्हें व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में देखा जाए तो ये संकेत देते हैं कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रही है। यह संक्रमण उस विश्व व्यवस्था का है जिसमें दशकों तक अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में स्थापित रहा, लेकिन अब उसके सामने ऐसी नई शक्तियाँ उभर रही हैं जिन्हें न तो आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है और न ही किसी एक खेमे में समेटा जा सकता है। इस बदलते परिदृश्य के केंद्र में भारत तेजी से एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने लगभग तीन दशकों तक अमेरिकी वर्चस्व वाली व्यवस्था को देखा। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक दृष्टि से भी वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में था। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर उसका प्रभाव था, डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बना हुआ था, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर उसका नियंत्रण था और आर्थिक प्रतिबंधों को विदेश नीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की उसकी क्षमता अद्वितीय थी। इस दौर में अधिकांश देश अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के भीतर ही अपनी रणनीतियाँ तैयार करते थे।

लेकिन समय के साथ वैश्विक शक्ति का वितरण बदलने लगा। चीन की अभूतपूर्व आर्थिक वृद्धि, रूस की सामरिक पुनर्सक्रियता, मध्य पूर्व की बदलती राजनीति और एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने एक नई बहुध्रुवीय दुनिया की नींव रखनी शुरू कर दी। आज स्थिति यह है कि अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक है, लेकिन वह अब अकेला निर्णायक केंद्र नहीं रह गया है। यही कारण है कि वाशिंगटन की विदेश नीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा इसी परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं थी। उनके साथ अमेरिका के कई प्रभावशाली उद्योगपति और कॉरपोरेट जगत के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। यह तथ्य स्वयं इस बात का संकेत है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव के बावजूद अमेरिका और चीन के आर्थिक संबंध इतने गहरे हैं कि उन्हें पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है। वैश्विक विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखलाएँ और व्यापारिक नेटवर्क आज भी बड़े पैमाने पर चीन से जुड़े हुए हैं। अमेरिकी कंपनियाँ चीनी बाजार की उपेक्षा नहीं कर सकतीं और अमेरिकी उपभोक्ता भी लंबे समय से चीनी उत्पादों पर निर्भर रहे हैं।
दूसरी ओर, चीन भी अब उस स्थिति में पहुँच चुका है जहाँ वह अमेरिका के दबाव के सामने रक्षात्मक मुद्रा में खड़ा नहीं होता। ताइवान, दक्षिण चीन सागर, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर बीजिंग लगातार यह संदेश दे रहा है कि वह अपने रणनीतिक हितों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि अमेरिका को पहली बार यह महसूस हो रहा है कि चीन को केवल दबाव की नीति से संतुलित करना संभव नहीं होगा। यहीं से भारत की भूमिका शुरू होती है।
मार्को रुबियो की भारत यात्रा को केवल एक नियमित राजनयिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह यात्रा उस रणनीतिक पुनर्संतुलन का प्रतीक है जो अमेरिका पिछले कुछ वर्षों से कर रहा है। वाशिंगटन यह समझ चुका है कि एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने और चीन की बढ़ती प्रभाव क्षमता का सामना करने के लिए भारत की भूमिका अपरिहार्य होती जा रही है। लेकिन यह स्थिति रातोंरात नहीं बनी। इसके पीछे पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति, आर्थिक क्षमता और सामरिक सोच में आए व्यापक परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
2014 से पहले भारत को अक्सर एक ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता था जिसमें अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन जो अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रही है। वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति महत्वपूर्ण तो थी, लेकिन निर्णायक नहीं मानी जाती थी। पिछले एक दशक में यह स्थिति उल्लेखनीय रूप से बदली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विदेश नीति को केवल प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण से निकालकर सक्रिय और बहुआयामी रणनीतिक नीति में परिवर्तित करने का प्रयास किया। नई दिल्ली ने विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संबंध विकसित किए और स्वयं को किसी एक ध्रुव के साथ बाँधने से बचाए रखा।
भारत की यही "मल्टी-अलाइनमेंट" रणनीति आज उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति बन चुकी है। जहाँ शीत युद्ध के दौरान अधिकांश देशों को किसी एक गुट का हिस्सा बनना पड़ता था, वहीं भारत ने वर्तमान दौर में एक अलग मॉडल प्रस्तुत किया है। उसने अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत किया, लेकिन रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखा। उसने पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी का विस्तार किया, साथ ही खाड़ी देशों और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
