भारत में रक्षा उत्पादन का भारतीयकरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी और नीतिगत सुधार कार्यक्रम के तहत शुरू 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत तेजी से बढ़ रहा है। इसकी सफलता का अंदाजा इस साल के कुल रक्षा उत्पादन के आंकड़ों से लगाया जा सकता है, जिसके अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में कुल रक्षा उत्पादन 1.54 लाख करोड़ रूपए के पार पहुँच गया है। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब तेइस हजार करोड़ ज्यादा है। पिछले वित्त वर्ष यानी 2023-24 में यह आंकड़ा एक लाख 27 हजार 434 करोड़ था। अगर शुरूआती वर्ष यानी 2014-15 के आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो यह वृद्धि करीब 174 प्रतिशत ज्यादा है। तब भारत ने 46429 करोड़ का उत्पादन किया था।
रक्षा उत्पादन में इस उपलब्धि में सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र ही नहीं, बल्कि निजी कॉर्पोरेट की भी हिस्सेदारी है। इस पूरे उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी करीब 23 प्रतिशत है। निजी क्षेत्र लगातार इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि अभी भी इस क्षेत्र में वर्चस्व सार्वजनिक क्षेत्र की ही कंपनियों का ही है। भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी कारपोरेट क्षेत्र दोनों की महत्वपूर्ण भागीदारी है। 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी विनिर्माण को बहुत बढ़ावा मिला है। यही वजह है कि वित्त वर्ष 2024-25 में कुल रक्षा उत्पादन ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
रक्षा उत्पादन की निगरानी और नीतिगत सहयोग के लिए मोदी सरकार ने अलग से रक्षा उत्पादन विभाग बनाया है। इसके अधीन कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएल प्रमुख रक्षा उत्पादक कंपनी के रूप में उभरी है। हालांकि इस क्षेत्र में भारत की अग्रणी निजी कंपनियां और कारोबारी समूह मसलन, टाटा, एल एंड टी और कल्याणी जैसे कॉर्पोरेट हाउस अब मिसाइल, तोप और बख्तरबंद वाहनों के निर्माण में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। नीतिगत बदलावों के चलते जहां बड़े कारपोरेट हाउसों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली, वहीं छोटे कारपोरेट हाउस और स्टार्टअप्स को भी मौका मिला है। रक्षा उत्पादन विभाग और वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, सोलह हजार लघु और मध्यम वर्ग की कंपनियां भी स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके साथ ही स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लिए 462 कंपनियों को 788 रक्षा औद्योगिक लाइसेंस जारी किए गए हैं।
रक्षा उत्पादन में नीतिगत सुधार और निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी का ही असर है कि आज देश, अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया समेत दुनिया के सौ से ज्यादा देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात कर रहा है। जहां तक रक्षा उत्पादन में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की बात है तो देश के कुल रक्षा उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का कुल योगदान जहां 77 प्रतिशत है, वहीं निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत है। रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी साल-दर-साल लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2023-24 में कुल रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी जहां 21 प्रतिशत थी, वहीं अब इसमें दो फीसद का इजाफा हो चुका है। यह आंकड़ा भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में निजी क्षेत्र की तेजी से बढती भूमिका को स्पष्ट करता है। निर्यात के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वित्त वर्ष 2023-24 के निर्यात की तुलना में बीते वित्त वर्ष में 2,539 करोड़ रुपये यानी करीब 12.04 फीसद की बढत दर्ज की गई है। सरकार ने वर्ष 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपए के रक्षा निर्माण और 50,000 करोड़ रुपए के रक्षा निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इन महत्वपूर्ण गतिविधियों के माध्यम से भारत न केवल अपने आर्थिक विकास को नई गति दे रहा है, बल्कि एक वैश्विक रक्षा उत्पादन और विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर रहा है। आने वाले दिनों में भारत का रक्षा उत्पादन क्षेत्र तेजी, नवाचार और आत्मनिर्भरता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए तैयार है।
रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का सपना नरेंद्र मोदी ने देखा था। इसी सिलसिले में उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना और अभियान शुरू किया। इसके तहत तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में विशेष रक्षा गलियारा बनाने की तैयारी हुई। तमिलनाडु में तो काम तेजी से जारी है, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार भी इस दिशा में तेजी से सहयोग कर रही है। जब ये गलियारा तैयार हो जाएगा तो माना जाता है कि रक्षा उत्पादन में और तेजी आएगी और उसका निर्यात भी बढ़ेगा।
आज अगर भारत रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात कर रहा है तो इसकी वजह है कि सरकारी नीतियों में आया बदलाव जिनकी वजह से भारतीय रक्षा उत्पादन क्षेत्र लगातार देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इन नीतियों ने रक्षा क्षेत्र को आयात-निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाया है। इसके तहत रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया को जहां साल 2020 में ज्यादा सरल बनाया गया, वहीं रक्षा उत्पादन की खरीद प्रक्रियाओं को भी सहज और पारदर्शी बनाया है। इतना ही नहीं सरकार ने सकारात्मक ढंग से स्वदेशीकरण की सूची तैयार की है। इसी सिलसिले में,सरकार ने हजारों रक्षा वस्तुओं की सूची जारी की है, जिन्हें केवल घरेलू उद्योगों से खरीदा जाएगा, जिससे आयात निर्भरता और भी कम हुई है। सरकार ने रक्षा के उत्पादन को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की दिशा में रक्षा उपकरण उत्पादन में विदेशी निवेश को 74 प्रतिशत तक कर दिया है। इसके साथ ही लाइसेंसिंग प्रक्रिया भी सरल कर दी गई है। इसका ही असर है कि रक्षा उत्पादन के लिए तेजी से निजी क्षेत्र के लोग भी कदम बढ़ा रहे हैं। सरकार ने एक और बेहतर कदम उठाया है। सरकार ने सृजन यानी SRIJAN पोर्टल के माध्यम से 19,500 से अधिक रक्षा वस्तुओं को स्वदेशीकरण के लिए पहचाना है, जिसमें निजी क्षेत्र के एमएसएमई की भूमिका कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मोदी सरकार का लक्ष्य 2030 तक रक्षा उत्पादन को ₹3 लाख करोड़ तक पहुँचाने का है। हालांकि इस सिलसिले में उन्नत तकनीक की निर्भरता बढ़ रही है। हालांकि पुराने लोग कहते हैं कि प्रोद्योगिकी में आत्मनिर्भरता हासिल करना, अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करना।
बेहतर होगा कि रक्षा उत्पादन में शामिल प्रमुख कॉर्पोरेट और सार्वजनिक इकाइयों को जान लें। ये इकाइयां हैं,
इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य उपक्रम हैं, आयुध कारखाना बोर्ड (OFB) से पुनर्गठित 7 नई कंपनियां: मुनिशन्स इंडिया लिमिटेड (MIL), आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL), एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWE India), ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड (TCL), यंत्र इंडिया लिमिटेड (YIL), इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (IOL), और ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड (GIL)।
रक्षा उत्पादन में शामिल प्रमुख निजी कार्पोरेट हैं,
जहां तक भारत के उत्पाद की बात है तो अब देश स्वदेशी रूप से ब्रह्मोस मिसाइल, आर्टिलरी गन और रडार जैसे 65 प्रतिशत से ज्यादा महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों का घरेलू स्तर पर निर्माण कर रहा है। जिस तरह नीतियों निजी उद्योग को मौका दिया है, उससे आने वाले दिनों में निजी क्षेत्रों की भागीदारी और ज्यादा बढ़ेगी, रक्षा उपकरण और भी ज्यादा संख्या में स्वदेशी होंगे।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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