रूस-यूक्रेन युद्ध इस नीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हुआ। पश्चिमी देशों के व्यापक दबाव के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा। साथ ही उसने अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक सहयोग को भी कमजोर नहीं होने दिया। इस संतुलन ने दुनिया को यह संकेत दिया कि भारत अब अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से संचालित करने की क्षमता रखता है और वह किसी भी बाहरी दबाव के आधार पर अपने राष्ट्रीय हितों का निर्धारण नहीं करेगा।
भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति ने भी उसकी वैश्विक स्थिति को मजबूत किया है। पिछले वर्षों में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। डिजिटल अवसंरचना, विनिर्माण, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में हुई प्रगति ने भारत को केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एक संभावित वैश्विक उत्पादन और नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित किया है। यही कारण है कि सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में दुनिया की बड़ी शक्तियाँ भारत के साथ सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखा रही हैं।
आज की वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। 21वीं सदी में आपूर्ति श्रृंखलाएँ, ऊर्जा गलियारे, तकनीकी मानक, डेटा नियंत्रण और औद्योगिक क्षमता उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं जितने पारंपरिक सैन्य संसाधन। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से वैश्विक अवसंरचना और संपर्क नेटवर्क में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया। इसके जवाब में अमेरिका और उसके साझेदार ऐसे वैकल्पिक नेटवर्क विकसित करना चाहते हैं जो चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकें। इस रणनीति में भारत की भूमिका केंद्रीय होती जा रही है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा इसी सोच का एक उदाहरण है। यह परियोजना केवल व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला एक भू-राजनीतिक प्रयास भी है। भारत की भौगोलिक स्थिति, उसकी आर्थिक क्षमता और उसके बढ़ते अंतरराष्ट्रीय संबंध उसे इस तरह की पहलों का स्वाभाविक केंद्र बनाते हैं।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती सक्रियता भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है। हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक उपस्थिति, क्वाड जैसे मंचों में उसकी भूमिका और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में उसकी बढ़ती क्षमताएँ उसे क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बनाती हैं। अमेरिका के लिए यह स्पष्ट हो चुका है कि एशिया में दीर्घकालिक स्थिरता और संतुलन भारत की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
इसी कारण पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी भाषा और दृष्टिकोण में भी परिवर्तन दिखाई देता है। एक समय था जब भारत को विभिन्न मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से सलाह देने या दबाव बनाने की कोशिशें की जाती थीं। आज अमेरिका की प्राथमिकता साझेदारी, सहयोग और साझा हितों की भाषा पर अधिक केंद्रित है। इसका कारण केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह बदलती शक्ति वास्तविकताओं की स्वीकारोक्ति भी है।
भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह स्वयं को वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देशों के लिए भारत एक ऐसे मॉडल के रूप में उभरा है जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर रहते हुए आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति का मार्ग अपनाया है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने इस भूमिका को और अधिक मजबूती से प्रस्तुत किया।
इन सभी घटनाक्रमों को एक साथ जोड़कर देखें तो स्पष्ट होता है कि आज विश्व राजनीति एक नए युग की ओर बढ़ रही है। यह वह दौर नहीं है जिसमें एक ही शक्ति सभी निर्णयों को नियंत्रित कर सके। यह वह समय है जब विभिन्न शक्ति केंद्र अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों और हितों के आधार पर वैश्विक व्यवस्था को आकार दे रहे हैं। इस नई व्यवस्था में भारत केवल एक सहभागी नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण निर्धारक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा और मार्को रुबियो की भारत यात्रा इसी व्यापक परिवर्तन की प्रतीक घटनाएँ हैं। एक ओर अमेरिका चीन की शक्ति और प्रभाव को समझने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह भारत के साथ अपने संबंधों को नए स्तर पर ले जाने की आवश्यकता को भी महसूस कर रहा है। यह केवल चीन को संतुलित करने की रणनीति नहीं है, बल्कि उस वास्तविकता की स्वीकारोक्ति भी है कि भारत अब वैश्विक शक्ति संतुलन का एक अनिवार्य स्तंभ बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। अमेरिका की नई रणनीतिक सोच इसी सिद्धांत को प्रतिबिंबित करती है। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत का महत्व इसलिए बढ़ा है क्योंकि उसने पिछले दशक में आर्थिक विकास, रणनीतिक स्वायत्तता, कूटनीतिक सक्रियता और वैश्विक विश्वसनीयता के आधार पर स्वयं को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है जिसकी अनदेखी करना किसी भी बड़ी शक्ति के लिए संभव नहीं है।
संभवतः यही कारण है कि आज जब वैश्विक शक्ति संतुलन का नया अध्याय लिखा जा रहा है, तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियों में भारत का नाम पहले से कहीं अधिक स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ दिखाई दे रहा है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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